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जावेद आलम खान की कविताएँ

जावेद आलम खान
(1) मैं मीठा नहीं हूँ

मेरे गीत को सुनकर तुमने एक बार कहा था
तुम्हे मिठास की जरूरत नहीं
तुम्हारी आवाज में नमक घुला है
मैं इस नमक को पी जाना चाहती हूँ

उसी दिन से मैंने मधुरता से बैर ठान लिया
मैंने अपने भीतर का सारा मधु निचोड दिया
मधुमास में प्रणय गीत लिखना छोड दिया

उदास रातों में दर्द से कराहती आँखें
कभी नम नहीं होती
इसलिए नहीं कि मेरे आँसू सूख चुके हैं
बस इन्हे एक वादा निभाना है
कुछ और बचे न बचे
भीतर का नमक जरूर बचाना है








(2) बुद्ध की मुस्कान

वफादारी का उदाहरण ढूँढने
मैं जब भी स्मृति की खोह में घुसा
मुझे भीतर से टूटी हुई उस लडकी का
सख्त चेहरा याद आया
जो अपने प्रेमी से निर्णायक स्वर में कहती है
मैं अपने पिता को नही छोड सकती

मैने जब भी मजबूरी को परिभाषित करना चाहा
तब मुझे लडकी नहीं लडकी का पिता याद आया
जिम्मेदारियों के बोझ से दबा
लडकी के लिए खुशियों का
स्वप्न लोक तैयार करने वाला आदमी
जिसके आँसुओं की सरस्वती
हृदय के गर्भ में ही सूख जाने को अभिशप्त है

मैंने जब-जब ढूँढना चाहा अभिशापों का उत्स
तब कोई चेहरा याद नहीं आया
बल्कि दुखों की खोज करते बुद्ध वाली फीलिंग आई
जंगल, पहाड और गुफाओं में भटकने की बजाय
मुझे मन की खोह में उतरना पडा
जिसके घने अँधेरे में अभिशाप
इज्जत, मान, मर्यादा के अलग-अलग नामों में छुपकर
कहीं दुबककर मुँह छिपाए बैठा था

मुझे अब कुछ भी ढूँढना नही था
सभी परिभाषाएँ मेरे सामने नाच रही थी
और मैं इन सबसे बेखबर
बुद्ध की मुस्कान में डूब रहा था





(3) कवि बेचैन रहने के लिए अभिशप्त है

पराजित मन में गर्भस्थ निराश कविताएँ
बहुत कष्ट देती हैं जन्मने से पहले
और बधाई मिलती है इनके जन्म के बाद

उदासी किसी चील की तरह झपटती है
और प्रेम की लालिमा फीकी हँसी बनकर
चेहरे पर फँसकर रह जाती है

झील को निहारते हुए कई बार
मेरी सौंदर्य की प्यास
भूखे की आँख में बदल जाती है
और मछली झील से ज्यादा जरूरी हो जाती है

करूण गीत दरअसल हमदर्दी की याचना है
जो आँसुओं का आचमन करके
स्वाभिमान को पादुकाओं में धारण करके
पीडाओं के वर्क में लपेटकर निवेदित किए जाते हैं
और उन पर ताली बजते हुए देखना
कविता की सबसे बडी विडम्बना है

कवि इसी विडम्बना में जीता है
प्रेम उसकी जमापूँजी है सौंदर्य आँख की भूख
हंसी उसकी व्यंजना की थैली में बँधी रहती है
और शान्ति महज उपदेशों की प्रतिछाया में
आँख में करुणा है ह्रदय चिरोत्तप्त है
कवि बेचैन रहने के लिए अभिशप्त है


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