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गाँधीः एक व्यावहारिक दार्शनिक की प्रासंगिकता

मनोज मोहन
अहिंसक प्रतिरोध को एक राजनीतिक अवधारणा का रूप देने में जिन विचारकों का महत्त्वपूर्ण योगदान है, उनमें थोरो, तोलस्तोय और महात्मा गाँधी सर्वाधिक उल्लेखनीय हैं और महात्मा गाँधी ने तो न केवल वैयक्तिक, बल्कि सामूहिक स्तर पर उसका सफल प्रयोग किया।
अहिंसा की संस्कृति, नंदकिशोर आचार्य डॉ.सरोज कुमार वर्मा की किताब गाँधी भविष्य का महानायक गाँधी की डेढ सौवीं जयंती पर उन्हें याद करते हुए लिखा है, और वे इस बहाने आज के समय-संदर्भ में उनके विचारों की प्रासंगिकता की खोज भी कर रहे हैं। जबकि आज इक्कीसवीं सदी में एक ऐसी युवा पीढी साँस ले रही है जिसके बारे में समाज वैज्ञानिक सतीश देशपाण्डे कहते हैं कि गाँधीजी जैसे शख्सियत पर आज तक हमारे देश ने एक प्रौढ रवैया नहीं अपनाया है। अभी तक हमारा जो नजरिया है, जो परिप्रेक्ष्य है, उसमें एक अजीब-सा बचपना है। हम शुरू में नतमस्तक हो जाते हैं या फिर हम उन्हें कोसने लग जाते हैं। उनके बीच का जिसे मैं प्रौढ नजरिया कह रहा हूँ, जिसमें आप इंसान को इंसान समझकर उसकी खूबियों को, उसकी कमियों को, उनके सारे उजले पक्ष को ध्यान में रखते हुए या तो आप उसे फरिश्ता बना डालते हैं या फिर एक किसी प्रकार का राक्षस। इस प्रवृत्ति से हम अभी तक उबर नहीं पाए है। डॉ. सरोज कुमार वर्मा सिर्फ दर्शनशास्त्र पढाते ही नहीं हैं बल्कि उनका अनुराग दर्शन के प्रति और गहरा है, तभी वे रजनीश, विवेकानंद, और टैगोर की चिंतनधारा से गुजरते हुए अपनी भूमिका में कहते हैं कि अतीत का कोई भी विचार, चाहे वह अपने वक्त के कितने भी अंतर्विरोधों को दूर करने मे सक्षम रहा हो, यदि वर्तमान की जटिलताओं को सुलझा पाने में समर्थ नहीं है, तो आज के लिए प्रासंगिक नहीं हो सकता। उनका पहला आलेख हिंद स्वराज : गाँधी का सभ्यता दर्शन में हिंद स्वराज की बीज-पुस्तिका मानते हुए लिखते हैं कि वे अपने सभ्यता-दर्शन में इस भोगवादी जीवन-पद्धति और मूल्यों को सिरे से नकारते हुए एक ऐसे आध्यात्मिक जीवन और मूल्य-बोध का प्रतिपादन करते हैं, जिसमें मनुष्य भीतर से समृद्ध होकर अपनी संवेदनशीलता और सृजनात्मकता को अक्षुण्ण रखते हुए सार्थक जीवन जीता है। यह भी सत्य है कि सौ साल बाद भी अभी के सर्वनाशी समय में सर्वसुरक्षा के लिए गाँधी के हिंद स्वराज के विचार ही काम आएँगे। नारायण देसाई कहते हैं कि गाँधीजी को देश की उस काल की दशा बदलनी थी। उनको गरीबी दूर करनी थी, बेकारी दूर करनी थी, असमानता दूर करनी थी, गंदगी दूर करनी थी, रोग दूर करने थे और अज्ञान दूर करना था। गाँधीजी इन सब के लिए गुलामी को दूर करने का महत् कार्य किया। यह दुर्भाग्य है कि आज भी समाज में अधिकांश मनुष्य की जो दशा है, उसे दूर करने के खातिर हमें गाँधीजी ही प्रेरक व्यक्तित्व के रूप में याद आते हैं। उनके प्रेरक व्यक्तित्व बनने के उत्स को हिंद स्वराज में देखा जा सकता है। तभी तो रमेशचंद्र शाह का मानना है कि गाँधी जिस तरह से हिंद स्वराज्य में वेद-वेदांत की दुहाई नहीं देते, बल्कि वे संस्कृति के सुपरस्ट्रक्चर की जगह इंफ्रास्ट्रक्चर को तरजीह देते हैं। एक दिलचस्प वाक्या का जिक्र गाँधी 1927 में कहते हैं कि उन्होंने 1915 में भारत लौटने तक चरखा नहीं देखा था। लेकिन वे यह मानते थे कि कोई भी चीज जो भारत की बहुसंख्य जनता को भीषण गरीबी से बाहर निकालने में मदद करेगी, वह उसी प्रक्रिया में स्वराज की स्थापना करेगी। सन् 1924 से 1944 तक के भारत प्रवास में ई.एम. फॉर्स्टर ने यहाँ के आत्मविस्मृत समाज के कारणों की पडताल करते हुए कहा था कि यहाँ के बुद्धिजीवी वर्गों में उन्हें अपने देश के आर्थिक और सांस्कृतिक प्रश्नों के बारे में किसी प्रकार की कोई सजगता नहीं दिखाई नहीं देती। आज उस वक्त में अठहत्तर वर्ष और जुड जाने के बावजूद भारत का बौद्धिक वर्ग राजनीति से ही आक्रांत है। सरोज कुमार वर्मा अपने लेख में सही कह रहे हैं कि गाँधीजी हिंद स्वराज में अपने सभ्यता-दर्शन के द्वारा उससे मुक्ति का ठोस मसौदा प्रस्तुत करते हैं। गाँधी इस मसौदे के द्वारा पहले भी भारत को राजनीतिक आजादी दिला चुके हैं और आज उसके बल पर वे उसे मानसिक आजादी भी दिला सकते हैं। डॉ. वर्मा यहीं नहीं ठहरते अतिरिक्त उत्साह के साथ यह भी जोडते चलते हैं कि न केवल भारत को, बल्कि संपूर्ण संसार को शोषण, हिंसा, आतंक और फरेब से मुक्त कर सकते हैं।
वे अपने दूसरे ही लेख में कहते हैं कि गाँधी अतीत के होते हुए भी भविष्य के महानायक हैं। और चूँकि वर्तमान इन दोनों के बीच में आता है, इसलिए वे स्वतः वर्तमान के महानायक हो जाते हैं। उनके महानायक होने के पीछे सुदूर अतीत का होकर भी शोषित भविष्य को देख पाने की उनकी क्षमता है। दूरदृष्टि की इसी क्षमता की बदौलत वे सौ साल पहले यह देख सके थे कि आनेवाले दिनों में में एक ऐसा तंत्र निर्मित होनेवाला है, जिसमें मुट्ठीभर समर्थ लोग दुनिया के शेष लोगों के शोषण की सुविधा हासिल कर लेंगे। आज जब हम भूमण्लीकरण और बाजारीकरण के साथ तीव्र मशीनीकरण की ओर बढते जा रहे हैं, जहाँ मनुष्य को मनुष्य बने रहने पर भी खतरे बढ रहे हों, तो सभी को हिंद स्वराज का याद आना लाजिमी हो आता है। डॉ. सरोज कुमार वर्मा भी इसे बीज-पुस्तिका मानते हैं और गाँधी का सभ्यता-दर्शन भी कहते हैं। इस छोटी-सी पुस्तक को गाँधी ने पाठक-संपादक संवाद शैली में लिखा भी है। इसे पढकर गाँधी के राजनीतिक गुरु गोखले ने खारिज कर दिया था, लेकिन स्वयं गाँधी बाद में लोगों को अपनी किताब पढने को सलाह देते हैं, यह कहकर कि मेरी राय में यह किताब ऐसी है कि यह बालक के हाथ में दी जा सकती है। यह द्वेषधर्म की जगह प्रेमधर्म सिखाती है, हिंसा की जगह आत्मबलिदान को रखती है, पशुबल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल को खडा करती है।
हिन्द स्वराज में गाँधी जिस आत्मबल पर जोर देते हैं, उसकी जरूरत जब आर्टिफिशियल इंटलीजेंस के जरिये तेजी से बढती हुई कंप्यूटर दक्षता और मशीनी रचनात्मकता के बीच यह अविश्वसनीय लेकिन बेहद भयावह खयाल है कि किसी दिन दुनिया का नियंत्रण मशीनों के सुपुर्द हो और इंसान केवल गुलाम बनकर रह न जाएँ, तब बढ जाती है। गाँधीजी हिंद स्वराज में पहले ही कह चुके हैं कि जहाँ यंत्र होंगे वहाँ बडे शहर होंगे। जहाँ बडे शहर होंगे वहाँ ट्रामगाडी और रेलगाडी होगी। वहाँ बिजली की बत्ती की जरूरत पडती है.... यानी सभ्य समाज यंत्रों के अधीन होगा। गाँधी चिंतन में पर्यावरण चिंता वाले लेख में डॉ. वर्मा कहते हैं कि तकनीकी अर्थ में भले उन्हें दार्शनिक नहीं मानते, लेकिन भविष्य को देखने की जो दूरदृष्टि उनके पास है। इस कारण वे उन्हें व्यावहारिक दार्शनिक तो मानते ही हैं। महात्मा गाँधी लोगों को संसाधनों के विवेकशील उपयोग करने की बात सदियों पहले कही थीं और अपव्यय की प्रवृत्ति से बचने की सलाह भी दी थी, उसकी जरूरत आज के खुले भोगवाद के प्रतिकार के लिए तो है ही। डॉ. वर्मा का भी कहना है कि गाँधी एक शताब्दी पहले उस खतरे के प्रति चिंतित हो पाए जो आनेवाले दिनों में भयानक तबाही मचाने वाला और समस्त प्राणी सहित संपूर्ण धरती को नष्ट कर देनेवाला था। यह खतरा पर्यावरण का था। वे गाँधी के इस विचार से भी सहमति रखते हैं कि भौतिक विकास को ही विकास का एकमात्र पैमाना न माना जाए। और हम प्रकृति से, जंगलों से उतना ही लें जितना कि इससे बेहतर हम अगली पीढी को दे सकें।
इस किताब का दूसरा खण्ड तुलनात्मक खण्ड है, जिसमें में डॉ. वर्मा गाँधी की अहिंसा को महावीर की अहिंसा के बरअक्स रखते हुए कहते हैं कि गाँधी की अहिंसा सत्य से भिन्न नहीं है। ऐसे भी गाँधी खुद स्वीकार करते हैं कि वे सत्य की खोज में अहिंसा तक पहुँचते हैं, जबकि महावीर अहिंसा को परम धर्म मानते हैं। महावीर की अहिंसा केवल मनुष्य से नहीं है, बल्कि इस चराचर जगत में उपस्थित हर जीव से है। सच इतना है कि सिर्फ महावीर के अनेकांतवाद का प्रभाव गाँधी के अहिंसा-दर्शन पर है। उसी तरह गाँधीजी की शिक्षा को लेकर जो विचार हैं, वह महर्षि अरविंद के विचार से ज्यादा व्यावहारिक है। अरविंद स्मरण शक्ति की अपेक्षा समझ पर ज्यादा जोर देते हैं, उनकी समझ है कि हम अच्छी तरह वही जान पाते हैं जिसे अच्छी तरह समझा हो, जबकि गाँधी शिक्षा के द्वारा मन और इंद्रियों के नियंत्रण तक ही सीमित रह जाते हैं। गाँधीजी ने अपने पूर्ववर्ती विचारकों के विचारों से जो उन्होंने व्यावहारिक समझा, उसे ही लिया। गाँधी के विचार अपने पूर्ववर्ती मूर्धन्य विचारकों से भले मेल न खाते हों, लेकिन उन्होंने उन विचारकों के आलोक में आजादी के बाद के भारत के लिए व्यावहारिक पहलुओं को अपने विचार में समाहित करने से गुरेज नहीं किया। गाँधी एक सतर्क सुधारक की भूमिका हमेशा निभाते रहे हैं, समानता का आध्यात्मिक लक्ष्य से परे वे कभी नहीं दिखे। यही कारण है कि डॉ. वर्मा भी अपने तमाम विश्लेषण के बावजूद यही कहते हैं कि गाँधी धुँधले नहीं होते, और न उनके विचार। गाँधी को परंपरा और आधुनिकता के आलोक में देखें, तो मौजूदा समय-संदर्भ में भी उनकी प्रासंगिकता है, और आगे आनेवाले समय में भी।

पुस्तक का नाम : गाँधीः भविष्य का महानायक
लेखक : डॉ. सरोज कुमार वर्मा
प्रकाशक : अनुज्ञा बुक्स,
वेस्ट गोरख पार्क, शाहदरा,
दिल्ली-110032
वर्ष : 2020
मूल्य : 450/-

सम्पर्क - एल.पी.-61/बी, पीतमपुरा,
दिल्ली- ११००३४
मो. ८५०६११४९१७