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मुकम्मल जहाँ की तलाश करती कविताएँ

देवेश पथ सरिया
मेरी ताजा पढत स्मृतियों में बसा समय पुस्तक के कवि चंद्रकुमार सहज कविताओं के कवि हैं। अलग-अलग मापदण्डों पर कविता लिखने के अलग-अलग तरीके हो सकते हैं। एक मापदण्ड यह है कि कविता की भाषा कैसी हो- तत्सम अथवा आम बोलचाल की भाषा? कुछ जानकार मानते हैं कि आसान कविता लिखना अधिक कठिन है। अलबत्ता मुझे लगता है कि दोनों ही तरह की कविता लिखना कठिन है। एक सतही* सहज कविता निराश कर सकती है, उसी तरह कुछ कविताएँ शब्दों में जटिल होते हुए भी निष्प्रभावी रहती हैं। कुछ युवा कवि तत्सम शब्दों युक्त कविताएँ लिख रहे हैं, पर कुछ अपवादों को छोडकर ऐसे अधिकतर युवा कवियों को अभी अपनी कविता के मानी की तलाश है। कुछ इन दोनों के बीच की कविता लिख रहे हैं और कला इत्यादि का प्रयोग कर उसे पठनीय बना रहे हैं। सिर्फ इतने पर निर्भर रहना फिलवक्त एक सुरक्षित तरीका है, पर दीर्घगामी नहीं। क्योंकि कला का आश्रय लेकर कविता में आगे जाने के लिए आपको उस कला में बहुत गहरे उतरना होगा। अन्यथा, आप दोहराव के शिकार हो जाएँगे।
राजस्थान की युवा कविता में बीते कुछ वर्षों में लोक संस्कृति का प्रभाव अधिक रहा है। चंद्रकुमार इस मामले में भिन्न कवि हैं। उनकी कविताएँ कस्बाई और शहरी जीवन जीते व्यक्ति के आत्म विश्लेषण की कविताएँ हैं। उसका नॉस्टैल्जिया में जाना उसे इस दरमियाँ घटित हुई फिसलन का एहसास दिलाता है। वह अपनी मनुष्यगत कमजोरियों की पडताल करता नजर आता है-
होने नहीं दिया
जो होना चाहता था
मेरी हूँ ने मुझे
चूँकि कवि की प्रकृति आत्मावलोकन की है, वह जीवन की धकापेल में नाकाम होते मंसूबों को दर्ज करता है। फिसलती रेत कविता में वह मानवीय रिश्तों की महीन बुनावट को समझने की कोशिश करता है। वहीं कवि यह भी मानता है कि कईं बार रिश्तों को समझने की तमाम कोशिशें नाकाम होती हैं और उस स्थिति में अकेला झाड जैसी कविता लिखी जाती है। उसकी स्मृतियों में बुजुर्गों की नसीहतें तैरती हैं। जाहिर है कि वह भूतकाल में विचरता है। इसी तबीयत की कविता, लौट आना, संग्रह की उत्कृष्ट कविताओं में से है। चंद्रकुमार के यहाँ अकेलेपन से निकलने की तडप, लौट आने की ललक बन जाती है। आँखों में नयापन बरकरार रख कवि भूतकाल से तालमेल बनाए रखने का एक रास्ता निकालना चाहता है-
आँखों में है
नयापन वह
पुराना नहीं होने देता
कुछ भी जो
मेरे लिए।
अंततः, नॉस्टैल्जिया के यथार्थ में न बदल पाने से हताश कवि मृत्यु को अपनी कई कविताओं का विषय बनाता है। वह तारों को अपना इकलौता ऐसा साथी मानता है, जो मरने के बाद उसे याद रखेंगे। मृत्यु और तारों के प्रति यह रूमानियत हिंदी में नई नहीं है, बल्कि तारों के प्रति प्रेम बचपन से ही व्यक्ति को परिकथाओं और विज्ञान दोनों से संपृक्त करता है। प्रकृति, अपने विभिन्न रूपों से, मनुष्य की संवेदनाओं का विस्तार कर उसे कला और कविता की दुनिया की तरफ उत्प्रेरित करती है।
प्रकृति पर कुछ कविताएँ हैं संग्रह में। जैसे, पुराना-नया हरा और छत्र-फूल, वसंत और बादलों की कविताएँ हैं। प्रकृति आधारित कविताओं में से प्यासा जल कविता प्रभावित करती हैर्
समन्दर है प्यासा
या कि प्यासी है नदी

मिलने पर कितने
आह्लादित होते हैं!
जल से बुझती जल की प्यास।
चंद्रकुमार की स्मृतियों की यंत्रणा शीर्षक कविता, राजस्थान के ही कवि प्रभात की कविता जहाँ वह शव था की याद दिलाती है। पर यह अनुभूति मुझे मात्र संवेदना के स्तर पर हुई। प्रभात की कविता की जडें लोकजीवन में हैं, जबकि चंद्रकुमार अंतर्द्वन्द्व से कविता उपजाते हैं। यथार्थ कविता श्रीमद्भगवद्गीता के कर्मफल भोगने के सिद्धांत को दोहराती है। पुस्तक में पिता की मृत्यु के उपरांत लिखी कविताएँ पिता-1,2 हैं, किंतु उनसे भी बेहतर कविता है अस्थि-विसर्जन। यह कविता इस संग्रह की स्मरणीय कविताओं में से है-
माँ का अंश है (भस्म)
ऐसे कैसे हाथ धो लूँ
कुछ तो रहे पोर-पोर में
जैसे वह रहेगी मुझमें
जब तक राख न हो जाऊँ।
इस कविता संग्रह में कई कविताएँ शब्दों, कविताओं की बुनावट और रचना प्रक्रिया के बारे में हैं?। कवि कलम के चलने और शब्दों के दर्ज किए जाने का पक्षधर है, भले ही लेखक कोई भी हो। उसका भरोसा शब्दों पर है। पगडण्डियाँ कविता में चंद्रकुमार कहते हैं कि शब्द की प्रार्थना कविता के भी पार जाने की है। यहाँ कवि शब्दों और कविता के इस ब्रह्माण्ड की सीमा को परिभाषित करता है और उन्हें लाँघ जाने की उम्मीद भी रखता है। इसी उम्मीद के पूरी होने पर साहित्य का विश्व पुनर्नवा होता है। कविता शीर्षक कविता भी लगभग इसी भाव की कविता हैर्
सार्थक हैं शब्द
जब खो देते हैं
खुद को
कविता होते हुए।
चंद्रकुमार अधूरी कविताओं से इसलिए लगाव रखते हैं क्योंकि वे एक क्रियाशील समय की गवाही देती हैं?। यह एक बात हुई। दूसरी बात यह कि अधूरी कविताओं को एक औपचारिकता के लिए पूरी कर देना कविता को अपना चरम बिंदु प्राप्त करने से रोकता है। धैर्य बडी तपस्या से हासिल होता है। चंद्रकुमार के यहाँ भी ऐसी कविताएँ मिलती हैं, जिन पर ठहर कर और काम किए जाने की संभावना दिखती है। मसलन, बहरा समय कविता जिस संदर्भ में लिखी गई है, यदि उसका जिक्र फुटनोट में न होता, तो अमूर्तन की गुंजाइश का विचार करते हुए भी वह घटना ध्यान में न आती। दुष्कर्म की घटनाओं के प्रति विरोध को अपनी विवशता पर केंद्रित करना कविता को मात्र प्रतिक्रियात्मक बनाता है, जबकि कवि इस समस्या की जड में जाकर कुछ कह सकता था। इसके विपरीत सन्नाटों का शहर एक बेहतरीन कविता है, जहाँ विषय का ट्रीटमेंट बहुत कसा हुआ है। इसी श्रेणी में पुरानी बस्ती कविता भी रखी जा सकती है, जिसने पूरे संग्रह में मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया-

आश्वस्त करता है धुआँ
खण्डित जरूर हैं
घर ही हैं
खण्डहर नहीं हुए हैं अभी!
संग्रह में प्रेम कविताएँ भी बहुत हैं। नदी और किनारा कविता में प्रयुक्त बिंब कुछ नये नहीं लगते। प्रेम कविता शीर्षक से भी एक प्रेम कविता पुस्तक में है, जो विरह के क्षणों में प्रेयसी को प्रेम कविताएँ पढने की ताकीद करती है र्
थोडा-थोडा ही सही
मैं मौजूद हूँ
दुनिया की अब तक की लिखी गयी
या लिखी जाने वाली
हर प्रेम कविता में।
प्रेम को परिभाषित करने के लिए प्रेमी होना पहली शर्त है, कवि होने से भी पहली। प्रेम की कितनी सारी परिभाषाएँ हैं, सबकी अलग-अलग। प्रेम कविताएँ भी कितनी तरह की। टूटन कविता का जिक्र करना यहाँ उचित होगा। इस कविता में चंद्रकुमार कहते हैं कि प्रेम उसी क्षण खत्म हो जाता है, जब हम प्रेम के पार सोचने की कोशिश करते हैं और तत्पश्चात कोई भी कोशिश मात्र एक दिलासा भर है। हालाँकि, इससे यह असहमति हो सकती है कि प्रेम टूट कर दोनों प्रेमियों के प्रयासों से पुनः जुडना भी है। दाम्पत्य जीवन का साहचर्य, प्रेम के इस स्वरूप का उदाहरण है।
चंद्रकुमार कुछ कविताओं में हिंदी कविता और उर्दू तहजीब के बीच आवाजाही करते नजर आते हैं। इसका एक नुकसान कहीं-कहीं कविता का फिल्मी हो जाना है (उदाहरण महकता प्रेम, सलीका और शब्द के पीछे का मौन कविताएँ )। ऐसी कविताओं में मुकम्मल जहाँ कविता, जिसका शीर्षक निदा फाजली साहब की गजल से लिया गया है, अपेक्षाकृत ठीक है।

चंद्रकुमार की कविताओं में एक समस्या सामान्यीकरण की भी है। मसलन, ये पंक्तियाँ देखिए-
बर्फ जब भी पिघलती है
बह पडती है
निर्मल झरना बन कर
बर्फ हर बार ऐसी जगह नहीं गिरती कि पिघलने पर झरना बनकर ही बह निकले। रूस के किसी मैदानी इलाके में गिरी बर्फ को झरना बनकर बहना कहाँ नसीब होगा? अपनी बात को दूसरी तरह कहकर कवि सामान्यीकरण से बच सकता था?। इसी तरह सपना और मौत कविता में कवि कहता है कि किसी ने अपनी मौत सपने में नहीं देखी। यह कथन यहीं गलत हो जाता है कि इस टिप्पणी का लेखक स्वयं कईं बार खुद को सपने में मरते हुए देख चुका है।
कुछ कविताओं (जैसे दस्तक और साये का रास्ता) में शब्दों की खिलंदडी, कवि का कौशल दर्शाती है। सुनी-सुनायी शीर्षक कविता जितने मुँह उतनी बातें लोकोक्ति से प्रेरित लगती है, जहाँ मुँहों की जगह कानों ने ले ली है। प्रेमाकांक्षा कविता में स्त्री का कथन कि पुरुष गुस्से को व्यक्त करने में कोताही नहीं बरतता, पर प्रेम को छुपा जाता है, वरिष्ठ कवि विष्णु नागर की कविता मैं पूछती हूँ की इन पंक्तियों की याद दिलाता है- .. एक बार घर से गए/तो घर को और मुझे भूल जाते हो/हार-थककर जब शाम को वापिस आते हो/तो प्यार करना तक बाहर भूलकर आते हो..। इससे इशारा मिलता है कि चंद्रकुमार में स्त्री विमर्श की कविताएँ लिखने की संभावनाएँ हैं। अलबत्ता, स्मृतियों में बसा समय पुस्तक में ऐसी कविताओं की कमी है, जबकि शब्दों और कविता पर केंद्रित कविताओं का अतिरेक है।
सहज कविताओं का यह कवि, जिसका यह पहला ही कविता संग्रह है, अभी उस यात्रा पर है जहाँ कविता सटीक निहितार्थ प्राप्त कर लेती है। यहाँ यह ध्यान देने की बात है कि वह गंतव्य की ओर अग्रसर है। वह छोटी कविताओं के शिल्प को बेहतर साध पा रहा है। आत्म से बाहर निकल कर व्यापक दृष्टि यदि वह विकसित करता है, तो कईं जरूरी मुद्दों पर दखल देती कविताएँ लिख पाएगा। विषयों की विविधता, मनोविज्ञान में गहराई तक पैठ, भाषा के साथ प्रयोग और बिंबों का सटीक चुनाव चंद्रकुमार की कविता में और निखार लेकर आएगा। स्मृतियों में बसा समय पढने के बाद ऐसा मेरा विचार है और सदाकांक्षा भी।
पुस्तक : स्मृतियों में बसा समय
लेखक : चंद्रकुमार
प्रकाशक : सेतु प्रकाशन, दिल्ली
प्रकाशन वर्ष : 2021
मूल्य : 140 रुपए
पृष्ठ संख्या : 104
विधा : कविता

सम्पर्क - C/o श्रीमती सरोज शर्मा, माडा योजना छात्रावास, पोस्ट ऑफिस के पास, राजगढ, अलवर- ३०१४०८