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साहित्यिक समाचार

शब्द रंग निर्बन्ध
कितना कुछ कहती कविता...
अमित कल्ला
साहित्य की मुख्यधारा के पटल पर उभरे अंतरराष्ट्रीय मंच पिकअप बुक क्लब और जवाहर कला केंद्र के संयुक्त तत्वाधान में पुस्तक परिचर्चा केंद्रित एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया।
जिसके अंतर्गत भरतीय ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार से सम्मानित जयपुर के युवा कवि चित्रकार अमित कल्ला द्वारा उनके हाल ही में प्रकाशित काव्य संग्रह शब्द कहे से अधिक पर गहनता के साथ बातचीत की गई।
क्लब के सिटी प्रेसिडेंट अक्षय गोयल और रिजनल ऑपरेशन ह के साथ हुए संवाद में अमित ने न केवल अपने संग्रह से चुनिन्दा कविताओं का पाठ किया बल्कि शब्द और रंगों के दरमियान होने वाली परस्पर रचना प्रक्रिया को आमंत्रित शब्द प्रेमियों और श्रोताओं के साथ संजीदगी से साझा भी किया, उनकी कविताएँ एक ओर जहाँ शब्द और दृश्य के बीच एक अनुपम संसार की निर्मिति करती हैं वहीं दूसरी ओर वे कितने ही रूप अरूपमयी बिंबों, प्रतीकों और असंख्य नामरूपों को प्रतिबिंबित करती अनुनयी भाव में विसर्जनीय दर्शन को भी बतलाती है।
अमित ने असल जीवन में कविता की उपस्थिति जैसे विषय पर ध्यान आकर्षित करवाने की कोशिश कि, उनके लिए कविता कल्पना और यथार्थ के बीच घटीत होने वाला तिलिस्म है, जो एक किस्म का सत्याग्रह भी है, एक ऐसा रास्ता है जो स्वयं को स्वयं से जोडता है, जीवन के असल अर्थों को उजागर करने में मददगार साबित होता है, भारत देश की बात करते हुए उन्होंने बताया कि ये गर्व की बात है हमारे संत कवियों ने कविता को ईश्वर बनाया, प्रक्रिया सम्मत शब्द चित्र की यात्रा का उल्लेख करते हुए अपने बचपन को उन्होंने सबसे बडी प्रेरणा बतलाया। इस अवसर पर कमला पोद्दार, अक्षय गोयल, दीपक शर्मा, अशोक तिवारी, विनोद गर्ग मौजूद रहे, रुचिता माथुर, नीता जोशी,प्रीति सिहाग, विजेता सांगरी, अंजू पुरोहित, रिया ने जिज्ञासा भरे कई सवाल पूछे गए जिनके कवि द्वारा यथासंभव उत्तर दिए गए जो अपने आपमें रोचकता भरे थे।
- डेस्क मधुमती
पाँच दिवसीय राष्ट्रीय नाट्यशास्त्र कार्यशाला
एक अद्भुत और जीवंत आयोजन

भरतमुनि द्वारा विरचित नाट्यशास्त्र नाट्य (नाटक एवं रंगमंच) पर सबसे विस्तृत एवं प्राचीन ग्रन्थ है। दूसरी शताब्दी ई. पू. संकलित नाट्यशास्त्र वास्तव में विश्वकोषीय प्रवृत्ति की एक कला है। नाट्यशास्त्र विभिन्न अनुशा सित विषयों और उपविषयों जैसे- संगीतशास्त्र, सौन्दर्यशास्त्र, शिल्पशास्त्र, वास्तुशास्त्र साहित्यशास्त्र जैसे विषयों की एक विशद श्रृंखला से भी संबंधित है तथा 37 अध्यायों में लगभग 6000 श्लोकों में पद्यरूप में निर्मित है। नाट्यशास्त्र की खोज उन्नीसवीं सदी में प्राप्त पाण्डुलिपियों और पाठ के बाद प्रकाशन के दौरान सौदर्यशास्त्र और रंगमंच के इतिहास की महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक ही है।
नाट्यशास्त्र ने गत दो सहस्त्राब्दियों से भारत में परम्पराओं के प्रदर्शन और साहित्यिक कलाओं व सौन्दर्य सिद्धान्तों के लिये एक प्रामाणिक स्रोत ग्रन्थ के रूप में कार्य किया है। एक बहुलवादी दृष्टिकोण के साथ विस्तृत व्याख्यात्मक नाट्यशास्त्र में अभ्यास और भारतीय रंगमंच की विविध धाराओं के बीच चर्चा के लिये सिद्धान्त की गतिशील प्रक्रिया को जन्म दिया है। नाट्यशास्त्र में ही परम्परागत रूप में विख्तरता और परिवर्तन की एक प्रक्रिया शुरू की है। साथ ही रंगमंच के भारतीय रूपों और क्षेत्रीय नाट्य के निर्वाह में मदद की है।
नाट्यशास्त्र ने न केवल भारत में बल्कि अन्य एशियाई देशों की नाट्य परम्पराओं में भागीदारी को सुनिश्चित किया है। नाट्यशास्त्र और क्षेत्रीय नाट्य के बीच सामंजस्य का विषय भारतीय थिएटर का एकतरफा मामला नहीं रहा है। नाट्यशास्त्र में ही क्षेत्रीय नाट्य परम्पराओं के पुनर्गठन में भी महनीय योगदान दिया है।
नाट्यशास्त्र के प्रत्यक्ष प्रदर्शन का अध्ययन प्रदान करने की दृष्टि से रंगमंच, नाटक और इस क्षेत्र में कार्यरत व्यक्तियों और छात्रों के लिये नाट्यशास्त्र से संबद्ध कला व इसकी समकालीन प्रासंगिकता की खोज के लिये राजस्थान कला एवं संस्कृति विभाग, राजस्थान संगीत नाटक अकादमी एवं राजस्थान संस्कृत अकादमी के संयुक्त तत्त्वावधान में पांच दिवसीय नाट्यशास्त्र कार्यशाला का राष्ट्रीय आयोजन दिनांक 13 दिसम्बर से 17 दिसम्बर 2021 तक जोधपुर में आयोजित हुआ । राष्ट्रीय नाट्यशास्त्र कार्यशाला का आयोजन राजस्थान में अपनी तरह का पहला अद्भुत और जीवंत आयोजन होने के साथ ऐतिहासिक अकादमिक आयोजन बन गया है।
संस्कृत मनीषी व नाट्यशास्त्र के एक मात्र अधिकृत अंतरार्ष्ट्रीय विद्वान श्री राधावल्लभ त्रिपाठी जी के कुशल नेतृत्व में भारत रत्न भार्गव, प्रोफेसर महेश चम्पक लाल, प्रोफेसर भरत गुप्त, प्रोफेसर भार्गव ठक्कर, डोली ठक्कर जैसे लोगों का कार्यशाला में पूर्णकालिक उपस्थित रहकर अपनी सृजना को साझा करना अपने आप मे महत्त्वपूर्ण है।
राज्य के कला संस्कृति मंत्री द्वारा उद्घाटन व मुख्यमंत्री द्वारा समापन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहना, अपने आपमें आयोजन की गरिमा व श्रेष्ठता को रेखांकित करता है ।
राज्य के कला एवं संस्कृति मंत्री डॉ. बी.डी. कल्ला ने कार्यशाला का उद्घाटन करते हुए कहा कि - नाट्यशास्त्र ढाई हजार वर्ष पुरानी भारत की अनमोल विरासत है संसार की कोई ऐसी कला, ज्ञान, शिल्प, विद्या, योग कर्म नहीं है,जो नाट्यशास्त्र का अंग न बन सके । नाट्य में असंख्य ज्ञान सागर समाहित हैं ।नाट्य पंचम वेद है । नाट्य में तो तीनों लोकों के भावों का प्रस्तुतिकरण होता है । कहीं धर्म,कहीं क्रीडा,कहीं अर्थ,कहीं श्रम,कहीं हास्य, कहीं युद्ध कहीं काम तथा कहीं वध है । ये दुख से,थकावट से, शोक पीडित दीन दुखियों को विश्राम देने वाला है । ये धर्म ,यश,आयु और बुद्धि का संवर्धक है।
ऑनलाइन एवं ऑफलाइन मोड पर आयोजित हो रही इस राष्ट्रीय नाट्यशास्त्र कार्यशाला के उद्घाटन समारोह में अध्यक्षता कर रहे विश्व विख्यात संस्कृत एवं नाट्य मनीषी प्रोफेसर राधावल्लभ त्रिपाठी ने कहा कि-
नाट्यशास्त्र पर केंद्रित पांच दिन की कार्यशाला प्रदेश में अपने ढंग का पहला आयोजन है। नाट्यशास्त्र भारत की अनमोल विरासत है। ढाई हजार साल पहले संस्कृत में रचा गया यह ग्रंथ भारतीय कलाओं का विश्वकोश है तथा साहित्यशास्त्र, सौन्दर्यशास्त्र और नाट्यचिन्तन का भी मूलाधार है। इस कार्यशाला के माध्यम से युवा रंगकर्मी भरतमुनिकृत नाट्यशास्त्र का प्रामाणिक परिचय प्राप्त कर के अपने प्रयोगों को अपने देश की कलापरम्परा में डाल सकेंगे। भारत के राष्ट्रीय रंगमंच की खोज में भी यह कार्यशाला एक पडाव बनेगी।
कार्यऋम के मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए प्रख्यात फिल्म अभिनेता और रंगकर्मी रघुवीर यादव ने कहा कि यह कार्यशाला नाट्यशास्त्र की बारीकियों को समझने का एक बडा अवसर है। नाट्य शास्त्र में निहित रस, भाव और भनिति भंगिमाओं के प्रयोग नाट्यकारों को पूर्ण और परिष्कृत बनाते हैं। भारत के अभिनय संसार के लिए यह किसी वरदान से कम नहीं है ।नाट्यशास्त्र अभिनय का अनुशासन है।
कार्यक्रम का विषय प्रवर्तन करते हुए संगीत नाटक अकादमी के पूर्व अध्यक्ष एवं वरिष्ठ नाट्यकर्मी तथा इस कार्यशाला के संयोजक रमेश बोराणा ने कहा कि नाट्य शास्त्र का अध्ययन एक महायज्ञ है, जो हमें कला, सौंदर्य और साहित्य की पूर्णता का फल प्रदान करता है। इसमें संपूर्ण कलाओं के साथ सभी रस पूर्णता के साथ विद्यमान हैं। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में बोलते हुए कला एवं संस्कृति विभाग की प्रमुख शासन सचिव, गायत्री राठौड ने कहा यह राष्ट्रीय कार्यशाला नाट्य प्रेमियों, रंग कर्मियों, शोधार्थियों में एक नए उत्साह का संचार करेगी और कालांतर में यह एक मील का पत्थर साबित होगी।
कार्यक्रम में संगीत नाटक अकादमी के प्रशासक और संभागीय आयुक्त, जोधपुर डॉ.राजेश शर्मा ने बताया कि कोरोना कालखंड में राज्य सरकार द्वारा दी जा रही प्रोत्साहन राशि ने बडे स्तर पर कलाकारों को संबल प्रदान किया है। इस अवसर पर राजस्थान संस्कृत अकादमी द्वारा नाट्यशास्त्र कार्यशाला पर प्रकाशित विशेषांक संस्कृत सेतु का लोकार्पण किया गया । कार्यऋम का संचालन वरिष्ठ रंगकर्मी प्रियदर्शिनी मिश्रा ने किया और राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के सचिव अनिल कुमार जैन ने कार्यक्रम में आगंतुक अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन किया
भरतमुनि का रंगमंच देवों की उपस्थिति का अनुभव कराता है- त्रिपाठी
रंगमंच एक साधना है। भारतीय नाटक में मनुष्य अकेला नहीं, सारी सृष्टि का अंग है। सृष्टि के कण कण में देवता का वास है। भरतमुनि का रंगमंच देवताओं की उपस्थिति का अनुभव कराता है। रंगमंच को भरतमुनि ने नाट्य को एक यज्ञ बताया है। नाट्यशास्त्र में आगम और निगम का समन्वय करते हुए वैदिक यज्ञ और पौराणिक पूजा पद्धतियों के तत्त्व अपनाये। उक्त विचार प्रोफेसर राधावल्लभ त्रिपाठी ने नाट्यशास्त्र कार्यशाला के द्वितीय दिवस के प्रथम सत्र में नाट्यशास्त्र का अध्यापन करते हुए प्रकट किए। प्रोफेसर त्रिपाठी ने कल के सत्र में नाट्यशास्त्र के पहले और दूसरे अध्याय का अध्यापन करते हुए भारतीय नाट्य के उद्भव और नाट्यमंडप के निर्माण की विधि को स्पष्ट किया। आज के सत्रों में उन्होंने नाट्य मंडप में देवताओं के पूजन तथा नाटक के प्रारम्भ होने के पहले किये जाने वाले पूर्व-रंग के विधान की विस्तार से चर्चा की। अपने चौथे व्याख्यान में उन्होंने रस-भाव और नायक नायिका भेद को समझाया। द्वितीय दिवस के द्वितीय सत्र के अंतर्गत श्रीमती डॉली ठकर के द्वारा नाट्य में नृत्य की अवधारणा का स्पष्टीकरण करते हुए नाट्यशास्त्र के चतुर्थ अध्याय में वर्णित चारि, करण, रेचक, अंगहार के विषय में विस्तार से समझाया। नाट्य और नृत्य कला के समंवय का अद्भुत चित्रण उनके द्वारा किया गया।
पाँच दिवसीय कार्यशाला के द्वितीय दिवस का विषय प्रवर्तन करते हुए रमेश बोराणा ने कार्यक्रम प्रारंभ किया, जिसका समापन श्री भार्गव ठकर जी के नाट्य मंडप और गोवर्धन पांचाल ी के नाट्य प्रस्तुतियाँ विषयक चतुर्थ सत्र के द्वारा संपादित हुआ ।
रस, भाव और आंगिक अभिनय पर विस्तार से हुई चर्चा।
राजस्थान संगीत नाटक अकादमी व राजस्थान संस्कृत अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित राष्ट्रीय नाट्यशास्त्र कार्यशाला के तीसरे दिन प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने नाट्य शास्त्र के 6ठवें , 7वें, और 25वें अध्यायों का सार प्रस्तुत करते हुए रस और भाव के स्वरूप पर प्रकाश डाला तथा नाट्यशास्त्र के अनुसार नायक और नायिका के भेद की भी बारीकियाँ समझाई।
विषय प्रवर्तन करते हुए नाट्यविद रमेश बोराणा ने नाट्यशास्त्र की प्रासंगिकता का उल्लेख करते हुए भारतीय परम्परा की जडों से जुडने का आह्वान किया ।
कार्यशाला के प्रतिभागियों ने प्रो. त्रिपाठी के परामार्शनुसार रस और भाव की विभिन्न आशु नाट्य रचना करते हुए रोचक प्रस्तुतियाँ भी इस अवसर पर प्रस्तुत की।
द्वितीय सत्र के मुख्य वक्ता देश के जाने-माने रंगकर्मी, नाटककार, नाट्य समीक्षक और कवि भारतरत्न भार्गव थे। श्री भार्गव ने विश्व विख्यात नाट्य निर्देशक कावालम नारायण पणिक्कर की 50 वर्षों की रंगयात्रा के संबंध में अपने प्रत्यक्ष अनुभवों को साझा किया। पणिक्कर जी के साथ कई वर्ष कार्य कर चुके श्री भार्गव ने उनके अनेक नाटकों के हिन्दी अनुवाद भी किए हैं। उन्होंने भारतीय रंगमंच के लिए पणिक्कर जी के महत्त्वपूर्ण योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला।
अपराह्न के सत्र में प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने अपने व्याख्यान में नाट्यशास्त्र के 13वें अध्याय के आधार पर लोकधर्मी, नाट्यधर्मी और प्रवृत्ति के स्वरूप को विस्तार से समझाया तथा प्रतिभागियों को इन पर आधारित नाट्य प्रस्तुतियाँ करने के लिए प्रेरित किया।
अंतिम सत्र में देश की विख्यात भरतनाट्यम की नृत्यांगना व विष्यविज्ञ श्रीमती डॉली ठकर ने नाट्यशास्त्र सम्मत आंगिक अभिनय की कतिपय प्रस्तुतियों को प्रतिभागियों से तैयार करवाया और उन्हें आंगिक अभिनय की बारीकियाँ समझाई। इन प्रस्तुतियों में सुनील माथुर, शिल्पी माथुर, प्रियदर्शिनी, गुलनाज, दीपमाला, शब्बीर दादा, एस. पी. रंगा, अरू स्वाति व्यास आदि कलाकारों ने भागिता निभाई ।
सत्र के अंत में नाट्यशास्त्र की विधि से आधुनिक नाटको को प्रस्तुत करने की समस्याओं पर गहन विचार विमर्श हुआ।
नाट्यशास्त्र छन्द शास्त्र व काव्य शास्त्र का महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है
राजस्थान संगीत नाटक अकादमी व राजस्थान संस्कृत अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में चल रही नाट्य शास्त्र कार्य शाला के अंतर्गत आज चौथे दिन प्रो. राधा वल्लभ त्रिपाठी ने नाट्यशास्त्र के 14 वे तथा 15वे अध्यायों के अंतर्गत छन्द शास्त्र पर चर्चा की। उन्होंने छन्द शास्त्र की वेदों से चली आ रही परंपरा पर प्रकाश डाला और नाट्यशास्त्र और रंगमंच में छन्द की व्यापक भूमिका को रेखांकित किया। प्रो. त्रिपाठीजी ने नाट्यशास्त्र के 16वे अध्याय के आधार पर भारतीय काव्य शास्त्र की परंपरा पर प्रकाश डालते हुए बताया कि नाट्य शास्त्र जिस प्रकार छन्द शास्त्र का एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है, उसी प्रकार काव्यशास्त्र का भी उतना ही महत्त्व पूर्ण ग्रंथ है। नाट्य शास्त्र में अनेक शास्त्र समाये हैं और भारत की कला परंपरा के अनेक विषयों में पहली बार हमें नाट्य शास्त्र से ज्ञान मिलता है। नाट्यशास्त्र में अलंकार, गुण, रीति और काव्य के दोषों का भी विस्तार से निरूपण किया गया है।
अपने अंतिम व्याख्यान में श्री राधावल्लभ त्रिपाठी ने काव्य शास्त्र के 17 वे अध्याय में बताऐ गये वाचिक अभिनय की चर्चा की। उन्होंने बताया कि किस प्रकार आज के रंगकर्मी संवाद बोलने का अभ्यास नाट्य शास्त्र के इस अध्याय से सीख सकते हैं। कार्यशाला तब जीवित हो उठी जब अकादमी पूर्वध्यक्ष रमेश बोराणा , मदन बोराणा, रमेश बोहरा, पुष्पा, संगीता घोष, शिल्पी माथुर, हितेंद्र गोयल, गगन मिश्रा, प्रमोद वैष्णव, मोनिका वर्मा, दीपमाला, उम्मेद भाटी आदि रंगकर्मियों नेअनेक प्राचीन और आधुनिक नाटकों के मार्मिक प्रसंगों की प्रभावी प्रस्तुति से वातावरण रंगमय बना दिया।
अंतिम व्याख्यान नाट्यशास्त्र के जाने माने अध्येता प्रो. भरत गुप्तजी ने नाट्यशास्त्र के संगीत सिद्धांत पर दिया। उन्होंने नाट्य शास्त्र में बताये गए संगीत सिद्धांतों की आज के आधुनिक संगीत सिद्धांतों से तुलना, स्वयं के गायन और वादन का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हुए की। उन्होंने नाट्य शास्त्र के जाति, श्रुति, गांधर्व, स्वर आदि के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए नाट्यशास्त्र में संगीत पर विस्तृत चर्चा की। इस रोचक व्याख्यान में प्रतिभागियों ने रंग मंच में संगीत संबंधी अपनी समस्याओं पर उनसे परामर्श भी प्राप्त किया।
सरकार प्रदेश में कला संस्कृति के प्रोत्साहन व संरक्षण हेतु सदैव तत्पर - गहलोत
पाँच दिवसीय राष्ट्रीय नाट्यशास्त्र कार्यशाला के समापन सत्र को सम्बोधित करते हुए राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने कहा कि नाटक समाज मे बदलाव व हकीकत सामने लाने का प्रभावी जरिया है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी भी सत्यवादी राजा हरिशचंद्र और माता-पिता भक्त श्रवण कुमार के नाटक से काफी प्रभावित हुए और इससे उनके जीवन में बडा बदलाव आया। उन्होंने कहा कि बॉलीवुड सहित देश के कलाकारों एवं साहित्यकारों ने राजभाषा हिंदी को लोकप्रिय बनाने में बडा योगदान दिया है। आचार्य भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में नाटकों के विभिन्न भेदों और सिद्धांतों की व्यापक व्याख्या की है। उन्होंने कहा कि राजनीति, धर्म, जीवन, समाज और दुनिया से जुडे नाटक सही मायने में जन कल्याण का माध्यम है।
समारोह को सम्बोधित करते हुए राज्य के कला संस्कृति मंत्री डॉ. बी.डी. कल्ला ने कहा कि नाट्यशास्त्र भारतीय संस्कृति का महान ग्रन्थ है जिसे पंचमवेद भी कहा जाता है और इस ग्रन्थ में जीवन के सभी पक्षों की अवधारणा व कलाओं का विस्तारित विधान उपलब्ध है, जिसे संरक्षित करने की महती आवश्यकता है । कार्यशाला के संयोजक व राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के पूर्व अध्यक्ष नाट्यविद रमेश बोराणा ने समारोह का संचालन करते हुए मुख्यमंत्री को राज्य के नाट्य व सांस्कृतिक परिदृश्य से अवगत कराया, साथ ही मुख्यमंत्री जी द्वारा समय समय पर प्रदेश में कला व कलाकारों के उत्थान हेतु किये गए प्रयासों का उल्लेख करते उनके प्रति आभार भी ज्ञापित किया। कला संस्कृति की प्रमुख शाशन सचिव गायत्री राठौड ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यशाला के विषय व उद्देश्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
समारोह को कार्यशाला के निदेशक व संस्कृत मनीषी प्रोफेसर राधावल्लभ त्रिपाठी ने सम्बोधित करते हुए मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि राजस्थान कला संस्कृति की उर्वरा भूमि है यदि यहाँ भरतमुनि के नाट्यशास्त्र सम्मत रंगशाला का निर्माण किया जाता है तो देश मे एक अभिन्नव कार्य होगा। दिल्ली से आए विषय विज्ञ प्रोफेसर भरत गुप्त ने भी मुख्यमंत्री के प्रयासों की सराहना करते हुए उक्त कार्यशाला को एतिहासिक व फलित बताया। इस अवसर पर प्रोफेसर राधावल्लभ त्रिपाठी सम्पादित पुस्तक नाट्यशास्त्र का लोकार्पण भी किया गया।
इससे पूर्व दिन में कार्यशाला के अंतिम दिन के तीनों सत्रों के मुख्य वक्ता प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी थे, जिन्होंने नाट्यशास्त्र के 18वें, 19वें और 20वें अध्याय के बारे में बताया तथा अभिनय की बारीकियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। कार्यशाला के अंतिम सत्र में उन्होंने कांसेप्ट ऑफ सिद्धि नाट्यशास्त्र के अध्याय 37 के बारे में प्रतिभागियों को सरलता से समझाया। इस अवसर पर सभी प्रति भागियों को प्रमाणपत्र वितरित किये गए और उनकी भावाभिव्यक्ति को भी सुना गया । अंत मे कार्यशाला के संयोजक रमेश बोराणा ने सभी अतिथि विषय विशेषग्यो का आभार व्यक्त करते हुए इस कार्यशाला के दूरगामी व सार्थक परिणाम निकलने व पुनः शीघ्र मिलने की कामना के साथ प्रतिभगियों को संवर्धित होने की बधाई प्रदान की ।
सभी विष्यविज्ञों को स्मृति चिन्ह भी प्रदान किए गए। पाँच दिवसीय यह वर्कशॉप ऑफलाइन और ऑनलाइन मोड पर आयोजित हुई, जिसका देश विदेश में कला व सहित्यनुरागियों ने लुत्फ उठाया ।
कार्यशाला समाप्ति पश्चात काव्य गोष्ठी का भी आयोजन किया गया, जिसमे प्रोफेसर राधा वल्लभ त्रिपाठी के साथ भारतरत्न भार्गव, रमेश बोराणा, उम्मेद भाटी, डॉ हितेंद्र गोयल, रमेंश बोहरा, प्रोफेसर सरोज कौशल ने भी अपनी काव्य रचनाएं प्रस्तुत की।
इस कार्यशाला की परिकल्पना व सफल आयोजन के लिए पर्दे के पीछे प्रमुख भूमिका निभाने वाले संस्कृत अकादमी के निदेशक प्रोफेसर संजय झाला के नाम का यदि उल्लेख व धन्यवाद ज्ञापित न किया जाय, तो कृतघ्नता ही होगी ।
- रमेश बोराणा
अनामिका अनु को राजस्थान पत्रिका का सर्वश्रेष्ठ कवयित्री पुरस्कार
राजस्थान पत्रिका के वार्षिक सृजनात्मक पुरस्कारों की श्रृंखला में वर्ष 2021 के प्रथम सर्वश्रेष्ठ कवयित्री के रूप में श्रीमती अनामिका अनु का चयन किया गया।
पत्रिका समूह के परिशिष्टों में होने वाली कहानियों और कविताओं में प्रथम और द्वितीय का चयन करके दोनों विधा के रचनाकारों को प्रति वर्ष सम्मानित कर क्रमशः इक्कीस हजार और ग्यारह हजार रुपए की राशि भी भेंट की जाती है। इस वर्ष निर्णायक मण्डल ने परिशिष्ट खुशबू (07.04.2021 ) में प्रकाशित उनकी कविता प्रवासी प्रिय को सर्वश्रेष्ठ कविता के रूप में चुना गया है।
-डेस्क मधुमती