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मातृभाषा और साहित्यः आत्मसम्पन्नता का मार्ग

-ब्रजरतन जोशी
भाषा किसी भी समाज के चिन्तन, विवेक, प्रगति और संस्कृति का आधार ही नहीं, मूलभूत आवश्यकता भी है। भाषा मानवीय ज्ञान को संगठित, व्यवस्थित कर चिरकाल तक संचित रखती है। इतना ही नहीं वह समाज को अधिक मानवीय, प्रगतिशील, सजग, विवेकवान और तर्कनिष्ठ भी बनाती है।
संसार के सभी शास्त्र और ज्ञान-विज्ञान की पद्धतियाँ एकमत और एकस्वर में यह निरन्तर उद्घोष कर रहे हैं कि मनुष्य शिक्षण के माध्यम रूप में मातृभाषा निर्विकल्प है। मातृभाषा के माध्यम से ही हम मौलिकता, विचार और बुद्धि के मार्ग पर आसानी से बढ सकते हैं। बिना मातृभाषा के आत्मसम्पन्नता की राह अति कठिन है। विचारकों का एक वर्ग तो यह भी कहता है कि जो भी चीज हमारे रक्त में ही नहीं है, उसका वजूद हमारे आत्मपूरित होने की राह में बडी बाधा बनता है। निजभाषी (मातृभाषा) और परभाषी के तेज और पराक्रम में उतना ही अन्तर है, जितना बिजली के प्रकाश और सूर्य के नैसर्गिक प्रकाश में है। प्रकाश दोनों ही हैं, पर दोनों की प्रकृति, सत्त्व और उपादेयता में जमीन-आसमान का अन्तर है।
राजस्थानी भाषा एवं साहित्य के विशेष संदर्भ में विचार करता हूँ, तो पाता हूँ कि पिछले दशकों में राजस्थानी में उत्साही और संख्यात्मक लिखने वालों की मात्रा में तो भारी ईजाफा हुआ है, पर राजस्थानी को विचार की भाषा बनाने की प्रक्रिया उतनी ही मन्दहै। जब मैं राजस्थानी को विचार की भाषा बनाने की बात कर रहा हूँ, तो इससे मेरा तात्पर्य है कि राजस्थानी में ज्ञान के विविध-अनुशासनों की पुस्तकें और तत्सम्बन्धी शब्दावली के विकास का अभाव है। साथ ही राजस्थानी भाषा को सार्वजनिक जीवन की भाषा बनाने की राह पर अभी कार्य होना शेष है।
आज राजस्थानी के पास विश्व साहित्य एवं साहित्येत्तर ज्ञान की उत्कृष्ट पुस्तकें लगभग नगण्य हैं। क्योंकि इस तरफ रचनाकारों या मायड के हेताळुओं का ध्यान ही नहीं जा पा रहा है। जबकि उत्कृष्ट साहित्य की रचना, अनुभव जगत की समृद्धि एवं विस्तार के लिए, ज्ञान परिसर में सक्रिय अन्य अनुशासनों से जुडे रहने से हमारी रचनात्मकता और साहित्यिकता को बल मिलता है।
राजस्थानी भाषा की अपनी मिट्टी और पानी में वह ताकत है कि जिसके माध्यम से वह समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, दर्शन, विज्ञान, नृतत्त्वशास्त्र आदि विषयों की सम्पन्नता में अपना योग दे सकती है। अगर आज राजस्थानी को विचार की भाषा बनाने की राह में बडी बाधा की ओर गौर करें, तो यह वही मानसिकता है जो हिन्दी के विचार की भाषा होने की राह में है। सबसे पहले तो हमें अपनी औपनिवेशिक दास्ताँ से उत्पन्न हीनताबोध पर ध्यान देना जरूरी है। यह मानसिक दास्ताँ इस कदर हावी है कि आज मातृभाषा में शिक्षण तो दिवास्वप्न हो ही गया है, और तो और मातृभाषा का प्रयोग घर में करने से भी अभिभावक हीन भाव महसूस करने लगे हैं। अपनी जडों के प्रति ऐसी उदासीनता असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा है।
ध्यान रहे कि अपनी भाषा में रचना, सोचना, विचारना किसी अन्य भाषा के अस्तित्व और परम्परा को हीन मानना या अस्वीकार करना नहीं है। बस, हमें तो अपनी मिट्टी और पानी की ताकत से अपने विचार रूपी नवांकुरों को हरे-भरे ज्ञानवृक्षों में बदलने की निरन्तर कोशिश करते जाना है। विश्व साहित्य में हेगेल, न्यूटन, आंईस्टीन, हाईजेन्बर्ग आदि द्वारा अन्वेषित दुनिया के अधिकांश मौलिक ज्ञान का अभ्युदय उनकी अपनी मातृभाषा में हुआ है। हिन्दी में यशदेव शल्यजी का दर्शन के क्षेत्र में अपनी भाषा हिन्दी में निरन्तर काम करते हुए नई शब्दावली को विकसित करना ऐसे ही श्रेष्ठ रचनात्मक कर्म का उदाहरण हैं जिन पर मायड का हेताळु विचार-व्यवहार कर सकता है।
यह भी विचारणीय है कि किसी भी भाषा के रचनात्मक विकास में पाँच घटकों की भूमिका निर्विवाद मानी जाती है। ये पाँच घटक हैं- शिक्षा, शोध, नवाचार, विज्ञान और तकनीकी उद्यमिता। दुनिया के कईं राष्ट्र इसका उदाहरण है। हम अपने पडौसी चीन को ही लें, उनकी संपूर्ण शिक्षा चीनी भाषा में है। उत्पादन, नवाचार और माँगपूर्ति की समस्त श्रृंखला को जोडने वाली भाषा चीनी है। इसी कारण आज चीन विश्व बाजार एवं राजनीति में एक अहम् देश है।
राजस्थानी भाषा के सन्दर्भ में इन पाँच घटकों को देखें, तो साफ दिखाई देता है कि राजस्थानी भाषा अपने ही प्रदेश में शिक्षण का माध्यम नहीं है। शोध का स्तर तो हिन्दी में भी औसत ही है, तो राजस्थानी में शोध की बेहतर संभावनाओं के बारे में तो क्या कहा जाए। राजस्थानी भाषा में विज्ञान और तकनीकी व उद्यमिता के क्षेत्र में तो अभी लगभग शून्य है। जब तक राजस्थानी का लेखक इन पाँच प्रमुख घटकों का विचार करते हुए अपनी भाषा और संस्कृति के स्वाभिमान एवं स्वालम्बन की ताकत अर्जित कर उसे प्रदर्शित नहीं करेगा, भविष्य की राहें कठिन ही रहेगी।
राजस्थानी भाषा और साहित्य को स्वावलम्बन के मार्ग पर आगे बढाने के लिए मातृभाषा में यानी राजस्थानी शिक्षण को बढावा देना होगा और अपने आस-पास के परिवेश के प्रति संवेदनशील, वैज्ञानिक दृष्टि सम्पन्न व्यवहार करते हुए अछूती, अस्पर्शी और नई राहों की खोज करते हुए अपनी विकास यात्रा को सार्थक साबित करना होगा। अपने बडे लेखकों की रचनाओं की अर्थ मीमांसीय, सौन्दर्यशास्त्रीय व्याख्याएँ कर समकालीन संवेदना के साथ उनके रिश्ते की पडताल करनी होगी। वस्तुनिष्ठ दृष्टि से यह देखना होगा कि राजस्थानी का रचनाकर अपनी भाषा और विधा के साथ रचना प्रक्रिया के अहम पडावों की यात्रा को कितनी सजगता से सम्पन्न करता है। विधा रूपों के प्रति उदासीनता के भाव को त्यागकर, अनुभव की आकृति और संरचना के साथ उसके सम्बन्ध पर सूक्ष्म दृष्टि से विचार करना होगा। अनुवाद के माध्यम से विश्व साहित्य पटल पर नित नूतन सामने आ रहे विमर्शों एवं चिन्तकों के प्रमुख विचार एवं उनकी पारिभाषिक पदावलियों को राजस्थानी में रूपान्तरित कर राजस्थानी आलोचना को समृद्ध करना होगा। पद्मश्री चन्द्रप्रकाश देवल, नन्द भारद्वाज और दूलाराम ने इस दिशा में बढने की पहल भी की है। इसी दिशा में विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में राजस्थानी की क्लासिक कृतियों के ऑडियो बुक्स, ईबुक्स और रचनाकारों के पॉडकॉस्ट जारी करना आदि की तरफ जाकर भाषा स्वावलम्बन की राह को आसान बनाया जा सकता है।
विज्ञान एवं तकनीकी के उपयोग से उद्यमिता का मार्ग आसानी से खुलेगा। बाजार की माँग के अनुरूप, उसकी पूर्ति के लिए उत्पादन पर जोर पडेगा, तभी सारा आर्थिक चक्र हमारी भाषा की ताकत के बल पर आगे बढ सकेगा।
हमारा समय विज्ञान और प्रौद्योगिकी का समय है। आज सभी उन्नत भाषाएँ स्टेम एड्यूकेशन के मार्ग पर आगे बढ रही है।

स्टेम यानी साईंस, तकनीक, इंजीनीयरिंग और मैथ्स (गणित)। हमें यह विचार करना होगा कि इस नवीन ज्ञान को अपनी देशज परम्परा से जोडने के लिए हमारे समय के लेखक-विचारक क्या कर रहे हैं। पाणिनी ने हजारों वर्ष पूर्व कहा कि शास्त्र के पास जब शब्द नहीं हों, तो वह लोक के पास जाता है। जैसे हम कुम्हार के पास घडा आदि बनाने के लिए जाते हैं। रचनाकार अपने सर्जक व्यक्तित्व के अहं से विमुक्त होकर लोक, व्याकरण, अन्य अनुशासनों और देसी परम्पराओं के पास जाए और देखें कि उन्होंने अपनी भाषा में विविध अनुशासनों की पारिभाषिक शब्दावली कैसे व किस प्रकार गढी है। इसी राह पर आगे बढने से राजस्थानी लेखक अपनी भाषा ओर साहित्य को गति देने में सार्थक साबित हो पाएँगे। दक्षिण भारतीय भाषाओं में हुआ कार्य इसकी उत्कृष्ट मिसाल है।
यह भी तय है कि जब आप दो भिन्न भाषाओं के विचार-संसार में प्रविष्ट होते हैं, तो अस्तित्त्व भी स्वतः ही द्वैत भाव से घिर जाता है। आज अंग्रेजी ज्ञान और विचार के लिए सर्वोत्त्कृष्ट भाषाओं में अग्रणी है। गाँधीजी इस द्वैत को पहचानने वाले आधुनिक भारत के चुनिंदा व्यक्तियों में अग्रणी रहे हैं। उन्होंने घर व विद्यालय के बीच की दूरी को इसी भाषिक-रणनीति के माध्यम से पहचाना था और उस समय कहा कि स्वयं यूरोप में घर व विद्यालय की भाषा एक है। अंग्रेजों ने जानबूझकर हमें हमारे केन्द्र से हटाने और भटकाने की क्रूर कोशिश की है। क्योंकि दो संस्कृतियों की पारम्परिक असंगतियों के मध्य संतुलन को लाँघना लगभग असंभव है। आज हम इसी द्वैत से घिरे हैं, बल्कि राजस्थानी के मामले में यह और गहरा है क्योंकि उस पर तो हिन्दी और अंग्रेजी दोनों का वर्चस्व व दबाव साफ देखा जा सकता है।
दूसरे, यह भी दृष्टिबोध आवश्यक है कि विचार किसी विशेष भाषा में ही जन्मते-पनपते हैं। मुकुन्द लाठ ने वर्षों पहले कहा था कि भाषा तो वाहन है, विचार चेतना जागे, तो किसी भी भाषा को अपना वाहन बना सकती है।
राजस्थानी के विद्वानों को कन्नड के प्रख्यात शिल्पी और प्रबुद्ध लेखक यू.आर.अनंतमूर्ति के इस पर्यवेक्षण से जरूर गुजरना चाहिए कि बुद्धि की तीक्ष्णता के स्पर्श बिना भाव मवाद बनता है, भाव के सम्पर्क के बिना बुद्धि राक्षस बन जाती है। लोकजीवन की संस्कृति की जानकारी के न होने से बुद्धिवादी डोरी से लटकने वाला ब्रह्मराक्षस बन जाता है।
राजस्थानी के प्रबुद्ध रचनाकार लोक जीवन से सीधे संवाद करें, वे लोक के असीम प्रांगण में उतरें। हमें नए शब्दों, पदों और मुहावरे की तलाश के लिए लोक के पास जाना चाहिए। अगर वे ऐसा करते हैं, तो राजस्थानी भाषा और साहित्य के विकास में आडे आ रही बाधाओं, कुण्ठाओं, प्रवृत्तियों की पहचान भली-भाँति कर पाएँगे। यानी हमें हमारी आधुनिकता की राह, अपनी ही देशज भूमि और भाषा के माध्यम से पार करनी होगी।
यह भी विदित है कि हर भाषा की अपनी एक सीमा होती है, तो राजस्थानी की भी अपनी सीमाएँ हैं, लेकिन उसके पास अपने लोक की अनंत पूँजी भी है जिससे उन सीमाओं के अतिक्रमण का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। हमें दूसरी भाषाओं, उप-भाषाओं को नकारने या उनसे घृणा करने की आवश्यकता नहीं है, वरन् उनके साथ समन्वयवादी दृष्टि से सृजनात्मक राह पर आगे बढने की गंभीर कोशिश करनी है। यह एक आधारभूत सूत्र है कि ज्ञान को ग्रहण करने के लिए हमें किसी भी भाषा से परहेज नहीं करना चाहिए, लेकिन ज्ञान की अभिव्यक्ति हमें अपनी ही मातृभाषा में करनी चाहिए। जब तक राजस्थानी का लेखक और हेताळु इस भावना से भरकर मायड के आँचल समृद्ध नहीं करेगा, तब तक उसे इस यात्रा में पिछडा ही माना जाएगा।
किसी भी विषय के मर्म को स्पर्श करने के लिए हमें उस विषय की मूल कृतियों तक जाने की चेष्टा करनी चाहिए, पर उससे प्राप्त अनुभव को हमें सदैव अपनी ही भाषा के मुहावरे में ही व्यक्त करना चाहिए।
राजस्थानी भाषा के सागर में उतरना असल में राजस्थानी संस्कृति के आत्म में गहरे उतरना है। हमें इस तथ्य को पूरी सजगता से ध्यान में रखना होगा कि कविता-कहानी का सृजन और विचार का सृजन दोनों नाभिनालबद्ध है, अलग-अलग नहीं। जाहिर-सी बात है कि अगर हम अपनी भाषा के आलोक में आगे बढेंगे, तो हमारा मार्ग अधिक संभावनाशील, परिपूर्ण और तेज सम्पन्न होगा। अपनी भाषा यानी जिसे हम भारत के संदर्भ में विभिन्न प्रदेशों की मातृभाषा कहते हैं, जो हर प्रांत की अपनी-अपनी है, के बारे में एक तथ्य समान है कि माँ की गोद में हम सुरक्षित, स्वतंत्र और अधिक सम्पन्न होते हैं। यह भी है कि जब-जब हम अधिक सुरक्षित, सम्पन्न और तेजमय होंग, तभी हमारी राहें आसान होंगी और ज्ञानपटल पर हमारी भाषिक, वैचारिक एवं साहित्यिक उपस्थिति अचंभित करने वाली होगी। इस उपस्थिति से हम न केवल हीनताबोध से मुक्त होंगे, बल्कि अपने स्व में स्थित हो कर आत्मसम्पन्न व्यक्तित्व के रूपाकार की प्रक्रिया को भी मजबूती दे सकेंगे। राजस्थानी के लेखकों और हेताळुओं को इसी राह पर आगे बढने की महत्ती आवश्यकता है।
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हम मधुमती के हर अंक को आफ लिए बेहतर से बेहतर बनाने का प्रयास निरन्तर कर रहे हैं। समय-समय पर आप सब द्वारा दिए गए मार्गदर्शन और सुझाओं के चलते हमारा मार्ग प्रशस्त भी हो रहा है। इस अंक में भी हमने आफ लिए अपने नियमित स्तम्भों के माध्यम से विविध एवं ज्ञानोपयोगी सामग्री जुटाने की भरपूर कोशिश की है। आशा करता हूँ कि अंक आपको पसंद आएगा। अंक पर आपकी राय हमारे लिए बहुत आवश्यक है। समय-समय पर केन्द्र और राज्य की ओर से जारी दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए कोविड अनुरूप व्यवहार करें। मंगलकामनाओं के साथ -
- ब्रजतरन जोशी