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आचार्य रामचन्द्र शुक्ल : आलोचना की वैज्ञानिक अभिव्यक्ति

छबिल कुमार मेहेर
शुक्लजी ने अपने समय की एक अर्द्धजाग्रत साहित्य-चेतना को दिशाज्ञान दिया। रास्ता सुझाया ही नहीं, स्वयं आगे-आगे चले और मंजिल तय किए। विपर्यस्त लक्षण ग्रंथों की परम्परा को साहित्यशास्त्र की पदवी तक पहुँचाया, उसे आदर्शात्मक स्वरूप दिया। अपने उच्चकोटि के व्यक्तित्व और अध्ययन की छाप वे साहित्य पर छोड गए हैं। प्रांजलता और महाकाव्योचित औदात्य के लिए यह युग शुक्लजी को स्मरण करेगा। साहित्य समीक्षक की हैसियत से सबसे बडी बात शुक्लजी में यह नहीं है कि उन्होंने उच्चतर काव्य को निम्नतर काव्य से अलग किया; बल्कि उन्होंने वह ज्ञान दिया कि हम भी उस अन्तर को पहचान सकें... ...पाण्डित्य में उनकी अप्रतिहत गति थी; विवेचना की उनमें विलक्षण शक्ति थी। वे आलोचक या समीक्षक मात्र नहीं थे; सच्चे अर्थ में साहित्य के आचार्य थे।
-नन्ददुलारे वाजपेयी, हिन्दी साहित्यः बीसवीं शताब्दी, पृ. 87
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल आज भी हमें बार-बार आकृष्ट करते हैं, हम लौट के जाते हैं, आप उनके लोक-मंगल की सीमा मानें, उनके इतिहास दर्शन को विधेयवादी कहें, साहित्य और समाज का जो सम्बन्ध वे निरूपित करते हैं, वह कहीं आपको बहुत संश्लिष्ट न लगे, इस पर बहस हो कि वे वस्तुवादी थे, प्रत्ययवादी थे, पर उनकी दृष्टि अचूक थी-काव्यत्व की उनकी पहचान में और जहाँ बडे से बडा कवि स्खलित होता है। सभी जानते हैं कि उनकी रस-दृष्टि अचूक थी। शायद इसका आधार था आचार्य शुक्ल का भाषा-विवेक। शायद ही कोई ऐसा लेखक हो जिस पर लिखते हुए रामचन्द्र शुक्ल ने यह न लिखा हो कि उसके भाषा-विवेक से ही वह काव्य-विवेक मिला था।
-नामवर सिंह, आलोचना और विचारधारा, पृ. 194

हिन्दी समीक्षा और आचार्य शुक्ल
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल (1884-1941) हिन्दी समीक्षा को प्रौढ व वैज्ञानिक रूप देनेवाले पहले आलोचक हैं। हिन्दी आलोचना की व्यवस्थित शुरुआत उन्हीं के लेखन से हुई है। उनके पहले की आलोचना गुण-दोष विवेचन वाली समीक्षा ही थी। रामचन्द्र शुक्ल ने जब समीक्षा का कार्य शुरू किया तब हिन्दी साहित्य का द्विवेदी युग था। जो प्रयत्न भारतेन्दु एवं महावीरप्रसाद द्विवेदी ने किए थे, वे महत्त्वपूर्ण होते हुए भी आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के प्रयत्न के समकक्ष न थे। आलोचक प्रायः साहित्यिक कृतियों की यथाशक्ति व्याख्या करके उसमें निहित सौन्दर्य का उद्घाटन करते थे। आचार्य शुक्ल की गूढ दृष्टि ने व्याख्या के इस कार्य में अद्भुत क्षमता का परिचय दिया। उन्होंने अपने सजग सौन्दर्यबोध और गहरी रस-ग्राहिणी शक्ति के द्वारा लेखकों और साधकों के मन में उच्चकोटि के साहित्य-संस्कार अथवा रुचि का बीज वपन किया।1 वैसे हिन्दी साहित्य में समालोचना का सूत्रपात आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदीजी ने किया, पर उसे परिनिष्ठित स्वरूप प्रदान करनेवाले आचार्य रामचद्र शुक्ल ही थे। द्विवेदी जी मूलतः भाषा के संस्कारक थे, जबकि आचार्य शुक्ल भाव और विषय के संस्कारक। अपने हिन्दी साहित्य का इतिहास में शुक्लजी ने कहा हैः इस तृतीय उत्थान (सन् 1918 ई. से) में समालोचना का आदर्श भी बदला। गुण-दोष के कथन के आगे बढकर कवियों की विशेषताओं और उनकी अंतःप्रकृति की छानबीन की ओर भी ध्यान दिया गया।2 वे गद्य-पद्य, दोनों के वैज्ञानिक-दृष्टि सम्पन्न लेखक-आलोचक थे। उनकी तुलसी, जायसी तथा सूर की समालोचना, हिन्दी साहित्य का इतिहास तथा चिन्तामणि में संगृहीत उनके निबन्ध अप्रतिम हैं ही, उनका एक मात्र काव्य-संग्रह मधुस्रोत की कविताएँ भी कई दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण हैं। विश्व प्रपंच की भूमिका उनके गम्भीर दार्शनिक चिन्तन का पुष्ट प्रमाण है। आचार्य शुक्ल के मानदण्ड की एक बडी भारी विशेषता यह है कि वह अपने सैद्धान्तिक और व्यावहारिक दोनों रूपों में सुलभ है। यदि कविता क्या है, काव्य में लोक-मंगल की साधनावस्था’, रस मीमांसा आदि निबन्धों में सिद्धान्त का निरूपण है तो जायसी, सूरदास और तुलसीदास की समीक्षाओं में उस सिद्धान्त का विनियोग। यदि कोई सिद्धान्त और व्यवहार को एकत्र ही समन्वित रूप में देखना चाहता है तो शुक्लजी का हिन्दी साहित्य का इतिहास मूर्तिमान मानदण्ड है। शुक्लजी के पास युगानुरूप नवीन-दृष्टि थी, लोक-मंगल और लोक-संग्रह की दृढ-पुष्ट धारणा थी, इतिहास का अद्भुत आलोक था, और भाषा की प्रखर चेतना थी। इस कारण वे आज भी आधुनिक आलोचना के उन्नायकों में अग्रगण्य हैं।
बहुत पहले नलिन विलोचन शर्मा ने आचार्य शुक्ल को विधेयवादी कहा था। उनकी दृष्टि में शुक्लजी ने हिन्दी आलोचना में उस विधेयवाद को प्रतिष्ठित किया जिसे प्रथम विश्वयुद्ध के बाद यूरोप में अस्वीकृत कर दिया गया था। डॉ. रामविलास शर्मा ने आचार्य शुक्ल को वस्तुवादी घोषित किया हैः शुक्लजी का दार्शनिक दृष्टिकोण मूलतः वस्तुवादी है। यह जगत् सत्य है। शुक्लजी ने संसार को कहीं भी मिथ्या नहीं कहा। वह उसे रूप-समुद्र कहते हैं। मनुष्य को अपनी सत्ता का ज्ञान भी लौकिक जीवन से होता है। इस तरह ज्ञान का आधार अलौकिक नहीं है। शुक्लजी उसकी अलौकिकता का खण्डन करते हैं, यह उनके ज्ञान-सम्बन्धी सिद्धान्त का ही परिणाम है।3 कतिपय आधुनिक समीक्षक शुक्लजी के वैज्ञानिक चिन्तन को प्रगतिशील जनवादी विचारधारा के मेल में देखते हैं और उन्हें विकासवाद तथा भौतिकवाद के समानान्तर स्वीकारते हैं। आचार्य शुक्ल की चिन्तन-पद्धति पर विचार करते हुए नन्दकिशोर नवल ज्ञान के भौतिकवादी सिद्धान्त को ही उनके साहित्य सम्बन्धी दृष्टिकोण का आधार मानते हैं।4 कुछ ऐसे विद्वान भी हैं जिनके अनुसार शुक्लजी भाववादी हैं। सच तो यह है कि शुक्लजी का समग्र चिन्तन लोकबद्ध तथा प्रवृत्तिवादी था। चाहे प्रकृति का सौन्दर्य हो, चाहे पौराणिक पात्रों का चरित्र-चित्रण हो, इनके मूल्यांकन में शुक्लजी की लौकिक-दृष्टि ही प्रधान रही। भावों की सामाजिक प्रतिष्ठा तथा उपादेयता, धर्म एवं समाज की विकासवादी व्याख्या, व्यष्टि के बदले समष्टि का मापदण्ड आदि बातें शुक्लजी के समाजोन्मुखी वैज्ञानिक दृष्टिकोण को स्पष्ट करती हैं। शुक्लजी की प्रवृत्तिवादी चिन्तना का आधार उनका यही वैज्ञानिक दृष्टिकोण था।
निबन्ध साहित्य की प्रकृति
हिन्दी की साहित्यिक दुनिया में आचार्य शुक्ल एक बेहद सजग और जरूरी समीक्षक के रूप में प्रतिष्ठित हैं। किन्तु यह बात भी निर्विवाद है कि गद्य-साहित्य की और विशेषकर निबन्ध साहित्य की प्रतिष्ठा बढाने में शुक्लजी का अवदान अद्वितीय है। वैसे गद्य को कवियों की कसौटी कहा गया हैः गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति। और निबन्ध गद्य का एक निजी रूप है। शुक्लजी के निबन्धों को चार वर्गों में बाँटा जा सकता हैः
1. मनोविकार सम्बन्धी - भाव या मनोविकार, उत्साह, श्रद्धा-भक्ति, करुणा, लज्जा और ग्लानि, लोभ और प्रीति, घृणा, ईर्ष्या, भय और क्रोध।
2. साहित्य सिद्धान्त सम्बन्धी - कविता क्या है, साधारणीकरण और व्यक्ति- वैचिर्त्यवाद, रसात्मक बोध के विविध आयाम।
3. साहित्य समीक्षा सम्बन्धी - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, तुलसी का भक्तिमार्ग, मानस की धर्मभूमि, काव्य में लोक-मंगल की साधनावस्था।
4. आलोचनात्मक सम्बन्धी - काव्य में प्राकृतिक दृश्य, काव्य में रहस्यवाद, काव्य में अभिव्यंजनावाद।
शुक्लजी ने अधिकतर विचारप्रधान निबन्ध लिखे हैं, जिसमें समास शैली का प्राधान्य है। उनके निबन्ध बौद्धिक और विषय निष्ठ हैं। इन निबन्धों में जो गम्भीरता, विवेचन में जो पाण्डित्य एवं तार्किकता तथा शैली में जो कसावट मिलती है, वह इन्हें अभूतपूर्व दीप्ति दे देता है। शुक्लजी के निबन्धों में पहले एक बात सूत्र-रूप में कही जाती है फिर उसकी विश्लेषणात्मक व्याख्या की जाती है और जीवन से लिए हुए उदाहरणों द्वारा वह बात स्पष्ट की जाती है। उनके उदाहरण बडे मार्मिक होते हैं। जैसेः
1. वैयक्तिक जीवन में मनोवेगों का उपयोग आत्म-शुद्धि, विकास या विस्तार के लिये किया जा सकता है। यह उपयोग ही मनोविकार का परिष्कार है।
2. दूसरों का भय हमें भगा सकता है, हमारी बुराइयों को नहीं। दूसरों से हम भाग सकते हैं, पर अपने से नहीं।
3. ग्लानि अन्तःकरण की शुद्धि का एक विधान है।
4. सामाजिक जीवन की स्थिति और पुष्टि के लिए करुणा का प्रसार आवश्यक है।
विशेष और साधारण के समन्वय के ही कारण हम उनके निबन्धों में सूक्तियों के साथ उदाहरण और उदाहरण के साथ सूक्तियों का समावेश पाते हैं। शुक्लजी के शब्दों में कहें तो शुद्ध विचारात्मक निबन्धों का चरम उत्कर्ष वहीं कहा जा सकता है जहाँ एक-एक पैराग्राफ में विचार दबा-दबाकर कसे गये हो और एक-एक वाक्य किसी सम्बद्ध विचार खण्ड को लिए हो। उनकी सूक्तियों में गूढ सिद्धान्त मुरब्बे की तरह सुरक्षित रहते हैं:
-वैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है।
- लोभ सामान्योन्मुख होता है और प्रेम विशेषोन्मुख।
- श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है।
- भक्ति धर्म की रसात्मक अनुभूति है।
- यदि प्रेम स्वप्न है तो श्रद्धा जागरण है।
मनुष्य की अन्तःप्रकृति की जितनी परख आचार्य शुक्ल को थी उतनी हिन्दी के किसी आचार्य या कवि को नहीं। मनोविकारों पर लिखे गये उनके निबन्ध इस बात के साक्षी हैं। अन्तर्दर्शन और बाह्य निरीक्षण का इतना अनूठा उदाहरण हिन्दी ही नहीं अन्य भारतीय भाषाओं में भी दुर्लभ है। चिन्तामणि (प्रथम भाग) में संकलित भावों या मनोविकारों सम्बन्धी उनके निबन्ध मानव-मनोविज्ञान का जो सूक्ष्म-निरीक्षण और गहन-विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं, उनसे न केवल साहित्य में वरन् मनोविज्ञान में भी शुक्लजी की गहरी पैठ का अन्दाजा लगाया जा सकता है। सैद्धान्तिक एवं आलोचनात्मक निबन्धों में आचार्य शुक्लजी का गम्भीर एवं विस्तृत अध्ययन, व्यापक दृष्टिकोण, सूक्ष्म विवेचन और विश्वसनीय निर्णय सर्वत्र लक्षित होता है। शुक्लजी की व्यावहारिक समीक्षा, आलोच्य-वस्तु के मर्म का उद्घाटन ही नहीं करती, वरन् उसकी तात्त्विक व्याख्या करके उसे अभिनव महिमा से मण्डित भी कर देती है।
साहित्य और इतिहास दृष्टि
हिन्दी साहित्य को आचार्य शुक्ल की अविस्मरणीय देन उनका हिन्दी साहित्य का इतिहास है जिसने सर्वप्रथम भारतीय भाषाओं में हिन्दी के वास्तविक स्वरूप का बोध कराया। शुक्लजी ने सन् 1908 में हिन्दी शब्दसागर के सम्पादन का कार्य सँभाला था। किसान, कारीगर और व्यापारियों के बीच प्रचलित शब्दों की बनावट और संस्कृति की खोज में वे उनसे सम्पर्क स्थापित करके शब्द-संग्रह करने लगे। सन् 1922 में नागरी प्रचारिणी सभा ने शब्दों का इतिहास प्रकाशित किया और इसके बाद भाषा का विकास और साहित्य का विकास नामक दो ग्रंथों को भी प्रकाशित करने का निश्चय किया। यही साहित्य का विकास ही सन् 1929 में हिन्दी साहित्य का इतिहास के नाम से पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ।
रामचन्द्र शुक्ल हिन्दी के प्रथम साहित्यिक इतिहास लेखक हैं, जिन्होंने मात्र कविवृश्र-संग्रह से आगे बढकर शिक्षित जनता की जिन-जिन प्रवृत्तियों के अनुसार हमारे साहित्य के स्वरूप में जो-जो परिवर्तन होते आए हैं, जिन-जिन प्रभावों की प्रेरणा से काव्यधारा की भिन्न-भिन्न शाखाएँ फूटती रही हैं, उन सबके सम्यक निरूपण तथा उनकी स्वस्थ वैज्ञानिक दृष्टि से किये गए सुसंगठित काल-विभाग की ओर ध्यान दिया।5 शुक्लजी का ध्यान इस लोक-मानस, जनता की इस चित्तवृत्ति और उसके बदलाव पर था। इसलिए इतिहास की शक्ति की उनकी पहचान अधिक प्रामाणिक और उनका इतिहास-बोध अधिक प्रासंगिक है। काल विभाग के अन्तर्गत अपने इतिहास बोध और साहित्येतिहास दृष्टि को स्पष्ट करते हुए शुक्लजी ने लिखा है किः जब कि प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिम्ब होता है, तब यह निश्चित है कि जनता की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अन्त तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परम्परा को परखते हुए साहित्य परम्परा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना ही साहित्य का इतिहास कहलाता है। जनता की चित्तवृत्ति बहुत कुछ राजनीतिक, सामाजिक, साम्प्रदायिक तथा धार्मिक परिस्थिति के अनुसार होती है; अतः कारणस्वरूप इन परिस्थितियों का किंचित दिग्दर्शन भी साथ ही साथ आवश्यक होता है। इस दृष्टि से हिन्दी साहित्य का विवेचन करने में यह बात ध्यान में रखनी होगी कि किस विशेष समय में लोगों में रुचिविशेष का संचार और पोषण किधर से और किस प्रकार हुआ।6
हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन की परम्परा यद्यपि गार्सा द तासी से शुरू होती है, लेकिन आचार्य रामचन्द्र शुक्ल प्रथम इतिहासकार हैं जिन्होंने विकासवादी और लोकवादी इतिहास-दृष्टि से सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य की परम्परा का विश्लेषण किया और व्यवस्थित इतिहास-लेखन की शुरुआत की। हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखन में शुक्लजी से पहले जो काल-विभाजन प्रस्तुत किया गया था उसका कोई व्यवस्थित आधार नहीं था। आचार्य शुक्ल ने पहली बार साहित्य के काल-विभाजन और नामकरण की व्यवस्थित-पद्धति कायम की और उसको एक ठोस आधार दिया। उन्होंने कालक्रम और साहित्यिक प्रवृत्तियों की व्यवस्था कायम करके हिन्दी साहित्य के इतिहास का वस्तुवादी आधार पर काल-विभाजन और नामकरण किया। उन्होंने इसी वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हिन्दी साहित्य के 900 वर्षों के इतिहास को चार कालों में विभक्त किया हैः
1. आदिकाल -(वीरगाथाकाल, सं.1050-1375)
2. पूर्व मध्यकाल - (भक्तिकाल, सं.1375-1700)
3. उत्तर मध्यकाल- (रीतिकाल, सं. 1700-1900)
4. आधुनिक काल- (गद्यकाल, सं. 1900-1984)
इसी विभाजन के सन्दर्भ में उनकी मान्यता है कि यद्यपि इन कालों की रचनाओं की विशेष प्रवृत्ति के अनुसार ही उनका नामकरण किया गया है, पर यह न समझना चाहिए कि किसी विशेष काल में और प्रकार की रचनाएँ होती ही नहीं थीं। जैसे, भक्तिकाल या रीतिकाल को लें तो उसमें वीररस के अनेक काव्य मिलेंगे जिनमें वीर राजाओं की प्रशंसा उसी ढंग की होगी जिस ढंग की वीरगाथाकाल में हुआ करती थी। अतः प्रत्येक काल का वर्णन इस प्रणाली पर किया जायेगा कि पहले तो उक्त काल की विशेष प्रवृत्तिसूचक उन रचनाओं का वर्णन होगा जो उस काल के लक्षण के अन्तर्गत होंगी, पीछे संक्षेप में उनके अतिरिक्त और प्रकार की ध्यान देने योग्य रचनाओं का उल्लेख होगा।7 इस कथन से यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि शुक्लजी साहित्यिक संवेदनाओं व विशिष्टताओं को लेकर कितना सचेत थे। शुक्लजी के इतिहास के बारे में डॉ. नामवर सिंह ने लिखा है कि इतिहास के आदि, मध्य, आधुनिक जैसे कोरे कालपरक विभाजन को उन्होंने वीरगाथा, भक्ति, रीति और गद्यकाल की भावपरक क्यारियों में पुनः रोपने का उद्योग किया; साथ ही इन सबका सामान्य परिचय देकर एक ऐतिहासिक प्रवाह दिखाना चाहा। उन्होंने प्रवाह की गति का उत्थान-पतन भी दिखाया और लोक-संग्रह की कसौटी पर इतिहास के समाजोन्मुख और समाजपरान्मुख युगों में अन्तर बतलाया। कुल मिलाकर यह निस्सन्देह कहा जा सकता है कि शुक्लजी को जो इतिहास पंचांग के रूप में प्राप्त हुआ था उसे उन्होंने मानवीय शक्ति से अनुप्राणित कर साहित्य बना दिया।8 ‘शुक्लजी ने हिन्दी साहित्य का इतिहास विद्यार्थियों को पढाने के लिए भले ही लिखा हो, लेकिन उस इतिहास के द्वारा उन्हंने हिन्दी भाषा-भाषी जाति को अपनी जातीय पहचान दी, अपनी संस्कृति की सच्ची विरासत से परिचित कराया।9 आदिकाल का मूल्यांकन करते हुए सिद्धों और योगियों की साधना को शुक्लजी ने लोकविरोधी कहा है, क्योंकि उनका विचार है कि उसमें रहस्य और गुह्य की सिद्धियों की चर्चा को महत्त्व दिया गया है। शुक्लजी ने इस दृष्टि से आदिकाल के साहित्य की व्याख्या तो की ही, साथ ही इस प्रकार के साहित्य को साम्प्रदायिक मानकर साहित्य की कोटि से भी बाहर कर दिया। आचार्य शुक्ल ने भक्ति-आन्दोलन और भक्ति-काव्य का विस्तृत मूल्यांकन किया है। भक्ति के उदय की व्याख्या करते हुए शुक्लजी ने लिखा है किः देश में मुसलमानों का राज्य प्रतिष्ठित हो जाने पर हिन्दू जनता के हृदय में गौरव, गर्व और उत्साह के लिए वह अवकाश न रह गया। उसके सामने ही उसके देवमंदिर गिराए जाते थे, देवमूर्तियाँ तोडी जाती थीं और पूज्य-पुरुषों का अपमान होता था और वे कुछ नहीं कर सकते थे।... अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की शक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था?... भक्ति का जो सोता दक्षिण की ओर से धीरे-धीरे उत्तर भारत की ओर पहले से ही आ रहा था उसे राजनीतिक परिवर्तन के कारण शून्य पडते हुए जनता के हृदयक्षेत्र में फैलने के लिए पूरा स्थान मिला।10 नाथों और सिद्धों की परम्परा वाले सन्तों से ज्यादा महत्त्व उन्होंने सगुण भक्तकवियों को दिया है। वास्तव में शुक्लजी की इतिहास-दृष्टि समाजोन्मुखी है। उसमें लोक-कल्याण को महत्त्व दिया गया है। जायसी, तुलसी, सूर और कबीर आदि भक्तकवियों की रचनाओं के लोक-कल्याणकारी स्वरूप की शुक्लजी ने काफी प्रशंसा की है। तुलसी उनका प्रिय कवि है। लगता है, उनकी आलोचना के मानदण्ड तुलसी के लिए ही निर्मित हुए हैं। रीतिकाल के विवेचन में शुक्लजी की सामन्तवाद-विरोधी दृष्टि स्पष्ट होता है। रीतिकालीन कविता नखशिख वर्णन और नायिकाभेद तक सीमित रहने के कारण लोक-कल्याण सम्भव ही नहीं था। यहाँ प्रेम और श्रृंगार का अस्वाभाविक स्वरूप चित्रित हुआ है। शुक्लजी ने रीतिकविता के दरबारी स्वरूप को पहचान कर उसकी कडी आलोचना की। उन्होंने आधुनिक काल के साहित्य का मूल्यांकन करते हुए छायावादी काव्यधारा की आलोचना की और स्वच्छन्दतावादी काव्य का समर्थन किया। आधुनिक काल के विश्लेषण के मार्फत उन्होंने हिन्दी गद्य के विकास की भी व्याख्या की। खडी बोली के विकास की बात करते हुए शुक्लजी ने उसकी जातीय प्रकृति और सामाजिक आधार पर बल दिया। कहना न होगा कि कवियों की विशेषताओं एवं उनकी अन्तःप्रकृति की छानबीन की ओर ध्यान, सबसे पहले शुक्लजी ने ही दिया। कुछ विशिष्ट सूत्रबद्ध स्थापनाएँ यहाँ द्रष्टव्य हैं:
1. केशव को कवि-हृदय नहीं मिला था। उनमें वह सहृदयता और भावुकता न थी जो एक कवि में होनी चाहिए।
2. घनानन्द साक्षात् रस-मूर्ति और ब्रज भाषा के प्रधान स्तंभों में हैं।
3. भारतेन्दु सिद्ध वाणी के अत्यन्त सरस हृदय कवि थे। प्राचीन और नवीन का यही सुन्दर सामंजस्य उनकी कला का विशेष माधुर्य है।
4. कामायनी में प्रसाद ने नर-जीवन के विकास में भिन्न-भिन्न भावात्मिकावृत्तियों का योग और संघर्ष बडी प्रगल्भ रमणीय कल्पना द्वारा चित्रित करके मानवता का रसात्मक इतिहास प्रस्तुत किया है।
5. बहु वस्तु-स्पर्शिनी प्रतिभा निराला जी में है। अज्ञात प्रिय की ओर इशारा करने के अतिरिक्त इन्होंने जगत् के अनेक प्रस्तुत रूपों और व्यापारों को भी अपनी सरस भावनाओं के रंग में देखा है।
स्पष्ट है कि शुक्लजी का इतिहास-बोध हिन्दी प्रदेश और राष्ट्रीय जागरण तक ही सीमित नहीं है बल्कि इतिहास की गतिविधियों को वे एक व्यापक राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भी देखते हैं। यही कारण है कि उनका इतिहास आज भी इतिहासकारों के लिए प्रेरणा-पुंज बना हुआ है।
काव्य-विवेक और रस-चिन्तन
आचार्य शुक्ल कविता के जौहरी हैं। उनकी काव्यगत स्वीकार्यता नैतिकतावादी अवधारणा की पक्षधर है। शुक्लजी सदाचारविहीन काव्य को स्वीकृति नहीं देते। उनके लिए कविता मनोरंजन की वस्तु नहीं बल्कि हृदय-विस्तार का अनन्त स्रोत है। बकौल डॉ. नगेन्द्र काव्य के प्रति आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का दृष्टिकोण व्यावहारिक एवं प्रत्ययवादी था। वे (शुक्लजी) मानते थे कि काव्य का जीवन के साथ रागात्मक सम्बन्ध हैः काव्य जीवन की रागात्मक अभिव्यक्ति है। भारतीय चिन्तन परम्परा के अनुसार कला की गणना उपविधाओं में की गई है और काव्य को विद्या माना गया है। अतः काव्य को कला मानना उसका अवमूल्यन करना है। कवि जयशंकर प्रसाद ने इसलिए कहा कि काव्य तो वस्तुतः आत्मा की संकल्पनात्मक अनुभूति है। आचार्य शुक्ल ने भी काव्य को कला नहीं स्वीकारा। काव्य का जीवन के साथ सहज सम्बन्ध स्वीकार करते हुए उन्होंने उसे जीवन की रागात्मक अभिव्यक्ति स्वीकाराः कविता वह साधन है जिसके द्वारा शेष सृष्टि के साथ मनुष्य के रागात्मक सम्बन्ध की रक्षा और उसका निर्वाह होता है। कविता क्या है शीर्षक निबन्ध आचार्य शुक्ल के काव्य-चिन्तन का मूलाधार है। इसमें उन्होंने काव्य की जटिलता, काव्य की आवश्यकता, काव्य-दृष्टि के प्रसार, सभ्यता के आवरण और कविकर्म की जटिलता, सहृदयता की पहचान, काव्य में सौन्दर्यानुभूति, काव्य की भाषा आदि अनेक विषयों पर गहन विचार किया है। रामचन्द्र शुक्ल वाच्यार्थ में काव्य मानते हैं, प्राचीन आचार्य लक्ष्यार्थ और व्यंग्यार्थ में। वाच्यार्थ में काव्य के पक्ष को रामचन्द्र शुक्ल ने बहुत ही साफ तौर से प्रतिपादित किया है। उनका कहना है कि काव्य का सारा सौन्दर्य तो वाच्यार्थ में ही होता है। उन्होंने काव्य में प्रसाद-गुण का समर्थन किया है। उनका कहना है कि प्रसाद-गुण से भरी अभिव्यक्ति के द्वारा ही वस्तु और भाव की व्यंजना हो सकती है। वे कविता को जीवन और जगत् से अनिवार्यतः सम्बद्ध मानते हैं। यही कारण है कि कविता क्या है निबन्ध के प्रारम्भ में ही वे जीना किसे कहते हैं और जगत् क्या है की संक्षिप्त व्याख्या करते हैं: इन अनेक भावों का व्यायाम और परिष्कार तभी समझा जा सकता है जबकि इन सबका प्रकृत सामंजस्य जगत् के भिन्न-भिन्न रूपों, व्यापारों या तथ्यों के साथ हो जाये। इन्हीं भावों के सूत्र से मनुष्य जाति जगत् के साथ तादात्म्य का अनुभव चिरकाल से करती चली आयी है। कविता का आशय व्यक्त करते हुए वे लिखते हैं कि जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान-दशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्दविधान करती आयी है उसे कविता कहते हैं। कविता के इस व्यापक प्रयोजन के प्रकाश में ही उनके काव्यशास्त्र को नया अर्थ मिलता है।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल रस-सम्प्रदाय के कट्टर अनुयायी हैं। बकौल बच्चन सिंह आचार्य शुक्ल पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने रसानुभूति या रस को दार्शनिक जकडबंदी से मुक्त करके मनोवैज्ञानिक भूमिका पर प्रतिष्ठित किया और जीवन तथा जगत् के सम्बन्धों में देखा।11 उन्होंने रस-सिद्धान्त की बौद्धिक व्याख्या कर उसे आधुनिक स्वरूप प्रदान किया। रस की परिभाषा करते हुए उन्होंने कहा है-1. हृदय की अनुभूति ही साहित्य में रस और भाव कहलाती है। 2. लोक-हृदय में हृदय के लीन होने की दशा का नाम रसदशा है। 3. हृदय के प्रभावित होने का नाम ही रसानुभूति है। उन्होंने रसदशा को हृदय की मुक्तावस्था माना हैः जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान-दशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रस-दशा कहलाती है। इसमें श्रोता, पाठक, दर्शक साहित्य की रचना के श्रवण, पठन, दर्शन में इतना लीन हो जाता है कि उसे अपने चारों ओर के वातावरण की सुध-बुध नहीं रहती, वह कलाकृति की रसात्मकता के प्रभाव से अपने में ही खो जाता है। हृदय की यह मुक्तावस्था कुछ क्षणों की होती है। रस-दशा तक पहुँचने के लिए यह जरूरी है कि श्रोता, पाठक, दर्शक का साहित्य में वर्णित आश्रय के साथ तादात्म्य हो और रचनाकार आलम्बन को इस रूप में वर्णित करे कि वह उन श्रोता, पाठक, दर्शक के लिए साधारण हो जाय। अर्थात् रसानुभूति के लिए आलम्बन का साधारणीकरण होना आवश्यक है। संक्षेप में रामचन्द्र शुक्ल ने यही कहा है कि आश्रय के साथ तादात्म्य और आलम्बन का साधारणीकरण रस की अनुभूति के लिए जरूरी है।
आचार्य शुक्ल न तो रस को अलौकिक या दिव्य अनुभूति मानते हैं, और न यह मानते हैं कि रस की अनुभूति अनिवार्यतः आनन्दमयी होती है। रस-मीमांसा में रस की आनन्दरूपता का विरोध करते हुए उन्होंने स्पष्ट लिखा है मेरी समझ में रसास्वादन का प्रकृत स्वरूप आनन्द शब्द में व्यक्त नहीं होता। लोकोत्तर, अनिर्वचनीय आदि विशेषणों से न तो उसके वाचकत्व का परिहार होता है और न प्रयोग का प्रायश्चित। क्या क्रोध, शोक, जुगुप्सा आदि आनन्द का रूप धारण करके ही श्रोता के हृदय में प्रकट होते हैं? अपने प्रकृत रूप का सर्वथा विसर्जन कर देते हैं, उसे कुछ भी लगा नहीं रहने देते? क्या विभावत्व का स्वरूप हर वक्त उन्हें एक ही स्वरूप सुख देता है ? क्या दुःख के भेद सुख के भेद से प्रतीत होने लगते हैं? क्या मृत पुत्र के लिए विलाप करती हुई शैव्या से राजा हरिश्चन्द का कफन माँगना देख-सुनकर आँसू नहीं आ जाते....क्या महमूद के अत्याचारों का वर्णन पढकर यह जी में नहीं आता कि वह सामने आता तो उसे कच्चा खा जाते? क्या कोई दुःखान्त कथा पढकर बहुत देर तक उसकी खिन्नता नहीं बनी रहती? चित्त का द्रुत होना क्या आनन्दगत है? इस आनन्द शब्द ने काव्य के महत्त्व को बहुत कुछ कम कर दिया है- उसे नाच-तमाशे की तरह बना दिया है। स्पष्ट है कि शुक्ल संस्कृत के आचार्यों की भाँति रस को आनन्दस्वरूप नहीं मानते, वे उसे प्रत्यक्षानुभूति से जोडते हैं।
लोक-धर्म और लोक-मंगल की भावना
लोक-धर्म और लोक-मंगल आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के चिन्तन के केन्द्रीय तत्त्व हैं। उनके कथनानुसार वह व्यवस्था या वृत्ति जिनसे लोक में मंगल का विधान होता है, अभ्युदय की सिद्धि होती है धर्म है। मानस की धर्म-भूमि में उन्होंने जन-कल्याण को ही श्रेष्ठ धर्म स्वीकारा हैः सत्स्वरूप की व्यक्त प्रवृत्ति अर्थात् धर्म की ऊँची-नीची कई भूमियाँ लक्षित होती है, जैसे गृहधर्म, कुलधर्म, समाजधर्म, लोकधर्म और विश्वधर्म या पूर्णधर्म। किसी परिमित वर्ग के कल्याण से सम्बन्ध रखनेवाले धर्म की अपेक्षा विस्तृत जनसमूह के कल्याण से सम्बन्ध रखनेवाला धर्म उच्चकोटि का है। काव्य-विवेचन में भी नैतिकता और सदाचार की मर्यादा का उनका आग्रह सतत बना रहा है। साहित्य को मनोरंजन तक सीमित न मानकर लोक मंगलकारी सिद्ध करने में उनका प्रयत्न रहा है। इसी कारण गोस्वामी तुलसीदास की अमर कृति रामचरितमानस उनकी प्रिय रचना है, क्योंकि उसमें लोक-मंगल के तत्त्व निहित हैं। गोस्वामी तुलसीदास के लोकधर्म की चर्चा करते हुए शुक्लजी ने लिखा है कि संसार जैसा है, वैसा मानकर उसके बीच के एक-एक कोने को स्पर्श करता हुआ जो धर्म निकलेगा, वही धर्म लोकधर्म होगा। आगे इसे स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया है कि जनता की प्रवृत्तियों का औसत निकालने पर धर्म का जो मान निर्धारित होता है, वही लोकधर्म है। लोक-धर्म का सच्चा आशय लोकहित की साधना में ही अभिव्यक्त होता है। लोक-धर्म की व्याख्या करते समय भी नीति और सदाचार पर उनकी दृष्टि सतत बनी रहती है। लोक-हृदय की पहचान रखने वाले कवि को उन्होंने श्रेष्ठ कवि माना है। उनके अनुसार काव्य का चरम लक्ष्य सर्वभूत को आत्मभूत करके अनुभव कराना है। काव्य में लोक-मंगल की साधनावस्था में वे विरुद्ध के सामंजस्य में लोकधर्म का सौन्दर्य देखते हैं: भीषणता और सरसता, कोमलता और कठोरता, कटुता और मधुरता, प्रचंडता और मृदुता का सामंजस्य ही लोकधर्म का सौन्दर्य है। काव्य में रहस्यवाद शीर्षक निबन्ध में उन्होंने सौन्दर्य और मंगल को पर्याय के रूप में स्वीकारा हैः सौन्दर्य और मंगल वास्तव में पर्यायवाची हैं। कला पक्ष से देखने में जो सौन्दर्य है, वही धर्म-पक्ष से देखने में मंगल है।
लोकमंगल से शुक्लजी का अभीष्ट अर्थ है इसी जगत् में बसनेवाले सर्वसाधारण मानव-समाज का धार्मिक, सामाजिक-आर्थिक, नैतिक, बौद्धिक-मनोवैज्ञानिक, शारीरिक आदि विविध दृष्टियों से कल्याण। इसीलिए वे मानते हैं कि जगत् अपने व्यक्त रूप में सत् और असत् का मिश्रण है और पुष्टि के लिए गोस्वामी तुलसीदास को उद्धृत करते हैं:
सगुन छीर अवगुन जल, ताता।
मिलई रचई परपंच विधाता।।
शुक्लजी ने इसी आशय को स्पष्ट करते हुए लिखा हैः जबकि अव्यक्तावस्था से छूटी हुई प्रकृति के व्यक्त स्वरूप जगत् में आदि से अन्त तक सत्त्व, रजस् और तमस् तीनों गुण रहेंगे तब समष्टि रूप में लोक के बीच मंगल का विधान करनेवाली ब्रह्म की आनन्दकला के प्रकाश की यही पद्धति हो सकती कि तमोगुण और रजोगुण सत्त्वगुण के अधीन होकर उसके इशारे पर काम करें। साहित्य के मूल्यांकन के एक प्रमुख मानदण्ड के रूप में लोक-मंगल की प्रतिष्ठा शुक्लजी ने जिस तर्क-श्रृंखला के आधार पर की है, वह बहुत पुष्ट है। सर्वप्रथम उन्होंने यह निरूपित किया कि साहित्य या काव्य का प्रयोजन इसी लोक के भीतर है और उसका लक्ष्य मनुष्य का हृदय है। उनके अनुसार मनुष्य लोकबद्ध प्राणी है। उसका अपनी सत्ता का ज्ञान तक लोकबद्ध है। लोक के भीतर ही कविता क्या किसी कला का प्रयोजन और विकास होता है। एक की अनुभूति को दूसरे के हृदय तक पहुँचाना यही कला का लक्ष्य होता है।12
प्राचीन काव्यशास्त्र में लोक-मंगल शब्द से किसी शास्त्रीय सिद्धान्त का प्रतिपादन नहीं हुआ था लेकिन शुक्लजी की व्यावहारिक आलोचना का मेरुदंड बन गया यह शब्द। तुलसी और सूर की समीक्षा का प्रमुख तत्त्व यही बना और तुलसी को लोक-मंगल का कवि तथा सूर को लोक-रंजक कवि ठहरा कर कोटिक्रम से तारतम्य स्थापित किया गया। बकौल नामवर सिंह उन्होंने अपने सौन्दर्य-बोध तथा रसानुभूति को शुद्ध आनन्द की स्थिति से ऊपर उठाकर लोक-मंगल की उदात्त सामाजिक पृष्ठभूमि पर प्रतिष्ठित किया। उनका विचार था कि साहित्य केवल आनन्द की वस्तु नहीं है, बल्कि उसे लोक-मंगल के लिए प्रयत्न भी करना चाहिए। इसी दृष्टि से उन्होंने तुलसीदास के साहित्य को सूरदास की रचना से श्रेष्ठ ठहराया क्योंकि उनके विचार से तुलसी में सूर की अपेक्षा लोक-मंगल की भावना अधिक थी। शुद्ध आनन्दवाले साहित्य को वे लोक-मंगल की सिद्धावस्था कहते थे और सामाजिक कल्याण वाले साहित्य को ‘लोक-मंगल की साधनावस्था।13
इस प्रकार हम देखते हैं कि लोक-मंगल की भावना आचार्य शुक्ल की आलोचना का आदर्श है। सच कहें तो आलोचना की इसी कसौटी के कारण ही आचार्य शुक्ल पूज्य रहे हैं। शुक्लजी के लोक-मंगल विधान के बारें में डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है- उन्होंने मंगल का विधान करने वाले दो भाव ठहराये- करुणा और प्रेम। इसमें भी भारतीय महाकाव्यों को देखते हुए करुणा को ही उन्होंने बीज-भाव माना। प्रेम की अपेक्षा उन्होंने करुणा को और व्यापक बतलाया। जिससे प्रेम हो, उसी के लिए करुणा जागे, यह आवश्यक नहीं है। करुणा प्रेम से स्वतंत्र है।14
काव्य, कविताई और मधुस्रोत
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का व्यक्तित्व बहुआयामी था। उनका नाम सुनते ही मस्तिष्क-पटल पर एक विचारशील और गम्भीर आलोचक का चित्र उभरता है। परन्तु वे विचारशील आलोचक होने के साथ-साथ एक सहृदय कवि भी थे। सन् 1971 में नागरी प्रचारिणी सभा ने उनकी कविताओं का एक मात्र संग्रह मधुस्रोत नाम से प्रकाशित किया है, जिसमें शुक्लजी की 27 कविताएँ संकलित हैं। इसमें आठ कविताएँ ब्रज भाषा की हैं और शेष उन्नीस खडी बोली की।15 इस संग्रह में सन् 1901 से लेकर सन् 1929 तक यानी 30 वर्ष की कालावधि की कविताएँ संकलित हैं। प्रकाशकीय वक्तव्य के बाद भूमिका के रूप में शुक्लजी का कविता क्या है शीर्षक से पन्द्रह पृष्ठों का एक लेख संकलित है, जो चिन्तामणि के पहले भाग में छपे सुविस्तृत निबन्ध कविता क्या है से बहुत भिन्न है।
इस संग्रह में संकलित कविताओं में शुक्लजी के जीवन की झलक व उनकी आन्तरिक भावना अभिव्यक्त हुई है। दूसरे शब्दों में, उनकी कविता उनके हृदय का सच्चा उद्गार है। उनकी समालोचना के आदर्श की कुंजी भी उनकी इन कविताओं में निहित है। शुक्लजी के कवि-स्वभाव एवं कवि-दृष्टि, दोनों को संकलित कविताओं की विषयवस्तु से पहचाना जा सकता हैः
कर्मों के फल के मिलने में यद्यपि हो जाती है देर।
तो भी उस जगदीश्वर के घर, होता कभी नहीं अँधेर।।
करने दो मुझको प्रयत्न बस, देने दो जीवन का दान।
निज कर्त्तव्य पूर्ण कर लूँ मैं, फल का मुझे नहीं कुछ ध्यान।
यद्यपि मैं दुर्बल शरीर हूँ, जीवन भी मेरा निःसार।
प्राणदान देने का तो भी, मुझको है अवश्य अधिकार।।
जब तक मेरे इस शरीर में, कुछ भी शेष रहेंगे प्राण।
तब तक कर प्रयत्न मेटूँगा अत्याचारों का अभिमान।।
धर्म न्याय का पक्ष ग्रहण कर कभी न दूँगा पीछे पैर।
वीर जनों की रीति यही है, नहीं प्रतिज्ञा लेते फेर।।
देश दुःख अपमान जाति का बदला मैं अवश्य लूँगा।
अन्यायी के घोर पाप का, दण्ड उसे अवश्य दूँगा।।
-आशा और उद्योग कविता से
आचार्य शुक्ल कवि-सहृदय आलोचक हैं। उनकी आलोचना के भव्य प्रासाद की नींव काव्यगत भावुकता के आधार पर रखी गयी। उनकी कविताएँ साहित्यिक महत्त्व की तुलना में ऐतिहासिक महत्त्व अधिक रखती हैं। इन्हीं कविताओं के मार्फत उनके सत्यादर्श को समझा जा सकता हैः
हम उसी प्रभु से यह माँगते,
जब कभी हम कर्म प्रवृत्त हों।
सुगम तू कर दे पथ को प्रभो,
विकट संकट-कण्टक फेंक के।।
-वंदना कविता से
अंग्रेजों के फूट डालो और राजनीति करो से पूरा भारतवर्ष तबाही भोगता रहा। शुक्लजी देख रहे थे कि सन् 1857 जैसी व्यापक सशस्त्र क्रान्ति फूट के कारण असफल हो गई थी। इसी चेतना से प्रभावित होकर उन्होंने फूट शीर्षक कविता लिखी :
ब्रिटिश जाति के न्याय नीति की मची धूम जब भारी।
सुख के स्वप्न दिखाई देने लगे हमें दुखहारी।।
उठे चौंककर बन्धु कई जो थे सचेत और ज्ञानी।
मिलकर यही बिचारा रोवै अपनी राम कहानी।।
ब्रिटिश न्याय की पनल शिखा को अपनी ओर घुमावै।
जिसमें पढकर सभी हमारे दुख दरिद्र जल जावै।।
फिर भी इस भूतल के ऊपर हम भी मनुज कहावै।
परम प्रबल अँगरेज जाति का प्रलय तलक यश गावै।।
दादा भाई और अयोध्या नाथ सुरेन्द्र सयाने।
देश दशा को खोल-खोल तब सब को लगे सुहाने।।
मेहता, माधव, दत्त, घोष का घोष देश में छाया।
आँख खोल हम लगे चेतने अपना और पराया।।
-फूट कविता से
देश की दुर्दशा ने कवि-मन पर इतना दबाव डाला हुआ है कि उसे बसन्त के फूलों का खिलना बेचैन करता है। बसन्त के आने पर वे भारतेन्दु के लहजे में कहते हैं:
रे रे निलज सरोज। अजहुँ विकसत लखि भानहि;
देश-दुर्दशा-जनित दुःख चित्त नेकु न आनहि।
-बसन्त कविता से
जब शुक्लजी को अपने देश से इतना प्रेम था तो भला उसके सुन्दर प्राकृतिक दृश्यों के प्रति उनका आकर्षण क्यों न होता। निम्नलिखित पंक्तियों में प्राकृतिक सौन्दर्य को जैसे आँखों के आगे साकार कर दिया गया हैः
देखा सरोवर-तीर निर्मल नीर मन्द हिलौर है,
जिसमें पडी वट-विटप-छाया काँपती इक ओर है।
अति मन्द गति से ढुर रही है पाँति बगलों की कहीं,
बैठी कहीं दो-चार चिडियाँ पंख को खुजला रहीं।
झुक कर दु*मों की डालियाँ जल के निकट तक छा रहीं,
जिनसे लिपट अनुराग से फूली लता लहरा रहीं।
-बसन्त-पथिक कविता से
कहीं-कहीं प्रकृति का मानवीकृत रूप बहुत मोहक बन पडा है। धरती के गर्भ से अंगडाई लेकर आँखें खोलते हुए बीज का यह चित्रण मन मोह लेता है :
जगने के इस जटिल यत्न में बीज फूटता-
उठने के कुछ पहले उसका अंग टूटता।
खोल खेत में आँख बीज अँखुआ कहलाता,
मिट्टी मुँह में डाल, फूल तन में न समाता।
-प्रकृति प्रबोध कविता से
अतः कहा जा सकता है कि शुक्लजी के मानस-जगत को समझने के लिए मधुस्रोत निःसन्देह एक अपरिहार्य कृति है। बकौल कृष्णदत्त पालीवाल मधुस्रोत के प्रकाशित हो जाने से आचार्य शुक्ल के सृजनात्मक व्यक्तित्व का जो रूप उजागर होता है उससे आचार्य शुक्ल के अन्तरंग अंतःइतिहास को, उनके समीक्षा-सिद्धान्तों के विचार पक्ष को ठीक से समझने में बडी सहायता मिलती है।... इन कविताओं के अन्तर्जगत को समझने पर शुक्लजी के आलोचक को समझने में सरलता हो जाती है।16
अनुवाद और अनुसृजन
रामचन्द्र शुक्ल ने अपना लेखक-जीवन मॉर्डन रिव्यू और हिन्दुस्तान रिव्यू में अंग्रेजी लेखन से शुरू किया था। इसके साथ-साथ उन्होंने मनोविज्ञान, इतिहास, संस्कृति, शिक्षा एवं व्यवहार सम्बन्धी लेखों एवं पत्रिकाओं के अनुवाद भी किए हैं। आचार्य शुक्ल ने सन् 1920 में जर्मन दार्शनिक अर्न्स्ट हैकल की पुस्तक दि रिडल ऑफ दि यूनिवर्स से प्रभावित होकर उसका अनुवाद किया था। उन्होंने इसकी 155 पृष्ठों की लम्बी भूमिका भी लिखी थी। इस पुस्तक का अनुवाद करते हुए उन्होंने पाश्चात्य वैज्ञानिकों एवं दार्शनिकों के विचारों को आत्मसात् किया और न केवल अनात्मवादी आधिभौतिक पक्ष के सिद्धान्तों, वरन् भाववादी दार्शनिकों के विचारों को भी क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत किया। पाश्चात्य विचारकों के साथ ही उन्होंने वेदान्त, सांख्य, वैशेषिक, न्याय तथा चार्वाक आदि भारतीय दर्शनों के मतों को उद्धृत करके तुलनात्मक आधार पर अपना मत स्थिर करने का प्रयत्न किया।
उन्होंने बंगला के प्रख्यात साहित्यकार राखालदास बन्द्योपाध्याय के ऐतिहासिक उपन्यास शशांक का हिन्दी रूपान्तर कर तथा उसकी भूमिका लिखकर जहाँ अपनी बंगला भाषा एवं साहित्य के प्रति पैठ का परिचय दिया, वहीं भारत के प्राचीन इतिहास के विशद ज्ञान का बोध भी कराया। अपनी पैनी दृष्टि से उन्होंने गुप्त-साम्राज्य की उत्पत्ति से हर्ष तक और उसके साथ ही मालवा, मगध और गौड प्रदेश के इतिहास पर प्रकाश डाला है। साहित्यिक दृष्टि से यह रोचक और शिक्षाप्रद तो है ही, ऐतिहासिक दृष्टि से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है।
एडविन आर्नल्ड की लाइट ऑफ एशिया नामक विशिष्ट कृति का बुद्धचरित शीर्षक से ब्रज भाषा में छन्दोबद्ध काव्यानुवाद भी उन्होंने किया है। शुक्लजी प्रकृति के महान् आराधक थे। लाइट ऑफ एशिया का काव्यानुवाद करते समय उन्होंने अनेकानेक स्थानों पर भावों का विस्तार से वर्णन किया है। परन्तु ऐसा करते हुए भी उन्होंने अनुवादक की मर्यादा का पालन किया है और मूल लेखक के भावों की रक्षा भी की है। बुद्धचरित के आरम्भिक वक्तव्य में उन्होंने अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए लिखा हैः यद्यपि ढंग इसका ऐसा रखा गया है कि एक स्वतंत्र हिन्दी काव्य के रूप में इसका ग्रहण हो पर साथ ही मूल पुस्तक के भावों को स्पष्ट करने का भी पूर्ण प्रयत्न किया गया है। दृश्य-वर्णन जहाँ अयुक्त या अपर्याप्त प्रतीत हुए वहाँ बहुत-कुछ फेर-फार करना या बढाना भी पडा है। दो उदाहरणों से बात और स्पष्ट हो जाएगीः
उदाहरण-1
मूल पाठः
But, when the days were numbered,
Then befell
The parting of our Lord--which was to be--
Whereby came wailing in the Golden Home,
Woe to the King and Sorrow O'er the land,
But for all flesh deliverance, and that Law
Which whose hears--the same shall
make him free.
अनुवादः
जब दिन पूरे भए बुद्ध भगवान् हमारे,
तजि अपनो घर-बार घोर बन ओर सिधारे।
जासों परयो खभार राज-मन्दिर में भारी,
शोक-विकल अति भूप, प्रजा सब भई दुखारी।
पै निकस्यो निस्तार पंथ प्राणिन हित नूतन;
प्रगट्यो शास्त्र पुनीत कटैं जासों भव-बन्धन
उदाहरण-2
मूल पाठः
Softly the Indian night sinks on the plains
At full Moon, in the month of Chaitra Shud,
When mangoes redden and the Asoka buds
Sweeten the breeze, and Rama's
Birthday comes,
And all the fields are glad and all the towns.
अनुवादः
निखरी रैन चैत पूनो की अति निर्मल उजियारी ।
चारुहासिनी खिली चाँदनी पट पर पै अति प्यारी ।।
अमराइन में धँसि अमियन को दरसावति बिलगाई ।
सींकन में गुछि झूल रहीं जो मन्द झकोरन पाई ।।
चुवत मधूक परसि भू जौ लौं टप-टप शब्द सुनावैं।
ताके प्रथम पलक मारत भर में निज झलक दिखावैं।।
महकति कतहुँ अशोक-मंजरी, कतहुँ-कतहुँ पुर माँहीं ।
रामजन्म-उत्सव के अब लौं साज हटे हैं नाहीं।।
दोनों उदाहरणों से स्पष्ट है कि अनुवाद में मूल के भाव सुरक्षित हैं, परन्तु जहाँ प्रकृति-वर्णन का प्रसंग आया है वहाँ शुक्लजी अपने को रोक नहीं सके हैं। द्वितीय उदाहरण से यह बात स्पष्ट हो जाती है। इस प्रकार बुद्धचरित अंग्रेजी से हिन्दी में अनूदित होने वाले काव्यों में सर्वश्रेष्ठ है। यह मक्षिका स्थाने मक्षिका वाला अनुवाद नहीं, अपितु मूल पुस्तक का आश्रय लेकर रचा गया बहुत सुन्दर स्वच्छन्द काव्य ही है। भाषा यहाँ शुद्ध ब्रजभाषा है। इस अनुवाद में उन्होंने न जाने कितने छन्दों का सफल भावानुकूल प्रयोग किया है। अनुवाद करते समय आचार्य शुक्ल ने हिन्दी भाषा के प्रयोगों और प्रवृत्तियों पर सर्वत्र ध्यान रखा है। विदेशी मुहावरों, लाक्षणिक प्रयोगों तथा अंग्रेजी के अलंकारों के अनुवाद में उन्होंने बडी सतर्कता से किया है। हिन्दी को अंग्रेजी के ढाँचे में नहीं ढलने दिया।
इसके अलावा शुक्लजी ने जोसेफ ऐडिसन के प्लेजर ऑफ इमेजिनेशन तथा न्यूमन का लिटरेचर का क्रमशः कल्पना का आनन्द व साहित्य नाम से हिन्दी में रोचक अनुवाद किया है। ये दोनों ऐसे अनुवाद हैं, जिनकी भित्ति पर आचार्य शुकल का साहित्य चिन्तन खडा है। दरअसल प्लेजर ऑफ इमेजिनेशन तथा लिटरेचर का अनुवाद करते समय ही शुक्लजी के सामने यह प्रश्न उपस्थित हो गया था कि कविता क्या है?। लिटरेचर निबन्ध के अनुवाद का एक अंश इस क्रम में द्रष्टव्य है।
साहित्य की व्याख्या करते हुए न्यूमन ने लिखा हैः
'Such men consider fine writing to be an addition form without to the matter treated of a sort of ornament super induced of a luxury indulged in, by those who have time and inclination for such varities they agree together in this in considering such composition a trick and trade, they put in on a bar with the gold plate and the flowers and the music of a banquet, which do not make the vianas better, but the entertainment more pleasurable, as if language were the hired servant, the mere mistress of the reason and not the lawful wife in her own house.'
इसका हिन्दी अनुवाद शुक्लजी ने इस प्रकार किया हैः
बहुतों का मत है कि सुन्दर रचना अर्थात् साहित्य किसी वस्तु पर ऊपर से कलई कर देना है, अथवा एक प्रकार के आभूषणों से विभूषित करना है, जिसका साधन केवल ऐसे ही मनुष्य करते हैं, जिन्हें ऐसी तुच्छ बातों में रुचि होती है और उसके लिए समय मिलता है। वे साहित्य रचना को एक प्रकार का व्यवसाय और चातुरी मानते हैं। वे उनको ऐसे ही समझते हैं, जैसे भोजन के समय सोने का पात्र और गुलदस्ते आदि, जो भोजन को अधिक स्वादिष्ट नहीं बना देते, किन्तु आनन्द को बढाते हैं।
इससे स्पष्ट है कि अनुवाद सम्बन्धी उनकी प्रथम निष्ठा विषय को अपने पाठकों के लिए यथार्थ रूप में बोधगम्य बनाने के प्रति है। उनके लिए महत्त्वपूर्ण यह है कि उनका पाठकवर्ग विषय को ठीक-ठीक समझ सके, सिर्फ यह नहीं कि अनूद्य ज्यों का त्यों भाषान्तरित हो जाए। इसके लिए वे कभी-कभी अपनी ओर से कुछ मिला देते थे या मूल के किसी अंश को बदल देते थे। मूल बंगला कृति शशांक के प्रथम परिच्छेद शोण-संगमे के पाँच वाक्यों का अनुवाद इस ऋम में द्रष्टव्य हैः
मूल बंगलाः
सहस्राधिक वर्ष पूर्वे पाटलिपुत्र नगरेर निम्ने शोण नदीर जलराशि भागीरथी सहित मिलित हइत। शोणसंगमेर तीरे एकटि अतिबृहद् प्राचीन पाषाणनिर्मित प्रासाद छिल, बहुशताब्दी परे शोणेर गति परिवर्तन समये नाहार ध्वंसावशेष गंगावक्षे विलीन हइयाछे। वर्षार प्रारम्भे, सन्ध्यार प्राक्काले शोणेर सम्मुखे, प्रासादेर वातायने एकटि बालक ओ जनैक वृद्ध दंडायमान छिल।
शुक्लजी द्वारा अनूदितः
हजार वर्ष से ऊपर हुए जबकि पाटलिपुत्र नगर के नीचे सोन की धारा गंगा से मिलती थी। सोन के संगम पर ही एक बहुत बडा और पुराना पत्थर का प्रासाद था। उसका अब कोई चिन्ह तक नहीं है। धारा जिस समय हटी उसी समय खण्डहर गंगा के गर्भ में विलीन हो गया।
वर्षा का आरम्भ था, संध्या हो चली थी। प्रासाद की एक खिडकी पर एक बालक और वृद्ध खडे थे।
मूल के साथ-साथ यदि शशांक का अनुवाद भी पढा जाए, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि बंगला के लम्बे-लम्बे वाक्यों को बोधगम्यता की दृष्टि से शुक्लजी ने छोटे-छोटे वाक्यों में तब्दील कर दिया है। अनुवाद करते समय शुक्लजी इस बात का पूरा ध्यान रखते थे कि हिन्दी की प्रकृति की रक्षा हो। उसके वाक्यविन्यास या शब्दप्रयोग पर अनूद्य भाषा हावी न हो जाये। विश्वप्रपंच के वक्तव्य में अपने अनुवाद की भाषा-शैली के सम्बन्ध में उन्होंने लिखा हैः भाषा के सम्बन्ध में इतना कह देना अनुचित न होगा कि उसे केवल हिन्दी या संस्कृत जाननेवाले भी अपनी विचार-पद्धति के प्रायः अनुरूप पाएँगे। कौन-सा वाक्य किस अंग्रेजी वाक्य का अक्षरशः अनुवाद है, इसका पता लगाने की जरूरत किसी को न होगी। अंग्रेजी की तुलना में बंगला से अनुवाद करना निश्चय ही सरल है किन्तु अपरिचित अनुवादक कभी-कभी हिन्दी में अप्रयुक्त बंगला शब्दों को भी अनुवाद में रहने देते हैं और कभी-कभी वाक्य विन्यास में गडबडी कर देते हैं। कहा जा सकता है कि आचार्य शुक्ल अनुवाद के कठोर व शुष्क नियमों की उपेक्षा करके भी विषय के निहितार्थ का सम्यक प्रतिपादिन करने में समर्थ थे।

भाषा और संवेदना
रामचन्द्र शुक्ल के कथनानुसार भाषा का पहला काम है शब्दों के द्वारा अर्थ का बोध कराना। बाल गंगाधर तिलक के विचारों से प्रभावित शुक्लजी का देशभक्त मन यह मानता है कि भाषा और साहित्य के स्वतंत्र विकास से ही किसी भी राष्ट्र का मौलिक चिन्तन और सांस्कृतिक मूल्य-भावना पुष्ट ओर प्रेरक रूप धारण करती है। शुक्लजी के अनुसार भाषा ही जाति के धार्मिक और जातीय विचारों की रक्षिणी है, वही उसके पूर्ण गौरव का स्मरण कराती हुई, हीन से हीन दशा में भी, उसमें आत्माभिमान का स्रोत बहाती है। किसी जाति को अशक्त करने का सबसे सहज उपाय उसकी भाषा को नष्ट करना है।
शुक्लजी की भाषा प्रायः गँठी रहती है। उनमें विशेषतः शुद्ध तत्सम शब्दों के प्रयोग की ही प्रवृत्ति नहीं है, ये तद्भव शब्दों को भी अपनाते हैं और प्रसंगानुसार उर्दू की भी कद्र करते हैं:
1. श्रद्धा और प्रेम के योग का नाम भक्ति है।
2. लोभ सामान्योन्मुख होता है और प्रेम विशेषोन्मुख।
3. साधारण बोलचाल में वस्तु के प्रति मन की जो
ललक होती है उसे लोभ और किसी व्यक्ति के प्रति जो ललक होती है उसे प्रेम कहते हैं।
उनकी भाषा और उनके गद्य के स्वरूप उनके अंग्रेजी अध्ययन-चिन्तन-मनन के सन्दर्भ में भी समझे जा सकते हैं। अंग्रेजी निबन्ध साहित्य के इतिहास पर दृष्टिपात करें तो 17वीं शती के अंग्रेजी निबन्धकार फ्रांसिस बेकन ही उनके समकक्ष दिखाई पडते हैं। इन दोनों महान् निबन्धकारों की भाषा का कसाव, शब्द-चयन और सूत्रात्मक शैली बेजोड हैः
1. वैर क्रोध का अचार या मुरब्बा है। -आचार्य शुक्ल
Revenge is wild justice. -Francis Ba 2. यदि प्रेम स्वप्न है, तो श्रद्धा जागरण है। -आचार्य शुक्ल
That it is impossible to love and to be wise. - Francis Bacon
जिस प्रकार विचारों के क्षेत्र में, उसी प्रकार भाषा के मामले में भी शुक्लजी ने अंग्रेजी से भी बहुत कुछ लिया है। उन्होंने अपने काव्य-सिद्धान्तों से सम्बन्धित निबन्धों में पारिभाषिक शब्दों का बहुतायत प्रयोग किया है; अपने विवेचन में अंग्रेजी के पारिभाषिक शब्दों के प्रतिशब्द संस्कृत से ही गढे। प्रत्यय (Cognition), सर्ववाद (Pentheism), अद्वैतवाद (Monism), प्रतीति (Perception), अन्तःसंस्कार (Impressions), अभिव्यंजनावाद (Expressionism) जैसे अनेकानेक शब्दों ने अपनी पूरी अर्थव्याप्ति के साथ प्रयुक्त होकर शुक्लजी की भाषा-शैली को गूढ, शास्त्रीय और पारिभाषिक बना दिया है। हिन्दी साहित्य के इतिहास एवं आलोचना-धर्म को जिस नयी भाषा की तलाश थी वह आचार्य रामचन्द्र के इतिहास एवं आलोचना-कर्म से पूरी हो रही थी। वे सच्चे अर्थों में हिन्दी के पहले वैज्ञानिक आलोचक थे। निस्सन्देह उनके समान समालोचक, निबन्धकार तथा गद्य लेखक अन्यत्र दुर्लभ है। अपने युग के जितने जागरूक चिन्तक शुक्लजी थे, हिन्दी जगत् में उतना सर्वतोन्मुखुी और गम्भीर चिन्तक दूसरा न था और न है। आचार्य शुक्ल आज भी चुके नहीं है। उनमें ऐसा बहुत कुछ है जो हमारे हिन्दी साहित्य और समीक्षाशास्त्र के लिए अर्थवान और प्रासंगिक है।
हिन्दी भाषा और साहित्य को समृद्धि प्रदान करने की दिशा में आचार्य शुक्ल के अवदान को कभी विस्मृत नहीं किया जा सकता। नलिन विलोचन शर्मा ने अपनी पुस्तक साहित्य का इतिहासदर्शन में कहा है कि शुक्लजी से बडा समीक्षक सम्भवतः उस युग में किसी भी भारतीय भाषा में नहीं था। आलोचना, निबन्ध-लेखन तथा साहित्य की अनेक विधाओं में सक्रिय इस अद्वितीय प्रतिभा के महाप्रयाण पर कविवर सनेही ने ठीक ही कहा थाः अमा निशा है, समालोचना के अम्बर में। सचमुच उनकी रिक्ति की पूर्ति अभी तक पूरी नहीं हो पाई है। उनके जैसा प्रौढ और सर्वांगीण आलोचक आज तक नहीं हुआ। नन्ददुलारे वाजपेयी, हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ. नगेन्द्र, रामविलास शर्मा, नामवर सिंह आदि परवर्ती आलोचकों ने परोक्ष रूप से उनसे टकराकर उनकी श्रेष्ठता स्वीकार कर ली और अपने लिए नया मार्ग ढूँढकर हिन्दी आलोचना को आगे बढाया।
सन्दर्भ :
1. सिंह नामवर, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ,
पृ. 86।
2. शुक्ल रामचन्द्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ 305।
3. शर्मा रामविलास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी
आलोचना, पृ. 45।
4. नवल नन्दकिशोर, हिन्दी आलोचना का विकास,
पृ. 101।
5. शुक्ल रामचन्द्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास की भूमिका
से ।
6. शुक्ल रामचन्द्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास, काल
विभाग से ।
7. वही।
8. सिंह नामवर, इतिहास और आलोचना, पृ. 136।
9. सिंह नामवर, सम्मुख, पृ. 101।
10.शुक्ल रामचन्द्र, हिन्दी साहित्य का इतिहास, भक्ति
प्रकरण-1, पृ. 34 ।
11.सिंह बच्चन, आलोचक और आलोचना, पृ. 172।
12.शुक्ल रामचन्द्र, चिन्तामणि, भाग-3, पृ. 186-87
13.सिंह नामवर, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ,
पृ. 86।
14.शर्मा रामविलास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी
आलोचना, पृ. 38।
15. (क). ब्रजभाषा की कविताएँ- मनोहर छटा, बसन्त,
शिशिर-पथिक, विरह-सप्तक, भारत और वसन्त, बाल-विनय, हर्षोद्गार तथा रानी दुर्गावती ।
(ख). खडीबोली की कविताएँ- मधुस्रोत, अन्योक्तियाँ, प्रेम-प्रताप, प्रकृति-प्रबोध, हृदय का मधुरभार, वसन्त-पथिक, रूपमय हृदय, देशद्रोही को दुत्कार, फूट, आशा और उद्योग, वन्दना, हमारी हिन्दी, याचना, पाखंड-प्रतिषेध, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, श्रीयुत बाबू देवकीनन्दन खत्री का वियोग, भारतेन्दु-जयन्ती, आमन्त्रण तथा गोस्वामी जी और हिन्दू-जाति।
16-पालीवाल कृष्णदत्त, अचार्य शुक्ल का चिन्तन-जगत, साहित्यनिधि, पृ 65।

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