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यथार्थवादी काव्य-चेतना और कवि चन्द्रदेव शर्मा

नन्द भारद्वाज
कवि चन्द्रदेव शर्मा की जन्म-शताब्दी पर विशेष -
आधुनिक हिन्दी साहित्य की यथार्थवादी काव्य-चेतना के विकास में राजस्थान के हिन्दी कवियों के अवदान की जब भी चर्चा होती है, बीसवीं सदी के पाँचवें और छठे दशक में सक्रिय कवि चन्द्रदेव शर्मा का नाम सहज ही उभर कर सामने आ जाता है। वरिष्ठ कवि नन्द चतुर्वेदी ने अपने सम्पादन में प्रकाशित राजस्थान साहित्य अकादमी की काव्य श्रृंखला राजस्थान के कवि के पहले भाग में चन्द्रदेवजी की कविताओं को शामिल करते हुए अपनी भूमिका में उनके महत्त्व को विशेष रूप से रेखांकित किया था। सन् 1964 में प्रकाशित इस काव्य-संकलन की भूमिका में उन्होंने इस बात का विशेष रूप से उल्लेख किया था कि 19 शताब्दी में हिन्दी का काव्योद्भव और राजस्थानी का पुनः उत्थान जैसे साथ-साथ ही चलता है। भाषाओं का यह सहगमन इतिहास की सद्भावनापूर्ण और बडी घटना है। 19वीं सदी में राजस्थानी का पुनर्जागरण और पुराने ग्रंथों की शोध-खोज मुझे स्वतंत्रता संग्राम के विस्तृत कार्यक्रम का एक अभिन्न अंग मालूम होती है, क्योंकि उस समय प्रत्येक प्राचीन ग्रंथ के प्रकाशन का यह अभिप्राय था कि हम पूर्वजों का यश आलोकित कर रहे हैं, जिसे कुछ तो इतिहास के अँधेरे ने और कुछ अंग्रेजी शासन के स्वार्थ ने फैलने नहीं दिया था। स्वातंत्र्य उपलब्धि के अंतिम चरण में राजस्थान के कवियों का कण्ठ-स्वर प्रदेश के छोटे-छोटे भू-भागों की सीमा लाँघकर फैलने लगा था। इस स्वर को राजस्थान की काव्य-चेतना का नया हस्ताक्षर कहना औचित्यपूर्ण होगा। इस नये व्यक्तित्व को धारण करने वाले कवियों का उल्लेख आवश्यक है, और ये हैं गणपतिचन्द्र भण्डारी, कन्हैयालाल सेठिया, रामनाथ कमलाकर, घनश्याम शलभ, स्वर्गीय चन्द्रदेव शर्मा, परमेश्वर द्विरेफ, मेघराज मुकुल, सत्यप्रकाश जोशी, प्रकाश आतुर इत्यादि।
21 दिसंबर, 1921 को नागौर के कुचेरा गाँव में जन्मे चन्द्रदेव शर्मा राजपूताना की बीकानेर रियासत में चल रहे स्वाधीनता आन्दोलन के अंतिम चरण में सक्रिय ऐसे सजग कवि थे, जिन्होंने स्वाधीनता, समानता और सामाजिक न्याय जैसे लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक सरोकारों को लेकर अपनी कविताओं, वैचारिक टिप्पणियों और आन्दोलन से जुडी गतिविधियों में भाग लेते हुए सामाजिक चेतना के निर्माण में अहम भूमिका निभाई। एक युवा कवि के रूप में वे सन् 1943-44 के आस-पास सक्रिय हुए थे और उसी दौरान अपनी कविताओं के माध्यम से स्कूल, कॉलेज और सार्वजनिक संगोष्ठियों में एक विवेकशील, सजग और बेबाक रचनाकार के रूप में सामने आने लगे थे। सन् 45 से लेकर अपने जीवनकाल के अंतिम समय तक सामाजिक सरोकार वाले संजीदा रचनाकार के रूप में वे बराबर सक्रिय बने रहे। राष्ट्रीय स्तर के कवि सम्मेलनों और साहित्यिक आयोजनों में उनके नाम की धूम थी। महाकवि निराला, रामविलास शर्मा, बरसानेलाल चतुर्वेदी, हरिकृष्ण प्रेमी आदि के लिए एक कवि के रूप में उनकी पहचान कतई नयी नहीं थी। वे उनके साथ कई राष्ट्रीय महत्त्व के आयोजनों में सहभागिता निभा चुके थे। जब वे अपनी रचनाशीलता के पूरे उभार पर थे, तभी कुछ अस्वस्थता और कमजोर स्वास्थ्य के चलते 16 जनवरी, 1959 को अलवर में आयोजित कवि सम्मेलन से लौटते हुए रेवाडी में एक रिश्तेदार के यहाँ उनके अकस्मात निधन की खबर ने पूरे परिवार और उनके मित्रों को स्तब्ध कर दिया।
जब वे इंटर के विद्यार्थी थे, तब की एक घटना का उल्लेख करते हुए कवि-लेखक शंभूदयाल सक्सेना ने चंद्रदेव शर्मा की असामयिक मृत्यु पर सेनानी साप्ताहिक में एक संस्मरण लिखते हुए कहा था कि वे अपने समय के एक विलक्षण कवि थ।। उनके साथ अपने जीवन का एक शुरुआती अनुभव बयान करते हुए लिखा कि उस जमाने के चर्चित कवि-नाटककार हरिकृष्ण प्रेमी और उन्होंने एक संगोष्ठी में जब अपनी कविताएँ सुनाईं, तो उसी संगोष्ठी में उपस्थित फक्क मस्ती में अलमस्त युवा कवि चन्द्रदेव शर्मा ने उनके कविता पाठ के ठीक बाद जिस तरह उन कविताओं की पैरोडी बनाकर सुनाई, तो उसे सुनकर सभी विमुग्ध रह गए और तब उन्होंने प्रेमीजी से कहा था कि इस प्रतिभा के पंख लगने चाहिए। प्रेमीजी ने भी शंभूदयाल सक्सेना के उद्गार का समर्थन करते हुए कहा कि उसके बाद वह नवचन्द्र पूर्ण चन्द्र बन गया और उसकी कौमुदी ने बीकानेर ही नहीं, राजस्थान के नभमण्डल को आलोकित कर दिया। चन्द्रदेव शर्मा अपनी नियमित औपचारिक शिक्षा के साथ एक कवि और गद्य लेखक के रूप में सक्रिय तो रहे ही, उन्होंने काव्य मंचों और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से एक कवि के रूप में अपनी अलग पहचान भी बराबर बनाए रखी। अपनी सर्जनात्मक रुचि के साथ शिक्षा के प्रति भी वे उतने ही संजीदा रहे। यही कारण था कि सन् 1945 में एम.ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने से पूर्व वे साहित्यरत्न और साहित्याचार्य की परीक्षाएँ भी पास कर चुके थे। चन्द्रदेव की इन उपलब्धियों की सराहना करते हुए उनके शिक्षक और विख्यात इतिहासकार डॉ.दशरथ शर्मा ने जून 1945 की अपनी एक टिप्पणी में लिखा था, पण्डित चन्द्रदेव शर्मा एक उत्कृष्ट शैलीकार, लेखक और मौलिक विचारक हैं। वे हिन्दी में अब उभर रहे कविता के नये दौर के प्रमुख लेखक माने जाते हैं। मैं निजीतौर पर व्यंग्य को उनका विशेष क्षेत्र मानता हूं। इस क्षेत्र में वे संभवतः सर्वश्रेष्ठ हैं। न सिर्फ राजपूताना में ही अपितु अन्यत्र भी उनके-से तीक्ष्ण व्यंग्यकार बहुत नहीं होंगे और एक दिन उन्हें अपनी पीढी के सर्वश्रेष्ठ व्यंग्य लेखकों में गिना जाएगा। और इस तरह कवि शंभूदयाल सक्सेना और हरिकृष्ण प्रेमी की भांति डॉ. दशरथ शर्मा भी उनकी प्रतिभा के कायल थे। एम.ए. क रने के एक साल बाद ही चन्द्रदेव स्वयं भी कॉलेज में प्राध्यापक नियुक्त हो गए और उसके बाद श्रीगंगानगर और चूरू के महाविद्यालयों में सेवाएँ देते हुए 1949 में वे डूँगर कॉलेज बीकानेर आ गए थे, बीच में दो वर्ष (1952-54) जोधपुर के जसवंत कॉलेज में भी सेवारत रहे, लेकिन वहाँ से फिर लौटकर बीकानेर आ गए थे जहाँ वे जीवन के आखिरी साल तक बने रहे।
इस तरह 38 वर्षों की अपनी छोटी-सी जीवन-यात्रा में से महज 15-16 वर्ष एक कवि और प्राध्यापक के रूप में सक्रिय यह रचनाकार जनवरी, 1959 में बेशक सदा के लिए भौतिक रूप से मौन हो गया हो, लेकिन उसकी कविताएँ और अन्य रचनाएँ विगत छह दशकों में साहित्य के अध्येताओं और काव्य प्रेमियों के बीच बराबर चर्चा का विषय बनी रहीं। सन् 1955 में जब राजस्थान साहित्य अकादमी की स्थापना हुई, तो उस समय के चर्चित कवि चन्द्रदेव शर्मा एक सम्मानित सदस्य के रूप में अकादमी की गतिविधियों से जुडे रहे। यही कारण है कि जब राजस्थान साहित्य अकादमी ने अपनी प्रमुख गतिविधि के रूप में प्रदेश में साहित्य सृजन को बढावा देने और श्रेष्ठ रचनाकर्म को सम्मानित करने की दृष्टि से प्रदेश के दिवंगत वरिष्ठ साहित्यकारों के नाम पर विभिन्न पुरस्कार योजनाओं की घोषणा की, तो उनमें युवा प्रतिभाओं को दिया जाने वाला पुरस्कार चन्द्रदेव शर्मा के नाम से आरम्भ किया गया। इसी तरह मध्यकाल की महान् कवयित्री मीरां, कवि सुधीन्द्र, सुमनेश जोशी, रांगेय राघव, कन्हैयालाल सहल जैसे प्रदेश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों के नाम पर अन्य विधाओं में श्रेष्ठ लेखन को प्रोत्साहित करने लिए पुरस्कार योजनाएँ आरंभ की गई थीं। इन दिवंगत रचनाकारों में चन्द्रदेव शर्मा के समकालीन कवि सुधीन्द्र और रांगेय राघव ऐसे रचनाकार रहें, जिनका चालीस-पैंतालीस वर्ष से भी कम आयु में अकस्मात निधन हो गया था। जाने ये कैसी विडम्बना है कि आधुनिक विश्व साहित्य और भारतीय भाषाओं के कई बडे रचनाकार इसी तरह 35 से 50 वर्ष की आयु सीमा पूरी करने से पहले ही इस असार संसार से विदा हो गए, जो आज साहित्य-जगत के कालजयी रचनाकारों में गिने जाते हैं। अंग्रेजी कवि शैली, कीट्स, बायरन, क्रिस्टोफर कॉडवेल, बैंजामिन मोलाइस, लोर्का, हिन्दी कवि मुक्तिबोध, धूमिल, बांग्ला कवि सुकान्त भट्टाचार्य, पंजाबी कवि पाश आदि ऐसे ही कुछ विख्यात नाम हैं, जो अपनी छोटी-सी जीवन-यात्रा में ऐसा मुकाम बना गए कि उस तक पहुँचना आठ-नौ दशक की आयु पार करने वाले बहु-प्रचारित रचनाकारों के लिए संदिग्ध और अनिश्चित ही बना रहा। हालाँकि मैं इसे कोई कुदरत का करिश्मा कहने के पक्ष में नहीं हूँ। वैसे भी किसी प्रतिभाशाली रचनाकार के लिए अपनी अलग पहचान बनाने की यही कालावधि हुआ करती है, उसके बाद तो वह उस अवस्था और पहचान का विस्तार भर करता है।
यह वर्ष कवि चन्द्रदेव शर्मा का जन्म-शताब्दी वर्ष है। खुशी की बात है कि इस शताब्दी वर्ष की शुरूआत स्वयं उनके और परिवार के प्रमुख रहवास स्थल बीकानेर में उनके जीवन और रचनाकर्म पर केन्द्रित इस महत्त्वपूर्ण साहित्यिक संगोष्ठी से हो रही है। चन्द्रदेवजी अपने जीवन काल में काव्य मंचों और साहित्यिक आयोजनों में बेशक सक्रिय रहे, खूब चर्चित और कामयाब भी रहे, लेकिन अपनी कविताओं और अन्य रचनाओं के प्रकाशन पर ध्यान देने का समय और अवसर शायद वे नहीं जुटा पाए। उनकी व्यंग्य कविताओं का एक मात्र संग्रह पण्डितजी गजब हो रहा है भी उनके निधन के बाद प्रकाशित होकर सामने आ सका। राजस्थान साहित्य अकादमी ने हमारे पुरोधा श्रृंखला में वर्ष 1992 में उनके जीवन और रचनाकर्म पर 116 पृष्ठ की एक पुस्तिका प्रकाशित की है - शब्दभेदी चन्द्रदेव शर्मा, जिसके लेखक हैं उनके सुपुत्र नरेन्द्र कुमार शर्मा। निस्संदेह इस पुस्तिका से चन्द्रदेवजी के संघर्षपूर्ण जीवन से जुडी कईं आवश्यक और महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। इस पुस्तिका के माध्यम से उनकी प्रमुख रचनाओं, विशेष रूप से उनकी कुछ चुनिन्दा कविताओं और उनकी रचनाशीलता पर नरेन्द्र शर्मा का सुविचारित वस्तुपरक विवेचन सामने आ सका है, लेकिन मेरा अनुमान है, और नरेन्द्रजी द्वारा दिये गये ब्यौरों से यह संकेत भी मिलता है कि उनकी लगभग डेढ सौ कविताएँ और अन्य गद्य रचनाएँ अभी तक प्रकाशन की प्रतीक्षा में हैं। उनकी सभी कविताओं और गद्य रचनाओं का एक समग्र या रचनावली के रूप में उनका प्रकाशन अवश्य किया जाना चाहिए, साथ ही उनके रचनाकर्म पर उनके जीवनकाल में और बाद में पत्र-पत्रिकाओं में जो सामग्री प्रकाशित हुई है (जिनके हवाले खुद नरेन्द्रजी ने अपने विवेचन में दिए हैं) अथवा जिन पक्षों पर नये सिरे से लिखे जाने की जरूरत है, उस पर भी समय रहते विचार कर लिया जाना आवश्यक है। स्वयं चन्द्रदेव शर्मा ने अपने स्नात्कोत्तर अध्ययन के बाद हिन्दी प्रगीत साहित्य पर जो शोधकार्य किया था, उस शोध ग्रंथ की खोज-खबर ली जानी चाहिए। राजस्थान साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार डॉ प्रकाश आतुर ने अपनी मध्यमार्गी सोच के अनुरूप उनके काव्य-संकलन पण्डित जी गजब हो रहा है पर अपना विवेचन प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि चन्द्रदेव प्रगतिशील कवि थे और उनके काव्य में मनुष्य की सर्वोपरिता, शोषण का विरोध, धार्मिक कठमुल्लेपन पर प्रहार, त्वरित परिवर्तन के प्रति आग्रह एवं शोषक के प्रति तीव्र आक्रोश की भावना मुखर हुई है। इनके व्यंग्यों में बडा पैनापन है। इस संकलन में प्रकाशित रचनाएँ या तो शुद्ध रूप से हास्य हैं, जिनका उद्देश्य केवल मनोरंजन करना है या व्यंग्यात्मक हैं, जिनका उद्देश्य सुधारवादी रहा है। रूप का बाजार कविता में मुखौटाधारी समाज सुधारकों की जम कर खबर ली गई है। मुर्दों का देश हमारा है, जनखों का देश हमारा है, मिसेज लन्दन के प्रति, गोबर युग आदि कविताओं में राजनीतिक विद्रूपताओं और असंगतियों पर व्यंग्य के नश्तर लगाए गये हैं। चन्द्रदेव की इत्तिवृत्तात्मकता कविता को विस्तार तो देती है, लेकिन इससे कहीं कहीं गति में शैथिल्य भी आया है। उनका स्वष्टवादी निर्भीक व्यक्ति ही उनके काव्य को अग्निधर्मा बनाता है। वे जिस सहजता से माक्र्स पर प्रहार करते थे, उसी स्वाभाविकता से गाँधीवाद की दुर्बलताओं पर भी चोट करते थे। तथाकथित अध्यात्मवादी ढकोसलों और धार्मिक पोंगापंथी की तो उन्होंने बखिया उधेड दी है। उनके असामयिक निधन से भविष्य की प्रबल संभावनाओं को समाप्त कर दिया है। (राजस्थान की हिन्दी कविता, पृष्ठ 227)
दिलचस्प बात यह है कि प्रकाश आतुर की तरह राजस्थान साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष डॉ दयाकृष्ण विजय को भी अकादमी की ओर से प्रकाशित होनेवाली इस पुरोधा पुस्तक पर अपना आमुख लिखने के बहाने चन्द्रदेव की कविताओं में अपनी तथाकथित राष्ट्रवादी सोच और वामविरोधी मानसिकता के मुताबिक माक्र्स पर अपना आदिम विरोध प्रकट करने का अवसर जरूर मिल गया। वे लिखते हैं, राष्ट्रीयता के संबंध में उनके विचारों को पढकर कोई भी व्यक्ति उनके व्यक्तित्व को भली-भाँति समझ सकता है। वे शोषण के, पूँजीवाद के, सामन्तवाद के, राजाशाही के विरोधी थे, इसका अर्थ यह नहीं था कि वे माक्र्सवादी थे। यदि माक्र्सवादी होते तो माक्र्सवाद की धज्जियाँ नहीं उडाते, वे तो समाज में व्याप्त सडांध के विरोधी थे। इसीलिए उन्होंने लिखा भी है कि वर्तमान व्यवस्था से समाज में सडान्ध पैदा हो गई है। कवि का उसी व्यवस्था से विरोध है। विडंबना देखिए प्रकाश आतुर और दयाकृष्ण विजय कवि चन्द्रदेव की जिन अमर रहे अध्यात्म हमारा सरीखी दो-चार कविताओं के बल पर उन्हें माक्र्सवाद विरोधी ठहराने का प्रपंच कर रहे थे, वह दरअसल माक्र्स की उसी वैज्ञानिक और मानवीय समझ के अनुरूप सन्त-वैरागियों के पाखण्ड, स्त्री के प्रति उनकी दकियानूसी सोच, मठ-मंदिर में विनिवेश करने वाले धन-कुबेरों के छल-कपट और अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों के लिए राम-नाम का दोहन करने वाले राजनीतिज्ञों के दोगलेपन पर करारा व्यंग्य करने वाली कविता है। मजे की बात यह कि इस कविता के मूल भाव और सन्दर्भ से अभिन्न कार्ल माक्र्स मर गया बिचारा जैसी व्यंजनात्मक उक्ति, इन मन्दबुद्धि धज्जीधारियों को माक्र्सवाद का मन-सुहाता विरोध नजर आती है। चन्द्रदेव की यह कविता है -
त्यागी, वैरागी, सन्यासी,
सन्त यहाँ पर मठाधीश हैं।
नारी उनको नरक द्वार है,
फिर भी चेली बीस तीस हैं।।
राजाओं की बात न पूछो,
वे जगदीश्वर के स्वरूप हैं।
जनक बने निष्काम भाव से,
भोग रहे सुख, राज प्रमुख हैं।।
भक्ति भाव से भरे महाजन,
डबल मुनाफा खाते आय।।
चोर बाजारी की दौलत से
मठ-मन्दिर बनवाते आय।।
डालमिया बन गये सन्त अब,
शाश्वत सत्य समाया मन में।
सत्य, अहिंसा, त्याग, तपस्या,
उगल रहे नित प्रति भाषण में।।

जिनके हाथ आज है सत्ता,
राम बने वे राज्य कर रह।।
आजादी की उस सीता को,
निर्वासित कर पुण्य कर रह।।।
शूद्र, दास, मजदूर, कृषक सब,
सन्तोषी हैं, महा सुखी हैं।
करते हैं उपवास खुशी से,
यहाँ बताओ कौन दुखी है।।
सुख-दुख से जो दूर निरन्तर,
वही ब्रह्म है हमको प्यारा।
यह दुनिया क्षणभंगुर, नश्वर,
अमर रहे अध्यात्म हमारा।।
कार्ल माक्र्स मर गया बिचारा।।
ऐसी स्थूल बौद्धिकता अपनी ही समझ की धज्जियाँ उडाते हुए जो न कह जाए, कम है। यहाँ यह बात भी गौरतलब है कि चन्द्रदेव की राष्ट्रीयता फलक बहुत व्यापक है। वह जीवन की गतिशील मान्यताओं से पोषित होती है। वहाँ सतही भावुकता, उद्बोधनपरक अभिव्यक्ति या हवाई उच्छवास के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंने अपनी रचनाशीलता को राष्ट्रीय आन्दोलन और जनतांत्रिक प्रगतिशील जीवन-दृष्टि से सदा जोडे रखा और अपने परिवेश और सामाजिक यथार्थ के प्रति तीखे आलोचनात्मक स्वर के बावजूद वे बेहतर भविष्य के प्रति सदा आशावान बने रहे। जहाँ तक उनकी विश्व-दृष्टि और वैचारिक सोच का सवाल है, इसी पुस्तक में चन्द्रदेव की रचनाशीलता और उनकी वैचारिकता का सटीक विश्लेषण करते हुए लेखक नरेन्द्र कुमार शर्मा ने बहुत स्पष्ट रूप से लिखा है कि चन्द्रदेव स्वयं को माक्र्सवादी नहीं कहते, साथ ही वे कहीं भी माक्र्सवाद का वैचारिक विरोध नहीं करते। हाँ, यदा-कदा उनकी व्यंग्य दृष्टि प्रगतिशील कवि या माक्र्सवादियों के नकारात्मक या फौरी तौर पर लिये गए रवैयों को अपना निशाना बनाती नजर आती है। वे समाजवाद को विकासक्रम की एक अवस्था कहकर प्रकारान्तर से माक्र्सवाद को भी उसी प्रक्रिया में देखना व्यक्त करते हैं। अन्यत्र वे पूँजीवादी समाज की कटु और घनघोर आलोचना करते हुए उसमें प्रचलित वैचारिक रूपों को उनके वस्तुगत आधार वर्ग-हितों से जोडकर देखते हैं। दार्शनिक तौर पर भाववादी, आध्यात्मिक व निवृत्तिमूलक वेदान्त दर्शन की कटु आलोचना करते हुए पदार्थवादी विचारकों, अवधारणाओं के पक्ष में खडे होते हैं। ये सब बातें भी इसी निष्कर्ष तक ले जाती हैं कि वे स्वयं को माक्र्सवादी न कहते हुए उसे खारिज नहीं करते, अपितु उसके पदार्थवाद, वर्ग-दृष्टि, क्रान्तिकारिता, श्रम-शक्ति को इतिहास की संचालिका के रूप में देखना, विकास और इतिहास की प्रक्रिया में चीजों को जाँचना-परखना, वैचारिक रूपों को उसके वस्तुगत आधार से जोडकर देखना आदि के रूप में माक्र्सवाद के अवदान का रचनात्मक उपयोग करते हैं। इस संदर्भ में स्वयं चन्द्रदेव शर्मा अपने एक लेख में डॉ.रामविलास शर्मा के हवाले से यह सवाल पूछते हैं कि कबीर ने जब हिन्दू-मुस्लिम एक्य एवं धर्म की रूढि-भीरुता पर लिखा तब क्या उनके आदर्श रूस से अनुप्राणित थे? क्या भारतेन्दुकाल के लेखक माक्र्स के डॉक्यूमेंट पढकर आए थे? तुलसी ने कब कलिकाल और किसानों की दैन्य दशा पर लिखते हुए रूस की नकल की थी। (शब्दभेदी चन्द्रदेव शर्मा, पृष्ठ 51-52)
भारत में ब्रिटिश राज के अंतिम चरण में आजादी के आन्दोलन को कुचलने में ब्रिटिश हुकूमत की ज्यादतियों और देशी रजवाडों की सामन्ती जकडन में आम जनता जैसी दोजख भरी जन्दगी जी रही थी, उसके खिलाफ जन-चेतना जाग्रत करने में अगुवा आन्दोलनकारियों और भाषाई कलमकारों को जो लम्बा संघर्ष करना पडा, उसकी कुछ झलक चन्द्रदेव शर्मा के रचना संसार और उनकी रचनाशीलता में सहज ही लक्षित की जा सकती है। उन विकट वैश्विक, राष्ट्रीय और प्रादेशिक परिस्थितियों और कवि चन्द्रदेव शर्मा के व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया का लेखक नरेन्द्र शर्मा ने नपे-तुले शब्दों में जो सटीक विश्लेषण किया है, वह वही कर सकते थे। वे लिखते हैं, क्रूर और निरंकुश राजशाही और साम्राज्यवादी अंग्रेज शासकों के दुहरे जुए तले उत्पीडित-दमित, गरीबी, अभाव, अज्ञान, अन्धविश्वास से ग्रस्त यहाँ की जनता दूरस्थ यूरोप में उभरती ब्रिटिश भारत में उत्ताल तरंगें ले रही जनवादी स्वातंत्र्य चेतना के बहुत हल्के-हल्के झकोरों को देख-सुन और महसूस करने की बहुत अधिक सक्षम स्थिति में नहीं थी। दूर-दूर तक फैले रेत के समन्दर में यहाँ-वहाँ बिखरे गाँवों-कस्बों की दुनिया, इन्हें जोडते डाक के हरकारों और तारों की दुनिया में आँखें खोलता, आती-जाती डाक के पतों-अखबारों को पढता, जनता के तार-पत्रादि पढता लिखता हमारा चरित्र नायक चन्द्रदेव जीवन से सीखता, फिर उसे ही अर्पित करने को तैयार हो रहा था। इसी प्रक्रिया में वह एक ओर मिडिल, मैट्रिक और आगे की भी दुनियावी रस्मी शिक्षा प्राप्त कर रहा था, दूसरी ओर अपने निकटतम और दूरस्थ विश्व की हर बात, चीज, घटना, अवधारणा, रस्मो-रिवाज, व्यवहार, अनुभव आदि को जिज्ञासा से देखते हुए उसकी तह में पहुँचने को प्रयासरत था। और इस संश्लिष्ट प्रक्रिया में जिस सजग और संवेदनशील रचनाकार ने आकार लिया, उसके अंतरंग का उद्घाटन करते हुए वे आगे लिखते है - साहित्य के विद्यार्थी के रूप में परम्परा और इतिहास से परिचय के जरिये भी वह अपना मार्ग प्रशस्त कर रहा था। यह संयोग ही नहीं था कि बाद में उनके तैयार किये हुए समीक्षा नोट्स में सर्वाधिक ध्यान कबीर, जायसी, तुलसी, मीरां, भारतेन्दु, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और प्रेमचन्द पर था। और यह भी कि वे इन्हें सम्पूर्णतः ज्यों का त्यों नहीं, अपितु पैनी दृष्टि से देखते परखते परम्परा को अवदान की वस्तुनिष्ठ प्रणाली का उपयोग कर समझ रहे थे। और इस तरह देशकाल की विकट परिस्थितियों, सामाजिक विषमताओं और जीवन के निर्मम यथार्थ का सामना करता हुआ जो संवेदनशील रचनाकार सामने आया, उसकी सहजभाषा में बेबाक बयानी इतनी प्रभावशाली थी कि उसकी काव्योक्तियाँ निरायास लोगों की जुबान और स्मृति का हिस्सा बन जाती थी। जैसे मजहब के नाम पर विद्वेष पैदा करने वाले तब भी थे और आज तो उससे भी कहीं अधिक बढकर। ऐसे ही लोगों को धिक्कारते हुए कवि कहता है-
वह कलकत्ता जल गया उधर,
नोआखाली श्मशान हुआ,
बिहार बना बूचडखाना,
आतंकित हिन्दुस्तान हुआ।
किसने यह आग लगाई है,
किसने यह विष फैलाया है?
भूखी गुलाम जनता का मन,
किसने ऐसा भरमाया है?
खुदाराम
सार्वजनिक जीवन में व्याप्त विषमता पर प्रहार करते हुए कवि कहता है -
क्यों ये ऊँचे भवन खडे हैं?
क्यों कोई भूखों मरता है-
क्यों गरीब हैं? क्यों अमीर हैं?
क्यों कोई तुमसे डरता है?
मैं कहता हूँ, वहशी हो तुम!
मैं कहता हूँ तुम हत्यारे!
चाँदी की तलवार उठाकर,
तुमने लाखों मानव मारे !
पैसे का को?
मीडिया और पत्रकारों के अवसरवादी रवैये की भर्त्स्ना करते हुए वे कहते हैं -
कब तक रंगा सियार पायेगा इज्जत,आदर, पूजा ?
पत्रकार कब तक बन लेगा, भाडझोंक भडभूजा?
कब तक पत्र नाम से कूडा कर्कट यहाँ बिकेगा?
कब आएगा होश और जन जीवन कुछ समझेगा ?
(पत्रकार कब तक )
आज काव्य और कथा-साहित्य में नारी अस्मिता पर बोलने लिखने वाले सैकडों कवि लेखक हैं, लेकिन सन् 60 से पहले नारी अस्मिता पर इतनी बेबाक बात कहने वाले कवि चन्द्रदेव सरीखे कुछ ही लोग हुआ करते थे। अपनी प्रसिद्ध कविता रूप का बाजार में नारी अस्मिता के ज्वलंत प्रश्न को उठाते हुए कवि कहता है -
युगों से बिक रही है नारी बाजारों में, दुकानों पर,
बनी भोग्या तुम्हारी पूजनीया माँ, तुम्हारी शक्ति की अवतार
जैसे मूक पशु हो ! बन तुम्हारे भोग की चेरी?
तुम्हारी सभ्यता को, संस्कृति को,
कर रही नंगी तुम्हारी भूख-पागल भूख,
रातों रूप का बाजार है आबाद जिससे !
बतलाओ तो बिकेगा कब तलक यूं रूप
कर अपमान नारी का ?
कवि चन्द्रदेव बीसवीं सदी के पाँचवें और छठे दशक में जिस तरह समाज में स्त्रियों, दलितों, पिछडे वर्गों और धर्म-जाति के नाम पर फैली असमानता के घोर विरोधी थे, वे जिस सामाजिक समानता और र्धामिक सौहार्द* की बात करते थे, वह उनकी मानवीय सोच और अभिव्यक्ति का अटूट हिस्सा रही है। देश की आजादी के बाद जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था के वे आसन्न हिमायती थे, उसमें पूँजीवादी व्यवस्था की कुटिल चालों, राजनीतिक दलों की गैर-जिम्मेदार आचरण और लोक की कम-शिक्षा और उदासीनता उन्हें व्यथित करती थी। यही व्यथा प्रकारान्तर उनकी कविताओं में बहुत गहरे स्तर पर व्यक्त हुई है। इसी सामाजिक यथार्थ में बदलाव और एक बेहतर लोकतांत्रिक समाज व्यवस्था का निर्माण उनका अटूट सपना था, जिसे अपने कलेजे में संजोए वे सन् 1959 की शुरूआत में ही इस संसार से रुखसत हो गए और हमारा यह अर्ध-विकसित लोकतंत्र उसी ढुलमुल ढर्रे पर चलता हुआ इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के पार पहुँचकर भी उसी जुनून और तन्द्रा में जी रहा है।
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मानसरोवर, जयपुर - 302020
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