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कविता- एक शामिल जादू

रंजना अरगडे
ज्ञान की परस्परता के विशेष संदर्भ में
सभी ज्ञान एक बिन्दु पर आकर अ-भेद हो जाते हैं क्योंकि अपनी प्रकृति में ज्ञान एक ही है। संभवतः इसीलिए ज्ञान की सभी शाखाएँ भिन्न प्रतीत होते हुए भी अन्ततोगत्वा एक ही हैं। विभिन्न विद्याशाखाओं में वर्गीकृत चार विषय - भौतिक-शास्त्र, भूगोल तथा साहित्य और कला में समानता का एक बिन्दु है- प्रकृति। ये चारों विद्याशाखाएँ प्रकृति को अपनी भाषा तथा परिभाषा में मापती है और समझने का प्रयत्न करती हैं। इन सभी विद्याशाखाओं में प्रकृति में रहे गति, प्रकाश, ध्वनि, देश तथा काल मनुष्य पर उसके प्रभाव और परस्पर सम्बन्ध तथा संबद्धता का अध्ययन किया जाता है। किन्तु चूँकि सभी की अभिव्यक्ति -भाषा भिन्न है तथा चारों के उद्देश्य भी अलग हैं, अतः भिन्न विद्या-शाखा के रूप में ज्ञान के क्षेत्र में अपना स्थान बनाए हुए हैं। आधुनिक काल में क्रमशः यह स्पष्ट होता गया है कि जहाँ भूगोल की समझ साहित्य के कथानक को अधिक विश्वसनीय बनाने में उपयोगी है, भौतिक देश और ऐतिहासिक काल की यहाँ बात है वहीं भौतिक-शास्त्र दर्शन-शास्त्र की तरह साहित्य के दृष्टिकोण को निर्मित करता है; भौतिक-शास्त्र के सिद्धांत इस लौकिक एवं भौतिक (pertaining to nature and material) जगत की उन सच्चाइयों को उजागर करता है जो आखिरकार मनुष्य को इस जगत में अपनी उपस्थिति और भूमिका को समझने में सहायक होती हैं। वह सैद्धांतिक काल और अ-भौगोलिक देश(स्पेस) के संदर्भ स्पष्ट करता है। साहित्य यही तो करता है। वह मनुष्य को इस जगत में अपनी उपस्थिति और भूमिका को समझने में मदद करता है।
साहित्य भौतिक सत्य से एवं भौतिक अनुभवों से अभौतिक, वायवीय एवं उन रहस्यमय क्षेत्रों की दिशा में अग्रसर होता है जो भौतिक, दृश्यात्मक ज्ञान से परे होता है। वह इस अनुभव को अनुमान एवं संभावना के आधार पर पाने का उपक्रम करता है जिसमें प्रख्यात आलोचक एस.टी.कॉलरिज निर्दिष्ट कल्पना की भूमिका होती है- अर्थात् सर्जनात्मकता का हाथ होता है एवं यही कल्पना अर्थात् सर्जनात्मकता एक वैज्ञानिक को नितांत नए क्षेत्रों में अवगाहन करने की प्रेरणा देता है जिसे वह ठोस भौतिक आधारों पर प्रमाणित करता है।
भौतिक जगत में विद्यमान तथ्यों को बिना तोडे, जोडे, बिखेरे, पिघलाए नए सिरे से पुनः निर्माण संभव नहीं है। साहित्यकार के पास निर्माण के तथ्य भाषा के माध्यम से साक्षात्कृत होते हैं और उसके साक्षात् होने में जिन उपकरणों का वह उपयोग करता है उसका मुख्य आधार बिम्बधर्मिता तथा लयात्मकता है। बिम्बधर्मिता एवं लयात्मकता के अभाव अथवा अनुपस्थिति में न यह भौतिक जगत संभव है न ही काव्य जगत। साहित्य चूँकि एक बिन्दु पर आकर दर्शन के साथ भी जुड जाता है, अतः इस बात का आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि फ्रिजॉफ्कैप्रा जैसे प्रसिद्ध भौतिक शास्त्री ताओ ऑफ फिजिक्स जैसी रचना लिखने के लिए क्यों बाध्य होते हैं।
यह याद रखने की बात है कि प्रसिद्ध गणितज्ञ लुई कैरॉल ने वर्षों पहले एलिस इन वंडरलैण्ड एवं एलिस थू* लुकिंग ग्लास जैसी स्थायी महत्त्व वाले बाल उपन्यास लिखे जिसका आधार एक ओर समय की वैज्ञानिक परिकल्पना है, तो दूसरी ओर (तब) नया विकसित होता मनोविज्ञान भी है। आज तक कौन एलिस की अद्भुत कल्पनाओं के पार जा सका है। तभी जब स्टीफन हॉकिन्स की समय सम्बन्धी विवेचना को पढते हैं, तो सहसा काल-व्यतिक्रम के तथा कालोपरि जाने के साहित्यकारों के प्रयासों का स्मरण होता है। काल से होड लेते कवियों की भाषा में तथा हॉकिन्स की भाषा में अंतर हो सकता है, किन्तु प्रकृति के जिस आश्चर्य पर आज भी भौतिक-शास्त्र टिका है, उसी पर साहित्य भी टिका है। इस जगत में भौतिक- वास्तव से अधिक आश्चर्यजनक और कुछ भी नहीं है।
कला, साहित्य एवं विज्ञान - सभी तो काल एवं देश में घटित होता है, किन्तु अपने सत्य के प्रागट्य एवं प्रस्तुति के लिए विभिन्न भाषा-रूपों को तलाशता है। आइंस्टाइन के सापेक्षता के सिद्धांत ने मनुष्य को सत्य परखने का नया दृष्टिकोण दिया। संभव है कि विज्ञान जगत में इस सिद्धांत के प्रति संदेह किया गया है, परन्तु यह भी उतना ही सही है कि समय के बदलने के साथ विज्ञान की तरह साहित्य भी अपने दृष्टिकोण को नवीनीकृत करता है। सत्य को देखने का सापेक्ष दृष्टिकोण जिस तरह आधुनिकता का लक्षण माना जा सकता है, उसी तरह साहित्य में उत्तर-आधुनिक दृष्टि, अनेक अन्य लक्ष्णों के साथ, जैसे किसी निश्चित अंत को स्वीकार नहीं करती; वह सत्य को व्यक्ति की परिसीमा से बाहर ले जा कर समूह की सीमा में ले जाती है और व्यक्ति के बरक्स समूह के सत्य पर टिकती है। भौतिक शास्त्र की स्ट्रिंग थ्योरी को इसी उत्तर-आधुनिक परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।
प्रसिद्ध नोबेल वैज्ञानिक भौतिकशास्त्री डॉ. चन्द्रशेखर ने तो यहाँ तक कहा है कि साहित्य तथा विज्ञान में अगर कोई एक तत्त्व समान है, तो वह है सुन्दरता की उपस्थिति। उनका मानना है कि विज्ञान में वही सिद्धान्त टिकते हैं जो सुन्दर होते हैं; और सुंदर वही होता है जो संतुलित होता है। साहित्य भी तो सुंदर की ही उपासना करता है और साहित्य में वही कृति चिरंजीवी होती है जो सन्तुलित होती है। विचार एवं भाव, कथ्य एवं रूप, भाषा एवं शिल्प का संतुलन ही कृति को टिकाता है।
पारिस्थितिकी आज सर्वाधिक चर्चित मुद्दा बन गया है। साहित्य में भी पारिस्थितिकी-दर्शन एक समीक्षा-दृष्टि के रूप में साहित्य के आकलन का एक प्रमाण बन गया है। पारिस्थितिकी दर्शन, इको-फेमिनि*म पर्यावरण एवं साहित्य आज के सर्वाधिक चर्चित मुद्दे हैं। अब यह प्रश्न ही नहीं है कि साहित्य तथा विज्ञान एक दूसरे के विलोम हैं, अतःअब आवश्यकता इनकी परस्परता के अध्ययन की है।
हिन्दी के कवियों में ऐसे कवि भी हुए हैं जिन्होंने विज्ञान की दृष्टि से काव्य-रचनाएँ की हैं। वैज्ञानिक विषयों पर काव्य लिखना और काव्य रचना में विज्ञान का सहज रूप से घुलना और भाव-विश्व में नयापन लाना -दोनों अलग बात है।
ढ्ढढ्ढ
एक बार कविता जेहन में उतर गई फिर साथ नहीं छोडती। कविता समझ में आए या न आए, यह जरूरी नहीं है। कविताएँ किसी भी समय समझ में आ जाती हैं। हो सकता है आप उन्हें समझने के लिए उनके पीछे पडे रहें तो वे आपकी मुट्ठी से या फिसल जाएँ या फिर कछुए की पीठ की तरह गुम हो जाए। लेकिन अगर वो आफ साथ हैं तो एक न एक दिन जंगल के एकान्त में सहसा खिले फूल की तरह आफ सामने नमूदार होगी और आप उसकी सरलता और सहजता पर मुग्ध हो जाएँगे। इसीलिए जरूरी है कि कविता आफ साथ बनी रहे। उसे बार-बार पढने की हमेशा आवश्यकता नहीं होती, पर हाँ, भीतर से सहृदय बने रहने की आवश्यकता अवश्य होती है। असल में कविताएँ आफ साथ भीतर ही भीतर विकसित होती है। अर्थ और शिल्प के स्तर पर जितने आप अनुभव-समृद्ध होते हैं, उतना कविता का अर्थ आफ भीतर बनता और पनपता रहता है।
शमशेरजी की कविताओं पर काम कर लेने के बाद कईं कविताएँ वर्षों बाद एक नई अर्थ छटा के साथ मेरे सामने उजागर हुईं हैं। जिन कविताओं को मैंने समझ लिया है, ऐसा मैं मानती रही, वे ही कविताएँ नई अर्थ छायाओं के साथ जब वर्षों बाद कईं-कईं बार मेरे सामने आईं, तो एक आश्चर्य और आह्लाद की चमत्कारपूर्ण अनुभूति हुई है, फिर चाहे वह ऊषा कविता हो या टूटी हुई बिखरी हुई हो या अन्य कवियों में अज्ञेय की असाध्य वीणा हो, मुक्तिबोध की अँधेरे में हो- यह सचमुच कुतूहल का विषय है कि कवि अपनी कविताओं में कैसा जादू भरते हैं! लेकिन कवियों की जादूगरी में पाठकों की, सहृदयों की शामिलगिरी जरूरी है। यों कविता का जादू शामिल जादू है। सहृदय, पाठक का शामिल जादू।
अभी पिछले ही दिनों प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता प्रो.वसंत शिन्दे ने, जो राखीगढी क्षेत्र में हडप्पा सभ्यता के अवशेषों पर काम कर रहे हैं, उन्होंने अरिहन्त पावरियाजी के इस सवाल पर कि अभी इस खोज में कितना समय लगेगा के जवाब में कहा कि अभी तो एक प्रतिशत भी काम नहीं हुआ है। और यह भी जोडा कि हमने एक पक्ष को ही देखा है, अभी तो और कईं संदर्भों में इस साईट पर काम होना बाकी है जिसके बाद ही सही चित्र सामने आ सकता है। कविता के साथ भी ऐसा ही होता है। उसे बार-बार कई कोणों से देखना पडता है। और कविता अपने पाठक के साथ बढती विकसित होती है, अतः वह अनेक बार अनेक प्रकार से समझी जा सकती है।
सन् 1982 में शमशेरजी पर शोध-कार्य पूरा कर लेने के बाद जो विचार मेरे साथ बना रहा वह यह कि कविता और भौतिक शास्त्र का परस्पर अध्ययन करना चाहिए। इस बात की प्रेरणा मुझे शमशेरजी की शंख-पंख कविता पढ कर हुई। इस कविता के साथ शमशेर ने एक रेखांकन भी किया था। रेखाओं और शब्दों के संयुक्त उपक्रम से भाव पाठकों तक वे अपनी अन्य कविताओं में भी करते हैं। अतः इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। बिल्कुल भी न समझ में आने वाली इस कविता को भी मैंने, अपने तई समझ ही लिया था जब महा मशक्कत से ऑरोरा का जैसा-तैसा अर्थ मैंने पकडने की कोशिश की थी। ऑरोरा भौतिक शास्त्र का शब्द है, यह मैंने पता लगा लिया था। पर उसका एक मिथकीय अर्थ गॉडेस ऑफ डॉन या ऊषा भी निकलता था और यह उस समय मेरे लिए काफी था। पर यह कविता मेरे भीतर अटकी रह गई थी झलमल करती हुई।
बयासी के पहले इंटरनेट हमारे पास सुलभ नहीं था। इस वर्ष इन्हीं दिनों यानी अक्तूबर-नवंबर में, जब मैंने इंटरनेट पर ऑरोरा बोरिएलीस के दिलकश, मन मोहने वाले, झिलमिलाते रंगों वाले खूबसूरत चित्र देखे, तो यह कविता मेरी स्मृति में ऑरोरा की तरह ही कौंधी और झिलमिलाई। मैं चकित थी और चकित हूँ कि ऑरोरा जिस तरह का है और उसके स्वरूप उसकी बनावट और इधर हो रही खोजों के बारे में कवि किस तरह हूबहू 1953 में लिख पा रहे हैं।
हमें यह याद रखना चाहिए कि शमशेरजी चित्रकार भी थे। चित्रकला पर उनके पास पुस्तकें भी थीं। निश्चय ही उनका ध्यान 1865 में बने उस प्रसिद्ध चित्र- ऑरोरा बोरिएलीस जिसे फ्रेडरिक एडविन चर्च ने बनाया था। मुझे इस बात की कोई हैरानी नहीं होती है कि जिस तरह ऑरोरा विषयक प्रसिद्ध खोजी और एडविन चर्च का शिष्य इसाक इजराईल हैज के वर्णन के आधार पर एडविन चर्च ने ऑरोरा की पेंटिग बनाता है, उसी तरह संभवतः इस अथवा ऑरोरा के अन्य पेंटिंग देख कर शमशेरजी ने यह कविता लिखी हो। पश्चिमी चित्रकला में ऑरोरा के चित्र बनाने की जैसे एक परंपरा ही हो। शायद इसलिए कि उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के निकट रहने वाले ही इस अद्भुत दृश्य का अवलोकन कर सकते हैं। आरंभिक अपरिचय के कारण या अज्ञान के कारण ऑरोरा के विषय में ऐसा प्रचलित था कि वे दुष्ट आत्माओं का बॉन-फायर है या दुरात्माएँ हैं। पहली बार ऑरोरा को भीषण अमरीकी युद्ध को समर्पित करते हुए चित्रकार एडविन चर्च ने इसे आशावाद से जोडा था। नव-निधान।
ढ्ढढ्ढढ्ढ
ज्ञान की जिस परस्परता की ऊपर बात की है उसके संदर्भ में शंख-पंख कविता को समझना रोचक हो सकता है।
कविता इस प्रकार है-
बिजली के /ऑरोरा /शंख-पंख/
झलझल कर/ श्रृंग-माल
एक सौन/ विस्मय से
उठे-उडे

भूतल पर
नव- विधान से!
(1953) शमशेर बहादुर सिंह)
सूर्य की भीषण लपटें जब पृथ्वी के इलेक्ट्रो मैग्नेटिक क्षेत्र के संफ में आती हैं तब वातावरण में रहे ऑक्सीजन या नाइट्रोजन के हिसाब से आकाश में हरे लाल-पीले जामुनी प्रकाश-पर्दें छा जाते हैं। दृश्य का विस्मय और रंगों का ऐसा वैभव चित्रकार को भला क्यों न आकृष्ट करे। शाम और सुबह के सुन्दर रंग और बादल तथा आसमान की बहुरंगी छटाएँ जिस कवि को आजन्म बाँधे हुए रही हों, वह क्योंकर ऑरोरा के आकर्षण से अछूता रहेगा।
शमशेर की यह कविता एब्स्ट्रेक्ट-सी है। इसमें एक भी ऐसी पंक्ति या शब्द नहीं है जो प्रथम पाठ, द्वितीय, तृतीय पाठ में भी संप्रेषणीय हो। पर जैसा मैंने कहा यह तब से मेरे मन में अटकी रह गई थी। शायद इसलिए कि तब कविता में ऑरोरा शब्द की उपस्थिति ने मुझे जकड लिया होगा। मैंने उसके मिथ के विषय में भी जाना और चूँकि ऊषा के साथ समानता जैसी लगी तो मैंने अपने को मना लिया कि हाँ, मेरी समझ में आ गई है।
कविता का आरंभ होता है- बिजली शब्द से। यह असल में एक शब्द नहीं, अपितु पूरी संकल्पना है। 1953 तक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक के लिए कोई हिन्दी शब्द बना नहीं होगा। आजकल हम उसे विद्युत चुंबकीय कह सकते हैं। कवि विद्युत अथवा विद्युल्लेखा जैसे शब्द का भी प्रयोग कर सकते थे। पर वे बिजली शब्द का प्रयोग करते हैं क्योंकि बिजली सहज शब्द है जिसके माध्यम से वे पाठक को ऑरेरा की जटिल संकल्पना की ओर ले जाना चाहते हैं। बिजली के ऑरोरा कहते ही ऑरोरा की निर्मिति की प्रक्रिया पूरी हो जाती है। क्योंकि ऑरोरा की संभावना इलोक्ट्रो मैग्नेटिक फील्ड में ही संभव है। अब भला कोई क्यों अपना दिमाग लडा कर इतने संक्षेप में कही बात को समझे। यह कविता असल में विज्ञान के सूत्रों की तरह किया गया भाषा प्रयोग है। भौतिक शास्त्र या रसायन शास्त्र में जिस तरह सूत्रों के माध्यम से संकल्पनाएँ समझाई जाती हैं, वैसे ही अल्पतम शब्दों द्वारा ऑरोरा की संकल्पना को कवि प्रस्तुत करने का यह नवीन प्रयास करते हैं।
शंख पंख झलझल कर श्रृंग माल में- यह ऑरोरा का रूप दर्शन और लोकेशन है। पर शंख पंख शब्द प्रयोग चमत्कृत करता है। शंख समुद्र में और पंख आसमान में। ये ऑरोरा आसमान में यहाँ से वहाँ फ्रॉम केप टू केनेडा - अंतरीपों से पर्वतों तक-एक अनंत के यात्री की तरह आते जाते हैं। उनके विभिन्न आकार हैं, कभी पंख से तो कभी शंख से तो कभी पर्दे से झलझल करते। झिलमिल नहीं झलझल करते एक-दूसरे में घुलते मिलते। कवि का ध्यान गति पर है, चमक पर नहीं-अतः झलझल है झिलमिल नहीं। यह ऑरोरा गति में संभव हैं, स्टेटिक- स्थिर स्थिति में नहीं। इधर ऑरोरा पर जो नई खोजें हो रही हैं उसमें यह बात उभर कर आई है कि ऑरोरा में से ध्वनि भी निकलती है। शंख भी ध्वनि का संकेत देता है। जब यह कविता लिखी गई तब ऐसी कोई बात नहीं थी, पर कवि की भावनात्मक कल्पना या ज्ञानात्मक संवेदन किन चीजों को पकडता है या पकडने में सक्षम है, हम नहीं कह सकते। हम जबरन यह अर्थ न भी डालें, तब भी आर्कटिक समुद्र के ऊपर आसमान में झलकता बहुरूपी ऑरोरा शंख की तरह अगर कवि की कल्पना में आता है तो आश्चर्य नहीं। कईं बार आसमान समुद्र का विस्तार भी तो लगता है। विद्युत, प्रकाश और चुंबकत्व- एक ही घटना के विविध रूप हैं।
एक मौन विस्मय से उडे उठे। ऑरोरा का दृश्य विधान दृष्टा को मौन आश्चर्य में ही डाल सकता है। इस अभौतिक लगने वाले दृश्य को देख कर भाषा भी मौन हो जाती है। यानी ऑरोरा की संकल्पना, रूप वर्णन उसका प्रभाव और अंत में कवि की आशा भरी बात
भूतल पर नव निधान से। यह निश्चय ही में एडविन चर्च के चित्र के पीछे रही भावना तक ले जाने वाली बात है। एक नवीन समृद्धि और संपत्ति की तरह ये ऑरोरा हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि यह कविता लिखने में कवि को कितना शिल्पगत श्रम पडा होगा। यह सारी बातें इतने कम शब्दों में कहना आसान नहीं है। और इस तरह से कहना कि वह पाठक के जेहन में अटकी रह जाए।
यह शामिल जादू इसलिए है कि पहले तो कविता और विज्ञान की परस्परता ने मुझे आकर्षित किया, फिर अचानक चित्रकला का संदर्भ इसमें जुड गया। और नव निधान का संकेत चर्च की पेंटिंग में रहे आशावाद और अमरीकी सिविल वॉर की सफलता से युक्त जनाकांक्षाओं की अभिव्यक्ति से जोडें, तो राजनीति की भी शामिलगिरी हो जाती है। जब काव्यार्थ सहृदय को स्पर्श करता है, तभी यह शामिल जादू आलोकित होता है।
यही है कविता में शामिलगिरि का जादू जिसका आधार ज्ञान की परस्परता है।

सम्पर्क - द्वारा प्रवीण पण्ड्या
402, बिल्डिंग नम्बर 2
विंडसर अरालिया
टोली क्रॉस स्कूल के सामने को लार रोड,
भोपाल, मध्यप्रदेश-४६२०४२