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कारपोरेट-संस्कृति और इक्कीसवीं सदी की हिन्दी कहानी

शशिभूषण मिश्र
बीसवीं सदी के अंतिम दशक से शुरू हुई वैश्वीकरण की प्रक्रिया से उपजे कारपोरेट सेक्टर ने नयी सदी के दो दशकों के भीतर न केवल अपने व्यावसायिक प्रतिमानों को सर्वशक्तिसंपन्न बना लिया है, बल्कि निगमों और मल्टीनेशनल कम्पनियों द्वारा एक नयी कार्य-संस्कृति विकसित कर उसे स्वीकारने के लिए पूरी दुनिया को बाध्य किया है। कुछ विकसित देशों की बात छोड दी जाए, तो पूरी दुनिया में इस कारपोरेट तंत्र के भीतर एम्लाइज की दशा बहुत चिंताजनक है। दुनिया भर में फैल चुकी मल्टीनेशनल की कार्य संस्कृति में शोषण और दमन की जितनी बारीक प्रक्रिया चल रही है, उसे देखा जान हौलनाक है।
हाल के वर्षों में हिन्दी में कुछ ऐसी कहानियाँ दिखाई देती हैं जिनमें कारपोरेट जगत की चमकती हुई उपलब्धियों के भीतर उस शोषण और दमन को उभारने की कोशिश की गयी है, जिसे अक्सर पूँजी प्रायोजित प्रचार तन्त्र द्वारा ढँक दिया जाता है। इन कहानियों को पढते हुए हम कारपोरेट की जिस दुनिया में प्रवेश करते हैं वहाँ देखते हैं कि यहाँ काम करने वाले एम्प्लायी के न तो काम करने के घन्टों की कोई सीमा है, न ही टार्गेट के कोई परिधि! असाधारण लक्ष्यों को पाने के दबाव के बीच काम करना कितना कठिन होता होगा; यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है! इस पाठ-आधारित लेख के माध्यम से कारपोरेट संस्कृति की उभरती प्रवृत्तियों को जानने-समझने की कोशिश की गयी है।
(एक)
कारपोरेट कामकाज के डेटा में किसी के आँसुओं को दर्ज करने के लिए कोई ऑप्शन नहीं होता और दुःख से भरे दिलों में किसी फीडबैक के लिए कोई जगह नहीं होती। - लाइफ लाइन (मनोज रूपडा)
लाइफ लाइन कारपोरेट सेक्टर की कार्य-संस्कृति का स्याह रूपक है जिसे पढते हुए रोंगटे खडे हो जाते हैं। यह हिन्दी कहानी का नया प्रस्थान बिन्दु है जिससे गुजरते हुए पाठक अवसाद से भर जाता है। पल-प्रतिपल पत्रिका के 79 वें अंक में छपी यह कथा एक ही नामी कम्पनी में काम करने वाली दो बहनों की ऐसी दास्तान है जिसे एक पाठक के रूप में मेरे लिए भुला पाना सम्भव नहीं हो सका। कहानी में इस बात के साक्ष्य हैं कि तकनीक का विस्तार मशीनों में ही नहीं मानव जीवन में भी हुआ है। अपने वर्कर्स को मशीन की तरह उत्पादक इकाई मानने वाले कारपोरेट सेक्टर में काम कर रही इन दोनों बहनों के जीवन में दो सबसे बडे कष्ट हैं- पहला, उनकी माँ से जुडा है, जो मानसिक रोग के इलाज के चरणों से गुजरने के बावजूद भी अभी अस्पताल में है जिसके लिए वो समय तक नहीं निकाल पातीं और दूसरा उनकी कंपनी के आफिस से जुडा है जहाँ काम की कोई सीमा नहीं है और हर नया काम दिमागी मशक्कत की इंतहा पर जाकर खत्म होता है। हर तिमाही के अंत तक तनाव इस कदर बढ जाता है कि बडी बहन का ब्लड प्रेशर इतना अधिक बढ जाता है कि उसके नाक से खून तक आने लगता है।
कहानी इन बहनों के जीवन के एक ऐसे नाजुक मोड से शुरू होती है जहाँ एक हाईटेक शहर के आईआईटी हब के बीचोंबीच एक बारह मंजिला इमारत में तीसरे फ्लोर में किराए के उनके फ्लैट का दरवाजा महीनों से खुला नहीं है। मार्केटिंग आपरेशन और सेल्स के नतीजों में खुद को निचोड देने के बाद अगली सुबह सेल फोन में आए काल के बाद से ही बडी बहन को चुप्पी का दौरा पडा है ; उसने बोलना-चालना बिलकुल बन्द कर दिया है। यहीं से शुरू होती है घुटन भरी आत्महन्ता परिणति जिसमें दोनों बहनें न केवल कहीं भी आना-जाना बन्द कर देती हैं, बल्कि खाना-पीना बन्द करने के साथ जीने की सम्भावनाओं का भी गला घोंट देती हैं। कहानी के अन्त को देखना और भी त्रासद है, जिसमें दो महीने बाद उस फ्लैट का दरवाजा तोडा जाता है और दुर्गन्ध का ऐसा भभका आता है कि सब नाक बन्द करके पीछे हट जाते हैं। फर्श पर दोनों लाशों पर भिनभिनाती मक्खियाँ और चीटें हैं, जमीन पर बिखरी हैं ब्राण्डेड कास्मेटिक्स की पिचकी बोतलें और खाने का सामान।
दुनिया के हर एक बडे शहर में अजर्रा उग आयीं इन कारपोरेट बिल्डिंग्स के भीतर की दुनिया कितने तनाव से भरी है, इसका अंदाजा इस कहानी से लगाया जा सकता है। अकूत मुनाफा कमाने की होड में अपने इम्प्लाइज पर असीमित काम और टार्गेट का इतना बोझ लाद दिया जाता है कि वो अपनी आजीविका की निर्मम शर्तों और जीवन के सबसे बडे स्वप्नों से लगातार दूर होता जाता है। इन निर्मम परिस्थितियों में दीगर जिम्मेदारियों को निभाने की बात तो दूर, अपने करीबी रिश्तों के बीच सन्तुलन बनाना दुष्कर हो जाता है। बडी बहन की छटपटाहट से निकले शब्दों पर गौर करें- मेरे एरिया में कम्पनी के प्रोडक्ट अगर परफार्म नहीं कर पा रहे हैं, तो इसकी जिम्मेदार मैं या मेरी सेल्स टीम नहीं है। हमने दिन-रात मेहनत की है। अपने हर तरह के पर्सनल प्राब्लम्स को भूलकर अपने आप को पूरा झोंक दिया...लेकिन जब जीडीपी लगातार तीन तिमाही तक गिरता है और स्टाक मार्केट में भी लगातार गिरावट आ रही है,तो कोई क्या कर सकता है ? आप सिर्फ कम्पनी की बाटम लाइन और टाप लाइन को देख रहे हैं, हमारा स्ट्रगल आपको दिखाई नहीं दे रहा है। क्या आप यह उम्मीद करते हैं कि अगर मैं अपना एक हाथ काट कर डेस्कटाप पर रख दूँगी, तो मार्केट में बूम आ जाएगा? (पल-प्रतिपल, 79,पृष्ठ-187)
कहानी की दृश्य क्षमता की दाद देनी पडेगी। भौचक आँखों से इस भयावह दृश्य को हम अपने सामने घटित होता हुआ देखते और हाथ मलते रह जाते हैं। यह देखना जितना डरावना है उससे कहीं अधिक डरावना है- चारों ओर पसरा आत्महंता मौन जो कहानी से बाहर निकल कर हमारे देशकाल के ओर-छोर तक पसर जाता है। पूर्वदीप्ति शैली में लिखी इस कहानी की परिस्थितियाँ और दृश्य कईं बार अविश्वसनीय और आभासी प्रतीत होते हैं। क्या यह अविश्वसनीयता और आभासी यथार्थ हमारे समय की पहचान नहीं है! रूपडा के पास समकालीन बाजारोन्मुखी रणनीतियों, व्यापारिक सरोकारों और कारोबारी कारस्तानियों के भीतर तक पैठने की कला है। कारपोरेट पूँजी और ब्राण्ड संस्कृति की लकदक के बीच काम कर रही युवा पीढी की मानसिकता का अचूक रेखांकन उनकी कथा दृष्टि का अनिवार्य सूत्र है।
(दो)
किसी को जीवन से निकाल देना आसान होता है, नौकरी से निकालना उतना ही मुश्किल वह खुद उन दस फीसदी लोगों देखना चाहता था,जो एक लम्बे समय से एक जिन्दगी का हिस्सा बने रहने के बाद उस जिन्दगी से बाहर हो जाने वाले थे।
- पिंक स्लिप डैडी (गीत चतुर्वेदी )
भूमण्डलीकरण-उदारीकरण की प्रक्रिया के चंगुल में फँसे विकासशील देशों के करोडों युवाओं के सामने रोजगार के संकट और उससे उपजे कई जरूरी सवालों से मुठभेड करती गीत चतुर्वेदी की प्रयोगधर्मी कहानी पिंक स्लिप डैडी को एक मानीखेज तहकीकात से जुडने जैसा है। कहानी प्राइवेट कारपोरेट सेक्टर की बाहर से रंगीन, किन्तु भीतर से उघडी और विगलित दुनिया की तस्वीर खींचती है। आर्थिक परिदृश्य में चारों ओर अपना वर्चस्व स्थापित करती कारपोरेट शक्तियाँ हमारी आँखों से दृष्टि छीनकर केवल अपनी दृष्टि प्रत्यारोपित करना चाहती हैं। कारपोरेट पूँजी का सबसे बडा लक्ष्य है कि उसके सपनों को सभी अपनी आँख से देखें।
पार्थ ग्रुप ऑफ कम्पनीज के बहाने कहानी कारपोरेट जगत की नीतियों और उसमें कार्यरत कर्मचारियों के जीवन का क्लीनिकल ट्रायल करती है। इस क्लीनिकल ट्रायल में आदमियत,संवेदना,सम्बन्ध सब बेमानी साबित होते हैं। कहानी राजकुमार पसरीचा जैसी नामी कारपोरेट हस्ती के माध्यम से इस पूरी बिरादरी और यहाँ काम करने वाले नामचीन बिजनेस टाइकून दाधीच की सफलताओं के पीछे की निर्मम सचाइयों की नोटिस लेती सवाल खडा करती है कि क्या मनुष्य बने रहते हुए बुलन्दियों तक पहुँचने के सारे रास्ते बन्द हो चुके हैं? क्या दूसरों को गिराए बिना कारपोरेट सेक्टर में आगे बढने का कोई और विकल्प नहीं है ? कहानी दिखाती है कि दुनिया भर में कारपोरेट घरानों के बीच अधिक से अधिक पैकेज देकर कुशल प्रबन्धकों को खरीदने की होड लगी है। मैं इसे खरीदना ही कहूँगा, वरना गलत चीज के मुकाबले एक सही हार को प्रिफर करने वाला प्रफुल्ल शशिकांत उर्फ पी.एस.दाधीच इतने स्तर तक नहीं गिर सकता था कि साथ काम करने वालों की मौत पर भी अपनी तरक्की की संभावना देखे ! कहानी दाधीच के माध्यम से न केवल प्राइवेट कारपोरेट सेक्टर में बेहद सफल व्यक्तियों की चंटई को बेनकाब करती है बल्कि उनकी धूर्तता और लम्पटता को भी उघाडती चलती है। स्पेशल मैनेजर ब्राण्डिंग पद पर आने के बाद दाधीच ने कम्पनी की मार्केट वैल्यू बढाने के लिए ऐसा हर ऐसा रास्ता अपनाया जो कम्पनी में उसके कद को बढाता हो। जी.एम. की कुर्सी तक पहुँच चुके पी एस दाधीच ने कारपोरेट दुनियाँ से ही यह सबक सीखा है कि ऊँचाई तक पहुँचने के लिए मेहनत से ज्यादा चालाकी और पैतरेबाजी की जरूरत पडती है और उसने हर जगह इस सबक को साबित भी किया।
अपनी मार्केट वैल्यू के लिए कारपोरेट वो सब करती-करवाती हैं जिसे गैरकानूनी कहा जाना चाहिए पर यह सब छिपे रास्तों से होता है। प्रॉफिट के लिए छिपे रास्तों से काम करना कारपोरेट कार्य-संस्कृति की अनिवार्य, किन्तु अदृश्य रणनीति है। वाइस प्रेसिडेंट रामनाथ पोतदार इन्हीं छिपे रास्तों का माहिर खिलाडी है जिसके हुनर ने पार्थ ग्रुप को बिजली और तेल-क्षेत्र की पोलिटिकल डीलिंग में बडी कामयाबी दिलवाई है। ध्यान दिया जाना चाहिए कि आखिर भारत में सरकारें क्यों इन कारपोरेट शक्तियों पर मेहरबान हैं ! बहुत पीछे न जाएँ और पिछले ही वर्ष की स्थिति देखें कि जुलाई 2019 में भारत की वित्तमंत्री ने कारपोरेट सेक्टर को कई रियायतें दीं, जिनमें कारपोरेट टैक्स में कटौती के अलावा सीएसआर के नियमों में भी बदलाव प्रमुख हैं। कारपोरेट टैक्स घटाने से सरकार के राजस्व में एक साल में 1.45 लाख करोड की कमी आएगी। गम्भीरता से विचार कीजिए कि हमारी सरकार किसके साथ है-मजदूरों, किसानों के साथ या कारपोरेट के साथ! इस बेहद अहम बिन्दु पर विचार किया जाना बेहद जरूरी हो जाता है कि, पार्थ ग्रुप ऑफ कम्पनीज जैसी कम्पनियाँ किसके बल पर फल-फूल रही हैं !
कहानी में विन्यस्त स्त्री चरित्रों के माध्यम से भी कारपोरेट दुनिया की कईं छिपी सचाइयाँ खुलती हैं। टैरो कार्ड रीडर पृशिला पाण्डे उर्फ मदर सेबेस्टियन इनमें से एक है, जिसके हारोस्कोप मुम्बई से निकलने वाले अखबारों में हर सप्ताह छपते हैं और जिसके पास उस शहर के बडे बडे पोलिटिकल डैडीज के बहुत सारे राज छिपे हैं। यही नहीं दाधीच जैसे जाने कितने कारपोरेट सेक्टर के लोग सफलता के लिए पृशिला के बताए टोटकों को बराबर आजमाते हैं और अपनी सफलता में उन्हें महत्त्वपूर्ण मानते हैं। कहानी बहुत गहरे आशय के साथ कारपोरेट दुनिया में फैले अन्धविश्वास और डर को रेखांकित करती है। यह देखकर हैरानी होती है कि अपार आर्थिक मुनाफे और वैभव में डूबी कारपोरेट दुनिया में वैज्ञानिक टेम्परामेंट का कितना टोटा है ! ऐसे में ही पृशिला पाण्डे जैसों को खूब स्पेस मिलता है और वो इसे हैंडल भी बखूबी करती हैं। दाधीच जैसे जाने कितने बडे मुर्गे पृशिला की शरण में जाकर न केवल सफलता की भूख को और बढाते हैं, बल्कि अपनी वासना की भूख को भी शान्त करते हैं। पृशिला पाण्डे जैसी बेहद सफल टेरो कार्ड रीडर्स की असल दुनिया में आप जैसे जैसे घुसने की कोशिश करेंगे वैसे-वैसे भारत की व्यावसायिक राजधानी के सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना की तहें खुलती जाएँगी।
कहानी के अहम किरदार जयंतलाल के माध्यम से लेखक ने ऐसे कईं संकेत किए हैं जिससे कारपोरेट दुनिया की नामी हस्तियों के कारनामों की पोल खुलती जाती है। पार्थ ग्रुप ऑफ कम्पनीज की बुनियाद कहे जाने वाला शख्स जयंतलाल, सिर्फ कम्पनी का वाइस प्रेसीडेंट नहीं था, बल्कि, एम.डी. राजकुमार पसरीजा के बाप यानी कम्पनी के संस्थापक चन्दूलाल पसरीचा (प्रेसीडेन्ट) का जायज न सही, पर था उसी की औलाद। प्रोफेशनल पावर के साथ उसका पर्सनल पावर भी इतना मजबूत था कि कईं बार ठान लेने के बाद भी राजकुमार पसरीचा उसका कुछ नहीं बिगाड पाया। दूसरों के व्यक्तिगत स्पेस का अतिक्रमण करना,हर उभरते एम्लाई को शक की निगाह से देखना उसके व्यक्तित्व का अनिवार्य पहलू है। उसे देखकर लोग कहते हैं कि अगर जयन्तलाल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन फील्ड में होता, तो सबसे बडा माफिया होता। जब उसे पार्थ कंस्ट्रक्शन का जिम्मा सौपा गया था; उसने बहुत कुछ ऐसा कर दिखाया जिसे मुम्बई जैसे बडे मेट्रोपोलिटन के सबसे सफल लोग भी नहीं कर पाए थे। कहानी दिखाती है कि उसने धार्मिक क्षेत्र में अपना एक बडा साम्राज्य खडा कर लिया था। इसलिए पार्थ को हमेशा के लिए अलविदा कहना चाहता था। उधोग में बेहतरीन मौका देखते हुए उसने कम्पनी का साथ हमेशा के लिए छोड दिया। कहानी धर्म के कारोबार पर बराबर नजर बनाए रखती है।
कारपोरेट नीतियों का सबसे पीडादाई पहलू कर्मचारियों की छँटनी है, जिसे कहानी बडी संजीदगी से उठाती है। पार्थ ग्रुप ऑफ कम्पनीज अपने दस फीसदी कर्मचारियों को पिंक स्लिप थमाती है, यानी दस फीसदी वर्कर्स की छँटनी का आदेश। स्लोडाउन की विभीषिका के सामने कर्मचारी मजबूर थे और हर कोई कुछ भी करके अपनी नौकरी बचा लेना चाहता था पर उनमें से दस फीसदी को पीएफ,ग्रेच्युटी और दो महीने की सैलरी देकर हमेशा के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। छँटनी के काम को प्रफुल्लचन्द्र दाधीच बखूबी अन्जाम तक पहुँचाता है। ऐसे लोमहर्षक दौर में कहानी पढने का सफर और भी कठिन रहा जब पूरा विश्व मन्दी के अभूतपूर्व और भयावह संकट से गुजर रहा है और देखते- देखते हजारों लाखों नहीं करोडों युवा अपनी नौकरी से हाथ धोते जा रहे हैं।
कहानी के दृश्यों से बाहर निकलकर आप कोरोनाकालीन भारतीय आर्थिक परिदृश्य को देखें, तो पता चलेगा कि भारत की सबसे बडी कारपोरेट हस्ती ने फेसबुक के साथ 43574 करोड की डील की है, मगर उसके पास अपने कर्मचारियों को सैलरी देने के लिए पर्याप्त राशि नहीं है। इसलिए उनकी सैलरी में कम्पनी तीस प्रतिशत तक की कटौती कर रही है। मुझे पूरा यकीन है कि यह दिखावे वाली घोषणा है सैलरी कितनी मिलेगी ये तो कर्मचारी ही बताएँगे ! बहरहाल, केवल मुनाफे के लिए काम करने वाले ऐसे निगमों में अपने कर्मचारियों को सैलरी देने के नाम पर हाहाकार मची है, जबकि अभी मार्च अंत तक काम हुआ है और केवल अप्रैल का महीना पूर्ण बन्दी में गुजरा है। कोरोना काल में आर्थिक साम्राज्यवाद को ताकत देने वाले गिरोहों का चेहरा नंगा हो चुका है।
(तीन)
कम्पनी वालों की चले, तो वे हमें भी कम्प्यूटर ही बना डालें - और अन्ना सो रही थी (राकेश बिहारी)
हिन्दी के रचनाशील परिदृश्य में कथा-आलोचक के रूप में स्थापित हो चुके राकेश बिहारी के कथाकार पर कम ध्यान दिया गया, जबकि उनके पास कारपोरेट दुनिया की तलस्पर्शी समझ वाली कहानियाँ हैं। अफसोस के साथ कहना पड रहा है कि हिन्दी में इस विषय पर बहुत कम कहानियाँ हैं और राकेश बिहारी शायद अकेले कहानीकार हैं जिनके पास कारपोरेट जगत की एक नहीं कईं कहानियाँ हैं। उनकी कहानियाँ भूमण्डलीकरण के गर्भ से उपजी शोषण की निर्मम नीतियों और दमन की बारीक प्रक्रिया का अनुभवजन्य साक्षात्कार कराती हैं। इस सन्दर्भ में और अन्ना सो रही थी तथा वह सपने बेचता था उल्लेख्य कहानियाँ हैं।
और अन्ना सो रही थी एक मल्टीनेशनल कम्पनी के माध्यम से उस कार्य-संस्कृति को उजागर करती है जहाँ पीटर जैसे मेहनती और जिम्मेदार कर्मचारी को भी नौकरी छोडने के लिए बाध्य कर दिया जाता है। प्राइवेट सेक्टर के बारे में आमतौर पर माना जाता है कि यहाँ सरकारी विभागों की तरह राजनीति नहीं होती और प्रतिभाओं को बडे ही सम्मान से देखा जाता है, जबकि वास्तविकता में ऐसा नहीं है,कम से कम प्रीपेस इण्डिया लिमिटेड की कार्य-संस्कृति को देखकर तो ऐसा नहीं लगता। विडम्बना ये कि पीटर जैसे कार्य-कुशल और प्रतिभाशाली कर्मचारियों को बेहतर परफार्मेंस के बाद भी बॉस द्वारा दरकिनार किया जाता है। जिस प्रीप्रेस इण्डिया लिमिटेड की एक्सपोर्ट यूनिट में पीटर काम करता है वहाँ ओवर टाइम और कम प्रोडक्शन के नाम पर इम्प्लाइज को बॉस द्वारा धमकाया जाना आम बात है। पीटर की सुपरवाइजर हरप्रीत की रिपोर्ट है कि पीटर साढे पाँच बजे के बाद आफिस में नहीं रुकते, जबकि पीटर का तर्क है कि समय से अपनी सारी जिम्मेदारियों को पूरा करना जरूरी है न कि बॉस को खुश करने के लिए देर तक रुकना। कहानी उस कार्य-संस्कृति को संदेह से देखती है जिसमें बॉस ही सब कुछ हो। ऐसे माहौल में एक मेहनती और स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए काम करना थोडा कठिन हो जाता है। कम्पनी के पर्सनल मैनेजर बरुआ भे पीटर को एक काबिल कॉपी एडीटर मानते हैं, पर उनका तर्क है कि प्रमोशन और इन्क्रीमेंट के लिए इतना ही काफी नहीं हैं। बरुआ का संकेत बहुत स्पष्ट है कि केवल बढिया काम ही से बात बनने वाली नहीं है वरन बेहतर कॅरिअर के लिए बॉस का खुश होना बेहद जरूरी है। अमूमन पूरे कारपोरेट जगत में एम्लाई का देर तक रुकना, वहाँ की कार्य संस्कृति का अनिवार्य पहलू बन गया है।
कम्पनी की इस यूनिट के हेड मिस्टर तलवार हैं जो स्वभाव से न केवल रंगीनमिजाज हैं, बल्कि ऑफिस में बारीक राजनीति के कर्णधार भी हैं। वो एक तरफ पीटर का इन्क्रीमेंट रोक देते हैं, तो दूसरी तरफ अपनी खास अलका को एक साथ दो प्रमोशन देते हैं। बॉस की चमचागीरी में कुशल और रंगीनमिजाजी का फायदा उठाने वालों के सामने पीटर के काम की क्या बिसात ! बहरहाल, मिस्टर तलवार को उनके बेहतर काम के पुरस्कार स्वरूप कम्पनी उन्हें यूरोप भेजती है और उनकी जगह कारपोरेट ऑफिस से मिस्टर डी.के. आते हैं। कारपोरेट ऑफिस से आए नए बॉस से यूनिट के कर्मचारियों को बडी उम्मीदें थीं कि शायद कुछ माहौल बदले, मगर डी.के. ने तलवार को भी पछाड दिया - आठ घन्टे के बजाए 10-12 घंटे काम लेना,कर्मचारियों को डाँटते हुए गाली तक उतर आना और बात-बात में नौकरी से हटाने की धमकी देना। मिस्टर तलवार की तरह डी.के. को भी किसी ने बता दिया था कि पीटर अपनी पिछली जॉब में यूनियन में जुडा था और उसने वहाँ हुई हडताल का नेतृत्व भी किया था। तो पीटर डी.के. की नजरों में भी चढ गया था और तब तो और ज्यादा जब कम्पनी के ई.डी. मिस्टर तनेजा ने यूनिट के दस वर्ष पूरे होने के ऐनुअल डे समारोह में पीटर की रिपोर्ट की न केवल खुली तारीफ की थी, बल्कि डी.के.से यह भी कहाँ था कि कारपोरेट आफिस में होने वाली मंथली मीटिंग में वह पीटर को अपने साथ जरूर लाएँ ।
पीटर का दिल्ली से बंगलुरु ट्रान्सफर कर दिया जाता है, वो भी ऐसी यूनिट में जहाँ उसके लिए कोई काम ही नहीं है; यानी एक तरह से बाहर का रास्ता दिखाने का प्रबन्ध डी.के. कर चुका होता है। क्या इतना बडा फैसला ई.डी. या पर्सनल मैनेजर की सहमति के बिना संभव था? हालाँकि कहानी ऐसा कोई संकेत नहीं करती। पीटर ने अपनी बेटी के अभी बहुत छोटी होने और दिल्ली में वाइफ के वर्किंग होने के मजबूत कारण बताए पर कुछ भी न सुना गया। कम्पनी जानती थी कि पीटर को नौकरी छोडने के लिए किस तरह मजबूर किया जा सकता है और अंततः पीटर को इस्तीफा देना पडा। पीटर को अपनी नौकरी जाने का अफसोस तो था ही, पर ऐसे समय में टेलीविजन पर दिखाई जा रही खबर ने उसे भीतर तक हिला दिया था कि सरकार ने भारत विद्युत निगम सहित चार सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश का फैसला लिया है। पीटर की पत्नी इसी भारत विद्युत निगम की कर्मचारी है। पीटर के उठे हुए कौर के बीच में ही रुक जाने और बेटी अन्ना के भविष्य को लेकर उसकी आँखों में काँपती दहशत के साथ कहानी का अंत पाठक को बेचैन कर देता है।
वह सपने बेंचता था कहानी और अन्ना सो रही थी का अगला चरण हैं जिसमें समाज को बदलने और जनवादी संघर्ष के लिए तत्पर रहने वाला पीटर अब एक कम्प्लीट मार्केटिंग प्रोफेसनल बन गया है। कारपोरेट की शोषणकारी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने और हडताल में कर्मचारी यूनियन का नेतृत्व करने वाला पीटर अब उन्हीं कारपोरेट नीतियों के पक्ष में खडा है। कहानी पीटर के बहाने वामपन्थी विचारधारा के अंतर्विरोधी प्रवृत्ति की भी छानबीन करती है,जिसका शिकार आज की युवा पीढी है। कहानी का अंतिम हिस्सा पाठक को झकझोर कर रख देता है। जिस राजकुमार नाम के व्यक्ति को पीटर ने अपनी एजेंसी में पार्ट टाइम एकाउंटेंट के रूप में रखा था, उसकी आप बीती सुनकर बेचैन हो जाना स्वाभाविक है - मैंने पीटर का काम छोड दिया है। वह बहुत धूर्त आदमी है। शुरू में तो उसने कहा था कि अभी हमने कम्पनी शुरू की है, इसलिए आपको कम तनख्वाह दे रहा हूँ, प्रॉफिट में आते ही बढा दूँगा। पिछले साल तो एक नम्बर में भी प्रॉफिट हुआ है, फिर भी वह सैलरी नहीं बढा रहा है । बातें तो बडी-बडी करता है कि आप हमारे इम्प्लाई नहीं बिजनेस पार्टनर हैं और पैसा देने के नाम पर...। (वह सपने बेचता था, पृष्ठ-58)
दोनों ही कहानियाँ इन्टरनल फोकलाईजेशन के माध्यम से उन दृष्टि बिन्दुओं पर ले जाती हैं, जहाँ से हम बदलते आर्थिक परिदृश्य में परिवर्तन की पूरी प्रक्रिया को देख पाते हैं। इनमें नैरेटर खुद एक पात्र के रूप में मौजूद है और उसी के माध्यम हम पीटर और उसके आसपास की दुनिया को बहुत करीब से देख पाते हैं। एक ऐसी दुनियाँ जहाँ आर्थिक संपन्नता और कॅरिअर के सामने विचार और विचारधारा का कोई महत्त्व नहीं रह गया है। अन्ना सो रही थी का जनसरोकारों से जुडा नायक इस कहानी में सपने बेचने वाला पेशेवर व्यापारी बन जाता है। ऐसा व्यापारी जो राजकुमार जैसे अपने अधीन काम करने वाले लोगों का भी हक मारता है। कहानी पीटर के जीवन के बीते दिनों में भी लौटती है और यह समझने का स्पेस देती है कि एक व्यक्ति के बदलने में परिस्थितियाँ किस हद तक जिम्मेदार होती हैं।
मल्टीनेशनल्स द्वारा अपने कर्मचारियों पर हर महीने टारगेट अचीव करने का दबाव, आर्थिक मन्दी में कर्मचारियों की छटनी और बेरोजगारी के संकट को केंद्र में रखकर लिखी कहानी है -प्रस्थान। यह छोटे शहरों में काम करने के बजाए महानगरों की ओर ललचाई निगाह से देखने वाली पीढी की दीपिका की कहानी है जिसे बडी मशक्कत के बाद मुम्बई में दूरसन्चार क्षेत्र की एक मल्टीनेशनल कम्पनी में काल सेंटर की नौकरी मिलती है। ट्रेनिंग, कम्यूनिकेशन की थियरी, अंग्रेजी बोलने का अभ्यास,कम्पनी के प्राडक्ट्स की जानकारी,क्लास टेस्ट,उसके बाद एक सप्ताह की फ्लोर ट्रेनिंग और नौकरी शुरू होते ही सबसे पहले एक महीने के भीतर पच्चीस कनेक्शन बेचने का टार्गेट। यहीं से शुरू होती है वह यात्रा जिसमें कम्पनी की परेशानियाँ अपनी परेशानियाँ बन जाती हैं और लाख मेहनत के बाद भी टार्गेट पूरा न हो पाया, तो सब बेकार। नीलिमा के बैच में सलेक्ट हुए पच्चीस लोगों में उसे मिलाकर दस लोगों को टार्गेट पूरा न करने के आधार पर अगले ही महीने निकाल दिया जाता है और इसके साथ फिर से नयी नौकरी की तलाश शुरू होती है। मेट्रो शहरों में नौकरी के लिए धक्के खाते युवाओं की हताशा को कहानी गहरी संवेदना के साथ व्यक्त करने में सफल कही जा सकती है। प्रयास करते रहने पर इस बार उसे इंडो-अमरीकन बैंक में कस्टमर केयर की नौकरी इस शर्त पर मिलती है, कि उसे शिफ्टों में ड्यूटी करने पडेगी। सभी शर्तों को स्वीकार करते हुए दीपिका ने न केवल बैंक में नौकरी हासिल की बल्कि छह महीने बाद उसने अपनी मेहनत से महत्त्वपूर्ण माने जाने वाले एनआरआई डिपार्टमेंट में भी अपनी जगह बना ली।
जीवन में पहली बार एक अच्छी सैलरी और आत्मनिर्भर बनने का सुख महसूस करते उसे बहुत समय नहीं हुआ था कि अमरीकी अर्थव्यवस्था में मन्दी की खबरें आने लगीं। नए कस्टमर मिलने कम हो रहे थे और मन्दी की सबसे अधिक मार कस्टमरकेयर डिपार्टमेंट के ऊपर पडी। बैंक ने इंसेंटिव तो बन्द ही कर दिए थे और अब छँटनी की बारी थी; पर छँटनी के कारण बैंक की मार्केट में साख गिरती, इसलिए बिलकुल नया तरीका निकाला गया जिससे साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। यह जुगत थी -बिना वेतन के स्वैक्षिक अवकाश। दीपिका के सामने और कोई रास्ता नहीं था सिवाय घर लौटने के पर क्या छुट्टी के बाद तक उसकी नौकरी सुरक्षित रह पाएगी ! इस भय और उथल-पुथल भरी लौट के साथ कहानी पाठक को अकेला छोड जाती है।
बाकी बातें फिर कभी में पिरोए गए लेखकीय अनुभवों के आधार पर इस बेहद जरूरी बहस की ओर बढा जा सकता है कि प्राइवेट पूँजी आधारित बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और सार्वजनिक पूँजी द्वारा संचालित निगमों की कार्य-संस्कृति में इतना बडा फर्क क्यों है ? यह गौर करने की बात है कि जहाँ प्राइवेट कम्पनियाँ हर तिमाही अपने टर्न ओवर और प्रॉफिट के बढने की घोषणा करते हुए सेंसेक्स का चढाव देखती हैं, वहीं इसी क्षेत्र की सरकारी कम्पनी के ये तथाकथित बडे अधिकारी मैनेज करते हुए कम्पनी के सिक होने का इन्तजार करते हैं। बहरहाल, कहानी में विन्यस्त घटनाओं और चरित्रों के माध्यम से लेखक ने न केवल उनके विनिवेशीकरण के लिए जिम्मेदार तत्वों की पहचान की है, बल्कि यह भी दिखाने की कोशिश की है कि सरकारें सार्वजनिक सिस्टम की खामियों को दूर करने के बजाए ऐसे उपक्रमों/कम्पनियों को ही नष्ट करने पर तुली हैं।
(चार)
नौकरी के लिए कोई तो नियम होते हैं, कुछ कायदे होते हैं,कुछ कानून होते हैं। पर यहाँ कोई नियम नहीं..यहाँ हम लोग सस्ते में काम करते हैं, इसलिए ये हमसे काम कराते हैं, अमेरिका में यही काम कराएँ, तो हमसे बीस गुना तनखाह इन्हें देनी पडे।
- वजूद के लिए ( हरियश राय )
वजूद के लिए चुनौतियों को अवसर मानने वाली एक ऐसी लडकी की कहानी है जिसका एमबीए करते ही एक अमरीकी मल्टीनेशनल कम्पनी में चयन होता है। करियर की इस शानदार शुरुआत पर गर्व करते हुए उसके पिता का मानना है कि जिस कम्पनी का कारोबार चालीस देशों में फैला हुआ है उसमें काम के लिए उसे चुना जाना एक बडी उपलब्धि है। यह न्यूयार्क से संचालित एक ऐसी एमएनसी है जो उन कम्पनियों का अध्ययन करती है जिनका मुनाफा कम है। उनके मैनेजमेन्ट,वर्क फोर्स,कार्यशैली और मार्केट इकॉनमी को ध्यान में रखते हुए उन्हें सुझाव देती है कि उनका व्यापार और उत्पादन कैसे बढ सके ! इस अमरीकी एमएनसी का वजूद इन्हीं कम्पनियों की सफलता पर टिका है और तेईस साल की लडकी वन्दना साबरवाल का वजूद भी।
कम्पनी उसे जम्मू भेजती है जहाँ उसकी मुलाकात कमल वर्मा से होती हैं। कमल वर्मा यानी उसके बॉस जिन्होंने वन्दना साबरवाल को फाइल देते हुए इस बात का आदेश दिया था कि वह रिपोर्ट का अध्ययन कर ऐसा प्रोजेक्ट तैयार करे जिससे कम्पनी का प्रॉफिट अगले साल तक दुगुना हो जाए। यहीं से शुरू होती है वन्दना साबरवाल की कारपोरेट जीवन-शैली जिसमें समय का कोई हिसाब नहीं है और काम कभी खत्म नहीं होता। सुबह आठ बजे से शुरू हुआ काम देर रात तक चलता, तब भी उसके सिमटने की कोई जुगत न बन पाती यहाँ तक कि खाना भी कम्पनी के ऑफिस में बनता ताकि कर्मचारियों के घर जाने का सबसे मजबूत अस्त्र भी विफल हो जाए। समय गुजरने के साथ वन्दना साबरवाल एक ऐसी मशीनी जीवन शैली की गिरफ्त में आती गयी जिससे बाहर निकलने का कोई रास्ता उसे नहीं सूझ रहा था। पूरे समय लैपटॉप पर घुसे रहना, दुनिया-जहान के कामर्शियल डेटा और जानकारियाँ इकठ्ठा करना, उनका विश्लेषण करना और तुलनात्मक आधार पर कुछ नतीजों की ओर बढना और जाने क्या क्या तरकीबें निकालना। हर दिन की प्रोग्रेस रिपोर्ट न्यूयार्क भेजना और एक प्रोजेक्ट पूरा होते ही अगले की तैयारी में खुद को झोंक देना। क्या वंदना साबरवाल की इस मशीनीकृत जीवन शैली का शिकार हमारी नयी जनरेशन नहीं है ! इसी जीवन शैली के चलते वंदना साबरवाल महज एक साल पूरे होने से पहले ही बहुत थकने लगी है,उसकी ऊर्जा का सोता कहीं सूखने लगा है और चश्में का नंबर बढने लगा है। बावजूद इसके उसने जब भी छुट्टी की बात की, तो बॉस कोई न कोई बहाना लगा कर बात टाल देता। इन्हीं मनःस्थितियों के बीच उसका परिचय उसी कम्पनी में काम करने वाली अर्पिता और रंजना से होता है । उससे अधिक सैलरी पर काम करने वाली उन दोनों सीनियर्स की महज तीन साल में ऐसी हालत देखकर उसे यकीन नहीं हो रहा था। उनके बीच जैसे-जैसे बातें आगे बढती जाती हैं, वैसे वैसे कारपोरेट-संस्कृति की तल्ख परतें उघडने लगती हैं। रंजना कहती है कि क्या उनकी हालत गुलामों जैसी नहीं हो गयी है ! यह प्रश्न बहुत ही प्रासंगिक और विचारणीय है, किन्तु भारतीय जनमानस में इसे लेकर कोई गहरी बेचैनी दिखाई नहीं देती; ऊपर से कोरोना की आड में कई सरकारें श्रम कानूनों को मिटाने पर आमादा हैं। वैसे भी भारत में श्रम कानूनों की हालत चिन्ताजनक है, उसके बावजूद भी उनमें ऐसे बदलाव किए गए हैं जिनसे शोषण की भयावह स्थितियाँ पैदा होंगी। ऐसा महसूस हो रहा है कि मानों सरकारें कॉरपोरेशन हैं और देश के नागरिक उनके अधीन काम करने वाले वर्कर।
कहानी उस विडम्बना को भी उभारती है जिसमें एक इम्प्लाई दूसरे इम्प्लाईज की जगह खुद को रखकर कभी देखने की कोशिश नहीं करता और अप्रत्यक्ष रूप से ऐसी परिस्थतियों को मजबूत करता है जिनसे शोषण जन्म लेता है। एक साल में दुगुना प्रॉफिट बढाने के लिए वन्दना साबरवाल जिन प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है, क्या उनमें कभी उसने यह देखने की कोशिश की होगी कि वहाँ के स्टाफ के लिए काम करने की परिस्थितियाँ कितनी स्वस्थ और अनुकूल हैं ? बात बहुत स्पष्ट है कम्पनी उसे जिस बात के लिए पैसे देती है उसमें इम्प्लाई कहीं नहीं है,उसमें केवल और केवल मुनाफा है। कम्पनियों के मुनाफे को एक साल के भीतर दुगुना करने के लिए उसने जो प्रोजेक्ट्स बनाए हैं उनमें क्या एक भी बिन्दु इम्प्लाइज के हित में होगा ? दरअसल दुनिया को अपनी मुट्ठी में करने की चाहत रखने वाली जो नयी खेप भारत में तैयार हुई है उसके लिए सिर्फ उसका पैकेज और तरक्की मायने रखती है। हमारा एमबीए का पाठ्यक्रम हमारे अन्दर कमाने की भूख तो पैदा करता है, पर यह नहीं सिखाता कि हम मशीन बनने से कैसे खुद को कैसे बचाएँ। यह भी कि स्वस्थ और ऊर्जावान बने रहने से बेहतर कोई और विकल्प नहीं होता।
कहानी का अन्त जिस क्षोभ और द्वंद्व से होता है वह महत्त्वपूर्ण है। वंदना साबरवाल को कंपनी में काम करते एक साल हो गए हैं फिर भी कई कोशिशों के बाद उसे छुट्टी मिल पा रही है। बॉस की हरामखोरी के चलते उसे कम्पनी के न्यूयार्क स्थित हेड ऑफिस से अनुमति लेनी पडती है। पाँच दिनों के स्वीकृत अवकाश के लिए इतनी मशक्कत और अपमान ! तिस पर घर निकलने से एक दिन पहले कमल वर्मा ने फाइलें पकडा दीं, इस कडे लहजे के साथ कि इन्हें वह देख ले और तीन दिन के भीतर प्रोजेक्ट मेल कर दे ! कितनी ऊर्जा और चहक लेकर आई थी, यहाँ वह और लौट रही है कितना गुबार लेकर! उसके मन में कई बार आया कि वह गलत जगह आ गयी है और उसे यहाँ से क्विट कर लेना चाहिए पर एमबीए की पढाई में लिए गए कर्ज की किश्तें कौन भरेगा? और कौन-सी दूसरी कम्पनी इतने पैसे देगी? उसके मन के किसी कोने में एक सवाल ने सर उठाया कि कहीं वह भी तो गुलाम नहीं बन गयी ? गुलामी की यह प्रक्रिया इतनी महीन है कि हमें पता ही नहीं चलता और हम..। कारपोरेट कार्य संस्कृति में दमन और शोषण की इस बारीक अनिवार्यता को कहानी बराबर लक्षित करती है। विरोधाभाषी और विभक्त व्यक्तित्व की बहुत सटीक पहचान करते हुए लेखक उस बिन्दु की तरफ भी ध्यान खींचता है जहाँ स्वयं वन्दना साबरवाल अप्रत्यक्ष रूप से शोषक की भूमिका में भी है और शोषित की भूमिका में भी।
उल्लेख्य कहानियों में कारपोरेट सेक्टर में काम करने वाली जिस युवा पीढी से हमारा सामना होता है वह जिन्दगी में कोई जोखिम उठाना तो दूर, अपनी छोटी-छोटी सुविधाओं की कटौती का तनिक भी खतरा मोल लेने के लिए तैयार नहीं है, फिर चाहे वह लाइफलाइन की दोनों बहनें हों; अन्ना सो रही थी की अलका हो; वह सपने बेचता था का पीटर या नीलिमा हों; प्रस्थान की दीपिका हो; पिंक स्लिप डैडी का दाधीच,अजरा जहागीर,उत्प्रेक्षा जोशी हो; वजूद के लिए की वन्दना साबरवाल हो। इन पात्रों के माध्यम से ये कहानियाँ हमें अपने भीतर झाँकने की जरूरत से रू-ब-रू कराती हैं। इतनी विशाल युवा आबादी वाले देश में बेरोजगारी की भयावह स्थितियों का फायदा उठाने वाले कारपोरेट सेक्टर की नीतियों का प्रतिपक्ष रखने और सत्ता की भूमिका को प्रश्नांकित करने का लेखकीय उपक्रम तभी सफल होगा, जब युवा खुद इस व्यवस्था का अपने स्तर पर प्रतिरोध करना शुरू करेंगे !

सम्पर्क : राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बाँदा- २१०००१, मो. ९४५७८१५०२४