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कला से रोमांस : कुछ दृश्य, कुछ अदृश्य

लीलाधर मंडलोई
मैं रचता हूँ, रचने का न इतिहास पूरी तरह जानता हूँ, न वर्तमान। जो समझता हूँ वह मेरा अपूर्ण, संपूर्ण होने का भ्रम है।
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इस कृति के बारे में संशयों से घिरा हूँ। न कथ्य पारदर्शी है न रंग योजना बेहद साफ। आईल पेंट है। मैं जो रच रहा हूँ उसमें जो बिम्ब चेतना में है, अमूर्त में मूर्त नहीं हो रहा। हटाने, खुरचने, मिटाकर बनाने के आवर्तन की प्रक्रिया में जो रूपाकर ले रहा है, सही रंग योजना के अभाव में कथ्य बिम्ब से दूर घटित हो रहा है, ये कृति मेरी कल्पना के मूल से अलग और भिन्न है।
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मेरा कला व्यवहार, सिद्धांत से व्यवहार में कुछ और हो जाता है। यह रहस्य है। रहस्य में इस कला की अदृश्य अनुभूति है। वह अनुभव की हूबहू शक्ल नहीं है।
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संकुचित होती आस्वाद क्षमता के इस दौर में, वह बैचेन होता जाता है। वह वेन गॉग से पूछता है, पूछने का और शरमाने का सिलसिला खत्म नहीं होता।
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एक खाँटी मनुष्य ,अपने पानियों में पक कर तैयार है। उसके साथ लंबा वक्त गुजारा,जिया। उसे केनवस पर मनोयोग से रचा,उसका चेहरा है,वो नहीं।
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बाँसुरी बचपन से साथ है। बजाने के भीतरी संस्मरण हैं। बजाने को स्वरों से सजाने की कला याद हो आती है। राग बिसरता नहीं। चित्र में आते हुए फिसलता है कला स्वर और माधुर्य बिखर जाता है।
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तुकहीन समय में तुकों में सोचता हूँ। छन्द में आँखें खोलता हूँ। वह अवचेतन में है। चेतन में रचते हुए छन्दविहीन हो जाता हूँ। मेरा चित्र लय के संश्लिष्ट रचाव में अनुपस्थित छन्द का भाष्य है।
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मेरी गली में एक अपंग, सुबह से शाम तक पेड की छाया में बैठा रहता है। प्रकाश वहाँ डालियों से छनता आता है। वह उसमें झिलमिलाता है। मैं संवेदना में दूर बैठा भीतर संजोता हूँ, गर्दन से झूलती खाल, खुले हुए माथे पर बेतरतीब फूलती नसें, और झुर्रियाँ और भूरे से स्याह होता चेहरे का रंग। यह दृश्य सालों से थोडा- थोडा बदलता फ्रीज होता रहा। ठीक सामने बैठकर बनाया उसका चित्र। वह वैसा ही लग रहा है। बस उसका होना नहीं है।
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जन्दगी की पढाई स्टुडिओ में न कर, निकल बाहर घूम-फिर, आवारा हो जा, ये अदब की जरूरी तालीम है।
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रोमान में बुद्धि के सम्त मानवीय रास्ता खोजता हूँ। रोमान प्यारा-सा अधूरा शाहकार है।
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अपूर्णता एक सृजन चक्र है। कला में चन्द्रमा।
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रंग तो ओर-छोर फैले हैं सिवाय उस एक चोखे रंग के, जो इस चित्र की ख्वाहिश में है।
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किसी एक रंग विचार से मंजिल न मिलेगी, कितने विचारों से गुजरकर,अपनी राह को पाना होगा।
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कला की एक बूँद हूँ, सही हूँ, इसमें समंदर है, देखना-सीखना होगा।
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अँधेरा है, गहरा है, यह सच है। इसमें रौशनी है परतों में दबी, खोज उसकी ही कला का हासिल है।
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पूर्वकल्पित कला आयाम चेतना में हस्बमामूल हैं, तस्वीर अपूर्ण, सम्पूर्ण प्रतीत हो रही है।
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जोखिम के रंग प्रत्यक्ष हैं, कला में वे अरूप, अमूर्त ऊग रहे हैं।
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मैं एक तस्वीर बनाना चाहता हूँ। जितनी जगह केनवास में चित्र को मिले, उतनी ही जगह रसिकों के लिए छोड दूँ, जिनका आना फिर कभी बन्द न हो।
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यह चित्र इतना संपूर्ण है अपूर्ण जैसा.....।
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तस्वीर बनाने को तैयार होते समय से पहले सोचो, तूलिका रूह में डूबी है कि नहीं?
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रचना अंततः रचना होती है किसी ब्राण्ड विशेष की मोहताज नहीं।
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आफ चित्र को देखकर कोई और याद आए, तो आप, आप नहीं हो सकते।
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कला में अपनी उपज पैदा नहीं कर पाए, तो वह मात्र रियाज है। रास्ते में मंजल नहीं होती।
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गाय की सार में जाओ, तो उसे गन्ध-सुगन्ध के साथ अनुभूति केन्द्र बनाओ, अन्यथा तुम्हारा रचा गोबर से बिनलिपे मकान से अधिक कुछ नहीं।
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हृदय में हर साँस तुम्हारी हो बिल्कुल निजी हस्ताक्षर की तरह।
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आक्सीजन हरी होगी, हरे हैं पेड-पौधे,जीवन हरा-भरा हो, हरा रचने के लिए हरा सोचो।
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चित्र के लिए नये विषयों में प्रवेश करो, रंगों में आपकी सीमा, नये रंगों में खुल जाएगी।
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रंग स्मृतियों में छिप जाते हैं, व्यतीत को पुनर्जीवित करता हूँ,वे मूल रूप में लौटने लगते हैं।
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माँ कुछ रंग के त्याज्य कपडों को अबेर-निबेर कर गुदडी और कथरी सिया करती थी, उन्हीं से बचपन के चित्रों में कला के आकार, रंग और विषय की खिडकियाँ खुलीं।
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जीवन इधर प्रतिकूल अँधेरा है,इसमें कला का नया दरवाजा खुलता दिख रहा है।
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अँधेरी खान में धुँआते टेमे की मद्धिम रौशनी में, बन-बिगड रही छवियों को निरखते हुए, मैंने प्रकाश का विज्ञान कला में सीखा।
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सतपुडा के सघन वन से घिरे आसमान में सूरज गुम और बस ताक-झाँक करने को आजाद। लम्बवत, आडी-तिरछी और दूसरे आयामों में धरती पर बमुश्किल उतरती किरनों में, मैंने प्रकाश को चित्रित करने के कुछ सूत्र अबेरते हुए आश्चर्य में डूब गया।
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बजद थामना पडे तब भी कला से रोमांस न छोडो, रोमांस में जिंदगी के पते ठिकाने हैं।
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एक ही विचार में इस तरह घिरना, कला में एक तरह से सरलता, सादगी और निश्छल सौंदर्य को खो देना है।
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समन्दर लहरों पर सवार जागता है, मछलियाँ लहरों पर जागती सोती हैं।
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कब किसकी छाया में हो, कब किसके प्रकाश में, कला में यह जान लेना, कला में अलग उपज का रास्ता है।
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जिस सौंदर्य को हम चेतना में बसा लेते हैं, वह भीतर से रहस्यमय होता है। एक स्त्री मेरी आँखों के पानियों में अस्थिर है।
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इधर तीन साल का बसन्त अवसाद-विषाद में है। मैंने बार-बार इसे हड्डियों में ऊगते देखा।
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पेडों, चट्टानों को जब क्लोजअप में देखता हूँ, टेंपरा कला की मौलिक संरचनाओं में खो जाता हूँ।
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कविता जलरंग में बनता चित्र है, अपना रूपार्थ बहते हुए सिरजता है।
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समय एक भुतहा हवेली है,जिसके अँधेरे में रौशनी लौकिक आँखों के पार झिलमिलाती है।
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अधूरे चित्र में, रंग लिथडे चाकू का कसमसाता अमूर्त है। चाकू पर आने वाले रंग यथार्थ की फंतासी है।
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कबसे याद करता केनवास के सामने अविचल हूँ। तुम सामने हो और तुम्हारी याद। गोया कबेलू वाले घर से झिरती रौशनी में पुरानी शहतीर। यादों के प्राचीन कम्पोजीशन में जो प्राचीनता है, वह तुम्हारी नहीं है।
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शहर के बीचों-बीच लकडी के कोयले का पहाड, लोहे के काँटेधार घेरों में, भूरे से स्याह और काले पडते बेतरतीब फटे बोरों में झूलता, पार्श्व में ट्रकों में भरे जाते कोयले से उठती-फैलती काली धूल को चीरतीं धुपैली श्याम किरणों ने कहा, यह मानो बचपन की गरीब सुबह का मंजर, पुराने पीले कागज पर बहती मैली-कुचैली जलअनुभूति।
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इस दृश्य चित्र में, चित्र है, कलाकार की दृश्येंद्रिय नहीं।
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बिना सही रंग का अधूरा सपना लिए, मैं शाम की पहाडी में धुँऐले बादली रंग के साथ डूब रहा हूँ। यह संक्राति काल की निःलफ्ज छवि है।
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कालजयी छवियों से भरा-पूरा ग्रामीण रूपविधान, अब भी है। धुँधलाता मूर्त से अमूर्त अदृश्य होता। जो शेष है पुराना, उसमें नया आने को बचा हुआ है।
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शब्द यहाँ भाव मौन हैं। रंग अपने अमूर्त निहितार्थों में अभिव्यक्त। मनुष्य स्मृतियाँ अभी पूरी तरह विदा नहीं हुई हैं।
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सालों-साल के प्राकृतिक व्यवहार से, ये दीवार पानी की अनुभूति का श्वेत -श्याम चित्र है।
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चूने में लिपटी दूध याद, दीवार में उमगती चित्रांकन परम्परा का ककहरा है। बच्चे बाँचते बडे हो रहे हैं।
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घास में उगता है तूलिका निर्माण का रहस्य, इस विज्ञान को जाने बिना, चित्र इतिहास समझ से परे बना रहता है।
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चित्र के सामने खडे-खडे कब उसमें समा गया, पता न चला। लौटा तो वह अवचेतन में साथ था और मैं विलक्षण अनुभव में, कल से बिल्कुल जुदा।
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देवदार के सघन वन में, रक्स है विलम्बित हवा का, देखते-देखते एक अमूर्त नम चित्र डिजाल्व होता है भीतर गहराइयों में।
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इतने रूपों में वर्षा की पा*ोब के खनकते घुँघरू हैं। ततकार है। और दुर्गालाल महाराज की देह में, पहाड से उतरते ताण्डव के भाव रंग हैं।
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धुला-धुला-सा चाँद का मनोहर जगमग आसमान। तारों का दिप-दिप करता हसीन मंजर। सहसा वेन गाग का चित्र आँखों में कौंध गया। चाँदनी की दिगम्बरा सनातन हँसी। इसे पेंट करने को वेन गॉग का एक और जन्म चाहिए।
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जंगल में गाय प्रसव समय में है। परिंदों ने उसे घेर लिया है। और बन्दर पास से गुजरने वालों पर दाँत किटकिटा रहे हैं।
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कितनी आग है मुहब्बत की पहाडों के दूर-दूर तक फैले सीनों में, गोशे-गोशे में धुँआ उठता दिखाई देता है।
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परिंदों की गजलसराई सुनी। इतनी मीठी-सुहावनी। मेरा सूरते-हाल अमूर्त स्टिल का था।
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इस आबे-हयात में जीव हैं, परिंदे हैं, रेंगते, दौडते, उडते-नाचते। फरोगे-हुस्न है चार सू। और इतनी बला की सादा खूबसूरती, जो न होती इतना सादा, कुछ कहने का कोई साहस जुटाता।
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श्वेतवसन हैं हरे वृक्ष। बादलों की पोशाक में प्रसन्नचित्त।
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यह तुम्हारा रचा है, यह कहने के पहले सोच लो, किसी की छाया तो नहीं।
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जो दूर है उसके पास जाओ, भीतर उतरो, जो आएगा रचे में वो कमाल मौलिक होगा।
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बचपन में जंगल से उठा लाया था जो रंगीन पंख, न होते तो बन न पाते, जिंदगी के चित्र।
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आँखों के सुख के लिए, रंगों में सोचता हूँ, उदासी में भूरा, दुखों में स्याह-सफेद हो जाता हूँ।
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मेरे पास सिर्फ शब्द हैं। मेरी ताकत होकर भी मेरी सीमा। चित्र चौकेंगे या लानत-मलामत करेंगे। मैं क्या करूँ? एक चित्रकार आता है अपने सृजन के साथ। मैं उसके चित्र में कविता पढता हूँ, मेरी कविता में कोई चित्र नहीं देखता, और मैं भीतर से हिल जाता हूँ।
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सम्पर्क - आखर, बी 253,बी पाकेट
सरिता विहार, नई दिल्ली-76
मो.9818291188