fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

महामारी और मानवाधिकार का विमर्श संदर्भ : कोविड -19 के सन्दर्भ में

मिथिलेश कुमार तिवारी
महामारी एक प्रकार की संक्रमणजनित बीमारी होती है जो बडे ही तेजी से जीवों के द्वारा जीवों के बीच फैलती है। यह अपने उद्भव केंद्र से कुछ ही दिन अथवा सप्ताह में एक बडे समुदाय अथवा क्षेत्र को अपने गिरफ्त में ले लेती है। महामारी के बारे में कहा जाता कि कोई भी बीमारी महामारी का रूप तब ले लेती है, जब वह काफी दिनों अथवा महीनों तक समुदाय में मौजूद रहती है। एक स्थिति ऐसी आती है कि यह क्रांतिकारी ढंग से समाज में फैलाने लगाती है (चक्रबर्ती; 2015. पृ.1)। कोविड-19 नामक वर्तमान वैश्विक महामारी जो चीन के वुहान शहर में दिसम्बर, 2019 में पैदा हुई तथा इसने देखते ही देखते कुछ ही महीनों में पूरी दुनिया को अपने गिरफ्त में ले ली। स्वास्थ्य मनुष्य का सबसे बडा धन है जो मनुष्य को इस पृथ्वी पर रहने की प्रथम प्रत्याभूत देता है। स्वास्थ्य का सीधा सम्बन्ध कपडा, रोटी, मकान से होता है जो मानवाधिकार का अभिन्न अंग है। इस वैश्विक महामारी ने मनुष्य के मानवाधिकार के समक्ष महत्त्वपूर्ण प्रश्न खडे किए हैं। दुनिया के विभिन्न देशों की सरकारों ने काफी बढ-चढ के कोविड-19 के खिलाफ काम तो किया है, लेकिन इस समस्या के निपटने में बहुत से ऐसे तथ्य हैं जो मानवाधिकार के संदर्भ में सवाल खडे करते हैं।
यह सार्वभौमिक सत्य है कि मानवाधिकार को लेकर दुनिया में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सर्वाधिक विमर्श हुए, व्यक्ति के लिए उसका प्राकृतिक अथवा मौलिक अधिकार इस बात को चरितार्थ करता है कि जन्म के समय प्रकृति ने उसे जो कुछ प्रदान किया है, उस सब का वह पूरी तरह से जीवन भर हकदार है। इससे उसे वंचित नहीं किया जा सकता है। इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि सामाजिक व्यवस्था की मूलभूत प्रेरणा, मानव जीवन के बहुआयामी विकास सापेक्ष निर्मित होती है। हर समाज अपने-अपने हिसाब से अपनी क्षमता के अनुसार अपने सांस्कृतिक वातावरण को निर्मित करता है और उसके अंतर्गत श्रेष्ठतम कृति का निर्माण अपेक्षित मूल्य एवं मानदण्ड होता है। इस प्रक्रिया में प्रत्येक राष्ट्र की संस्कृति प्रकृति एवं मानव जीवन के बीच मधुर एवं सृजनात्मक सम्बन्ध कायम करने की हर संभव कोशिश करती है। जैसे-जैसे विकास आगे बढता है वैसे-वैसे मानव एवं प्रकृति के बीच सम्बन्ध भी बदलने लगते हैं। ऐसे में समाज और उसके स्थापित मूल्य कभी प्रकृति के संरक्षण, संवर्धन के समर्थन में आगे बढता हैं तो कभी मानवीय विकास को मानवीय सफलता एवं सुख के परिप्रेक्ष्य में आगे बढाने का प्रयास करता है। ऐसा करना मनुष्य का मानवाधिकार है। पर जब समाज में सामुदायिक भावना कमजोर पडने लगती है और व्यक्ति की स्वतंत्रता स्वछन्दता का रूप लेकर के मनमाने तरीके से विकास का पैमाना गढने लगती है, तो हर व्यक्ति प्रकृति के साथ-साथ हर दूसरे व्यक्ति के शोषण का षड्यंत्र रचने लगता है। यह शोषण दिखावटी प्रेम और भय दोनों पर अलम्बित होता है। प्रतिफलस्वरूप जीवन का मधुर संगीत रुदन में बदल जाता है। हालाँकि यह प्रश्न अत्यंत ही जटिल है कि मनुष्य के विकास का सामाजिक पैमाना क्या है और उसके लिए उसके मानवाधिकार का वास्तविक रूप क्या है? फिर भी इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि प्रकृति एवं व्यक्ति के बीच सन्तुलन मानवीय विकास का आधार स्तंभ है। मानवाधिकार प्रत्येक व्यक्ति को स्वच्छ जल, स्वच्छ वायु, पृथ्वी पर रहने के लिए निवास एवं भोजन के साथ-साथ शिक्षा, स्वास्थ एवं बहुआयामी स्वतंत्रता की माँग करता है। ये अपरिहार्य मानवीय आवश्यकता की चीजें हैं जिसके बगैर मनुष्य के विकास की कल्पना करना संभव नहीं है। हालाँकि मानवाधिकार की जब बात की जाती है, तो इसके अंतर्गत इस बात को सुनिश्चित किया जाता है कि मनुष्य का अस्तित्व स्वतंत्र रूप से अन्य प्राणियों से पृथक एवं विशिष्ट स्थान रखता है जो एक प्रकार की कहीं न कहीं समग्र दृष्टि न होकर मनुष्य केंद्रित दृष्टि होती है। मानवाधिकार की यह दृष्टि अब पृथ्वी के स्वास्थ्य के लिहाज से बदलाव की मांग करती है।
मानवाधिकार की प्रक्रिया में पर्यावरणीय मानवाधिकार की माँग भी एक महत्त्वपूर्ण आयाम है, जो मनुष्य के अस्तित्व के लिए वांछित आवश्यकता है। यह आवश्यकता वर्तमान मानव जाति के साथ-साथ उसके आने वाली पीढियों की भी है। कुछ विद्वानों का मानना है कि मानवाधिकार का विमर्श केवल समकालीन जीवित मानव जाति के संदर्भ में ही उचित है। वह पीढियाँ जो भविष्य में आने वाली हैं वे वर्तमान पीढियों के लिए न तो कुछ कर सकती हैं और न ही इनके किए हुए कृत्य के बदले में दण्ड ही दे सकती हैं। ऐसे में हर वर्तमान मानव जाति का मानवाधिकार इस बात को बडे गहरे स्तर पर संदर्भित करता है कि मौजूदा मानव कल्याण के संदर्भ में यदि ज्यादा से ज्यादा न्याय संगत व्यवहार अपनाया जाएगा, तो आने वाली भावी मानव पीढियाँ भी अपने अधिकारों को समुचित रूप में प्राप्त कर पाएगी। क्योंकि वास्तविक भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि उसका वास्तविक अतीत कैसा है। ऐसे में व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र-राज्य से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने समकालीन मानव जाति के अधिकारों की रक्षा एवं संवर्धन प्राकृतिक संवर्धन के सापेक्ष सन्तुलित रूप में करें।
कोविड-19 के इस दौर में राज्य के सापेक्ष मानवाधिकार महत्त्वपूर्ण मुद्दा बन गया है। प्रत्येक नागरिक का यह अधिकार बनता है कि वह इस प्रकार के महामारी के दौर में अपने मानवाधिकार के बारे में जाने। वहीं राज्य का कर्तव्य है कि वह मानवाधिकार की रक्षा हर प्रकार से करने का प्रयास करें। जिस प्रकार से कोविड-19 महामारी पूरी दुनिया में अपना पैर पसारी है, जिसके परिणामस्वरूप राज्य एक तरफ कडा दृष्टिकोण अपनाते हुए अपने आवाम की सुरक्षा हेतु कई प्रकार के बन्दी एवं कफ्र्यू जैसे कदम उठाया है जिसके अंतर्गत नागरिकों को राज्य के विभिन्न इकाइयों द्वारा प्रताडित किया जाता है एवं शारीरिक दण्ड झेलना पडता है जो एक तरह से मानवाधिकार का उल्लंघन ही है। जहाँ तक बात अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार की है, तो वह भी इस विश्वव्यापी महामारी में पूरी तरह से संकुचित हो गया है। देखते ही देखते दुनिया के 167 देशों ने अपनी सीमा को पूरी तरह से बन्द कर दिया जो शरणार्थी जैसे लोगों के लिए मानवाधिकार के हनन की एक बडी बहस छेडता है। इस बीमारी ने राज्य के केन्द्रित होती शक्ति को और अधिक ताकतवर बना दिया है। भविष्य में राज्य की इस बढती ताकत को किस प्रकार संतुलित किया जाए, यह भी एक महत्त्वपूर्ण मानवाधिकार मुद्दा है। क्योंकि लोकतन्त्र में सेवक एवं सेवा का भाव देखते ही देखते शासक एवं शाषित का कब रूप ले लेता है, पता नहीं चलता है।
मानवाधिकार की अवधारणा राजनीतिक अभिव्यक्ति का शंखनाद करती है। इसकी उपादेयता जन-जन के राजनीतिक चेतना का आधार है। वर्तमान राज्य एवं उसकी राजनीति लोकतांत्रिक समाज के लोकतांत्रिक मस्तिष्क का प्रतिफल है। स्वराज्य की चाह हर व्यक्ति की होती है। स्वराज्य के बारे में वैदिक संहिता में लिखा गया है कि व्यचिश्ठे बहुपाप्ये यतेमहि स्वराज्ये अर्थात स्वराज्य की चाह करना प्रतेक व्यक्ति का कर्तव्य है और यदि स्वराज्य है, तो उसकी सुरक्षा करना हर व्यक्ति का कर्तव्य है (इन्द्रमणि; 2016, पृ.101-102 )। शक्ति का प्रमुख केंद्र राज्य होता है और ऐसी स्थिति में यदि राज्य अपने ही जनता के साथ शोषणकारी कदम उठाने लगता है, तो मानवाधिकार के हनन के विमर्श की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। किसी भी राज्य की आवाम राज्य से यही अपेक्षा करती है कि वह प्रकृति एवं मानव संस्कृति के बीच समन्वय बैठाते हुए मानवीय चेतना को सारगर्भित एवं संवेदनशील तरीके से विकास करे। देखने में मिलता है कि जब कभी राज्य अपने नागरिकों के इस अधिकार की अवहेलना करता है कि वे एक बेहतर पारितंत्र के बीच जीने में असक्षम हो जाता है, तो राज्य के विरोध में आवाज उठने लगती है। सत्ता का अति केंद्रीकरण का स्वरूप उस आवाज को पल भर में दबा देता है या दबाने का प्रयास करता है। मानवाधिकार की उठती माँग राज्य के सामने कुन्द पड जाती है। राज्य के सामने उसकी नागरिकों की हैसियत इतना कमजोर हो जाती है कि वह विवशता महसूस करने लगते हैं। इसके केन्द्र में राज्य की सबसे बडी ताकत उसकी सैन्य क्षमता होती है जिसके बल पर वह अपने नागरिकों के आवाज का दमन करता है और उसमें वह अक्सर कामयाब होता है। पूरी दुनिया में ऐसे अनेक ज्वलन्त उदाहरण मिलते हैं की राज्य प्रकृति के विध्वंस का समर्थन करता रहा है और जब नागरिक इसका विरोध किए हैं, तो उन्हें राज्य प्रायोजित हिंसा का शिकार होना पडा है। महामारी एक प्राकृतिक आपदा होती है। इस दौरान राज्य का दायित्व होता है की वह महामारी का सूझ-बुझ के साथ सामना करे। जब राज्य अपनी इस जिम्मेदारी से पीछे हट जाता है और महामारी को चिकित्सकीय अधिप्रचार का हिस्सा बनने में मदद करने लगता है, तो मानवाधिकार का बडे पैमाने पर हनन होता है।
दुनिया का अधिकांश शासकीय प्रारूप लोकतंत्रात्मक ढाँचा को धारण करता है। यह लोकतंत्रात्मक ढाँचा राष्ट्रवादी चेतना का अभिन्न हिस्सा होता है। प्रत्येक राष्ट्र अपने नागरिकों के मानवाधिकार की रक्षा करने का प्रत्याभूत लेता है और अपने सम्प्रभु स्वरूप के द्वारा इसे प्राप्त करने का भगीरथ प्रयास भी करता है। पर जब राष्ट्रवाद का स्वरूप सम्पूर्ण पृथ्वी के पारितंत्र के सापेक्ष चरमपन्थी रूप धारण कर लेता है, तो उस समय वैश्विक मानवाधिकार की पहल हाशिए पर चली जाती है। अक्सर देखने को मिलता है कि पर्यावरण की सुरक्षा एवं संवर्धन के लिए अनेक बार दुनिया के राष्ट्राध्यक्ष्यों का सम्मेलन होता है, पर अपने-अपने राष्ट्र के विकास से कोई भी समझौता नहीं करता है। क्योंकि उसके विकास का केवल यह पैमाना नहीं होता है कि उसके नागरिक खुशहाल जीवन जी रहे हैं, बल्कि वह दुनिया के राष्ट्रों के बीच में अपनी ताकत किस रूप में स्थापित किए हुए है, यह भी एक प्रमुख पक्ष होता है। मानवाधिकार के हनन की हद तब हो जाती है जब एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के खिलाफ जैविक हथियार का प्रयोग करने के फिराक में होते हैं या चोरी छुपे करते हैं। कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी इस प्रकार के संदेह को उठने में बडी तेजी से मदद करती है।
कोविड-19 महामारी ने दुनिया के पैमाने पर आर्थिक विषमता की खाई को और बडा करने का काम किया है। इस विषमता का प्रभाव तीसरी दुनिया के देशों में साफतौर पर देखा जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (2017) की रिपोर्ट कहती है कि तकरीबन 40 करोड लोग गरीबी रेखा के नीचे जा सकते हैं। दुनिया में केवल 35 प्रतिशत बच्चों के पास सामाजिक सुरक्षा है और लगभग दो तिहाई बच्चे सामाजिक सुरक्षा से वंचित हैं। जिसमें से अधिकांश अफ्रीका और एशिया में रहते हैं। दुनिया भर में नवजात शिशुओं वाली केवल 41.1 प्रतिशत माताओं को मातृत्व लाभ मिलता है और 59 प्रतिशत महिलाएँ आज भी इससे वंचित हैं। दुनिया में केवल 21.8 प्रतिशत कर्मचारियों को बेरोजगारी भत्ता मिलता है, जबकि 152 मिलियन कर्मचारी ऐसी सुविधाओं से वंचित हैं। दुनिया के बहुत कम देशों में दिव्यांगों को सामाजिक सुरक्षा हासिल है। अधिकांश देशों में दिव्यांग सामाजिक सुरक्षा से वंचित हैं। अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (2017) के आँकडे दिखाते हैं कि दुनिया भर में गम्भीर रूप से दिव्यांगों में से केवल 27.8 प्रतिशत को ही विकलांगता का लाभ मिलता है। महामारी ने समाज के इन तबकों को किस तरह से प्रभावित किया होगा इसे समझा जा सकता है।
कोविड-19 महामारी के प्रभाव पर दुनिया के कईं सारे गैर-सरकारी संगठनों ने अपनी रिपोर्ट जारी की है। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा ऑक्सफेम की रिपोर्ट पर हुई। गैर-सरकारी संगठन ऑक्सफेम की इनइक्यूलिटी वाइरस- ग्लोबल रिपोर्ट (2021) के अनुसार, कोविड-19 महामारी के दौरान पूरी दुनिया में 740 मिलियन महिलाएँ अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं और कोविड के प्रथम माह में उनकी आय में 60 प्रतिशत तक की गिरावट हुई। जो कि लगभग 360 बिलियन के आस-पास थी। लॉकडाउन और सामाजिक दूरी ने सबसे ज्यादा सेवा क्षेत्र और पर्यटन को प्रभावित किया है। मैक्सिको में 21 प्रतिशत महिलाएँ अनौपचारिक क्षेत्र में थीं और वह काम से बाहर हो गईं। वहीं तकरीबन 15 प्रतिशत पुरुष जो कि अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत थे, काम से बाहर हो गए।
ऐसी स्थिति में जब महामारी कई महीनों तक अपना प्रकोप अबाधित रूप से कायम की हुई है वैसे मैं लोगों के लिए खाने के लाले पड गए हैं। प्रवासी मजदूर बडे पैमाने पर देश के विभिन्न क्षेत्रों से अपने घर के लिए प्रस्थान किए। आवागमन की असुविधा के कारण हजारों मील की यात्रा पैदल करने के लिए विवश हुए। कारखाना मालिकों ने इस स्थिति का भरपूर फायदा उठाया और बडे पैमाने पर मजदूरों की मजदूरी मन्दी का हवाला देकर मजदूरी कटी। जिसके लिए मजदूरों ने छोटे बडे स्तरों पर आन्दोलन भी किया पर वह बहुत प्रभावकारी नहीं रहा। बेरोजगारी की स्थिति में लोग चिन्ता, तनाव, हताशा जैसी मानसिक परेशानियों से ग्रसित हो गए। कई ऐसी भी खबरें आई कि लोगों आर्थिक परेशानियों के कारण आत्महत्या जैसा कदम भी उठाया। जिसने एक नए आर्थिक विकास के विमर्श को पैदा किया। यह विमर्श इस बात की समीक्षा करने की कोशिश करता है कि वर्तमान में जो मानवीय सभ्यता पूरे विश्व को आर्थिक आकार देने में अभ्यस्त है क्या वह मानवी जीवन के लिए सार्थक एवं न्याय संगत आधार प्रदान करती है। यह लाजमी है कि विश्वमानव का यह अधिकार है कि वह अपनी आजीविका के लिए आर्थिक क्रियाओं का आलंबन प्राप्त करें पर इन आर्थिक क्रियाओं का मुख्य आधार मानव जीवन के शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक विकास के साथ-साथ सामाजिक एवं पर्यावरणीय संतुलन की माँग करता है। जीवन को किसी भी स्तर से सिर्फ वस्तुगत मानसिकता के ढाँचे में ढाल देना हर हाल में मानवाधिकार के भावना के खिलाफ सोच है। पर वर्तमान आर्थिक एवं औद्योगिक अधोसंरचना जितना ज्यादा विकास के प्रतिमान को प्राप्त करने में सफल हुई है उतना ही ज्यादा विषमता, असंतोष, दमन, आक्रामकता एवं हिंसा जैसे अमानवीय मूल्यों को बढावा दिया है। बडे पैमाने पर आज के औद्योगिक विकास की प्रक्रिया ऐसी चीजों में मानव श्रम एवं समय का निवेश करती है जो युद्ध एवं विलासिता सम्बन्धी चीजों का उत्पादन करती है यह मानवाधिकार के लिहाज से हर हाल में अहितकर है। क्योंकि इसके द्वारा विषमतामूलक समाज का निर्माण होता है और इसमें बडे पैमाने पर प्रकृति के जैव-अजैव संसाधनों को निवेश करना पडता है।
इस कोविड-19 महामारी ने दुनिया की शिक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से ठप कर दिया है जिसके कारण बडे स्तर पर विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों को बन्द कर दिया गया है। शिक्षा व्यक्ति के मानवाधिकार का अहम् पक्ष है और इससे उसे किसी भी हाल में वंचित नहीं किया जा सकता है। पर वर्तमान समय में लगभग 95त्न शिक्षाधारक पूरी तरह से दुनिया में इस महामारी से प्रभावित हुए हैं। द हिंदू अखबार के एक आँकडे के अनुसार लगभग 191 देशों के स्कूल पूरी तरह से बन्द कर दिए गए, जिसमें 1.6 अरब विद्यार्थी प्रभावित हुए और 91.3त्न शिक्षा प्राप्त करने वाले लोग शिक्षा से वंचित हो गए (द हिंदू, 23 अप्रैल 2020)। महामारी का सम्बन्ध राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य के साथ-साथ सामाजिक रीति-रिवाजों से भी गहरा होता है। इतिहास इस बात का गवाह है कि महामारी समाज में छुआछूत एवं अस्पृश्यता जैसे बुराइयों को जन्म दिया है। क्योंकि समाज में कुछ लोग इस प्रकार की अवधारणा बना लेते हैं कि गरीब एवं गंदगी में रहने वाले लोगों द्वारा ही इस प्रकार की महामारी फैलती है। इसलिए राज्य को इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि दुनिया में कोविड-19 के वजह से किसी भी प्रकार के छुआछूत एवं अस्पृश्यता जैसे माहौल न बन पाए और न ही आने वाले कल में इसकी गुंजाइश रहे।
इस महामारी ने जिस प्रकार के बहुआयामी संकट को वैश्विक मानव के सामने खडा किया है इससे मानवाधिकार की बहस में अब आवश्यक है कि इसे मानव केन्द्रित न करके संपूर्ण रूप में या समग्र रूप में पृथ्वी केन्द्रित करके देखा जाए। इस क्षेत्र में भारतीय चेतना एक महत्त्वपूर्ण संभावना हो सकती है। यहाँ पर मानवाधिकार को सिर्फ मानव केन्द्रित न देखकर समग्र रूप में सृष्टि के चराचर प्राणियों के अस्तित्व की रक्षा के रूप में देखा गया है। भारतीय चिन्तन परम्परा में पाए जाने वाला कर्म का सिद्धांत इस बात की पुष्टि करता है कि मनुष्य को सिर्फ अपने अधिकारों के प्रति जागरूक न बनकर के सम्पूर्ण जीवों के अस्तित्व के प्रति जागरूक एवं संवेदनशील होना चाहिए। ऐसे में इसका अनुगमन करना सम्पूर्ण मानव जाति के लिए कल्याणकारी बन जाता है। सह-अस्तित्व की भावना जो अहिंसा की दृष्टि का मूल है। वह हमारी मानवीय चेतना का को जन्म देती है।
निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि इस वैश्विक महामारी के दौर में देश एवं दुनिया को मानवाधिकार के अनुरक्षण, संवर्धन एवं अनुप्रयोग व्यक्ति, समष्टि एवं प्रकृति के संदर्भ में करना होगा। नागरिक के रूप में प्रत्येक व्यक्ति राज्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी का पालन करे तो राज्य प्रत्येक नागरिक के मानवाधिकार की हर संभव रक्षा करे। एक नागरिक का कर्तव्य बनता है कि वह जिस रूप में है इस विश्वव्यापी कोविड-19 महामारी के दौर में अपने सन्निकट लोगों का हर तरह से संभव मदद करें। इस महामारी ने जिस प्रकार की चोट मानवता को पहुँचाई है यह इस बात का सूचक है कि अब समय आ गया है कि मनुष्य को अपने अस्तित्व के व्यक्तिवादी सोच से बाहर निकलकर सम्पूर्ण पृथ्वी के कल्याण की भावना प्रबल करे। इसके लिए राज्य एवं उत्पादन तंत्र दोनों की प्राथमिक जिम्मेदारी बनती है कि वह समाज को काल्पनिक, भोगवादी, व्यक्तिवादी एवं स्वामी भाव के चेतना से मुक्त करते हुए व्यवहारिक एवं वास्तविक जीवन के सच्चाई से रूबरू कराए।

संदर्भ सूची -
Ba×4, U. (2002).The Future of Human Rights. O&ford: O&ford University Press.
Crawford, J. (1988).The Rights of People.O& ford: Clarendon Press.
Donnelly, j. (1989).Universal Human Rights in Theory and Practice. Ithaca: Cornell University Press.
Dryzek, j. (1997).The politics of The Earth.O&ford, England: O&fordUniversity press.
Hayward, T. (2005).Constitutional Environmental Rights .O&ford: O&ford University press.
Chakraborty, R. (2015). Epidemics. Springer International Publishing.
The Hindu, wxapril, 2020
सिंह, म. (2018). वैदिक सनातन हिन्दुत्व. नई दिल्ली : प्रभात पेपरबैक्स.
इन्द्रमणि, डॉ. (2016). मानवाधिकार का वर्तमान वैश्विक परिदृश्य एवं सर्वोदय दर्शन. कानपुर :
सरस्वती प्रकाशन.
आचार्य, नं. (2010). मानवाधिकार की संस्कृति. बीकानेर : वाग्यदेवी प्रकाशन.
आचार्य, नं. (2003). मानवाधिकार के तकाजे. बीकानेर : वाग्यदेवी प्रकाशन.
***

महात्मा गाँधी फ्यूजी गुरुजी सामाजिक कार्य अध्ययन केंद्र
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
ई-मेल- mktv980@gmail.com
मोबाईल- 9764969689