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नेहरू का समाजवाद और आधुनिक भारत

प्रेम बहुखण्डी
वर्ष 2014 में, केन्द्रिय सत्ता में दक्षिणपन्थी सरकार के बनने के बाद लगातार नेहरू और उनकी नीतिओं पर प्रश्न खडे किये जा रहे हैं। हालाँकि देश की आजादी के समय देश देश की स्थिति और 67 साल बाद अर्थात् वर्ष 2014 में, देश की स्थिति के आँकडों का आकलन नेहरू के पक्ष में गवाही देता है। प्रस्तुत लेख, 15 अगस्त 1947 से लेकर मई 2014 तक भारत की विकास यात्रा की एक संक्षिप्त विवेचना के माध्यम से नेहरू की नीतियों की समालोचना करने का प्रयास है।
देश की आजादी के वक्त भारत की जनसंख्या लगभग 36 करोड थी। (चूँकि 1947 में हमारे पास जनसंख्या का कोई विश्वसनीय आधार उपलब्ध नहीं था, इसलिए जनगणना 1951 को आधार मानकर, इस जनसंख्या का आकलन किया जा रहा है)। जनगणना 1951 के अनुसार, भारत की जनसंख्या 361,088,090 थी (GOI) , वर्ष 2011 की जनगणना में यह संख्या 1,21,05,69,573 हो गई (त्रह्रढ्ढ) । साक्षरता दर 21.82 प्रतिशत थी (MHRD) और 42.6 प्रतिशत बच्चे स्कूल से बाहर थे आज यह दर, 2011 की जनगणना तक 74 प्रतिशत हो गई है (GOI)। औसत आयु मात्र 35 वर्ष थी, जो जनगणना 2011 में पुरुषों के लिए 63.8 वर्ष और स्त्रियों की 64.4 वर्ष हो गई थी। देश के पास मात्र 1362 मेगावाट बिजली उपलब्ध थी। जबकि आज 11 पंचवर्षीय योजना के अन्त तक, औसत 884 किलोवाट प्रतिव्यक्ति खपत के साथ 199877 मेगावाट का उत्पादन हो रहा है, तथा कुल 556633 तक बिजली पहुँच चुकी है।
बिजली साक्षरता से ऊपर, जो सबसे बडी चुनौती खाद्यान की कमी थी। चूँकि खाद्यान उत्पादन प्रयाप्त नहीं था, इसलिए भारत को खाद्यान आयात करना पडता था। वर्ष 1944-45 में 14 करोड, वर्ष 1945-46 में 24 करोड, 1946-47 में 89 करोड और वर्ष 1947-48 में यह बढकर 110 करोड पहुँच गया था (बजट भाषण 1948-49)। वर्ष 1950-51 में भारत की आज के रुपयों के मूल्य में ?10,036 करोड रूपये थी।
खाद्यान की कमी के साथ एक और बडी समस्या थी कि भारत पाकिस्तान बँटवारे के, कुल आवादी का 82 प्रतिशत भारत में रह गई जबकि खाद्यान उत्पादन का मात्र 75 प्रतिशत ही भारत के हिस्से में आया(FAO)। देश के आजाद होने के तत्काल बाद ही, आजाद भारत की पहली सरकार ने श्री पुरुषोत्तम दास ठाकुर के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया, जिसने अपनी रिपोर्ट में, भारत सरकार को तत्काल 2 मिलियन टन खाद्यान की जरूरत बताई और अगले कुछ वर्षो में को खाद्यान उत्पादन को 100 मिलियन टन तक बढाने का लक्ष्य/ सुझाव दिया।
14 अगस्त 1947 को आजादी के अवसर पर अपने प्रसिद्ध भाषण नियति से साक्षात्कार में नेहरू जी ने आने वाले भारत का एक एजेंडा (कार्यसूची) रखते हुए गरीबी, भूखमरी, निरक्षरता, अवैज्ञानिकता को खत्म करने के साथ साथ सामरिक और आर्थिक रूप से समृद्ध भारत का एक सपना देश को दिखाया। इसके लिए उन्होंने मजबूत और लोकतान्त्रिक संस्थाओं की वकालत की और कहा कि ऐसे संस्थायें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय करने में सक्षम और सहायक होंगी। उन्होंने एक ऐसे भारत की कल्पना की जो लोकतान्त्रिक, समृद्धशाली, और प्रगतिशील होगा। जहाँ पर प्रत्येक नागरिक के बुनियादी अधिकारों की रक्षा होगी और सबको न्याय सुनिश्चित होगा।
लेकिन इसके लिए सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण कार्य था उत्पादन बढाना। इसलिए देश के आजाद होने के मात्र एक वर्ष के अंदर ही, 30 अप्रैल 1948 को भारत सरकार ने पहली बार उद्योग नीति का प्रारूप पास किया, जो कि औद्योगिक नीति संकल्प-1948 (IPR-1948) के नाम से जाना जाता है। इसके तहत उद्योगों को चार भागो में क्लासिफाइड किया गया था।
- ग्रुप-ए बुनियादी और सामरिक महत्त्व की इकाईयों जैसे रक्षा सम्बन्धी, एटॉमिक एनर्जी, रेल से सम्बन्धित सभी कार्यों में सरकार का पूरा एकाधिकार रहेगा। निजी क्षेत्र की कोई भूमिका नहीं रहेगी।
- ग्रुप- बी जिन उद्योगों के लिए अधिक पूँजी और संसाधनों की आवश्यकता है, लेकिन वे भविष्य की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण भी हैं जैसे खनन (कोयला- इस्पात), जहाजरानी (शिपबिल्डिंग), कम्यूनिकेशन (टेलीफोन और टेलीग्राफ), तेल आदि की जिम्मेदारी भी सरकार ने अपने ऊपर ले ली लेकिन यह तय किया गया कि 10 साल बाद इस श्रेणी के उद्योगों का आकलन किया जाएगा।
- ग्रुप-सी तीसरी श्रेणीं में ट्रेक्टर, ऑटोमोबाइल, मशीन टूल्स जैसे 18 उद्योगों को सूचीवद्ध किया, तथा इनके निर्माण के लिए सरकार की निगरानी में निजी क्षेत्र को भी शामिल किया गया था। इसके अलावा जितने भी उद्योग विशेषकर उपभोक्ता वस्तुओं से सम्बंधित थे, को निजी क्षेत्र के लिए छोड दिया गया, हालाँकि इसमें स्पष्ट कहा गया था कि यदि जरूरत महसूस होगी, तो इसमें सरकार भी उद्योग लगा सकती है। इस क्षेत्र के उद्योगों के लिए स्माल स्केल एण्ड कॉटेज इण्डस्ट्री को विशेष महत्त्व दिया गया।
26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ, देश के लिए उसमें कुछ नीति निर्धारक तत्व (डायरेक्टिव प्रिंसिपल) थे, प्लानिंग कमीशन का विधिवत गठन हो चुका था, इसलिए वर्ष 1956 में, आईपीआर 1948 की पुनः विवेचना की गई और आईपीआर 1956 में उद्योगों को नए सिरे से वर्गीकृत किया गया (GOI 1956)।
- Schedule A - में राज्य और केंद्र सरकार के बीच भी उद्योगों की जिम्मेदारी को बाँटा गया, जिसके तहत चार प्रमुख उद्योगों जिसमे रक्षा क्षेत्र, एटॉमिक एनर्जी, रेलवे, और एयर ट्रांसपोर्ट को केंद्र सरकार के अधीन रखा गया.
- Schedule बी - के तहत 12 उद्योगों को रखा गया जिसमें निजी क्षेत्र को भी शामिल किया गया, हालाँकि इसमें स्पष्ट कहा गया था कि इन इकाइयों में स्वामित्व राज्य सरकार का ही रहेगा।
- Schedule सी - इसके अलावा जो भी उद्योग थे विशेषकर उपभोक्ता वस्तुओं से सम्ब्नधित, उनमें मुख्य्तः निजी क्षेत्र को स्वतंत्र रखा गया, हालाँकि निजी की आर्थिक गतिविधियों, उनके उत्पादन को भी सरकारी नीतियों के तहत तथा सामाजिक जरूरतों के हिसाब से नियंत्रित करने की व्यवस्था की गई।
आईपीआर 1956 में रोजगार सृजन के लिए कुटीर तहत लघु उद्योगों के विकास पर जोर दिया गया था।
उद्योगों के वर्गीकरण के अलावा आईपीआर 1956 ने बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए, विशेषकर बिजली, परिवहन और वित्तीय संस्थानों को प्राथमिकता दी तथा देश के विकास में सहयोगी के तौर पर निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए रास्ते खोले।
देश में संतुलित विकास के लिए, आर्थिक रूप से पिछडे क्षेत्रों में उद्योग धन्धे खोलने को प्राथमिकता में रखा गया, इसने औद्योगिक विकास के लिए तकनीक और प्रबन्धकीय कौशल को बढावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया, जिसके परिणामस्वरुप आई आई टी, की स्थापना हुई तथा विश्वविद्यालयों में व्यवसाय प्रबंधन (बिजनेस मॅनॅजमेंट) कार्यक्रम शुरू हुए। आईपीआर 1956 मुख्यतः समाजवादी सोच के साथ औद्योगिक विकास की नीति को ही आगे बढाने का ही कार्यक्रम था, लेकिन इसमें एक स्तर के बाद निजी क्षेत्र को भी शामिल करने का प्रस्ताव था। पहली पंचवर्षीय योजना में स्वीकार किया गया था कि निजी क्षेत्र उत्पादन और वितरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है (Rao 1952)। आईपीआर 1956 का एक महत्त्वपूर्ण और अघोषित उद्देश्य आर्थिक संसाधनों और शक्ति का चन्द हाथो, या समूहों या व्यापारिक प्रतिष्ठानों के पास एकत्र होने पर रोक लगाना भी था।
20 और 21 दिसंबर 1954 को लोक सभा (संसद) ने देश की आर्थिक स्थिति पर चर्चा की और अंत में प्रस्ताव पास किया कि भारत की आर्थिक नीतियों का उद्देश्य समाजवादी समाज का निर्माण करना होगा। आर्थिक और औद्योगिक गतिविधियों को इस प्रकार से बनाया और संचालित किया जाएगा कि वे इस उद्देश्य की पूर्ती करें (महालनोविस 1955)।
आईपीआर 1956 पर नेहरू की इससे समाजवादी सोच का स्पष्ट असर था। नेहरू जानते थे कि सैकडों वर्षों की गुलामी से आजाद हुआ भारत सामरिक दृष्टि से एक कमजोर राष्ट्र है, जबकि इसके अन्दर एक महान और शक्तिशाली राष्ट्र बनने की पूरी सम्भावना है। इसलिए देश की पहली प्राथमिकता होगी कि भारत अपनी सामरिक शक्ति में विस्तार करे, हथियार और अन्य उपकरणों का निर्माण स्वयं करे, इसके लिए सरकार ने एटॉमिक एनर्जी के साथ साथ स्पेस रिसर्च जैसे क्षेत्रों में भी इन्वेस्टमेंट करना शुरू कर दिया था। इसके अलावा देश की आम जनता के आत्मबल (सेल्फ कॉन्फिडेंस) को बढाने के लिए उनके जीवन स्तर को बढाने की दिशा में कदम बढाये गए। इन दोनों उद्देशों की पूर्ती के अलावा विश्वस्तर पर अपनी स्थिति को मजबूत करने, रोजगार सृजन और गरीबी उन्मूलन के लिए भारत ने भी तेज गति से औद्योगीकरण की दिशा में कदम बढाने शुरू कर दिए.

वर्ष 1958 में, वैज्ञानिक नीति संकल्प को संसद के पटल पर रखते हुए, नेहरू ने कहा था कि इसका मकसद है कि सरकार अपने नागरिकों को विज्ञान और तकनीक के उच्तम फायदे दिलवाना चाहती है। लोकसभा में अपने भाषण में नेहरू ने कहा था कि देश को औद्योगिकरण के लिए विदेशों से विज्ञान तथा तकनीक, प्रशिक्षित मानव संसाधन, प्लांट और मशीन के साथ साथ तकनीकी ज्ञान (कंसल्टेंसी) को आयत करना पडता है जिसके लिए हमें भारी पूँजी चुकानी पडती है। इसलिए तत्काल भारी संख्या में विज्ञान और तकनिकी तथा प्रशिक्षित मानव संसाधन की उपलब्धता, ही औद्योगिकरण के प्रथम चरण में भारी पूँजी को बचा सकता है। हमारे पास अनेक उद्योगों के लिए कच्चा माल नहीं है जिसके लिए हमें दूसरे देशो के ऊपर निर्भर रहना पडता है, यदि हमारे पास ज्ञान और तकनीक होगी तो हम उसके बदले में कच्चा माल ले सकते हैं।
देश में वैज्ञानिक शोध, शिक्षण प्रशिक्षण को बढावा देने के लिए आधारभूत व्यवस्था अर्थात साइंस एण्ड टेक्नोलॉजी के बुनियादी ढाँचा को बढाना होगा। भारत जैसे विकसित राष्ट के लिए यह सब करना मतलब बहुत अधिक संसाधनों की आवश्यकता होगी, लेकिन देश में बढती बेरोजगारी और गरीबी का हल भी यही है। नेहरू के अनुसार भारत की गरीबी का बडा कारण है कि उसने आधुनिक विज्ञान और आधुनिक सामाजिक आर्थिक तरीकों को नहीं अपनाया। इसलिए विज्ञान और तकनीक के माध्यम से समाजवादी समाज का निर्माण करना होगा। और यह तभी संभव है जब देश ऐसी मशीनो का निर्माण करने में सफल होगा जो दूसरी मशीनों का निर्माण कर सकें और दूसरा देश में मौलिक मौलिक रूप से विज्ञान और तकनीकी का शोध करने में सफल हो सकें।
नेहरूवादी दृष्टिकोण के अनुसार, भारत को बडी मशीनों और मशीन बनाने वाले उद्योग, वैज्ञानिक शोध संस्थान, और विद्युत् शक्ति की सबसे पहले जरूरत थी। इसलिए 1950 से 1970 के बीच का विज्ञान और तकनीक आधारित औद्योगिकरण और आधुनिकीकरण इसी सोच पर आधारित था। पण्डित नेहरू की अध्यक्षता में बनी पहली पंचवर्षीय योजना में स्पष्ट रेखांकित था कि नियोजित विकास का प्रथम लक्ष्य लोगों के जीवन स्तर को सुधारना और जीवन शैली में बदलाव लाने के के लिए नए आयाम, नयी संभावनाओं की खोज करना था। इस योजना में उल्लेखित किया गया था कि आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल और प्राकृतिक संसाधनों का उचित दोहन न कर सकना ही देश की गरीबी का प्रमुख कारण है; तथा समाज का नए सामाजिक आर्थिक उपायों के प्रति गतिहीन और निरुत्साहित रहना भी इसका प्रमुख कारण है। इसलिए यदि इस गतिहीनता और कुचक्र को तोडना है, तो तकनीक विकास के साथ साथ सामाजिक विकास की गति को भी तेज करना होगा। समाज में वैज्ञानिक चेतना और आधुनिक सोच विकसित करनी होगी ।
देश की आजादी के समय सबसे बडा संकट था भोजन की व्यवस्था करने का, इसलिए भोजन की व्यवस्था करने के लिए अतिरिक्त उपाय करने पर जोर दिया गया। इसलिए पहली पंचवर्षीय योजना में भी कृषि के साथ साथ ऊर्जा और सिंचाई को भी महत्त्व दिया गया था। यह भी महसूस किया गया कि अगर उद्योगों के लिए आवश्यक कच्चा माल और जनता के लिए उचित मात्रा में भोजन उपलब्ध नहीं होगा, तो फिर औद्योगीकरण की उच्चतम सीमा को पाना मुश्किल होगा। इसलिए कृषि उत्पादन को बढावा देने के लिए सार्वजानिक क्षेत्र में पूँजी निवेश को बढाया गया। हालाँकि इसी योजना में यह भी महसूस किया गया कि औद्योगीकरण के लिए कुछ अन्य सेवाएँ जैसे इस्पात, स्टील, रसायन, विद्युत उपकरण, बडी मशीनरी को भी नहीं छोडा जा सकता है। इसलिए इस पर भी ध्यान केंद्रित किया गया।
नेहरू की अध्यक्षता में बनी दूसरी पंचवर्षीय योजना में भी मुख्य उद्देश्य औद्योगिकरण के माध्यम से राष्ट्रीय आय में वृद्धि करना था। इसके लिए बुनियादी उत्पादन और उद्योग को बढावा देना, रोजगार की संभावनाओं को बढाना, आय और सम्पति के बीच के गैप को कम करना, और आर्थिक संसाधनों के उचित वितरण को प्राथमिकता दी गयी थी। दूसरी पंचवर्षीय योजना में भी औद्योगिकरण और बुनियादी उत्पादन और उद्योग को सबसे अधिक प्रमुखतः दी गई, जिसके लिए बडे-बडे स्तर विशेष तौर पर खनिज विकास और औद्योगिकीकरण की जरूरतों को पूरा करने के लिए सार्वजानिक क्षेत्र के कारखाने लगाए गए। इसी के साथ खनन, तेल शोधन, एटॉमिक एनर्जी का विकास, करने पर विशेष जोर दिया गया।
आईपीआर 1956 में आर्थिक विकास और औद्योगिक रूप से पिछडे क्षेत्रों में विकास और रोजगार उपलब्ध करवाने के लिए, बिजली पानी और परिवहन की व्यवस्था करने पर जोर दिया गया था ताकि उपयुक्त उद्योग लग सके। और इसी विचार को आगे बढाते हुए तीसरी पंचवर्षीय योजना में ऐसे क्षेत्रों में नए औद्योगिक क्षेत्र स्थापित किये गए। निजी उद्यमिता को प्रोत्साहित करने के लिए, इन क्षेत्रों में निजी उद्यमियों को सस्ते दामों में जमीन बेची गई या लम्बे समय के लिए लीज पर दे दी गई।
तीसरी पंचवर्षीय योजना में भी कृषि अर्थव्यवस्था, औद्योगिक विकास, ऊर्जा क्षेत्र, परिवहन के साथ तकनीक विकास को महत्ता दी गई थी। तीसरी पंचवर्षीय योजना की जो सबसे महत्त्वपूर्ण बिन्दु था वो था कि इसमें स्पष्ट उल्लेख किया गया था कि सभी क्षेत्रों के प्राकृतिक संसाधनों का राष्ट्रहित में भरपूर दोहन किया जाए तथा प्रत्येक क्षेत्र नेशनल पूल से विकास में अपना हिस्सा ले। हालाँकि इस प्रक्रिया में प्राकृतिक संसाधनों पर आश्रित समुदायों, आदिवासियों और पर्वतीय क्षेत्र के लोगों ने जंगल, नदी, पहाड और स्वच्छ वातावरण, सहित अपना सर्वोच्च देश हित में दे दिया, किन्तु बदले में उन्हें उचित हिस्सा नहीं मिला, परिणामस्वरूप इन क्षेत्रों और समुदायों के मन में रोष उत्पन होने लगा।
तकनीक नेहरू का एक मापदण्ड (पैरामीटर) था, जिससे वे सामाजिक और आर्थिक विकास का आकलन करते थे, उनका मानना था कि तकनीक का सामाजिक आर्थिक विकास से सीधा सम्बन्ध है। नेहरू चाहते थे कि एक ऐसा समाज का निर्माण हो जो आधुनिक विज्ञान और तकनीक का भरपूर उपयोग करने के साथ साथ नई तकनीकी के विकास में भी सहायक और सक्षम हो। इसलिए नेहरूजी का मुख्य ध्यान बडे उद्योगों के निर्माण के साथ साथ वैज्ञानिक और तकनीक शोध को बढावा देने पर भी था।
विज्ञान के प्रति नेहरू की प्राथमिकता को इससे भी आँका जा सकता है कि स्वतंत्रता के बाद जो पहला मंत्रिमण्डल बना था उसमे वैज्ञानिक शोध के लिए एक अलग मन्त्रालय का गठन किया गया और नेहरू स्वयं उसके प्रभारी मंत्री बने। आजादी के 10 महीने के अन्दर, 1 जून 1948 को वैज्ञानिक शोध विभाग (डिपार्टमेंट ऑफ साइंटिफिक रिसर्च) का गठन किया गया, जिसके अंतर्गत अनेक महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक और अनुसन्धान संस्थानों को रखा गया जिनका प्रमुख कार्य वैज्ञानिक और औद्योगिक शोध को बढावा देना था। आणविक एनर्जी जैसे महत्त्वपूर्ण संस्थान को भी इसी के अन्तर्गत रखा गया, नेहरू ने आणविक शक्ति को विकसित और उपयोग करने से सम्बंधित योजना को स्वयं संविधान सभा के पटल पर रखा था। अगस्त 1948 को एटॉमिक एनर्जी कमीशन बना था, जिसकी जिम्मेदारी सीधे प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू के पास थी, और जब 1954 में इसे एक स्वतंत्र मंत्रालय के रूप में स्थापित किया गया था उस वक्त भी नेहरू ही इसके प्रभारी मंत्री थे।
नेहरू का मानना था कि यदि सेना (आर्मी, नेवी, और एयरफोर्स) को मजबूत और अग्रणी बनना है, तो इसके लिए उसे आधुनिकतम तकनीक के साथ कदम मिलाकर चलना होगा। इसके लिए नेहरू ने डी ए कोठारी को रक्षा मंत्रालय में वैज्ञानिक सलाहकार के रूप में नियुक्त किया। रक्षा विज्ञान (डिफेंस साइंस) की प्रमुख जिम्मेदारी थी कि देश के सामरिक महत्त्व के हथियारों तथा अन्य उपकरणों को बनाये और उस पर निरंतर शोध करता रहे।
नेहरू के काम में पाँच सबसे महत्त्वपूर्ण भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के स्थापना का स्वप्न देखा । लक्ष्य आधारित वैज्ञानिक संस्थाओं (मिशन ओरिएँटेड साइंस एजेंसियों-MOSA) जैसे परमाणु ऊर्जा विभाग, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद, रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन की स्थापना या इस चरण के दौरान तेजी से विस्तार किया गया। 1947 -60 के समय को भारतीय विज्ञान की दृष्टि से स्वर्णिम काल कहा जा सकता है। इसी समय 1956 में भारत ने पहला स्वदेश परमाणु अनुसंधान रिएक्टर-अपसरा को देश को समर्पित किया जोकि सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि एशिया का पहला संयंत्र था।
नेहरूजी की कार्यकाल में, औद्योगीकरण, रक्षा, आणविक शक्ति, अंतरिक्ष अनुसंधान जैसे विषयों पर मुख्य ध्यान केंद्रित रहने के वावजूद जीवन के अन्य क्षेत्रों सिंचाई, दुग्ध उत्पाद, मत्स्य पालन, से सम्बंधित विज्ञान और शोध पर भी पूरा ध्यान दिया गया। पहली पंचवर्षीय योजना में तो कृषि क्षेत्र को विशेष तवज्जों दी गयी थी। ताकि देश के बँटवारे के कारण जो अनाज, और नकदी फसलों (विशेषकर जूट- कपास) असुंतलन आ गया था उसकी भरपाई की जा सके। कृषि उत्पादन और व्यवसाय को सहायता करने के लिए राष्ट्रीय बीज निगल लिमिटेड, फर्टिलाइजर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया और एग्रीकल्चर रिफाइनेंस एण्ड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया अनेक नए संस्थान स्थापित किए गए। हालाँकि आजादी के बाद देश के पास संसाधन बहुत कम थे, लेकिन सीमित संसाधनों के वावजूद नेहरू ने सिंचाई परियोजनाओं पर बहुत अधिक ध्यान दिया था।
यही सब आधारभूत कारण थे जिन्होंने हरित क्रांति के लिए मजबूत आधार तैयार किया था। देश में खाद्यान की कमी को पूरा करने के लिए भारत ने 1960 के मध्य से उच्च उपज वाली किस्में (HYV) के बीज इस्तेमाल करने शुरू कर दिए थे। इनके लिए अधिक मात्रा में खाद और पानी की आवश्यकता होती थी, यही कारण था, ये पूरे देश में सामान रूप से परिणाम नहीं दे पाए। कुछ क्षेत्र जैसे आदिवासी और पर्वतीय क्षेत्र, सीमान्त किसान, असिंचित क्षेत्र, हरित क्रांति का हिस्सा नहीं बन पाए।
ये कहना तथ्यात्मक रूप से आपराधिक होगा कि नेहरू की नीतियों के कारण देश में विकास नहीं हुआ। 1947 में सैकडों सालों की गुलामी से आजाद हुए भारत में, अपने नागरिकों को खिलाने के लिए खाद्यान भी नहीं था. आजादी के बाद के पहले दशक में ही भारत खाद्यान का उत्पादन 3.3 प्रतिशत वार्षिक दर से बढने लगा, जो कि 1900 के कुल उत्पादन का तीस गुना था (पटनायक 1997) आजादी के समय भारत बडे पैमाने पर खाद्यान आयत करता था, जो आजादी के पहले दशक से धीरे धीरे कम होते होते 1980 तक नकारात्मक हो गया; बडे पैमाने पर खाद्यान आयत करने वाला भारत एक बडा निर्यातक बन गया। 2019 में इसी अवधि के दौरान मार्च-जून 2020 में कुल कृषि जिंसों का निर्यात 3.50 बिलियन अमेरिकी डॉलर था, जिसमें इस वर्ष अर्थात 2020 में 23.24त्न की तेज वृद्धि हुई थी (GOI)।
आजादी के समय औद्योगिक उत्पादन लगभग न के बराबर था जबकि 1980 तक, देश हर प्रकार के औद्योगिक उत्पादन करने में सक्षम था। भारत ने 18 मई 1974 को राजस्थान के पोकरण में पहला न्यूक्लिर टेस्ट करके, दुनिया को अपनी वैज्ञानिक और सामरिक शक्ति से परिचित करवा दिया। सत्तर के दशक के दौरान, भारत ने अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम में उल्लेखनीय प्रगति की और संचार, प्रसारण और रिमोट सेंसिंग के लिए स्थानिक अनुप्रयोग विकसित किए। भारतीय ने प्रायोगिक उपग्रहों - आर्यभट्ट, काजल, एप्पल, रोहिणी, और प्रायोगिक सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SLV-3) और ऑगमेंटेड सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (ASLV) का सफलतापूर्वक डिजाइन और निर्माण किया। भारत का 100वाँ अंतरिक्ष अभियान सितंबर 2012 में वर्कहोल्ड पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) के सफल प्रक्षेपण के साथ हुआ। क्कस्रुङ्क, वर्कर्स पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (PSLV) ने आवश्यक कक्षाओं में सफलतापूर्वक फ्रेंच स्क्कह्रञ्ज-6 और जापानी प्रोफेर्स (PROFERES) उपग्रहों को स्थापित किया। सितंबर 2014, भारत ने मंगल ग्रह की कक्षा में एक मानवरहित अंतरिक्ष यान को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया।
इन सब उपलब्धियों के वावजूद, नेहरू की नीतियों से हुए विकास का एक चेहरा यह भी है कि अमीर और गरीब के बीच की खाई बढती गई। वर्ष 1960 -61 में 40 प्रतिशत ग्रामीण और 50 प्रतिशत शहरी आवादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही थी। उसे पूरी तरह पोषण नहीं मिल पा रहा था। वर्ष 1960 -61 से 1968 -69 के बीच के आठ वर्षों में प्रति व्यक्ति खपत 4.8 प्रतिशत बढी थी. यही वो समय था जब योजना आयोग ने उच्च वृद्धि लक्ष्य पर अपना ध्यान केंद्रित कर दिया था, और 1968 -69 से 1980 -81 के बीच के 12 वर्षों में प्रति व्यक्ति खपत को 42 प्रतिशत तक बढाने का लक्ष्य रखा था। इस बीच यह कल्पना की गई कि इससे गरीब और अमीर के बीच की खाई कुछ कम होगी, तथा गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की संख्या 10 प्रतिशत से कम हो जाएगी (डांडेकर और रथ 1971)।
देश में एक तरफ तेज गति से विकास हो रहा था और दूसरी तरफ कुछ क्षेत्रों और समुदायों में गरीबी भी बढ रही थी। देश के विकास और गरीबी के बीच के इस द्वंद्व के कारण भारत सरकार ने, 1962 में गरीबी का आकलन करने के लिए एक विशेष समूह का गठन किया। इस समिति ने न्यूनतम भोजन की जरूरतों को पूरा करने के लिए, जरूरी पैसों को आधार मानकर, गरीबी का आकलन किया(Dandekar and Rath 1971)। वर्ष 1979 में वाई के अलग समिति ने भी गरीबी रेखा का आकलन प्रति व्यक्ति पोषण के आधार पर किया, उनके अनुसार शहरी क्षेत्र में 2100 कैलोरी और ग्रामीण क्षेत्र जहाँ शारीरिक श्रम अधिक करना पडता है, में 2400 कैलोरी भोजन प्राप्त करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। वर्ष 1993 में डी टी लकडवाला समिति ने गरीबी की इस परिभाषा को बदलकर, इसमें पोषण के अलावा, शिक्षा और स्वास्थय के दो नए आयाम जोड दिए। जिस कारण अचानक से गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या 16 प्रतिशत से बढकर 36.3 प्रतिशत हो गई (GOI- नीति आयोग)।
वर्ष 2005 में भारत सरकार ने महसूस किया कि ग्रामीण गरीबी रखा काफी नीचे है इसलिए नए सिरे से इसका आकलन करने के लिए सुरेश तेन्दुलकर समिति का गठन किया।
तेन्दुलकर समिति ने कैलोरी आधारित मॉडल का बदलकर, गरीबी रखा में शिक्षा, स्वास्थय, ऊर्जा खपत, और परिवहन खर्च को भी जोडकर, प्रति व्यक्ति खपत का एक नया मॉडल तैयार कर दिया। इसके अनुसार प्रति व्यक्ति ग्रामीण क्षेत्र में 27 रूपये प्रतिदिन और ग्रामीण क्षेत्र में 35 रूपये औसत खपत से ऊपर का व्यक्ति गरीबी रेखा से ऊपर है। इसके आधार पर भारत में गरीबों की संख्या कुल जनसँख्या का 22 प्रतिशत थी। इस रिपोर्ट का विरोध होने के पश्चात, तत्कालीन प्रधानमन्त्री के आर्थिक मामलों की समिति के अध्यक्ष सी रंगराजन की अध्यक्षता में एक नई समिति का गठन हुआ, इस समिति ने प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति खर्च के आँकडें को बढाकर ग्रामीण क्षेत्र में 32 रूपये और शहरी क्षेत्र में 47 रूपये कर दिया। नतीजतन वर्ष 2011-12 में गरीबी रखा के नीचे रहने वालों की संख्या में कुल आवादी का 30 प्रतिशत हो गई जोकि 2011-12 की जनसँख्या के हिसाब से 36.3 करोड थी। गरीबी के आँकडे ऐसे समय के हैं जब प्रति व्यक्ति औसत आय 67,839 रूपये थी, अर्थात् प्रति व्यक्ति प्रतिदिन की आय 185 रूपये से अधिक थी (Hindu NP)।
ये सच है कि देश में अनेक समस्याएँ विद्यमान हैं, गरीबी, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, अमीर गरीब के बीच की खाई, क्षेत्रीय असन्तुलन, मूल भूत सुविधाओं का अभाव, आज भी देश की आजादी के 70 साल बाद भी है। लेकिन आजादी के बाद भूख से तडपते देश ने, सैकडों वर्षों की गुलामी से आजाद हुए देश ने, हजारों भाषाओं-बोलियों, क्षेत्रीयताओं, उप राष्ट्रीयता, जातियों, और धर्मों वाले देश ने एक बेहतरीन स्थिति पा ली है। देश ने इस बीच अनचाहे तीन युद्ध लडे, अनेक क्षेत्रों में सांप्रदायिक और क्षेत्रीयता के आन्दोलनों का सामना किया, आतंकवाद के कारण देश ने एक प्रधानमंत्री, एक पूर्व प्रधानमन्त्री और राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को खोया। हर बार इन सब घटनाओं के कारण देश की प्रगति में रुकावट आनी स्वाभाविक थी।
यह भी संभव है कि नेहरू की समाजवादी नीतियों के मुकाबले, अगर कोई दूसरा मॉडल होता, जैसा कुछ विदेशी विद्वानों का मानना है कि औद्योगीकरण के मुकाबले कृषि पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए था, निश्चित ही उसके परिणाम आज से भिन्न होते, लेकिन परिणाम आज से बेहतर होते, इस बात को कहने का कोई स्पष्ट वैज्ञानिक आधार नहीं है।
इसलिए जो लोग यह कह रहे हैं कि देश ने पिछले 70 वर्षों में कुछ नहीं किया, कोई विकास नहीं हुआ। वे निश्चित ही अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों में देश के पुरुषार्थ को नकार रहे है।
सन्दर्भ -
पूर्व शोध विभाग प्रमुख, राज्य सभा टेलीविजन, मुख्य ट्रस्टी - फ्रेंड्स ऑफ हिमालय
https://censusindia.gov.in/census_data_2 001/India_at_ Glance/variation.asp &
https://www.censusindia.gov.in/2011census/pca/pca_highlights/pca_highlights_file/india/chapter-v.pdf
https://censusindia.gov.in/2011-prov-results/data_files/india/Final_PPT_2011_chapter{.pdf
https://www.censusindia.gov.in/2011census/pca/pca_highlights/pca_highlights_file/india/chapter-v.pdf
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