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महाभारतः क्लोज रीडिंग

त्र्यम्बकनाथ त्रिपाठी
1.
जिस प्रकार मानव शरीर की संरचना में शिराओं और धमनियों की सूक्ष्म विन्यस्त संरचना मौजूद है ठीक वैसे ही महाभारत जैसे महाकाव्यात्मक आख्यान में सूक्ष्म उपाख्यानों का विन्यास मौजूद है। महाभारत एक ऐसी अद्भुत रचना है जिसकी संरचना, रचना-प्रक्रिया और पाठ-प्रक्रिया का निर्धारण कर पाना कठिन कार्य है। यह भारतीय मानव-मेधा का सर्वोच्च उदाहरण है।
पाठ को पढने के बाद यह सवाल सहज ही जेहन में आने लगता है कि इस जटिल कथा-विन्यास की संरचना को भारतीय समाज के सामने प्रस्तुत करने वाला व्यक्ति और उसकी मेधा-विलक्षणता किस प्रकार की रही होगी।
महाभारत एक वैश्विक प्रसिद्धि प्राप्त महाकाव्यात्मक आख्यान है। प्रमाण यह है कि दुनिया की अनेकानेक भाषाओं में इसका अनुवाद किया गया और अनेकानेक विद्वानों के द्वारा इसकी अनेक मीमांसाएँ भी प्रस्तुत की गईं। इन सबने मुक्तकण्ठ से यह स्वीकार किया कि ऐसी महान रचना विश्व की किसी भाषा में मौजूद नहीं है। इसलिए महाभारत एक अपूर्व काव्य ग्रंथ है।1
भारतीय महाकाव्यात्मक आख्यान परम्परा 1 का यह एक ऐसा मौलिक प्रयोग है जिसमें कथा केवल कथा नहीं रहती, बल्कि वह बार-बार इतिहास में परिवर्तित हो जाती है। अतः इसमें इतिहास की समझ का एक ऐसा संश्लेष मौजूद है जिसको किसी भी भाँति अलग नहीं किया जा सकता है।
शास्त्र और लोक के सम्बन्ध और द्वन्द्व दोनों पर भारतीय चिन्तन परम्परा में खूब विचार किया गया। कौन अधिक महत्त्वपूर्ण है, का विवेकात्मक विवेचन किया गया। एक लम्बी परम्परा दिखती है जिसने दोनों अंगांग सम्बंधों का विवेचन किया है, लेकिन महाभारत की प्रतिष्ठा इस अर्थ में भी है कि यहाँ लोक और शास्त्र केवल सैद्धांतिक पद नहीं हैं। बल्कि पात्रों के माध्यम से इनका व्यवहार उनके जीवन और आचरण में दिखाई देता है। भारतीय जनमानस का स्वभाव, लोकाचार और शास्त्र सम्मत मान्यताओं का सम्यक निर्देशन महाभारत की जीवन रेखा के समान है।
वचन और मर्यादा दो प्रमुख छोर हैं इस आख्यान के। दोनों ही अपने सम्बंधों और द्वन्द्वों में समूचे कथा विन्यास में मौजूद हैं। ये दोनों ही प्रतियुग्म निरंतर बनते और बिगडते नजर आते हैं। इसीलिए कथा की अन्विति और अन्वय की प्रक्रिया को कन्टेन्ट और भाषा दोनों ही सन्दर्भों में समझना आसान कार्य नहीं है। यही कारण दिखता है कि महाभारत की संरचना में प्रश्न बहुत मौजूद है।
महाभारत की कथा प्रतिपक्षों के निर्माण की कथा है।
इस आख्यान-2 में पक्ष जितना महत्त्वपूर्ण है उससे कहीं अधिक प्रतिपक्ष महत्त्व का है। यही प्रतिपक्ष कथा/आख्यान के लिए त्वरण का कार्य करता है। श्रोता या पाठक का मस्तिष्क सदैव प्रतिपक्ष के आचरण और कार्य-व्यापारों पर ही टिका रहता है। जिस प्रकार कोई शब्द अपने द्विचर-प्रतियोग में अपने अर्थ का संधान करता है ठीक वैसे ही महाभारत का आख्यान अपने प्रतिपक्ष के विवेक, व्यवहार और नियति से अर्थ का संधान करता है। यह सर्वथा सोचने का विषय है कि केवल आख्यानक मुख्य कथाओं में ही प्रतिपक्ष नहीं है बल्कि कोई भी उपाख्यान इससे अछूता नहीं है।
2.
तीन नैरेटिव्स
जय, भारत और महाभारत तीनों अलग-अलग नैरेटिव (Narative) हैं। इस तथ्य को सामने रखने के पीछे जो कारण मौजूद हैं उनका सबका संकेत आज हमारे सामने प्राप्त महाभारत पाठ में है। विचार के क्रम में मेरा मानना है कि इसको काव्य, महाकाव्य, इतिहास, आख्यान आदि न कहकर पाठ (text) के रूप में देखना ठीक रहेगा। और इसी सन्दर्भ में क्रमशः उन तथ्यों पर विचार किया जा सकता है।
1. 1966 के अपने एक शोधात्मक लेख में रोलाँ बार्थ कहते हैं कि The narratives of the world are numberless अभिप्राय यह कि समूचे विश्व में आख्यानों की बेशुमार संख्या है। यह कहने के पीछे उनका तर्क यह है कि हमारे सामने जो कुछ भी दिख रहा है वह एक पाठ है और उस मौजूदा पाठ के साथ ही साथ अनेक प्रकार के आख्यान मौजूद होते हैं। इन आख्यानों की आधारशिला प्रत्येक व्यक्ति के सोचने और समझने की प्रक्रिया है। अतः महाभारत के आख्यान को भी इसी अर्थ में देखने पर कहा जा सकता है कि उस समय यथार्थ रूप में घटित महाभारत की विभिन्न घटनाओं से संवलित घटना अनकहा पाठ था या अनकहा आख्यान था जिसको पहली बार श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास ने कथित आख्यान के रूप में समाज के सामने प्रस्तुत किया।
बार्थ की बात को ध्यान दिया जाए, तो यह भी कहा जा सकता है कि महाभारत की घटना में शामिल और घटना से बाहर रहकर देखने वाले लोगों के भी अपने-अपने नैरेटिव रहे होंगे लेकिन हमारे सामने एक ही व्यास विरचित नैरेटिव आ सका। इस संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।
महाभारत की जो घटना यथार्थ में घटित हो रही थी या हो चुकी थी वही महाभारत का मूल पाठ है। और जो आज हमारे सामने मौजूद है यह उस मूल पाठ का नैरेशन (Narration) है व्याख्या है। जिस जय नाम की चर्चा मौजूदा पाठ में होती है वह मूल पाठ की नैरेटोलाजी (Narratology) है। मूर्त रूप में प्रस्तुत करने की व्यास की यह रचना-दृष्टि है। क्रिएटिव प्रॉसेस है। एक विशेष रचना-दृष्टि का परिणाम है जय।
दरअसल बात यह है कि कोई भी घटना जो हमारी आँखों के सामने घटित हो या किसी के द्वारा अभिव्यक्त की गई हो उसकी संरचना दो आयामों पर विन्यस्त होती है। पहला-घटना का कन्टेन्ट (Content) और दूसरा उस घटना का नैरेशन (Narration) । दोनों ही क्रियाएँ व्यक्ति के मस्तिष्क में एक साथ घटित होती है। जय का फार्मेशन भी यही है। अर्थात् श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास की अपनी आख्या। अतः इसको व्यास का नैरेशन कहा जा सकता है। इसीलिए उग्रश्रवा सौति ने विद्यार्थियों (ऋषियों) के सामने कहा कि-
आचख्युः कवयः केचित्संप्रतयाचक्षते परे।
आख्यास्यन्ति तथैवान्ये इतिहासमिमं भुवि।।3
अर्थात् बहुतेरे कवियों ने भूमण्डल में पहले भी इस इतिहास को कहा है और आगे भी अनेकों कवियों द्वारा कहा जाएगा। सौति ने अपने इस वक्तव्य में आख्यान (Narration) की अनेकानेक स्थितियों की ओर संकेत किया है। जाहिर है कि यदि पूर्वापर अनेक कवियों ने आख्यान किया है, तो संभव है कि उनकी आख्यान दृष्टि (Narrative Vision) की प्रक्रिया और समझ भी अलग रही हो।
चूँकि जो आख्यान होता है उसका सीधा सम्बन्ध शैली और इन्टोनेशन से होता है। इसीलिए बार्थ कहते हैं कि Narrative is first and for most a Prodigious Variety of genses4 आख्यान विलक्षण शैली का प्रकार है। इसी शैली से आख्यान में प्रभाव उत्पादन की क्षमता का विकास होता है।
इसके साथ ही साथ यह भी सत्य है कि प्रत्येक व्यक्ति की शैली और उसका इन्टोनेशन अलग-अलग होता है। व्यक्ति के परिवर्तित होते ही शैली परिवर्तित हो जाती है, तो स्पष्ट है कि साथ आख्यान दृष्टि (Naration Vision) में नैरेटिव विजन भी बदल जाएगा। यही कारण है कि नैरेटर के बदलते ही उनके नामों में परिवर्तन दिखाई देता है। यदि ऐसा नहीं होता, तो नाम जय ही रहने दिया जाता। भारत और महाभारत नामकरण की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती।
श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास के बाद के दो वक्ताओं को इस तथ्य की जानकारी खूब रही होगी, तभी तो नाम परिवर्तित कर दिया। अच्छा यह सिर्फ नामकरण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उसकी व्याख्या-दृष्टि में परिवर्तन की सूचना भी है। इसकी सूचना आश्वलायन गृहसूत्र में भी विद्यमान है-
सुमंतु - जैमिनि - वैशम्पायन-पैल-सूत्र भाष्य5
भारत - महाभारत-धर्माचार्य
आश्वलायन गृहसूत्र 3/4
यहाँ वैशम्पायन को महाभारत ग्रंथ के साथ संयुक्त किया गया है। अतः यह स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है कि जय संहिता का अपना नैरेशन महाभारत के रूप में वैशम्पायन ने किया। इसके साथ ही कईं प्रकार नैरेशन की सूचना भी दिया सौति ने-
विविधं संहिताज्ञानं दीपयन्ति मनीषिणः।
व्याख्यातुं कुशलताः केचिद्ग*ंथान धारयितुं परे।। 6
अर्थात् अनेक विद्वानों ने संहिताज्ञान को प्रदीप्त किया है और व्याख्याएँ की हैं। यहाँ व्याख्या का अर्थ नैरेशन के रूप में ही शायद लिया गया है। व्याख्या करना मतलब नैरेट करना ही है जो पुराने किसी भी नैरेशन से बिल्कुल पृथक होगा।
अनेक विद्वानों ने महाभारत की मीमांसा करते हुए यह संकेत किया है कि महाभारत के तीन संस्करण मौजूद हैं या मिलते हैं। सातवलेकर ने महाभारत के श्लोकों का अर्थ और व्याख्या करके उसके सम्पादन में जो भूमिका लिखी उसमें महाभारत के संस्करण शीर्षक से अपना विचार प्रस्तुत किया और लिखा कि व्यास ने महाभारत को जय नाम से पुकारा। महाभारत के प्रथम श्लोक में ही इस नाम की चर्चा है- जयमुदीरयेत। इसके बाद जब इसमें परिवर्धन हो गया, तब इसका नाम भारत पड गया, अन्त में जब दूसरी बार फिर परिवर्धन हुआ, तब इसका नाम महाभारत पडा।7 यहाँ जिस परिवर्धन की बात की जा रही है, वही नैरेशन है।
इस प्रकार डॉ.वी.वैद्य ने अपनी पुस्तक Mahabharata : A Citicism में लिखा है कि the three editions of the work इन्होंने भी तीन संस्करणों की चर्चा की। लेकिन यह तथ्य जितनी सहजता और सरलता से प्रचलित हुआ है, उतनी सीधी बात है नहीं।
जब तक तीनों पाठ - जय, भारत और महाभारत सामने मौजूद नहीं होंगे, तब तक संस्करण कहना ठीक नहीं जान पडता। लेकिन नामकरण और श्लोकों की बदलती संख्या को देखकर तथा सौति के उद्धरणों से यही कहना समीचीन दिखता है कि ये तीन भिन्न-भिन्न प्रकार के नैरेटिव्स हैं।
2. किसी पाठ का आख्यान करना, आख्यान करने वाले (Narrator) की ज्ञान परम्परा, मनोदशा और परिस्थिति पर निर्भर होता है। आधुनिक समालोचना में यह सिद्धांत बहुत गंभीरता के साथ स्वीकृत है कि एक ही पाठ की अनेक व्याख्या/आख्यान हो सकता है। इसका भी हम विश्लेषण मौजूदा महाभारत के पाठ के आधार पर कर सकते हैं। पीछे यह देखा गया है कि किस प्रकार जय, भारत और महाभारत तीनों भिन्न-भिन्न प्रकार के नैरेशन हैं। इसकी अगली कडी में इस तथ्य का प्रमाण यह है कि स्वयं श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास ने महाभारत के अपने नैरेशन को काव्य माना और उसे ब्रह्मा के द्वारा स्वीकृत कराया।
शौनक के आश्रम में ऋषियों के सामने उनकी तमाम जिज्ञासाओं का प्रशमन करते हुए बताया कि किस प्रकार से जय ग्रंथ की रचना की गई उसकी भूमिका को स्पष्ट करते हुए कई बार जय के लिए इतिहास शब्द का प्रयोग किया-
1. जय नामक ग्रंथ में किन-किन तथ्यों पर विचार किया गया? उसकी विषय-वस्तु क्या है? पर अपना मन्तव्य अभिव्यक्त करते समय जय के लिए इतिहास शब्द का प्रयोग किया-
इतिहासाः सवैयाख्या विविधा श्रुतयोऽपि च 9
कहा कि इतिहास का और श्रुतियों का निरूपण किया व्यास ने।
2. पुनः इतिहासमिमं चक्रे पुण्यं सत्यवतीसुतं 10
कहकर जय ग्रंथ को इतिहास की संज्ञा दिया।
3. इसके साथ ही पराशर नंदन व्यास ने ब्रह्मा के सामने ग्रंथ लेखन की योजना को रखा, तो वहाँ भी जय में वर्णित विषय क्या है? पर विचारणा के क्रम में सौति के अनुसार व्यास ने ब्रह्मा से कहा कि इसमें (जय में) इतिहास पुराणों का मंथन प्रस्तुत किया गया है।
इतिहासपुराणमुन्मेषं निर्मितं च यत्11
सौति की निगाह में यहाँ भी इतिहास महत्त्वपूर्ण है।
अतः इन तत्त्वों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि जय के सन्दर्भ में यह एक नैरेटिव टाईप है।
अब इसके साथ ही यह देखना प्रासंगिक हो जाता है कि व्यास ने स्वयं जय के विषय में क्या कहा?
1. सौति की ही गवाही पर कहा कि-
कृतं मयेदं भगवन काव्यं परमपूजितम्।12
व्यासजी ने जो परिकल्पना अपने मस्तिष्क में बना रखी थी उसको काव्य की संज्ञा दिया, और उस काव्य में किन-किन अंगों-उपांगों की चर्चा होगी उसकी भी सूचना दिया।
2. व्यास की अपनी उक्ति के बाद ब्रह्मा ने कहा कि-
त्वाया च काव्यामित्युक्तं तस्मात् काव्यं भविष्यति।13
जिसे आपने काव्य की संज्ञा दिया है वह काव्य नाम से ही प्रसिद्ध होगा।
अतः यह व्यास का नैरेटिव टाइप है जिसको ब्रह्मा के द्वारा प्रामाणिकता प्राप्त होती है।
अतः निष्कर्ष में कहा जा सकता है कि सौति ने शौनक के आश्रम में दो नैरेटिव टाइप की चर्चा की। तो इस आधार पर भी कहा जा सकता है कि जय, भारत और महाभारत तीनों ही अलग-अलग नैरेटिव हैं और तीनों ग्रंथ एक खास प्रकार के नैरेशन मोड को प्रस्तुत करते हैं।
3.
किसी भी घटना या प्रसंग का आख्यान/Narration/ नैरेशन स्वयं में कुछ भी नहीं होता, बल्कि वह आख्यानकर्त्ता/Narrator के मनस में विन्यसित कथा सूत्रों का पाठात्मक परिवर्तन या श्रुत्यात्मक परिवर्तन होता है। इसलिए कहना अप्रासंगिक नहीं है कि आख्यान आख्यानकर्त्ता का ही बोधात्मक प्रतिफलन है। आख्यान की संरचना (Structure of Narration) आख्यानकर्त्ता के मूड पर आश्रित होता है। आख्यानर्त्ता का मनोविज्ञान (Psychology of Narration) आख्यान का ही मनोविज्ञान (Psychology of Narration) होता है। जिस प्रकार व्यक्ति के बदलते ही उसकी भूमिका, सन्दर्भ और सोच विचार की प्रक्रिया बदल जाती है ठीक वैसे ही नैरेटरर्स के बदलने पर नैरेशन का पूरा सन्दर्भ, व्याख्या और विमर्श सब कुछ बदल जाता है।
इस तर्क के आधार पर यह देखा जा सकता है कि व्यास, वैशम्पायन और सौति (उग्रश्रवा) की भूमिकाएँ बिल्कुल अलग-अलग हैं।
जैसे- (1) श्रीकृष्णद्वैपायन - की मनोभूमिका और मूड बाद के आख्यानकर्त्ताओं से बिल्कुल अलग होगा क्योंकि ये महाभारत की घटना में शामिल भी हैं। उस घटना का आरम्भिक सूत्र व्यास से ही आरम्भ होता है।
अतः व्यास पहले महाभारत की घटना का संरचनात्मक अंग हैं, तो बाद में उस घटना को बाहर से देखता हुआ प्रत्यक्षदर्शी। घटना में शामिल इस अर्थ में है कि इस कुरुवंश की आधारशिला में वंश परम्परा को आगे बढाने का कार्य स्वयं व्यास ने ही किया-
क्षेत्रे विचित्रवीर्यस्य कृष्ण द्वैपायनः पुरा।
त्रीनग्नीनिव कौरव्याञ्जनयामास वीर्यवान।।14
तो कुरुवंश की वंश परम्परा का वर्णन स्वयं व्यास ने किया। अतः वे महाभारत के सूत्र विन्यास में अहं भूमिका का निर्माण करते हैं। अतः उनका उस समय एक विशेष मूड रहा होगा। इसीलिए इस प्रसंग के आख्यान की विमर्श स्थिति भी अलग प्रकार की रही होगी। यहाँ विमर्श कहने का मेरा अभिप्राय यह है कि प्रत्येक आख्यान केवल कहानी नहीं होता, बल्कि वह अपने आप में एक प्रकार का विमर्श भी होता है।
2. वैशम्पायन - महाभारत की घटना की समाप्ति के बाद व्यास ने महाभारत के पाठ का निर्माण किया जो एक तरफ श्रुतिश्रव्य तो दूसरी ओर से चाक्षुष (लिखित) भी बनाया गया-
तेषु जातेषु वृद्धेषु गतेषु परमां गतिम्।
अब्रवीदं भारतं लोके मानुषेऽमन महानृषिः।।15
और इसके बाद परीक्षित के पुत्र जनमेजय की सभा में व्यास ने स्वयं वैशम्पायन को यह कथा कहने की आज्ञा दी थी। वैशम्पायन व्यास की परम्परा के कथावाचक और शिष्य हैं। महाभारत की घटना से इनका कोई सीधा सम्बंध नहीं है। वे व्यास की कथा के श्रोता हैं। अतः उनका मूड व्यास के मूड से अलग होगा, मनोदशा अलग होगी। तो कथा/आख्यान को कहने का तरीका भी अलग होगा। अतः कथा/आख्यान का विमर्श तमाम सचेतनताओं के विपरीत अलग होगा। वैशम्पायन कला का द्वितीयक श्रोता है। इसलिए आख्यान की अन्विति भी द्वितीयक होगी।
3. इसी प्रकार उस सभा में उपस्थित लोमहर्षण पुत्र उग्रश्रवा (सौति) विद्यमान है जिसने शौनक की सभा में वैशम्पायन द्वारा सुनाई गई कथा का पुनः व्याख्यान किया। व्यास उसी को कहा जाता है जो कि वेदों की व्याख्या प्रस्तुत करें या उसका विस्तार करे। व्यास (कृष्णद्वैपायन) स्वयं में एक Narrative थे। उन्होंने अपनी परम्परा में पाँच शिष्यों को दीक्षित किया था। सौति का भी महाभारत की घटना से कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है वह तो कथा का तृतियक श्रोता है। इसलिए वह मूड, सन्दर्भ, मनोदशा और मोड ऑफ नैरेटिव की प्रक्रिया में सबसे अलग होगा। इस प्रकार कथा आख्यान का विमर्श भी अलग होगा।
तो हम देखते हैं कि तीनो नैरेटर्स की भूमिकाएँ अलग-अलग हैं। ऐसे में एक ही विर्शात्मक आख्यान की कल्पना करना असंगत जान पडता है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी साहित्य की भूमिका में महाभारत क्या है? पर विचार करते हुए संकेत किया है कि- महाभारत को तीन बार तीन वक्ताओं ने तीन प्रकार के श्रोताओं के सामने सुनाया था।16
द्विवेदीजी के अनुसार भी यह प्रमाणित होता है कि तीन वक्ता हैं, लेकिन यहीं पर विचार करना आवश्यक है कि व्यास को छोडकर दो बार के वक्ताओं का सीधा सम्बम्ध महाभारत से नहीं है।
ठीक वैसे ही जनमेजय को छोडकर बाकी दो श्रोताओं का सम्बंध भी महाभारत की घटना से परोक्ष या अपरोक्ष रूप से नहीं है। अतः निष्कर्ष यह है कि व्यास (वक्ता) और जनमेजय (श्रोता) को छोडकर दोनों वक्ताओं और श्रोताओं की कथा कहने या सुनने की स्थिति ठीक वैसे नहीं रही होगी जैसा कि व्यास और जनमेजय की। अतः कथा नैरेशन में कईं अवश्य ही पडा होगा। इस प्रकार दोनों ही स्तरों पर नैरेशन में फर्क अवश्य ही आया होगा।
स्वयं शौनक आश्रम में उपस्थित ऋषियों के द्वारा प्रश्न किए जाने पर कि कुत आगम्यते सौते तो सौति ने जवाब में कहा कि-
जनमेजस्य राजर्षेः सर्पसत्रे महात्मनः17
अर्थात् वैशम्पायन जब ये कथा सुना रहे थे तब सौति श्रोता के एक में विद्यमान थे। और इसके अनंतर यह भी स्वीकार किया कि-
कृष्णद्वैपायन प्रोक्ताः सुपुण्या विविधाः कथाः।
कथिताच्चापि विधिवद्या वैशम्पायनेन वै।।18
उनको यह कथा वैशम्पायन ने सुनाई जो कि व्यास के द्वारा प्रोक्त थी। तो इन सन्दर्भों से सहज ही संकेत लिया जा सकता है कि सौति ने जिस कथा का नैरेशन किया, उसका श्रोत वैशम्पायन की कथा है न कि व्यास द्वारा सीधे तौर पर सुनाई गई कथा है।
इस प्रकार सौति की कथा का नैरेशन मोड (Mode of Narration) निश्चित रूप से परिवर्तित होगा और उसका विमर्श भी बदला होगा। हालाँकि दोनों वक्ताओं ने बार-बार इस बात को कहने का प्रयास किया कि हमने कथा को उसी रूप में व्यक्त किया है। सौति ने कहा कि-
महर्षे पूजितस्येह सर्वलोके महात्मनः।
प्रवक्ष्यामि मतं कृत्स्नं व्यासस्यामिततेजसः।।19
यहाँ भी यह कहा गया कि व्यास का मत कहूँगा। सौति ने वैशम्पायन को यहाँ परोक्ष कर दिया।
इन सभी परिस्थितियों को देखकर यह निःसंदेह कहा जा सकता है कि इन तीनो वक्ताओं ने तीन नैरेशन को प्रस्तावित किया। अतः किसी भी प्रकार से देखने पर यही प्रतीत होता है कि जय, भारत और महाभारत का पाठ तीन नैरेटर्स के पृथक-पृथक नैरेशन हैं। जो कि काव्य और इतिहास के रूप में हमारे सामने संकेतित हैं।
संदर्भ सूची
1. श्री डॉ. पं.श्रीपाद दामोदर सातवलेकर महाभारतः आदि पर्व, भूमिका, पृष्ठ संख्या - स्वाध्याय मण्डल पारडी, बलसाड, 1968
1 मैंने यहाँ भारतीय महाकाव्यात्मक आख्यान परम्परा इसलिए कहा कि रामायण और महाभारत जैसे काव्य अचानक नहीं निर्मित हो सकते। ये किसी सुदीर्घ परम्परा की परिणति हैं। महाभारत की बात करते समय अनेक स्थानों पर इस प्रकार के संकेत हैं कि उनसे किसी परम्परा का आभास होता है।
2 मैं बार-बार महाभारत की कथा को काव्य/इतिहास न कहकर आख्यान कर रहा हूँ, तो उसके पीछे एक व्याख्या है जो आगे सिद्ध की जाएगी।
2- Paul Bouissac, 'Encyclopedia of Semiotics' "Ronld Barths, 'Introduction to the structural analysis of narratives", pg. 245, Oxford University Press, 2007
3. सातवलेकर, महाभारतः आदिपर्व, श्लोक संख्या 24, स्वाध्याय मण्डल पारडी, प्रथम संस्करण संवत् 2025
4- Paul Bouissac, Encyclopedia of Semiotics Ronld Barths, 'Introduction to the structural analysis of narratives", pg. 246, Oxford University Press, 2007
5. आश्वलायन गृहसूत्र, - 3/4, निर्णय सागर प्रेम, बम्बई, 1894
6. सातवलेकर, महाभारतः आदिपर्व, श्लोक सं. 25, स्वाध्याय मंडल पारडी, प्रथम संस्करण संवत् 2025
7. सातवलेकर, महाभारतः आदिपर्व, भूमिका, महाभारत के संस्करण, पृ.7, स्वाध्याय मंडल पारडी, प्रथम संस्करण संवत् 2025
8. V. Vaidya, Mahabharat : A criticism, p. 1, A J Combridge & Co, Bombay, 1905
9. सातवलेकर, महाभारतः आदिपर्व, पृ.8, स्वाध्याय मंडल पारडी, प्रथम संस्करण संवत् 2025
10. वही, पृ. 8
11. सातवलेकर महाभारतः आदिपर्व, पृ. 6, स्वाध्याय मंडल पारडी, प्रथम संस्करण संवत् 2025
12. वही, पृ. 6
13. वही, पृ. 6
14. वही, पृ. 9
15. वही, पृ. 2
16. वही, पृ. 2 - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, हिन्दी साहित्य की भूमिका, पृ. 152, हिंदी ग्रंथ रत्नाकर कार्यालय, बम्बई, प्रथम संस्करण सन् 1940
17. वही, पृ. 2
18. वही, पृ. 2
19. वही, पृ. 5

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दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
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