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महादेवी के स्त्री-पात्रों में लोकतान्त्रिक चेतना

इन्दिरा डांगी
साहित्य में लोकतंत्र क्या है ?
लोकतंत्र की लोकप्रियता का यह आलम है कि तानाशाही भी किसी छद्म चुनाव का दुशाला ओढकर या किसी तरह के मत/प्रतिनिधित्व का प्रपंच रच अपने को लोकतंत्र कहने के मोह से बची नहीं रह पाती है। यह समय, काल, युग लोकतंत्र का युग है। सिर्फ राजनीतिक क्षेत्र में नहीं और सिर्फ आर्थिक दुनिया में नहीं, वरन शिक्षा के आचार्यकुलों से लेकर साहित्य के विमर्शों-वादों तक में लोकतंत्र सबसे बडी कसौटी भी है, मानक भी। तो साहित्य में लोकतंत्र क्या है? महादेवी के ही विशेष संदर्भ में समझें, तो शब्द अपव्यय से बच सकेंगे क्योंकि वे इसका सबसे बडा उदाहरण हैं कम से कम हिंदी साहित्य में अवश्य ही, मुझे यह दावा करने की अनुमति दीजिए, सो भी स्वर्णयुग कहे जाने वाले छायावाद के विशेष सन्दर्भ में तो अवश्य ही। जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और सुमित्रानंदन पन्त के सामने महादेवी को यदि हम खडा करते हैं, तो वे ही सर्वाधिक लोकतांत्रिक सिद्ध होती हैं। और इसके लिए बहुत प्रमाणों की भी कतिपय आवश्यकता नहीं है। प्रसाद, निराला, पन्त अपने काव्य और अपने गद्य में भी कहीं न कहीं प्रश्रय लेते दीख पडते हैं... कहीं वे अतीतगामी हैं, तो कहीं मायथॉलाजी की शरण में हैं; लेकिन महादेवी कहीं भी, कभी भी वर्तमान से पलायन करती नहीं दिखतीं, न अपने काव्य में और अपने गद्य में तो कदापि नहीं। वर्तमान में बने रहना ही पहला लोकतान्त्रिक मूल्य है, सूक्ष्मतम लोकतान्त्रिक चेतना है।
महादेवी के स्त्री पात्र :
लोकतंत्र समानता की बात करता है, स्वतंत्रता की बात करता है, अंतिम व्यक्ति के अधिकार की बात करता है और एक आम भारतीय घर की गृहणी से अधिक पीडित, शोषित, पराधीन, पददलित आपको ढूँढे नहीं मिलेगा। महादेवी लिखती हैं,
स्त्री के जीवन में राजनीतिक अधिकारों तथा आर्थिक स्वतंत्रता का अभाव तो रहा ही, साथ ही उसकी सामाजिक स्थिति भी कुछ स्पृहणीय नहीं रही। उसके जीवन का प्रथम लक्ष्य पत्नीत्व तथा अंतिम मातृत्व समझा जाता रहा, अतः उसके जीवन का एक ही मार्ग और आजीविका का एक ही साधन निश्चित था। यदि हम कटु सत्य सह सकें, तो लज्जा के साथ स्वीकार करना होगा कि समाज ने स्त्री को जीविकोपार्जन का साधन निकृष्टतम दिया है।1
लेखिका का मानस स्त्री को मनुष्य के रूप में देखता है न कि स्त्री-स्त्री के तौर पर जैसा कि पुरुष प्रधान सत्ता का एक खेल ठहरा मनोरंजन और मुनाफे का; महादेवी के मानस की यही लोकतान्त्रिक चेतना उनकी रचनाओं के स्त्री पात्रों में भी दृष्टिगोचर होती है।
सबिया उनका एक ऐसा ही पात्र है। अतीत के चलचित्र में संग्रहित रेखाचित्र सबिया में ऐसी ही एक नारी के जीवन की कथा है जो दलित भी है और स्त्री भी अर्थात् दोहरी शोषित; फिर भी वह एक सहृदय मनुष्य है। सबिया मेहतरानी का काम करती है। उसका पति एक-दूसरे मेहतर की पत्नी को लेकर भाग जाता है वो भी ऐसे समय में जबकि वह सौरी में थी। पति के इस तरह दूसरी स्त्री को लेकर गायब हो जाने के दुःख से वह बीमार पड गई। इसके चलते उसका काम भी हाथ से जाता रहा। उसके सिर पर अपनी नन्हीं बालिका, दूधमुँहे बालक और वृद्धा सास की जिम्मेदारी थी। वह महादेवीजी के पास आती है और निवेदन करती हैं कि वे उसको काम पर रख लें। महादेवीजी उसको काम दे देती हैं और इसी क्रम में जानती हैं कि सबिया का पति जिसकी पत्नी को लेकर भगा था उस जाति-भाई ने सबिया को अपनी पत्नी बनने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन सबिया ने उसको अस्वीकार कर दिया। अपने दोनों बच्चे और वृद्धा सास ही उसके जीवन की प्राथमिकता थे; जिनको पालने के लिए वह दिन-रात परिश्रम करती रहती है। सब उसके पति को भला-बुरा कहते रहते थे, लेकिन उसे उससे कोई शिकायत नहीं थी। यहाँ तक कि उसका पति सपत्नी को लेकर उसी घर में रहने आ जाता है। अपने पति के कहने पर वह खुद को बख्शीश में मिली नीली रेशमी साडी सपत्नी को दे देती है। इतना ही नहीं, सपत्नी को घर में रखने के लिए उसके पति मैकू को जाति भोज देना पडा, तो भी सबिया ने ही अपने बच्चों का पेट काटकर, अपने वेतन को पेशगी में लेकर और अपनी मृत मां की अंतिम निशानी रुपयों वाली हमेल बेचकर अपने पति को रुपये दिए।
महादेवी अत्यन्त सुन्दर शब्दों में लिखती हैं, मुझे जानना चाहिए था कि वह स्त्री कोई कर्तव्य स्वीकार करने के उपरान्त आनाकानी नहीं जानती।(2)
यही कर्तव्यपरायणता, यही वात्सल्य और सपत्नी के प्रति मानवीयता का बर्ताव उसके लोकतान्त्रिक मूल्यों का परिचायक है।
अतीत के चलचित्र में संग्रहित एक संस्मरण-रेखाचित्र है अभागी स्त्री जो अपेक्षाकृत कम चर्चित है। इस संस्मरण पर अवश्य बात की जानी चाहिए क्योंकि लोकतंत्र अंतिम व्यक्ति को भी सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार की बात करता है और ये संस्मरण भी। साधारण या निम्न जीवन में भी उच्च मानवीय मूल्यों का निबाह महादेवी के पात्रों की एक ऐसी विशिष्टता है जो उन्हें न सिर्फ सम्पूर्ण हिंदी साहित्य में महत्त्वपूर्ण बनाती है, बल्कि कालजयी भी बना देती है। अभागी स्त्री की नायिका भी उनकी एक ऐसी ही पात्र है। वह एक युवा लडकी है जिसने प्रेम विवाह किया है एक कुलीन युवक से किन्तु ससुरालवालों ने उसको स्वीकार नहीं किया क्योंकि समाज के अनुसार उसकी माँ कुलीन स्त्री नहीं है। प्रेम विवाह के बाद डेढ साल तक उसका पति बहुत बीमार रहता है और पति का इलाज करवाने में उसकी जमापूँजी से लेकर जेवर तक बिक जाते हैं। पति के इलाज के लिए धन की आवश्यकता है और कमाई का कोई जरिया नहीं। वह युवती महादेवीजी के पास आती है काम माँगने। महादेवीजी अब भला उसको काम दें भी तो कैसे; उसके साथ उसकी माँ के नाम का प्रवाद जुडा हुआ है और वे उसको अब अपने महिला विद्यापीठ में काम दें भी तो कैसे? वे लिखती हैं, वह क्या जाने कि उसकी उपस्थिति क्या-क्या अनर्थ कर सकती है? लेकिन फिर भी वे उसको काम देती हैं - कभी कोई ऐसा लेख नकल करने के लिए दे दिया, जिसके पृष्ठों का कोई उपयोग ही शेष न रहा था। कभी कोई ऐसा पत्र लिखवा दिया, जिससे रद्दी कागजों की टोकरी का ही गौरव बढता था। (3)
इस तरह जब वास्तव में कोई काम था ही नहीं, उसको रोजगार देने को और लेखिका मात्र दयावश कुछ आर्थिक सहायता करने के लिए उस युवती को कुछ भी व्यर्थ-सा काम दे रही थीं, तो वह युवती जल्द ही वास्तविकता जान गई और अपने स्वाभिमान के कारण वह बिना काम के कोई आर्थिक सहायता नहीं लेना चाहती थी, इसलिए चली जाती है और फिर काम माँगने नहीं आती। जब कई माह बीत जाते हैं, तो लेखिका को किसी से ज्ञात होता है कि इतनी सेवा और परिश्रम के बाद भी उस युवती का पति बच न सका था और पति की मृत्यु के बाद उसके ससुर ने उसको अपमानित किया था, जब वह निवेदन कर रही थी कि ससुराल में उसको रहने दिया जाए और वह नौकरों की तरह भी रहने और सबकी सेवा करने को तैयार है। यह सब जानकर लेखिका ने उसको खोजा भी लेकिन उसके बारे में ठीक-ठीक कुछ पता न चल सका। लेकिन समाज ने भले ही उसको कोई अवसर न दिया हो, वो एक सम्मानजनक जीवन जीने की कोशिश नहीं छोडती, यही उसके अन्दर की लोकतान्त्रिक चेतना है। उसके जीवन का श्रेष्ठ मानवीय मूल्य है। कई दिन बीत जाते हैं और तब एक दिन लेखिका को उसका पत्र मिलता है कि वह सिलाई-बुनाई का काम करने लगी है और आत्मनिर्भरता का जीवन जी रही है। यहीं आकर महादेवी के स्त्री-पात्र विशिष्ट हो जाते हैं। महादेवी की स्त्रियाँ न क्रूर व्यवस्था के सामने हारती हैं, न परिस्थितियों की दासी बन पतन के गर्त में गिरती हैं और न ही समाज नाम के सिस्टम से भागती हैं। वे इसी सिस्टम में अपने लिए स्पेस बनाती हैं और अपने सम्मान की रक्षिता स्वयं बनती हैं। वे आत्मनिर्भर हैं और उनमें मनुष्यता है।
बालिका माँ इसी पुस्तक का एक अन्य संस्मरण-रेखाचित्र है जो न सिर्फ नायिका वरन लेखिका के लोकतान्त्रिक दृष्टिकोण और वैश्विक जीवन दृष्टि का भी पता देता है। बिनब्याही माँ आज के इस उत्तर आधुनिक भारतीय समाज में भी एक चुनौती बन जाती है, समाज के लिए तब 1935 में क्या स्थिति रही होगी, हम सहज कल्पना कर सकते हैं। इस संस्मरण में महादेवी ने एक ऐसी बलिका की जीवनगाथा लिखी है जिसका बालविवाह हुआ था। जब वह आठ वर्ष की थी उसके माता-पिता चल बसे और जब ग्यारह वर्ष की थी तब वह बाल विधवा हो गई। जीवन के सहज विकास में उसको किसी से प्रेम हो गया और वह गर्भवती हो गई। लेकिन उसका प्रेमी उसको अपनाने के बजाय धोखा दे गया। अब वह एक बच्चे की माँ बन जाती है। बालिका के दादाजी लेखिका के पास पहुँचकर निवेदन करते हैं कि वे एक बार चलकर उनकी पोती से मिल लें। महादेवी के पात्रों में कितने गहरे तक लोकतान्त्रिक चेतना व्याप्त है ये उनकी रचनाओं को पढकर ही जाना जा सकता है; इस विधवा बालिका माँ का परिवार उसकी हत्या नहीं करता है और न ही उसकी अवैध संतान की हत्या करता है। आज हम आए दिन अखबारों में पढते हैं किस तरह पोलीथिन में भरकर, कपडे में लपेटकर नवजात शिशुओं को कभी नालों, कभी तालाबों, तो कभी झाडियों में फेंक दिया जाता है जहाँ चूहे, चीटियाँ या कुत्ते उन्हें टुकडे-टुकडे कर खाते रहते हैं। प्रश्न यह उठता है कि यह कैसा समाज है ? कैसे सामाजिक नियम हैं कि हम अपने ही बच्चों को जीने की जगह नहीं देते ? वैध-अवैध की परिभाषाओं ने सदियों से नवजात शिशुओं का गला घोंटा है, उनकी हत्या की है। बालिका माँ के वृद्ध पितामह के जीवन मूल्य यहाँ उल्लेखनीय हैं। इस परिवार ने न विधवा-प्रेमिका माँ की हत्या की है, न उसके नवजात की। यह है महादेवी वर्मा के पात्रों की लोकतान्त्रिक चेतना जो विरल है, विराट है, वैश्विक है। इस संस्मरण में आगे यह होता है कि परिवार लोकलाज के डर से बालिका माँ और उसके नवजात को नहीं रख सकता और बालिका माँ हर हाल में अपने बच्चे के साथ है। इस बिन्दु पर तनिक ठहरें। एक बाल विधवा, प्रेमी द्वारा छोडी गई नवयुवती अपने नवजात शिशु का साथ किसी भी तरह नहीं छोडना चाहती; ये स्त्री-शक्ति का कितना बडा उदाहरण है। आज इस विषय पर लेख लिखे जा रहे हैं, नाटक और फिल्में बन रहीं, लेकिन पराधीन भारत में, जबकि स्त्रियों को शिक्षा तक सरल-सुलभ न थी, ये साहस कितना महत्त्वपूर्ण, कितना बडा लोकतान्त्रिक मूल्य है कि पूरे संसार का सामना करके भी बालिका माँ अपने बच्चे से उसके जीने का हक नहीं छीनना चाहती। इस बालिका माँ और उसके नवजात शिशु को संस्मरण की लेखिका महादेवी अपना लेती हैं। यहाँ देखिए, क्योंकि वे आत्मनिर्भर हैं, सही अर्थों में आधुनिका हैं और मानवीय मूल्यों के प्रति दृढ प्रतिज्ञ हैं, वे उस बालिका माँ और उसके बच्चे को अपना लेती हैं।
-पर 27 वर्ष की अवस्था में मुझे 18 वर्षीय लडकी और 22 दिन के नाती का भार स्वीकार करना ही पढा।(4)
इस रेखाचित्र-संस्मरण में हमें लेखिका के विराट व्यक्तित्व का भी परिचय मिलता है जो कि
उनकी अन्य रचनाओं में भी हम पाते हैं और चकित हो-हो जाते हैं कि उस समय में इतनी आधुनिक सोच वाली लेखिका और स्त्री का होना भी संभव हुआ था।
भक्तिन महादेवी के एक प्रसिद्ध रेखाचित्र-संस्मरण का नाम है। भक्तिन उनकी सेविका का नाम था और उसका वर्णन उनकी अन्य रचनाओं में भी यत्र-तत्र आया है। यह संस्मरण महादेवी के संस्मरण-रेखाचित्र गिल्लू गिलहरी या चीनी फेरीवाला की ही तरह अत्यंत प्रसिद्ध है। लछमिन (भक्तिन नाम उसे महादेवी जी ने दिया था) का विवाह पाँच वर्ष की अवस्था में कर दिया गया और विमाता ने नौ वर्ष की बालिका का गौना कर दिया। उसके पिता की मृत्यु की सूचना तक उसे समय पर न भेजी विमाता ने; इस प्रकार मायके में अब उसका कोई न था। ससुराल में उसको अटूट काम करना होता था। तीन पुत्रियों की माँ बन जाने के कारण ससुरालवाले उसको अनेक तरह से प्रताडित और लांछित करते थे। वह पति और बच्चियों को लेकर ससुराल से अलग हो गई, लेकिन विधि को उसका सुख बहुत दिन मंजूर न था सो उन्तीस वर्ष की अवस्था में वह विधवा हो गई। भक्तिन की जमीन-जायदाद पाने को ललचाए जेठ-जिठौती ने उसका उसका दूसरा विवाह करवाना चाहा, लेकिन भक्तिन का जो उत्तर था वह यहाँ उल्लेखनीय है, हम कुकरी-बिलारी न होएँ, हमार मन पुसाई तौ हम दूसरा के जाब नाहिं त तुम्हार पचै के छाती पै होरहा भूँजब और राज करब, समुझे रहौ।(5)
एक अशिक्षित स्त्री अपना दूसरा विवाह करने-न-करने का निर्णय स्वयं ले रही हैं और कह रही है कि वह कोई कुत्ती-बिल्ली नहीं है और उसका मन होगा तो ही वह विवाह करेगी नहीं तो नहीं करेगी। यह व्यक्तित्व की स्वतंत्रता और समानता ही उसकी लोकतान्त्रिक चेतना है। आगे अपना पूरा ही जीवन लछमिन अर्थात् लक्ष्मी ने इसी दृढता के साथ बिताया। उसकी बडी बेटी जब विधवा होकर लौट आई, तो संपत्ति के लालची रिश्तेदारों ने नई साजिश रची। क्योंकि बाहर के बहनोई का आना चचेरे भाइयों के लिए सुविधाजनक नहीं था, अतः विधवा बहन के गठबंधन के लिए बडा जिठौत अपने निकम्मे साले को बुला लाया। एक साजिश के तहत इस युवक ने अकेली पाकर अहीर की बेटी के साथ कोठरी की कुण्डी अंदर से बन्द कर ली और उसके समर्थक गाँववालों को बुलाने लगे। युवती ने उसकी खूब पिटाई कर दी थी फिर भी पंचायत ने दोनों को समान दोषी माना और दोनों के विवाह का आदेश दिया। निकम्मे दामाद के आने के बाद पूर्व-सी सम्पन्नता न रही और पारिवारिक कलह में सब बर्बाद होने लगा। यहाँ तक कि जमीन का लगान अदा करना भी जब कठिन हो गया, तो कर्मठ लछमिन ने शहर जाकर कमाई करने के लिए घर से बाहर कदम निकाले। यों वह महादेवीजी की सेवा में आ गई जिन्होंने उसका नया नामकरण भक्तिन कर दिया। महादेवी उसे नौकर नहीं मानती वरन परिवार के सदस्य की भाँति समानता का अधिकार प्रदान करती हैं। इस प्रकार इस रेखाचित्र में जो दो मुख्य नारी पात्र हैं। एक तो रेखाचित्र की नायिका भक्तिन और दूसरी स्वयं लेखिका महादेवी, वे दोनों ही लोकतान्त्रिक चेतना की वाहक हैं।
एक अत्यंत मार्मिक चरित्र है बिबिया का। यह रेखाचित्र-संस्मरण स्मृति की रेखाएँ में संकलित हैं। लेखिका सही ही लिखती हैं उसके बारे में सुडौल गठीले शरीरवाली बिबिया को धोबिन समझना कठिन था; पर थी वह धोबिनों में भी सबसे अभागी धोबिन।(7)

बिन माँ-बाप की इस कन्या का विवाह पाँच वर्ष की अवस्था में ही कर दिया गया। यह विवाह उसके जन्म से भी पहले तय कर दिया गया था। गौना होने से पहले ही वह विधवा हो गई। भाई ने उसके लिए दूसरा जो वर ढूँढा वो शराबी और जुआरी था। बिबिया उसके साथ भी किसी तरह निर्वाह करने लगी, लेकिन जब उस तक यह समाचार पहुँचा कि उसका पति रमई किसी दिन उसे जुए में दाँव पर लगा सकता है और उसके साथी उसे इसके लिए भडकाते हैं, तो बिबिया ने इसका प्रतिरोध किया फलस्वरूप उसके शराबी-जुआरी पति ने उसे घर से बाहर निकाल दिया। पुरुष सत्ताप्रधान पंचायत ने भी पति के ही पक्ष में फैसला दिया। बेचारी बिबिया अपने भाई के घर लौट आई। अब वह पहले से चौगुना काम करती। उसके भाई ने एक बार फिर उसका घर बसा देने का प्रयास किया और इस बार एक विधुर अधेड और पाँच बच्चों के बाप को उसके लिए चुना। बिबिया ने बहुत विरोध किया। बहुत रोई-गिडगिडाई, लेकिन जबरन उसका विवाह कर दिया गया। उसके पति झनकू की दो पत्नियाँ मर चुकी थीं और अब उसका गाँव में एक स्त्री से अवैध सम्बन्ध था। बिबिया को पत्नी बनाकर वह सिर्फ इसलिए लाया था ताकि घर के छोटे बच्चों की देखभाल हो सके। बिबिया ने इस गृहस्थी में भी निर्वाह कर लिया था और सवेरे से आधी रात तक घर के कामों में लगी रहती; परन्तु दुर्भाग्य ने यहाँ भी उसका पीछा न छोडा; झनकू का सबसे बडा बेटा जो उम्र में बिबिया का हमउम्र या उससे बडा ही था, अपने ननिहाल से लौट आया। वह लडका भीखन आवारा और चरित्रहीन था जो विमाता बिबिया से छेडछाड करने लगता है। बिबिया ने चूल्हे से जलती लकडी खींचकर उसको बता दिया कि वह अपनी सीमा में रहे। भीखन ने इसे अपना अपमान समझा और वो समाज के सामने एक झूठ फैलाने लगा कि उसके और विमाता के अवैध सम्बन्ध हैं। जब यह बात पिता झनकू तक पहुँची, तो उसके सामने भी पुत्र भीखन ने यही झूठ बोल दिया। बिना बिबिया का पक्ष जाने-पूछे पति झनकू उसे लात, घूँसे, थप्पड, लाठी से मारते-मारते थक गया, तो देहरी के बाहर धकेलकर उसके लिए अपने घर के दरवाजे हमेशा के लिए बन्द कर लिए। बिबिया अन्धकार में गिरती-पडती, रोती-कराहती अपने मायके लौट आई। पुरुषप्रधान पंचायत ने भी बिबिया को ही दोषी माना। बिबिया की दादी भी अब मर चुकी थी। उसका भाई कन्हई उसे घर से नहीं निकाल सका, तो इस कारण उसका हुक्का-पानी पंचायत ने बन्द कर दिया था। भाभी के ताने बिबिया को दिन रात सुनने पडते। हारकर बिबिया ने किसी एक दिन यमुना में अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। बिबिया एक अच्छी मनुष्य थी, कर्मठ नागरिक थी, स्वभिमानिनी स्त्री थी और एक ईमानदार, सच्चे इन्सान की तरह अपना जीवन बिताना चाहती थी लेकिन व्यवस्था ने, समाज ने उस अभागिन को जीने भी न दिया। इस संस्मरण-रेखाचित्र में हमें लेखिका महादेवी बिबिया के साथ खडी दिखती हैं और बिबिया समाज की वो शोषित, दलित, अंतिम व्यक्ति है जिस तक न्याय पहुँचाने की बात महात्मा गाँधी करते हैं।
उपसंहार -
इस प्रकार हम देखते हैं कि महादेवी वर्मा के संस्मरणों-रेखाचित्रों में जो स्त्री-पात्र हैं, वे लोकतान्त्रिक चेतना के संवाहक हैं। वे अति साधारण और अभावों भरा जीवन जीते हुए भी उच्च मानवीय मूल्यों और लोकतान्त्रिक जीवन दृष्टि रखते हैं। इन पात्रों को रचने में लेखिका ने जिस वैश्विक, मानवीय, लोकतान्त्रिक दृष्टि, करुणा और संवेदना का प्रयोग किया है, वही है जो उन्हें अंतर्राष्ट्रीय लेखिका बनाती है। और हाँ, इतनी प्रतिभाशाली अंतर्राष्ट्रीय लेखिका हिंदी साहित्य की मुख्य धारा में उनके बाद कम-से-कम आज दिनांक तक तो कोई दूसरी नहीं हुई है।
सन्दर्भ -
1। पेज नंबर 66, हिन्दू स्त्री का पत्नीत्व, श्रृंखला की कडियाँ, लोकभारती पेपरबैक्स, पंचम् संस्करण, 2019
2. पेज नंबर 42, सबिया, अतीत के चलचित्र, लोकभारती पेपरबैक्स, चतुर्थ संस्करण, 2019
3. पेज नं-69, अभागी स्त्री, अतीत के चलचित्र, लोकभारती पेपरबैक्स, चतुर्थ संस्करण, 2019
4. पेज नंबर-55, बालिका माँ, अतीत के चलचित्र, लोकभारती पेपरबैक्स, चतुर्थ संस्करण, 2019
5. पेज नंबर-11, भक्तिन, स्मृति की रेखाएँ, लोकभारती प्रकाशन, पंचम पेपरबैक्स संस्करण, 2017
6. पेज नंबर 85, बिबिया, स्मृति की रेखाएँ, लोकभारती प्रकाशन, पंचम पेपरबैक्स संस्करण, 2017

सम्पर्क - इन्दिरा दांगी
9179131980