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कृषक आन्दोलन और राजनीतिक द्वंद्व

कुँवर प्रांजल सिंह
राजनीतिक दायरे के रूप में कृषक आन्दोलन के द्वारा निर्मित किए गए राजनीतिक विन्यास को किस प्रकार समझा जाए, यह इस लेख का मूल सवाल है। इसके लिए इस लेख में, उत्तर प्रदेश में, सन 1920 के दशक से 1940 के दशक के बीच की राजनीतिक उथल-पुथल को ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के तौर पर इस्तेमाल किया गया है। इस पृष्ठभूमि को चुनने का कारण यह है कि इस दौर में पूर्वी उत्तर प्रदेश की जनता अपनी राजनीतिक भागेदारी के स्वर खुद निर्मित करने लगी थी। राष्ट्रीय आन्दोलन के बीच यह बात और भी मशहूर होने लगी कि जिस जनता का जिक्र राष्ट्रवादी आख्यानों में आता रहता है, वह बात अब बामुलाहिजा नहीं कही जा सकती क्योंकि सबाल्टर्न केवल औपनिवेशिक कानूनों के चंगुल का ही विरोध नहीं कर रहे थे, बल्कि जमीदार, साहूकार और महाजनी व्यवस्था का भी तखता पलट करने के लिए तैयार थे। और अब कृषकों का संघर्ष सिर्फ जमीदारों के खिलाफ ही नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय आन्दोलन के समक्ष चिंता का विषय बना हुआ था। इसके साथ ही पूर्वी उत्तर प्रदेश, कस्बा एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक दायरे के रूप में उभर कर सामने आया जहाँ जमीदार औपनिवेशिक प्राधिकार के पर्याय के रूप में काम करता था। मुबारकपुर (आजमगढ) के कस्बे में कृषकों के जीवन और जुलाहों से कर वसूली का काम जमीदारो के द्वारा ही संपन्न होता था। इस जमीदारी की ऐतिहासिक स्मृति को खँगाला जाए, तो शक्ति को संतुलित और स्थानीय स्तर पर संचालित करने का मुख्य कार्य इन्हीं वर्गों के हाथ में देखा जा सकता है। यहाँ इस बात का विशेष उल्लेख करना आवश्यक भी है कि औपनिवेशिक भारत में सत्ता और हैसियत का संघर्ष इस कदर चला कि स्थानीय हुनर को खेतिहर मजदूर के रूप में परिवर्तित किया जाने लगा जिसके लिए जमीदार और औपनिवेशिक प्रभुत्व आमजन के खिलाफ खडा होता था। ज्ञानेद्र पाण्डे का मानना है कि औपनिवेशिक भारत में सत्ता और हैसियत का संघर्ष सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में औपनिवेशिक राज्य के द्वारा लाए गए परिवर्तनों से बढता चला गया जिसके मूल में दो स्पष्ट कारण थे एक, मशीनों का आगमन और दूसरा, राजकीय संरक्षण का ढुलमुल रवैया, जिसके कारण बाजारों से उनका रिश्ता निरन्तर टूटता चला गया। इसे हम लखनऊ, बनारस, मुबारकपुर, टांडा जैसे कपडा उत्पादन के बडे केंद्र में रह रहे जुलाहों और धागा कातने वालों के धंधे में आए उतार- चढाव से समझ सकते हैं। अब इन बुनकरों के पास खेतों में मजदूरी करने जैसे अपरिचित कामों को करने के सिवाय कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था। सम्मान जनक दिन देख चुके ये दस्तकार औपनिवेशिक व्यवस्था में बेकार हो गए जिसका परिणाम यह हुआ कि वे छोटे और बडे शहरों तथा कस्बों में होने वाले विद्रोहों के प्रमुख भागीदार बन कर उभरे। इसके मूल में सिर्फ इनकी रोजी- रोटी छिन जाना भर नहीं था, बल्कि उनके रोजमर्रा की जिंदगी में मान, सम्मान और गरिमा का भी छीन लिया जाना एक प्रमुख कारण था।
यही प्रक्रिया जब इन्हें कृषकों के रूप में निर्मित करती है और आन्दोलन का भागीदार बनाती है, तो इनके लक्ष्य में राष्ट्र की कल्पना से ज्यादा इनकी स्वायत्ता की राजनीति शामिल होती है। मुख्यधारा की राजनीति जिसका सीधा सम्बन्ध राष्ट्रवाद से था और इसके लिए स्थानीय नेताओं को आधार के तौर पर देखा जा रहा था, जिससे कांग्रेस संगठनात्मक तौर पर मजबूत हो सके और एक राष्ट्र के रूप में उसकी दावेदारी को वैधता भी मिलती रहे। ऐसे में कृषकों को एक ऐसा राजनीतिक दायरा प्रदान करने की आवश्यकता भी महसूस की गयी जिससे उनको यह अहसास हो सके कि राष्ट्रवाद की निर्मिति में उनकी भी भूमिका शामिल है ।
इसी दौर में मदन मोहन मालवीय अपने एक लेख भारतवासी और देशभक्ति में सरकार को यह समझाने की कोशिश कर रहे थे कि सुशासन के लिए प्रजा को विवादों में शामिल किया जाना चाहिए। जहाँ प्रजा को यह एहसास हो कि वह राज्य के सामने अपनी बातों को रख सकती है। यद्यपि किसान सभा के निर्माण से यह माना जाने लगा कि किसानों के एक राजनीतिक दायरे का निर्माण हुआ है और उनके स्वर को मुख्यधारा की राजनीति से जोडा जा सकता है। वास्तव में किसान सभा में किसानों ने अपनी राजनीतिक चेतना को जुलूस, आम सभा और स्थानीय संघर्षों के रूप में अभिव्यक्त किया तो लेकिन इस राजनीतिक कार्रवाही को गैर- संसदीय ही समझा और देखा गया।
जिसे शोध में असंगठित राजनीतिक कार्यवाही माना जाता रहा है। क्योंकि इनकी भूमिका को राजनीतिक तौर पर इतेमाल तो किया जाता रहा है, लेकिन उसका कलेवर हमेशा कांग्रेस अपने छतरी के नीचे ही रखती थी और साथ ही किसानों को अलग पहचान देने और उनके आन्दोलन को अलग से देखने की गुंजाइश को भी खत्म करने का प्रयास करती थी। यहाँ स्वामी सहजानंद के द्वारा लिखा गया एक लेख किसानो के दोस्त और दुश्मन का एक हिस्सा प्रासंगिक होगा -
जो लोग अंग्रेजी सरकार से लडने और लडाना चाहते है उन्हें जमीदारों के खिलाफ लडने में जो आनाकानी होती है, वह हमारी समझ में नहीं आती। आमतौर पर देहाती इलाकों में अंग्रेजी सरकार का कही पता नहीं रहता मगर जमीदार सरकार तो हर गाँव में विराजमान है जो किसानों और गरीबों का शोषण और उत्पीडन सैकडों प्रकार से करती रहती है। फलतः इस शत्रु का अनुभव किसान बराबर करता रहता है। जिसको समझने की आवश्यकता है जो लोग इस बात को नहीं समझते हैं या इस बात को लेकर आश्चर्य चकित होते है। जहाँ जमीदार जूते की काटी की भाँति चुभते रहते हैं।
सहजानंद के इस वाक्य से समझा जा सकता है कि कृषकों का प्रतिशोध जिस सरकार से होता है, वह जमीदार के रूप में उनके समाने है। इससे राज्य के नजरिये का आकलन भी समाने आता है जहाँ राज्य निम्नजनों को देखने और उनके साथ व्यवहार करने में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं करती है। सहजानंद के द्वारा प्रयोग किया शब्द सरकार राज्य के नजरियों को खोल देता है। सरकार एक ऐसे समान पद का रूप धारण कर लेता है जिसका सीधा सम्बन्ध शक्ति हासिल करने से था। इस शक्ति के संघर्षों को बनाने में निम्नजन की भूमिका को नजरअंदाज करना एक आवश्यक पहलू के रूप में सामने आया। इसके लिए आवश्यक है कि कृषकों के राजनीतिक क्षेत्र की चेतना को राजनीतिक दृष्टिकोण से परखा जाए। जब कृषकों ने अपनी पब्लिसिटी अख्तियार की और सार्वजनिक रूप से राष्ट्रीय आन्दोलन के सिद्धान्तों से बाहर निकलने की कोशिश की उस समय पैदा होने वाले तनाव और अप्रत्याशित माहौल का राजनीतिक अभिप्राय क्या था? इसी के साथ यह भी नत्थी है कि पूर्वांचल में भीड कहे जाने वालों की ज्यादा संख्या कृषकों की पृष्ठभूमि से ही आती थी। रही बात राजनीतिक दायरे की तो वहाँ शोषण और स्थायी स्वार्थ यह कृषकों के चेतना के समान्तर खडे रहे। हमेशा राष्ट्रीय नेतृत्व ने इस बात पर जोर देते है कि प्रत्येक व्यक्ति के शरीर की रक्षा की पूरी गारंटी होगी, लेकिन इसके पीछे जो तर्क थे वह व्यक्तिगत सम्पति पर कोई धावा न बोले प्रत्युत उसकी कदर करें ऐसा प्रबन्धन भी चाहिए।
गौरतलब यह भी है कि किसान सभा कृषकों की राजनीतिक जमीन तैयार करने में किस प्रकार का रवैया रखती थी? मुख्यधारा की राजनीति से यह किस रूप में भिन्न है, यह देखना भी दिलचस्प होगा । हम यहाँ किसानों को संबोधित करने वाली नियमावली को साझा करते हुए इस प्रश्न का विश्लेषण करेंगे। पहली नियमावली अवध के किसान विद्रोह की है जिसे गाँधी के मार्गदर्शन में बनाया गया था। जिसमें कुल 14 सूत्रीय आदेश थे। 1921 की फरवरी में संयुक्त प्रान्त आने पर गाँधी ने प्रांत के कृषकों को निम्नलिखित निर्देश दिए। इस निर्देश के साथ उन्होंने यह भी संलग्न किया कि यदि हम इन नियमों को नहीं मानते है, तो हमें स्वराज्य नहीं मिल सकता और न ही हमारे दुःख तकलीफ दूर हो सकते हैं। यह नियम कुछ इस प्रकार थे -
1. हमें किसी को मारना नहीं चाहिए और न लाठी
चलाना चाहिए । हमें न ही किसी को गाली
देनी चाहिए और न ही किसी के साथ जबरदस्ती
करनी चाहिए ।
2. दुकान नहीं लूटना चाहिए
3. जो हमारा कहा न माने, उसको मोहब्बत से
अपनाना चाहिए। उसके खिलाफ शारीरिक
ताकत का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए न ही
उसे पानी देना या नाऊ और धोबी की सेवा
रोकना चाहिए।
4. सरकार और जमीदारों का पोत और लगान
नहीं रोकना है और न ही बंद करना है ।
5. जमीदार यदि दुःख दे, तो संयुक्त प्रांतीय किसान
सभा के सभापति पंडित मोतीलाल नेहरू को
खबर देना है जो कुछ कहें, वैसा ही करना है।1
6. याद रखना कि जमीदार को भी हमें मित्र बनाना
है ।
7. इस समय हम सविनय अवज्ञा का आरम्भ नहीं
चाहते, इसलिए सभी सरकारी आज्ञाओं का
पालन करना है।
8. घर-घर में चरखा चलाना और दूसरों कामों में
जितना समय बचे, वह सभी स्त्री पुरुष को
सूत कातने में लगाना चाहिए। लडके और
लडकियों को भी सूत कातना और कम से
कम चार घंटे रोजाना सूत कातने के लिए
प्रोत्साहित करना चाहिए ।
9. अपने झगडे का फैसला अदालत में न करके
पंच की मार्फत तय करना।
यह निर्देश खासतौर पर अवध के किसानों को दिए गए थे जिन्होंने जमीदार और फिरंगी तन्त्र के खिलाफ हिंसक कार्यवाही को अंजाम दिया। यह निर्देश केवल गाँधी के सिद्धांत को नजर में रख कर नहीं दिए गए थे, बल्कि कांग्रेस की संगठनात्मक चिंता के समक्ष उठ रही किसानों की चुनौतियों को ध्यान में रख कर भी दिए गए थे। जाहिर है कि यह सारे नियम अहिंसा के धरातल पर ही सृजित किए जा रहे थे जिससे गाँधीवादी सिद्धांत की प्रासंगिकता को बनाये रखा जाए। लेकिन अपनी प्रासंगिकता को बनाये रखने की प्रक्रिया में किसानों की संगठित शक्ति पर ही गाँधी ने खुद प्रहार कर दिया। उपरोक्त नियम में प्रयोग किये गए शब्दों पर गौर करें। हम और हमारा शब्द का प्रयोग कृषकों की भूमिका को लेकर एक विरोधाभास बनता है। 1920 और 40 का दशक इस बात के लिए भी जमानतदार है कि कृषकों ने स्वयं भी राष्ट्रवादी पैराडाइम में सवालिया निशान लगाना शुरू कर दिया था। कृषकों को जब यह महसूस हुआ कि राष्ट्रीय भाषणों में प्रयोग किया गया शब्द हम या जनता में उसका हम या जनता की जो कल्पना की जा रही थी, उसमें वे शामिल नहीं है । यहाँ नैन्सी फ्रेजर द्वारा उठाए गए सवाल भी महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं कि राष्ट्रवादी लामबंदी के लिए, निर्मित किये जा रहे सार्वजनिक दायरे में सबाल्टर्न जनता को किस प्रकार संगठित किया जा रहा था। क्या राष्ट्रवादी विमर्श ने ऐसे समान्तर क्षेत्र निर्मित किए जहाँ सबाल्टर्न अपनी अस्मिता, अपने हितों, अपनी आवश्यकताओं का दावा पेश कर सके? इसके लिए नियम 5 पर एक बार फिर ध्यान दीजिए। कृषकों के उत्पीडन के मायने को गाँधी के आन्दोलन में कितना तरजीह दिया जा रहा है, इसका आकलन साफ हो जाता है। कृषक विद्रोह के रास्ते को उस समय चुनता है जब गाँधी के सिद्धांत को दुनिया में साकार करने का जिम्मा उन जमीदारो को सौंपा गया जो तथाकथित रूप से कांग्रेस के सदस्य की भूमिका निभा रहे थे। यह नियम और आदेश कृषकों और कांग्रेस के बीच भरोसे को लेकर निर्मित किया जा रहा था। अवध प्रान्त में इस नियम का प्रचार गाँधी को महात्मा के रुप मे उनके आदर्श का पालन करते हुए प्रसारित किया गया। रही बात कृषकों के राजनीतिक लोकवृत की तो उसे किसान सभा के रूप में परिभाषित किया जा रहा था। इसके द्वारा बताये गए किसानों के नियमों को भी यहाँ शामिल करते हुए किसानों की राजनीतिक भागेदारी का आकलन किया जाएगा।
1. हम किसान सच बोलब, झूठ न बोलब, दुःख
के बात सच सच कहब
2. हम कहूँ के मार गारी न सहब, हम कहूँ पर
हाथ न छोडब लेकिन जब केहू जिलादार बा
सिपाही मारी बदे हाथ उठाई उनकर दस पाँच
जने मिल केहू हाथ पकड लेब। जब केहू गारी
देई हम सभन मिलकर माना करब अगर न
मनिहै तो पकीर के अपने ठकुरे के पास ले
जाब ।
3. खेत के लगान ठीक बढत पर भुगतान करब,
लगान के रसीद जरूर लेब । आपन गाँव भर
मिलके ठकुरे इहाँ जायके लगान देब ।
4. हथियार, घोडावन, मोटरवावन गैर कानूनी
टिक्स न देब। बेगार बिना मजूरी के न करब।
अगर कौनो किसान के ताल्लुकदार के सिपाही
पकिड है वो के गाँव भर मिल के छोडाय के
भोजन करब, पहिले नाही । उपरी पतई भुला
बाजार भाव से थोदिक कम भाव पर बेचव,
रुपया, लेब-देब
5. आपस में झगडा न करब और कबों जब झगडा
होय जाई, पंचाइत में तय कय लेब । हर गाँव
या दुई दुई चार चार मिलके पंचाइत बनाउब
और जौन कुछ झगडा, तकरार होई वोही में
तय कय लेब
किसान सभा द्वारा किसानों को बताए गए नियम गाँधी के आदेश से मिलते- जुलते हैं जहाँ गाँधी ने यह कहा की हमें जमीदारों को अपना मित्र बनाना है, वहाँ किसान सभा ठाकुर को अपनी स्वायत्ता सौंपने का नियम बना रही थी। इन दोनों नियमों की विरोधाभासी सूची को यहाँ साझा करने का मूल उद्देश्य यह है कि जब कृषकों ने सार्वजनिक राजनीति में अपनी हिस्सेदारी को सक्रिय करने की कोशिश की, तो सामाजिक संरचना और राष्ट्रीय राजनीति में आने वाली परिभाषा में उन्हें समाहित करने की कोई स्वतंत्र कोशिश नहीं की गयी जिसमें उनकी राजनीतिक अर्थवत्ता और भाषा बरकरार रहे। दरअसल, निम्नवर्गीय पब्लिसिटी से राष्ट्रीय राजनीति को अप्रत्याशित मान्यता मिली, लेकिन राजनीतिक दायरे में इनकी भूमिका ठाकुर और जमीदार के इशारों तक ही सीमित रह गयी। यहाँ यह भी ध्यान देना आवश्यक है कि किसान महासभा और कांग्रेस के मिलन से क्या नतीजे निकले? किसान सभा की गतिविधियों से राष्ट्रीय राजनीति में हलचल प्रारम्भ हो गयी थी। इसी अवसर पर इलाहाबाद में सप्तमी गंगा नहान था। इस मौके पर बाबा रामचन्द्र लगभग 500 किसानों के साथ इलाहाबाद पहुँचे थे। इस उम्मीद में थे की अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी बनारस की मीटिंग के बाद गाँधी यहाँ आएँगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसके लिए कांग्रेस के नेताओं से मिलने के लिए बाबा आनंद भवन पहुँचे, जहाँ उन्होंने शहरी कांग्रेसियों के सामने किसानों की हालत का विवरण दिया।। जून 1920 , संयुक्त प्रांत किसान सभा के अध्यक्ष पुरुषोत्तम दास टण्डन के अध्यक्षता में बाबा ने किसानों की समस्या और उनकी हालत को उनके सामने रखा, वहाँ जवाहर लाला नेहरु तथा गौरीशंकर मिश्र भी उपस्थित थे। कांग्रेस नेताओं ने मदद का भरोसा भी दिया। साथ ही जवाहरलाल नेहरु और गौरीशंकर मिश्र प्रतापगढ, जौनपुर गए। जिससे किसान सभा से जुडे नेताओं और कुछ किसानों को भी बल मिला। यही वह समय था जहाँ बाबा रामचन्द्र और राष्ट्रीय अगुवाई करने वाली कांग्रेस से किसान सभा को जोड दिया।
दूसरी तरफ, कांग्रेसी नेता अपने आदर्श और कृषकों की अराजकता के डर को लेकर चिंतित भी थे । कृषकों के भोलेपन के कारण उन्हें भीड भी समझा जाता था जिससे लोकमत और उच्च वर्गों के मत के बीच अक्सर टकराव होता था। इसके लिए कांग्रेस के स्थानीय परिप्रेक्ष्य का आकलन जरूरी हो जाता है । क्योंकि असंगठित राजनीतिक कार्रवाई कृषकों की प्रतिशोधिक चेतना का निर्माण बेहद निराले ढंग से किया गया । फकीर, बाबा, साधू और क्रांतिकारी योगी के रूप में सामने आए। यह वे वह नायक थे जो ग्रामीण कहानियों और कविताओं से निर्मित हुए थे जहाँ ग्राम्शी का मानना है कि राजनीतिक सभाओं में बोलते हुए बुद्धिजीवियों पर किसान विश्वास नहीं कर पाते थे। वे उनके वक्तव्य पर गहनता से सोचते थे, जिसकी चमक से वे कुछ देर के लिए प्रभावित या जाग्रत हो जाते थे । लेकिन शब्दों में जगायी गयी भावना जब शान्त होती थी, तब वे अपने आपे में आ जाते थे। जिसे नेताओं की भाषा का औसतपन और अपनी जिन्दगी से मेल मिलाप न होने की धारा के रूप में देखते थे। समय के साथ उन पर अविश्वास करने लगते थे। इसके लिए उनके लामबंदी की नयी प्रवृत्तियों की खोज जारी हो जाती थी। इसके लिए ग्राम्सी ने कृषकों और मजदूरों जैसे सबाल्टर्न वर्ग की वैचारिक आवश्कताओं पर ध्यान दिलाते है। इस दृष्टि में यह बात पता चलती है कि सामान्य जन के प्रचलित विचार अपेक्षाकृत सरल और अल्प संगठित होते है। हालाँकि उनकी प्रकृति अक्सर परस्पर विरोधी और उलझे हुए भी होती है। उनमें लोकवार्ताओं, मिथकों और रोजमर्रा के लोक प्रचलित अनुभवों का पंचमेल होता है; फिर भी उन विचारों का बहुत महत्त्व है। ऐसा इसलिए भी है कि व्यापक जन आन्दोलन के लिए ये बहुत कारगर होते है। इसका एक बडा उदाहरण पूर्वांचल के कृषकों के बीच लौंडा नाच प्रसिद्ध लोकसंस्कृति के रूप में सामने आता है। जिसमें कृषकों की समस्या और उनके जीवन में संगठन की क्या भूमिका है उस पर नाच हुआ करती थी। आजमगढ और बलिया के कृषकों के लामबंदी का यह नाच एक बडा तरीका भी था। जिसका एक संक्षिप्त बोल कुछ इस तरह है - केहू रखवाला नहीं तोर ऐ राम, जईबे कहाँ रे पवनवा ननननन, ना ना ना ना यहाँ राम का संबोधन कृषकों के लिए किया जा रहा था। और पवन हवा का पर्यावाची है जो कृषकों के लक्ष्यविहीन आन्दोलन को दर्शाता है । यह बात मुझे अपने फील्ड यात्रा के दरमियान आजमगढ मेहनगर के पास एक गाँव तिल्साव में असहयोग आन्दोलन में शामिल कुछ कृषकों के परिजनों से पता चला। जिसमे रामअवध नाइ, शंकर कहार मुख्य रूप से शामिल थे। ये वही लोग थे, जो थाली बाजा कर लौंडा नाच के लिए लोगों को जुटाने का कार्य करते थे। गाँव में भी ऊँची जाति के लोग इन्हें निम* दृष्टि से देखते थे। कृषकों के बीच इनकी लोकप्रियता शहरी कांग्रेसी नेताओं से ज्यादा थी। दरअसल, कोई भी कृषक यदि औपनिवेशिक कानून के हाथ चढ जाता था तो स्थानीय नेता उसे नजरंदाज कर देते थे। इसी प्रकार का एक विवरण 1919 की बलिया पुलिस अधीक्षक के सर्कुलर में मिलता है जहाँ बताया गया कि कृषक जमीदारों के प्रभाव में आने से इनकार कर रहे थे और वे औपनिवेशिक राज्य के कानूनों को भी तोडते हुए देखे गए। बलिया के रसडा के डिप्टी कलेक्टर के अनुसार एक बवाल किसान सभा के दो प्रतिनिधियों के कारण हुआ जिसमें एक की माली हालत इतनी खराब थी कि उसका भोजन-पानी सब किसान सभा द्वारा चलाया जा रहा था। इसी समय कृषकों से कानून न मानने का आह्वान किया गया। फलस्वरूप इन दोनों कृषकों के ऊपर क्रिमिनल प्रोसीजर कोड 106 के हवाले से एक साल के लिए पाबन्द कर दिया गया। इससे इस बात का भी अंदाजा लगाया जा सकता था है कि राजनीति की जिस परिभाषा का निर्माण राष्ट्रीय आन्दोलन की तर्ज पर किया जा रहा था वहाँ कृषकों के आन्दोलन की भूमिका सिर्फ भीड के तौर पर या निष्क्रिय तौर पर ही शामिल थी। राष्ट्रीय राजनीति ने इसके पीछे जो तर्क दिया, वह उनकी राष्ट्र राज्य की मुराद से मेल नहीं खाता था। कृषकों ने जिस राजनीतिक चेतना से अपने राजनीतिक दायरे का निर्माण किया, वह उनके विद्रोही तेवर से निकलती थी। खास कर बेहद गरीब वंचित कृषकों में स्वायत्तता और स्वतः स्फूर्त विद्रोही चेतना की पुष्टि होती हुई दिखती है। वे विचारधारा और सामूहिक एक्शन करने में कोई खास हिचक भी नहीं रखते। बौद्धिकता के नेतृत्व की उपेक्षा नहीं करते बल्कि उसे अंगीकार करते है । इस तरह निर्देशित विद्रोही चेतना की संभावना उनके बीच मौजूद होती है । साथ ही आधुनिक राज्य का जटिल ढाँचा कृषक विद्रोह की संभावना को कम नहीं करता । बल्कि कृषकों को मजबूत करता है कि वे बन्द ग्रामीण समाज के यूटोपिया से निकल अपने पर्यावरण का एक नयी दिशा से अपने लक्ष्यों का निर्माण करें ।
सन्दर्भ सूची -
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1 प्रेमचंद (1936), गोदान, नयी दिल्ली, लोकमत
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2 ज्ञानेद्र पाण्डेय (1984), एनकाउंटर्स एँ ड
केलेमिटीस : द हिस्ट्री ऑफ ए नार्थ इंडिया
कस्बा इन द नाइनटीन सेंचुरी संकलित रणजीत
गुहा (संपादित). सबाल्टर्न स्टडीज. नयी दिल्ली,
ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, पृष्ठ संख्या 234-
241
3 मदनमोहन मालवीय का उद्धरण यहाँ इस लिए
भी दिया जा रहा है कि वे पूर्वांचल और संयुक्त
प्रांत में एक महत्त्वपूर्ण नेता के रूप में स्थापित
थे. किसान सभा के निर्माता में भी उनकी
भूमिका अहम् थी. विस्तृत परिचर्चा के लिए
देखिए : मदनमोहन मालवीय (1907),
भारतवासी और देशभक्ति, संकलित पद्रकांत
मालवीय (संपादित), मालवीय जी के लेख ,
नयी दिल्ली, नेशनल पब्लिकशिंग हाउस, पृष्ठ
संख्या 105-106
5 फ्रेचेस्का ओरसीनी (2002), हिन्दी पब्लिक
स्फियर- हिन्दी की सार्वजनिक दुनिया. रविकांत
(संपादित). दीवान-ए-सराय 01- मीडिया
विमर्श हिन्दी जनपद. नयी दिल्ली- विकासशील
समाज अध्ययन पीठ तथा वाणी प्रकाशन, पृष्ठ
संख्या 27
6 स्वामी सहजानंद सरस्वती (2012), किसानों
के दोस्त और दुश्मन, अभिनव कदम 27, वर्ष
16, अंक 27. मऊ - साहित्यिक सांस्कृतिक
संस्थान, पृष्ठ संख्या 63
7 गाँधी के इन निर्देशों की की संख्या 19 है. इस
लेख में उन बिन्दुओं को ही शामिल किया
गया है जो प्रत्यक्ष्य रूप से कृषकों से जुडे हुए
हैं. नियमों की विस्तृत जानकारी के लिए
देखे.गाँधी (1966) संपूर्ण गाँधी वाड्मय, भाग
19. पृष्ठ संख्या- 426-427 साथ ही इन नियमों
की व्याख्या और ऐतिहासिक हस्तक्षेप के लिए
देखे. ज्ञानेद्र पाण्डेय (2002) किसान आन्दोलन
और भारतीय राष्ट्रवाद संकलित शहीद अमीन
और ज्ञानेद्र पाण्डेय (संपादित) निम्नवर्गीय
प्रसंग (भाग 1), नयी दिल्ली, राजकमल
प्रकाशन, पृष्ठ संख्या 136-137.
8 जनता तथा हम के प्रयोग और सबाल्टर्न दाँवपेंच
के राजनीतिक इतिहास के लिए क्रम से देखें :
सुमित सरकार (1984) मॉडर्न इंडिया तथा
नैन्सी फ्रेजर (1992)रीथिंकिंग पब्लिक स्पेयर
- अ कॉन्ट्रिब्यूशन टू द क्रिटिक ऑफ एक्चुअली
एक्सिस्टिंग डेमोक्रेसी संकलित कल्हौन
(संपादित), हेबरमास एँ ड द पब्लिक स्पेयर,
कैम्ब्रिज, एमआईटी प्रेस, पृष्ठ संख्या 123
9 ज्ञानेद्र पाण्डे (1977), अ रूरल बेस फॉर
कांग्रेस -द यूनाइटेड प्रोविंस संकलित लो
(संपादित), कांग्रेस एँ ड द राज, नयी दिल्ली
10. फ्रेचेस्का ओरसीनी (2002) हिन्दी पब्लिक
स्फीयर-हिन्दी की सार्वजनिक दुनिया. संकलित
दीवान-ए-सराय 01-मिडिया विमर्श /हिन्दी
जनपद. विकासशील समाज अध्ययन पीठ का
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11. स्पीचेस एँ ड राइटिंग फाइल नंबर 2 ए,
रामचन्द्र पेपर्स, नयी दिल्ली- नेहरु मेमोरियल
पुस्तकालय और संग्रहालय.
12 मेहता जाँच रिपोर्ट, फाइल नंबर.753/1920,
रेवेन्यू डिपार्टमेंट, उत्तर प्रदेश शासकीय अभिलेखागार लखनऊ, पृष्ठ संख्या 3
13. ज्ञानेद्र पाण्डे (1984).
14. एँटोनियो ग्राम्शी(2012), सेलेक्शन फॉर
कल्चरल राइटिंग संपादित डेविड फोरगैक्स
और ज्योफ्री नॉवेल. शिकागो, हेमाक्रेट, पृष्ठ
संख्या 381.
15. यह मेरे द्वारा किए गए फील्ड वर्क पर आधारित
है. दिनांक 6जनवरी 2019
16. सर्कुलर नम्बर 2, फाइल नंबर 450/1919,
पुलिस विभाग। उत्तर प्रदेश राज्य अभिलेखागार,
लखनऊ


सम्पर्क - 352, तीसरी मंजिल, एस.एफ.एस. फ्लैट्स, डॉ. मखर्जी नगर, नई दिल्ली-110009
मो. ८८६०३२८३७२