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शंख घोष की दस कविताएँ

रोहित प्रसाद पथिक
1. बादल के जैसा मनुष्य

मेरे सामने से टहलते हुए जाता है
वह एक बादल के जैसा मनुष्य
उसके शरीर के भीतर प्रवेश करने पर
मालूम पडता है कि
सारा पानी धरती पर झड जाएगा।

मेरे सामने से टहलते हुए जाता है
वह एक बादल के जैसा मनुष्य
उसके सामने जाकर बैठने पर
मालूम पडता है कि
पेड की छाया आ जाएगी मेरे पास

वह देगा कि लेगा?
वह क्या आश्रय चाहता है?
ना कि आश्रय में है...?
मेरे सामने से टहलता हुआ जाता है
वह एक बादल के जैसा मनुष्य

उसके सामने जाकर खडे होने पर
मैं भी संभवतः कभी किसी दिन हो सकता हूँ बादल...?


2. तबाह

हे! भगवान,
तबाह हो जाने वाले रास्ते पर चला था
आप मेरे तबाह हो जाने का पूरा ऋणी हो
जो कटोरे में भर कर रखा था

लेकिन
आप की विस्तृत मुट्ठी को पकडकर
मैंने हृदय की आपा-धापी के मध्य
शाम के समय
आप एकदम से
बिखर जाते हैं... बिखर जाते हैं
जैसे शब्दों से तबाह कर देते हो
मेरे भगवान...!


3. यौवन

दिन रात के मध्य
पक्षियों के उडने की छाया
बीच-बीच में याद आता है
हमारा अन्तिम मिलना-जुलना।
4. प्रतिहिंसा
युवती कुछ नहीं जानती
सिर्फ प्रेम की बातें बोलती है
शरीर मेरा सजाई भी तुम
बीते समय में...
मैंने भी प्रतिक्रिया में रखा था सब बात;
शरीर भरकर उडेल दिया हूँ
तुम्हारे ऊपर
अग्नि और प्रवणता।
5. मेरी लडकियाँ
लिख रहा हूँ
जल के अक्षरों से मेरी लडकियाँ
हर घर में
आज भी भीख माँगने के हाथों में पडी हुई हैं.

6. बातों के भीतर बातें
सभी नहीं, फिर भी
बहुत कोई बातों के भीतर बातें खोजते हैं
सहज भाषा तुम भूल गए हो
इस मूसलाधार बारिश में
आओ नहा लें।
पानी के भीतर कितने मुक्तिपथ है...?
कभी सोच कर देखो
अब बाधित होकर बैठे रहकर
बहुत ज्यादा देर बैठें रहकर...सिर्फ बैठे रहकर
ह्रदय बहुत कुण्ठित हो चुका है
मालूम पडता है
अब क्या...?
तुम्हारी कोई निजी गरिमामई भाषा नहीं...?

क्यों आज प्रत्येक समय इतना
अपने विरुद्ध बातें बोलते हो।
7. तुम

मैं उडता फिरूँ
मैं घूमता फिरूँ
मैं सभी दिनमान रास्तों पर
जलता फिरूँ...

लेकिन मुझे अच्छा नहीं लगता
जब घर लौटूँ तो
न देख पाऊँ तुम्हें

कि तुम हो...?

8. देह

आ रहा था
सनातन मैंदान से निकलकर
ह्रदय के ऊपर
बहुत ज्यादा दबाव
धीरे-धीरे सुलगती आग
जिसे सामने से ग्रहण कर रहा हूँ।

मेरे सामने खडे हैं नगरवासी
जो हडबडकर चिल्लाए जा रहे हैं;

शरीर कहाँ है ?....शरीर कहाँ है ?...

अब मैं यह सब कुछ नहीं सुन सकता हूँ,
पॉकेट में हैं एक धुँधला आइना,
टूटी कंघी, चादर, मुडी और नौका चप्पल
(रबड हवाई चप्पल)
आ रहा था
मैं तुम्हारे लिए...!


9. अस्पताल (कविता-ऋम)

( नर्स-1 )

सो नहीं पा रहा हूँ
प्रत्येक हड्डी के भीतर जमा हुआ हैं भूसा

पैरों से लेकर सिर तक
फैल रहे हैं अश्लील जीवाणु
भूसा कहने लगा;

कौन कहाँ? सिस्टर, सिस्टर ....

हुआ क्या? चुप करके स्थिर से सो जाओ।
इसके अलावे फलों को खा सकते हो।

सफेद बाल, लाल बेल्ट पहने आ रही है नर्स...!


( नर्स-2 )

रात दो बजे
चुपचाप से दो लडकी पास के केबिन में ढूकती हैं
बेहोश युवक की आत्मा
कुछ और मरी है कि नहीं?
यह पता करने

अभी भी उतना नहीं...? होंठ दबाकर
एक लडकी
दूसरे से बोलती है।

तब क्या सो रहा है वह ?
ना कि बेहोश है? डॉक्टर की जरूरत है

अब रहने दो... बाबा!
फिनफिनाकर वह दोनों लडकियाँ जाती है
और कहती हैं;

हम लोग क्या कर सकते हैं?
जब तक ईश्वर कुछ ना करें?

( नर्स-3 )

दो एप्रन* पहनी हुई सुंदर महिलाएँ
जो एप्रन के नीचे दबाई हैं अपनी हँसी
मुंह पर मरुभूमि लेकर नियमित
सुबह का बिछौना सजाती है बारहो महीना

यदि मैं कहता हूँ;
लाइए, मैं भी चादर का एक कोना पकड लूँ

तो वह मुझे फाँसी पर लटका देगी...?


* एप्रन : चिकित्सक सफेद कोट

( नर्स-4 )

हँसना भी मना था
उसके चेहरे की तरफ नहीं देखता हूँ
कारण,
रोगी के चेहरे को देखने पर
हृदय में रक्त शिराएँ तीव्रता से बहती है

वह छूती है नाडी को
सिर पर हाथ फेर सकती है।

एक झटके में मेरा माथा ठनका
यही सिलसिला चलता रहता है
बच्चे से बूढे होने तक...!
10. तुम बोले थे - जय होगा, जय होगा !

तुम बोले थे; जय होगा, जय होगा
इस तरह का दिन हमेशा नहीं होगा
यह सुनकर न जाने कितने धमाके हुए
आश्चर्य से मन ही मन नाचता हूँ।

उत्सव से भराकर दुःख देखकर
स्वाभाविक ही सोचता हूँ भयावह दृश्य ।
व्यथित मन से.... हाथ में पकडा गए....
मैं पीकर गया हूँ तीव्र जहर।

तुम बोलें थे ; दल होगा, दल होगा
दल के बाहर नहीं होगा कुछ और
निवेदन होने पर सब कुछ बाहर होगा
दुर्लभ चोटी की तरह हर जगह...!

भूमण्डल की मट्टी भुरभुरी होकर गिर रही है
हमलोग किसी गड्ढे के नीचे दबने से बचेगे।
हर मित्रों के ह्रदय में विषाद भरा हुआ हैं,
फिर भी कोई हमारे पास आने को तैयार नहीं!

तुम बोलें थे; इसका होगा, उसका होगा
तुम्हारे रास्ते पर चल पडे हैं संसार
यह असमय कभी भी सोचा भी नहीं था कि
जय के भीतर इतना गहरा हार भी होता है...!


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