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अपनी जमीन की खुशबू

माधव नागदा
30 दिसंबर 2007 को राजस्थान साहित्य अकादमी का उदयपुर जिला स्तरीय सम्मेलन था। यद्यपि मैं राजसमंद जिले का हूँ, फिर भी आयोजक संस्था सलिला की कर्ताधर्ता विमलाजी भण्डारी ने फोन पर मुझे न्योता दिया। यह भी कहा कि आप किसी एक साथी का नाम बताएँ जिसे आप लाना चाहें। मैंने झट से कहा, जवानसिंह सिसोदिया।
बहुत अच्छा नाम सुझाया आपने।
जवानसिंह सिसोदिया दैनिक भास्कर के स्तम्भ मेवाडी गोखडो के कारण मेवाड के घर-घर में जाने जाते हैं। वे मेवाडी कहावतों, मुहावरों, लोकोक्तियों और ठेठ शब्दावली का प्रयोग करके लोककथा शैली में इतनी रोचक मेवाडी लघु कहानियाँ रच लेते हैं कि जहाँ-जहाँ भी भास्कर जाता है, पाठकों की जिह्वा पर उनका नाम बसा हुआ है। एक घर में तो मैंने उनकी कहानी की कटिंग को दीवार पर चिफ पाया। मुझे याद है, इस स्तंभ में उनकी प्रथम प्रकाशित कहानी का शीर्षक था, वा छेवडा में वरवरी। छेवडा और वरवरी दोनों शब्द पढी-लिखी पीढी के लिए अजूबे से कम नहीं है। परन्तु कहानी पढकर मंतव्य स्पष्ट हो जाता है। जवानसिंहजी ने ऐसे कईं शब्द पुनर्जीवित किए हैं। भगवती बाबू के शब्दों में कहें, तो वे अपनी जमीन की खुशबू फैला रहे हैं।
दरअसल मैंने सलूम्बर जाने की खुशी-खुशी हाँ इसलिए भर ली कि वहाँ मेरे परम आत्मीय नन्दलाल परसरमाणी रहते हैं। मैं उनसे मिलने का वादा कर चुका था। अतः मैंने जवानसिंह जी को स्पष्ट कह दिया कि मैं अपने मित्र के पास एक रात रुकूँगा, आज ही वापस नहीं आऊँगा।
उदयपुर से बस बदलकर हम दोनों सलूम्बर वाली गाडी में बैठे। एक सीट पर खिडकी के पास डॉ.रमेश मयंक विराजे थे।
यहीं आ जाओ। वे बोले। जवानसिंहजी ने कहा आओ आगे बैठते हैं। मुझे ड्राइवर के केबिन में जगह मिली। जवानजी केबिन के बाहर। एक बार फिर मेरी नजरें रमेश मयंक की भूरी आँखों से टकरायीं और कुछ याद आ गया।
करीब दो वर्ष पूर्व इन्होंने मुझे पत्र लिखा था। तुम्हारी सब किताबें मुझे भेज दो। हिन्दी, राजस्थानी कहानी संग्रह और राजस्थानी डायरी। मैं तुम पर कुछ लिखना चाहता हूँ। मैं बडा प्रसन्न हुआ। कोई तो मुझे इस लायक समझता है कि कुछ लिखा जाए मेरे लेखन को महत्त्व देने वाला विद्वान कोई तो है। तो मैंने बिना किसी हील-हुज्जत के अपनी सारी किताबें भेज दी। 1985 में प्रकाशित उसका दर्द की एकमात्र लोकार्पित प्रति भी जिस पर लोकार्पण के समय राजस्थान साहित्य अकादमी के तत्कालीन अध्यक्ष डॉ.प्रकाश आतुर ने बडे प्रेम से कुछ पंक्तियाँ लिखीं थीं और निष्त्रि*यता के दौर में जिन्हें पढकर मैं ऊर्जस्व हो लिया करता था। मैंने पुस्तकें भेजते समय रमेश मयंक से आग्रह किया था कि उसका दर्द उन्हें वापस लौटानी पडेगी, साथ ही आलेख की एक प्रति देनी होगी।
दो वर्ष हो गए हैं न तो उसका दर्द वापस आया है और न ही आलेख। पत्रों का भी कोई जवाब नहीं।
बस से उतरते ही मैंने रमेश जी से पूछा, कोई साहित्यकार इतना निर्मोही और असंवेदनशील कैसे हो सकता है ? पत्र का उत्तर तक नहीं।
तेरी सब बातों का मैं जवाब दूँगा। ठहर तो सही।
लगता है मुझे जवाब लेने चित्तौड आना पडेगा।
हाँ, यह ठीक रहेगा। तू चित्तौड आ जा एक बार। मैंने उनकी कोई मजबूरी समझकर इस बात को ज्यादा तूल नहीं दिया। यह भी तय किया कि इस प्रकरण को सदा के लिए भूल जाऊंगा।
केबिन में बैठने वाले को सामने रोड की तरफ देखने के लिए बाँयीं ओर गर्दन टेढी करके बैठना पडता है। जब गर्दन में दर्द होने लगा तो मैं थोडा दायीं ओर घूमा। जवानसिंह सिसोदिया से नजरें फिसलते हुए दो सीट पीछे बैठे डॉ.भगवातीलाल व्यास से जा टकरायीं। मुझे देखकर वे आगे आए और मेरी बगल में बैठकर बातें करने लगे। मैं उनके आत्मीय व्यवहार से अभिभूत हो गया। कितने सहज हैं भगवती बाबू। दो बार साहित्य अकादमी, दिल्ली से पुरस्कृत हो चुके हैं। जागती जोत के संपादक के रूप में भी आपने ख्याति अर्जित की है। बी.एड. कॉलेज डबोक से रिटायरमेंट के पश्चात आजकल बाँसवाडा के एक कॉलेज में प्राचार्य हैं। मुझसे हर मामले में बडे, उम्र में, लेखन में। इतनी उपलब्धियाँ हासिल कर लेने के बाद तथाकथित बडे साहित्यकार सीधे मुँह बात करना भी पसंद नहीं करते, जब तक कि उनकी दुखती रग पर हाथ न रख दो। इधर भगवती बाबू हैं कि किसी फकीर की तरह तमाम बोझ को दरकिनार करते हुए अपनी सीट छोडकर मेरे समीप आकर बैठ गए।
स्वास्थ्य कैसा है ? मैंने पूछा।
जो स्व में स्थित है उसका स्वास्थ्य तो अच्छा ही रहेगा। कितनी बडी बात। जो व्यक्ति स्व में स्थित हो, अर्थात् दूसरों के सुख में दुखी न हो वह तो सदैव स्वस्थ ही रहेगा।
कुछ देर हम इधर-उधर की बातें करते रहे। फिर एकाएक मेरे मुँह से निकल गया, इस बार साहित्य अकादमी पुरस्कार कुन्दन माली को मिला है। अगली बार आपको मिलेगा। भगवती बाबू ने कहा। मैंने उनकी आँखों में झाँका। क्या है वहाँ? सांत्वना भाव? क्या मेरी आवाज में दर्द था? या फिर कह रहे हैं, स्व में स्थित रहो? नहीं, मेरी आवाज में दर्द क्यों होने लगा। कुन्दन भाई मेरे मित्र हैं, राजस्थानी साहित्य की आलोचना विधा में पिछले कुछ वर्षों से लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। उनकी पुरस्कृत कृति आलोचना री आँख सूं में समकालीन राजस्थानी साहित्य की विभिन्न विधाओं और प्रवृत्तियों का जायजा लिया गया है। कुन्दन ने इसमें कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना, अनुवाद, नाटक आदि कई विधाओं को स्पर्श किया है। हालाँकि इसे आलोचना की एक सम्पूर्ण पुस्तक कहना समीचीन नहीं होगा, जैसी कि अर्जुनदेव चारण की, राजस्थानी कहाणी : परंपरा-विकास है। कुन्दन माली ने अपनी पुस्तक में विभिन्न विधाओं के उन संग्रहों की विवेचना दी है जो उन्होंने पिछले दिनों पढे थे। इसलिए किसी विधा की कोई मुकम्मल तस्वीर तो उभरकर नहीं आती, पर यह विवेचना कुन्दन की समालोचकीय दीठ पर भरोसा जगाती है। उनमें क्षमता है। इस दृष्टि से आलोचना री आँख सूं उनके आने वाले महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की पूर्वपीठिका के रूप में एक सार्थक कृति है। पुरस्कारों का एक उद्देश्य यह भी तो है; संभावनाओं को सामने लाना, उन्हें प्रोत्साहित करना। निस्संदेह कुन्दन एक ऊर्जावान और दृष्टिसंपन्न समालोचक हैं। अच्छे मित्र तो हैं ही।
लेकिन भगवती बाबू ने ऐसा क्यों कहा? क्या व्यंग्य में? नहीं, उनके कथन में व्यंग्य नहीं था। हाँ, विनोद हो सकता है। विनोद का अधिकार तो मित्रों को है ही। या शायद उनकी जानकारी में हो कि मेरी पुस्तक सोनेरी पाँखां वाळी तितळियाँ अंतिम दौड में सम्मिलित थी और उसे अगले वर्ष भी सम्मिलित किया जाएगा। डॉ.देव कोठारी ने अपने एक आलेख में लिखा है कि सोनेरी पाँखां वाळी तितळियाँ राजस्थानी भाषा के इतिहास में प्रथम प्रकाशित डायरी विधा की पुस्तक है, लेकिन इससे क्या।
सलूम्बर के आशीर्वाद गार्डन होटल में जाते ही जिस शख्स से मुलाकात हुई वह थे ठिगने कद के नंदजी परसरमाणी। उन्होंने मुझे गले लगा लिया। भगवती बाबू से बोले,ये मेरे गुरु हैं। इतने में जवानसिंहजी बोले, ये मेरे भी गुरु हैं। भगवती बाबू ने चुटकी ली, ये तो जगदगुरू हैं। माधव जो हैं।
यहाँ चर्चा का विषय रखा गया था, साहित्य में इतिहास। प्रथम सत्र में सामने विराजमान थे आनन्द शर्मा, राजेन्द्रमोहन भटनागर, भगवतीलाल व्यास और अकादमी अध्यक्ष डॉ.(श्रीमती) अजित गुप्ता। प्रथम दोनों तो साहित्य में इतिहास की जीती जागती मिसाल हैं। भटनागरजी ने बहुतेरे ऐतिहासिक उपन्यासों की रचना की है; नीले घोडे का सवार, राजराजेश्वर, दिल्ली चलो, सरदार आदि। पत्रकारिता में पहचान बनाने वाले आनंद शर्मा अपने पहले ही उपन्यास रसकपूर से प्रसिद्ध हो गए। इस कृति पर उन्हें राजस्थान साहित्य अकादमी के रांघेय राघव पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। हाल ही में एक और उपन्यास अमृत पुत्र के लिए मीरां पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा हुई है।
रमेश मयंक का आलेख कविता केन्द्रित था जिसमें उन्होंने कई ऐतिहासिक विषय-वस्तु वाली कविताओं के सटीक उद्धरण दिए थे। सर्वाधिक थे नरेंद्र मिश्र की कविताओं के। इस पर बाद में उपेंद्र अणु ने टिप्पणी भी की थी। रमेश मयंक ने इसे उदारता से लेते हुए विनोदपूर्वक कहा था, मुझे हमेशा नरेंद्र मिश्र के मकान के बाहर से होकर गुजरना पडता है।
दूसरा आलेख आनंद शर्मा ने पढा। यह मुख्यतः उपन्यास केन्द्रित था। उन्होंने अपनी बात गुरुदत्त के उपन्यास संभवामि युगे-युगे तथा अवतरण से आरंभ की। मैंने मंच से पहली बार किसी साहित्यकार के मुँह से गुरुदत्त का नाम इतने सम्मान के साथ सुना। वरना लगभग 200 उपन्यासों के रचयिता इस उपन्यासकार को हिन्दी साहित्य में अछूत समझा जाता रहा है। इसके अलावा भी आनंद शर्मा ने अपने आलेख में यादवेन्द्र शर्मा चंद्र, हजारीप्रसाद द्विवेदी, राजेन्द्रमोहन भटनागर, वृंदावनलाल वर्मा, शिवाजी सावंत, विष्णु प्रभाकर आदि की ऐतिहासिक कृतियों का उल्लेख किया। स्वयं के उपन्यासों रसकपूर, अमृतपुत्र, माधवी, एक और भीष्म पर भी बोले और खूब बोले। अन्त में उन्होंने कभी-कभी फिल्म में मुकेश द्वारा गाए इस गीत को सुनाकर समां बाँध दिया, कल और आएँगे नगमों की खिलती कलियाँ चुनने वाले, मुझसे बेहतर कहने वाले तुमसे बेहतर सुनने वाले।
भगवतीलाल व्यास ने विशिष्ट अतिथि पद से बोलते हुए बहुत सटीक बातें कहीं। उन्होंने सवाल किया, मैं क्यों लिखता हूँ? उत्तर भी दिया,भावनाओं के उदात्तीकरण, अनुरंजन और आत्मावलोकन के लिए लिखता हूँ। साहित्य लिखना अन्तःकरण में झाडू लगाने की तरह है। मैं इसलिए लिखता हूँ क्योंकि मैं अपनी जमीन की खुशबू को फैलाना चाहता हूँ। इतिहास अपने घर से आरम्भ होता है। इतिहास में तारीखें और समय के अलावा सब झूठ है, साहित्य में तारीखें और समय के अलावा सब सच है।
रात को नन्दजी परसरमाणी के यहीं रुका। सबसे बडी उपलब्धि रही उषा से भेंट। वह अपने पति के साथ आई हुई थी। कितने वर्षों बाद मिले ! लगभग बीस वर्ष। या इससे भी अधिक। मैंने उसे अपनी डायरी पुस्तक सोनेरी पांखां वाळी तितळियाँ भेंट की। वह मेवाडी अच्छी तरह समझ लेती है। हालाँकि घर पर सब सिन्धी बोलते हैं। नन्दजी ने कहा, माधव ने मेरे लिए भी कुछ लिखा है। मैंने वह पृष्ठ खोलकर उषा के सामने रखा जिसमें नन्दजी के व्यक्तित्व का जिक्र आया है। खुद पर हँसने का माद्दा रखना और दीवारकंप ठहाके लगाना।
प्रसंग पढते-पढते उषा उदास हो गई। बुझे स्वर में बोली, अब इस घर में कोई ठहाके नहीं लगाता।
नंदजी का बडा बेटा गोपाल कहीं नहीं होते हुए भी घर के एक-एक कोने अंतरे में मौजूद था, परिवार के प्रत्येक सदस्य के दिल में धडक रहा था। बात करते-करते, गोपाल के जिक्र से बचते-बचाते अनायास ही उसका जिक्र छिड जाता और वातावरण में उदासियाँ घुल जातीं। नन्दजी सँभलने लगे हैं, मगर भाभी तो वहीं अटकी हुई हैं। जब मैंने कहा कि आप बहुत कमजोर हो गईं हैं, तो वे फफक पडीं, भूल नहीं सकती। उस फोन को भी नहीं जिसमें किसी ने पूछा था कि इंजीनियर साहब हैं क्या। मुझे क्या पता कि लोग मेरे गोपाल को इंजीनियर साब कहने लगे हैं। मेरा बेटा इंजीनियर कहलाने लगा था। समझ में नहीं आता उसकी किडनियाँ कैसे खराब हो गईं। हमें तो उसने अपनी बीमारी के बारे में बताया तक नहीं।
मेरे कांकरोली वाले मकान का नक्शा गोपाल ने ही तो बनाया था। और एस्टिमेट भी, जिससे मैं विभाग से ऋण लेने में सफल हो सका।
माधव, जब कभी दिल बहुत उदास होता है, तो जी चाहता है कुछ दिनों के लिए तुम्हारे पास चला आऊँ। नन्दजी की आवाज उभरी, दर्द से भीगी हुई, आत्मीयता से लबरेज।
दूसरे दिन भण्डारी दम्पती की मेहमाननवाजी का लुत्फ उठाया। विमलाजी ने हाडी रानी की कुर्बानी पर केन्द्रित एक नाटक लिखा है। इसमें उन्होंने राजस्थानी की पाँच बोलियों का खूबसूरत प्रयोग किया है। ये बोलियाँ हैं-मेवाडी, वागडी, शेखावाटी, हाडौती और मारवाडी। ये पात्रानुसार संवादों में आतीं हैं। मैंने आश्चर्य से पूछा, आपको इतनी बोलियाँ आतीं हैं !
नहीं अनुवाद कराया है, अलग-अलग जानकारों से।
मैं और विमलाजी नाटक पर चर्चा करते हैं। नन्दजी मनोयोग से सुनते हैं। इस बीच जगदीश भण्डारी कई-कई आईटम लाकर टेबल पर सजा देते हैं-रसगुल्ले, तिल पापड, काजू, नमकीन, पकौडे, दूध और दूध से पूर्व सेवन के लिए च्यवनप्राश। पुरुष की सफलता के पीछे एक औरत होती है इस पुरानी मान्यता के ठीक विपरीत। यानी औरत की सफलता के पीछे एक पुरुष ! बातचीत के दौरान जगदीशजी बताते हैं कि इनके लेखन से मुझे कोई असुविधा नहीं है। ये अपने क्षेत्र में प्रगति करें, मैं अपने क्षेत्र अर्थात् बिजनेस में प्रगति कर रहा हूँ। बल्कि ये कंप्यूटर कार्य में इतनी दक्ष हैं कि मेरा एकाउन्ट सम्बन्धी सारा कार्य इन्होंने ही सम्भाल रखा है।
मैंने देखा है कि विमलाजी द्वारा आयोजित साहित्यिक समारोहों की सफलता में पर्दे के पीछे जगदीश जी का ही कुशल प्रबंधन होता है। मन्च पर विमलाजी, बाकी सब जगह जगदीशजी। चेहरे पर एक तरह की निस्पृहता, सेवा का आनंद।

सम्पर्क- लालमादडी(नाथद्वारा)-313301
मोब-9829588494