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साँवली लडकी की डायरी

अमिता नीरव
1
बीच वाली बुआ पढी-लिखी तो नहीं थी, लेकिन पढे-लिखे और जागरूक परिवार में ब्याही थी, तो पढाई-लिखाई का मतलब सबसे ज्यादा समझती थी। छोटे भाई की काली-गब्दू-सी बेटी बडी हो रही थी और किसी को उसे स्कूल में भर्ती करवाने की कोई जल्दी नहीं थी। बडे भाई का कहना था कि घर में ही मस्ती से रहने दो अभी, एक बार स्कूल गई, तो फिर जीवन भर इस चक्र से छुटकारा नहीं मिलना है। छोटा भाई मान देता था, तो मान लिया। फिर स्कूल भर्ती करने की यूँ कोई उम्र भी नहीं हुई थी।
फिर भी गाहे-ब-गाहे बुआ किसी-न-किसी बहाने उसे स्कूल में भर्ती करने की हिदायत दे ही देती थी। बहन से दोनों भाई डरते थे, इसलिए उसका स्कूल में एडमिशन करवाने का निश्चय कर ही लिया था।
नर्सरी में एडमिशन करवाया गया। 10.30 का स्कूल था। ताऊजी और पापा के दफ्तर जाने का समय हुआ करता था। माँ और ताईजी किचन में व्यस्त रहती थीं। ताईजी को वो हमेशा पूरी दुनिया की सबसे सीधी बच्ची लगती थी, वो उसे नबली कहा करती थी।
यूँ स्कूल बहुत दूर नहीं था, लेकिन अपनी नबली बेटी को अकेले जाने नहीं दिया जा सकता था। मजबूरी ये कि घर के मर्दों के जाने का वक्त होता था। दोनों ही खाना खाकर जाते थे, कोई अवसर हो, चाहे घर में और 50 लोगों को खाने पर बुलाया हो। दोनों मर्द भूखे घर से नहीं जाएँगे। तो उसके स्कूल जाने की व्यवस्था कैसे की जाए?
इसके लिए एक महिला से बात की। वो छोटे-छोटे बच्चों को स्कूल ले जाने का ही काम करती थी। गोरी चिट्टी बसन्ती बाई की चिन पर हरा चूँकि बना हुआ था। सीधे पल्लू की एक तरफ से खूँसी हुई साडी पहनती थी। रौबदार आवाज थी। चचेरी बहन उसकी हमउम्र थी और वह भी उसी के साथ उसी स्कूल में दाखिल हुई थी।
चचेरी बहन का रंग खुला हुआ था और उस पर उसका नाम भी था गौरी। उसका जन्म पहले हुआ था और रंग तो उसका साँवला था ही, उस पर बाद में पैदा हुई चचेरी बहन का रंग खुला हुआ था, ऐसे में शरारतन उसका घर और स्कूल दोनों का नाम गौरी रखा गया। यह माँ भी समझती थी और ताईजी भी।
घर भी पास-पास थे और रिश्ते भी इसलिए उस शरारत की उपेक्षा करने से ज्यादा और किया ही क्या जा सकता था! तो तय यह हुआ कि दोनों को बसन्ती बाई ही स्कूल ले जाएँ गी। स्कूल छूटने पर छोड भी जाएँगी। बसन्ती बाई पहले दिन आई तो उसे ताईजी ने नाम बता दिया था। फिर भी घर के दरवाजे पर खडी होकर आवाज लगाई गोरी-काली चलो...
ताईजी ने बाहर आकर कहा, नाम बता दिया है, तो नाम से क्यों नहीं बुलाती?
हओ... प्रकट में तो कहा, लेकिन मन में जाने क्या बुदबुदाई।
लगभग सप्ताह भर सब ठीक रहा। फिर एक दिन उसने फिर से गोरी-काली चलो... आवाज लगाई।
अबकी माँ ने आकर डपटा... तो उसने कह दिया अब जो है सो है... काली है तो काली न कहूँ?
तभी ताईजी ने आकर हिसाब साफ कर दिया, हमें अपनी बच्ची तेरे साथ नहीं भेजनी। मैं खुद ही छोडा आऊँगी। कल आकर अपने पैसे ले जाना।
ये सब वो जान समझ रही थी। काली कहने पर उसे बुरा तो लगा, लेकिन बसन्तीबाई का ये तर्क भी उसे गलत नहीं लगा कि जो है वही तो कहा जाएगा। लेकिन उसके मन में सवाल उठा था कि वह काली क्यों हैं?
उस वक्त जन्मा ये सवाल उसकी आधी जिन्दगी को लील गया था।
2
नर्सरी की परीक्षाएँ थीं। एक लम्बा-सा कमरा था, जिसमें छोटी-छोटी डेस्क लगी थीं, टीचर भी एक कम हाईट की कुर्सी पर बैठी थीं। टाटपट्टियों पर सारे बच्चे अपनी-अपनी बारी का इंतजार करते कोहनी टिकाए उत्सुकता से टीचर को देख रहे थे। उसकी बारी आई, तो वह उठकर गई। टीचर ने किताब खोलकर कुछ फलों के चित्र दिखाए और उनके नाम पूछे। जाने उसने कितने सही कहे, फिर एक मोटी गोल लकडी के इर्द-गिर्द लिपटी रंग-बिरंगी लाख को दिखाकर रंग पूछे... फिर कुछ ओर पूछा और कह दिया अपनी जगह जाकर बैठ जाओ। उसने कहा मुझे नींद आ रही है, तो टीचर ने कहा डेस्क पर सिर रखकर सो जाओ।
अभी उसकी चचेरी बहन की परीक्षा होनी बाकी थी। तभी तो उन दोनों को लेने कोई आएगा न?
माँ को सबसे ज्यादा उत्सुकता रहती थी वह स्कूल में क्या करके आई है? बहुत सारे सवाल पूछे, गफलत में वह यह भी बता बैठी कि उसे नींद आ रही थी और वह सो गई थी। माँ के लिए तो यह मसला हो गया था। उस पर रिजल्ट भी ऐसा ही आया। पास तो वह हो गई, लेकिन चचेरी बहन को उससे ज्यादा नंबर आए।
माँ को दुख का कारण मिला। इसके उलट ताई जी के लिए वह दुनिया की सबसे सुंदर, सबसे होशियार, सबसे सीधी और सबसे समझदार लडकी थी, तो जब माँ ने इस बात के लिए उसे डाँटा कि परीक्षा में उसको नंबर कम आए है तो ताई जी ने तुरन्त बचाव किया... टीचर ने इसे जानबूझकर नम्बर कम दिए हैं। लम्बी बहस हुई और तय हुआ कि उनकी बेटी को जानबूझकर सब पीछे करने पर तुले हैं, इसलिए अब इसे इस स्कूल से निकाल लिया जाना चाहिए। वैसे भी नर्सरी तो हो ही चुका है।
शहर के प्रसिद्ध प्राइवेट स्कूल में एडमिशन मिलने में तमाम दिक्कतें थीं, सो उसका एडमिशन घर के पास के ही एक सरकारी स्कूल में करवाने का निर्णय हुआ। ताई जी के रिश्ते के भाई उसी शहर के किसी दूसरे स्कूल में प्राइमरी टीचर थे, उनके मित्र उस सरकारी स्कूल में प्रिसिंपल थे। वे उसे एडमिशन दिलवाने ले गए। प्रिंसिपल ने उससे कहा, अपना सीधा हाथ सिर से ले जाकर उल्टा कान पकडकर दिखाओ। उसने किया, लेकिन उसका हाथ कान तक नहीं पहुँच पाया।
अरे अभी इसकी उम्र नहीं हुई है स्कूल में एडमिशन की। ये छोटी है अभी। प्रिंसिपल सर ने कहा।
अरे कर लो यार... नर्सरी तो हो ही गया है। रिश्तेदार ने कहा।
यार छोटी है अभी। प्रिंसिपल सर ने प्रतिवाद किया।
चलता है यार..., उन्होंने फिर जोर दिया।
जन्म का सन गडबड करेगा - प्रिंसिपल सर ने अपनी मजबूरी बताई।
ठीक है, सन में बडी बता दो। रास्ता सुझाया।
साल भर पहले की जन्म-तिथि लगाकर उसके एडमिशन की रस्म पूरी की गई। उस वक्त बर्थ-सर्टिफिकेट का चलन जो नहीं था।
प्रिंसिपल ने कहा इसे स्कूल का एक चक्कर लगवा दो। नीचे दो हॉलनुमा कमरे और ऊपर दो हॉलनुमा कमरे थे। सीढियों के नीचे की जगह पर टीचर और प्रिंसिपल के बैठने की जगह थी। टॉयलेट-बाथरूम की कोई व्यवस्था नहीं थी। उसके लिए टीचर सहित स्टूडेंट पास वाले घर पर निर्भर थे। वह भी इतने सहृदय थे कि उनके घर के दरवाजे इस चीज के लिए दिन भर खुले रहते थे।
पहली और दूसरी के बच्चों की क्लास नीचे लगती थी, तीसरी और चौथी के बच्चों की ऊपर...। ऊपर की मंजिल पर गई तो देखा कि जिन बच्चों के साथ वह खेलती थी, वह तीसरी क्लास में बैठे हैं। उनमें एक उन रिश्तेदार का बेटा भी था। जब उसने ये जाना कि उसकी क्लास नीचे है तो जिद पकड ली ऊपर की क्लास में अपने दोस्तों को साथ ही बैठेगी।
दोस्ती में प्रिंसिपल ने समझाया कि अभी तीसरी में बैठा देते हैं। कुछ दिनों बाद समझा-बुझाकर पहली क्लास में ले आएँगे। बात तय हो गई। वह अपने दोस्तों के साथ स्कूल जाने और उन्हीं की क्लास में बैठने लगी।
जाने प्रिंसिपल साहेब यह बात भूल गए या फिर उनका ट्रांसफर हो गया। एक बार वह जो तीसरी क्लास में ऊपर जाकर बैठी तो नीचे आई ही नहीं। उसने उन बच्चों के साथ ही तीसरी की परीक्षा दे दी। मजे की बात ये कि पास भी हो गई। फिर उसने चौथी की ही परीक्षा दी.... ।
बाद में कई सालों तक उसे यह लगता रहा इसीलिए उसकी नींव कमजोर रह गई है।
3
पढाई-लिखाई में मन लगता नहीं था उसका, जाने क्या किया करती थी वह लडकी। माँ को दुख ये कि रिश्तेदार-पडोस की उसकी हमउम्र यहाँ तक कि उससे छोटी लडकियाँ तक उससे पढाई में ज्यादा अच्छी और घर-बाहर के छोटे-मोटे कामों मे एक्सपर्ट है। ताईजी का गुस्सा माँ पर यूँ कि वह हमेशा उनकी बेटी को दूसरों से कमतर आँकती है। उसने अपने पूरे बचपन ताईजी और माँ के बीच उसी के लिए खींचतान देखी है।
अपनी बहन की बेटी की शादी के लिए ताईजी पहली बार शहर से बाहर जाने वाली थी। उस समय उसकी पाँचवी बोर्ड की परीक्षा में बस दो ही महीने बचे थे। माँ कतई नहीं चाहती थी कि वह जाए, लेकिन इसी शहर में ताईजी की परछाई-सी डोलती वह लडकी बिना उनके यहाँ रहनी नहीं है और ताई जी उसे यहाँ छोडकर जानी नहीं है तो बावजूद इसके कि उसकी परीक्षाएँ हैं वह ताई जी और भाई (ताई जी का बेटा) के साथ सुदूर गुजरात के कस्बे में होने वाली शादी में शामिल होने चली गई।
आधी बोगी भरकर उसी शहर से साथ जाने वाले सारे रिश्तेदारों में लगभग आधा दर्जन से ज्यादा बच्चे थे। उसे छोडकर सब चचेरे भाई-बहन थे। बस वही खून के रिश्तों में नहीं थी, लेकिन फिर भी वह उसी परिवार का हिस्सा थी।
जाने उस काली-मोटी गब्दू-सी लडकी में ऐसा क्या था कि मेजबान की कॉलेज में पढने वाली छोटी बेटी आधा दर्जन खेलते बच्चों के बीच से हर दिन बस उसे ही चुनती थीं। कभी अपनी दोस्त के यहाँ जाने के लिए तो कभी किसी रिश्तेदार के घर जाने के लिए शादी की तैयारी करना हो या फिर शादी का न्योता देना हो... इतने सारे धूल-मिट्टी में खेलते बच्चों के बीच में से वह बस उसी लडकी को हाथ पकडकर ले जाती, हाथ-मुँह धुलाती, बालों में कंघी करती और अपने साथ ले जाती।
गुजरात का वह कस्बा तब भी मध्यप्रदेश के संभाग मुख्यालय से ज्यादा विकसित था। बाद में वे ननिहाल आई थीं, तो उनके पास की मजेदार चीजों को देखकर हर बच्चे की खासतौर पर लडकियों की लार टपकती थीं। उसे किसी से भी कुछ माँगना और पूछना दोनों ही नापसंद था। हाँ लेकिन दीदी की चीजें उसका भी मन तो मोहती ही थी। उनके पास एक बहुत खूबसूरत क्लिप का पेयर था। चाँदी की उस खूबसूरत क्लिप-पेयर पर सब लडकियों की नजर थी, लौटते हुए दीदी ने अपनी घुँघरू लगी चाँदी की क्लिप उसे यह कहते हुए दी कि माँगी तो मामी ने थी, लेकिन मैंने मना कर दिया, इसलिए उन्हें मत बताना।
माँ ने अवाक होकर पूछा था बेटा ऐसा क्यों किया?
मासी (मासी की देवरानी को वे मासी ही कहती हैं।) मेरा मन नहीं हुआ। जाते-जाते वह मोतियों वाले अपने खूबसूरत इयररिंग्स भी उसे दे गई।
उस लडकी को और किसी चीज की कमी रही हो तो रही हो, लेकिन कभी भी प्रेम की कमी नहीं रही। इस पूरी दुनिया में उसे प्रेम करने वालों में अधिसंख्य महिलाएँ ही हैं.....
*
उसे इस बात में विश्वास नहीं रहा कि औरत ही औरत ही दुश्मन है...
4
प्राइमरी स्कूल में बाथरूम की कोई सुविधा नहीं थी। दो बडे हॉल नीचे और दो बडे हॉल ऊपर थे। दरवाजे के पास से एक बडी-सी पत्थर की सीढी ऊपर जाती थी। उस सीढी के नीचे पर्दे लगाकर स्टाफ रूम बनाया गया था। प्रिंसिपल सहित कुल तीन टीचर थे, जिनमें एक महिला थीं। वे गुजराती तरीके से साडी पहनती थीं, लम्बा कद, गोरा रंग, दुबली-पतली थीं। चश्मा लगाती थीं और खूब तेल लगाकर ढीली चोटी गुँथती थीं। कुल मिलाकर वे उसे बहुत सौम्य लगती थीं।
जाने उस वक्त तक कोई टीचर के नाम जानता नहीं था, या उसने ही जानने की कोशिश नहीं की थी। उसे किसी भी टीचर का नाम नहीं पता था। टाटपट्टी पर बच्चे बैठते थे। नीचे के पहले ही हॉल में उसकी क्लास लगती थी। हॉल की एक दीवार पर दो बडी-बडी खिडकियों के बीच ब्लैक बोर्ड टंगा रहता था। स्कूल को-एड था, लडके भी पढते थे। आमने-सामने की टाटपट्टी पर एक तरफ लडकियाँ बैठती थीं, दूसरी तरफ लडके। बीच के हिस्से में वे बच्चे जो देर से स्कूल आते थे। सामने टीचर की कुर्सी-टेबल।
उस समय टीचर बोर्ड पर कुछ समझा रहे थे कि उसके सामने की तरफ बैठे एक बदमाश बच्चे ने उससे पूछा,तुझे आँख मारना आता है?
उसने जवाब दिया, हाँ
वह जानती तो थी कि आँख मारना अच्छा नहीं है, लेकिन यह अच्छा क्यों नहीं है इसे वह कभी समझ ही नहीं पाई। चूँकि उसे यह समझ नहीं आया कि आँख मारना बुरा क्यों है इसलिए वह इससे परहेज भी नहीं करती थी।
लडके ने कहा,मारकर दिखा
उसने दिखा दिया। लडके ने कहा दूसरी मार कर दिखा, उसने दूसरी भी मारकर दिखाई, इसी बीच टीचर ने उसे आँख मारते देख लिया। तो उसे डाँटा। वह भुनभुनाई - जैसा कर्म करेगा, वैसे फल देगा भगवान।
पूरा वाकया उन मामा के माध्यम से घर में आया और कईं दिनों तक सारे लोग उससे पूछते रहे कि, क्या सचमुच तूने टीचर को ऐसा कहा था? फिर कईं दिनों तक यह बात हर आने-जाने वाले को सुनाई जाती और वह सोचती कि टीचर को उसकी इस बात पर गुस्सा नहीं आया होगा!
उन्हीं दिनों की बात है जब टीचर क्लास में पढाती होती थी, तब क्लास के बच्चे, उसमें भी खासतौर पर लडके... थोडी-थोडी देर में अपनी चीटी ऊँगली टीचर की तरफ उठा देते। टीचर कह देते -जाओ। एक को जाने की अनुमति मिलती, तो और चार खडे हो जाते। फिर टीचर कहते कि एक को आ जाने दो। तब जाना। ऐसे एक-एक कर सारे बच्चे ही बाहर जाने को उतारू रहते। उसने टीचर की आपसी बातचीत में दो-तीन बच्चों के लिए खासतौर पर यह सुना था कि - इनका पढाई-लिखाई में मन नहीं लगता है, इसलिए बार-बार टॉयलेट जाना चाहते हैं। इसी बहाने क्लास से छुट्टी मिले। यह बात उसके मन में घर कर गई थी।
वह कभी भी बाहर जाने की अनुमति नहीं माँगती थी। वह एक-एक कर बच्चों को बाहर जाते और आते देखती और सोचती थी, ये बाहर जाकर करते क्या होंगे क्या इतनी बार उनको पेशाब आती है। जुलाई से लेकर फरवरी आ गई थी, उसने कभी भी टीचर से चीटी ऊँगली उठाकर बाहर जाने की परमिशन नहीं माँगी थी। इन दिनों उसकी क्लास टीचर वह मैडम थीं।
एक दोपहर जब बच्चे अन्दर-बाहर अन्दर-बाहर कर रहे थे मैडम ने उसे इशारे से अपने पास बुलाया। उसे डर लगा, लेकिन सोचती हुई गई कि उसने तो कोई गलती की ही नहीं, तो मैडम ने उसे क्यों अपने पास बुलाया। डरते-डरते वह मैडम के पास गई, तो उन्होंने उसे बहुत प्यार से नाम पूछा। फिर उससे पूछा, इतने दिनों से मैं देख रही हूँ सारे बच्चे पेशाब करने के लिए छुट्टी माँगते हैं, तुमने कभी नहीं माँगी क्या बात है?
उसे सूझा ही नहीं इस बात का क्या जवाब दे, तो वह चुप रही। फिर मैडम ने ही कहा, बेटा यदि बाथरूम आ रहा हो, तो उसे दबाना नहीं, इससे बीमार हो जाते हैं। जब कभी जाना हो पूछ लिया करो। उसने आज्ञाकारी बच्चे की तरह गर्दन हिलाकर हाँ कर दी और अपनी जगह पर आकर बैठ गई।
वह देर तक सोचती रही कि जो मैडम ने उससे कहा वह तो किसी विषय के अंतर्गत नहीं आता है।
5
ताईजी कहती हैं कि बहुत बचपन में वह बहुत बीमार रहती थी। जाने वह कितने बचपन की बात रही होगी। वे बताती थी कि उन दिनों तो आने-जाने के साधन भी नहीं हुआ करते थे। आधी-आधी रात को बारिश पानी में ताऊजी छाता पकड कर चलते थे और ताईजी उसे उठाए अस्पताल भागती थीं। उसे तो कुछ याद नहीं है। जब से होश सँभाला है, छोटे भाई को ही बीमार होते देखती रही है। कभी पीलिया, तो कभी टॉयफॉइड...। माँ सारा-सारा दिन उसका सिर गोद में लेकर बैठी रहती थी, माँ हटती तो ताई... पापा ऑफिस से छुट्टी ले लिया करते और ताऊजी आधी छुट्टी कर घर आ जाते। वह बस दर्शक बनी देखती रहती... कितना लाड करते हैं, सब बीमार बच्चे से... कोई आस उसमें भी जागती। पैंपर शब्द से तब तक वह परिचित नहीं थी। पता नहीं कैसी मिट्टी थी, उसकी कि कभी उसका बुखार तक 100 से उपर नहीं जाता था। इस बात का मलाल था उसे... ।
उस दिन भी भाई की बीमारी का ग्यारहवाँ दिन था। बुखार उतरता और फिर चढने लगता...। कभी-कभी तो थर्मामीटर अविश्वसनीय छलाँग लगता और बुखार 104 डिग्री या फिर 105 के करीब पहुँच जाता... घर का हरेक सदस्य घबराने लगता, कोई इस डॉक्टर के पास ले जाने की बात करता तो कोई दूसरे...। वह बस दर्शक हुआ करती।
आखिरकार डॉक्टर ने सलाह दे ही डाली कि बच्चे को अस्पताल में भर्ती करना पडेगा। उन दिनों प्राइवेट अस्पताल बहुत ज्यादा नहीं हुआ करते थे और जो होते थे, उनकी विश्वसनीयता भी नहीं थी, सो सिविल अस्पताल में भाई को भर्ती करा दिया गया। दिन-भर एक-के-बाद एक टेस्ट होते रहे और शाम तक पता चला कि पीलिया तो खैर था ही, अब डबल टॉयफॉयड भी हो गया है। बुखार भी उतरते-उतरते ही उतरेगा। माँ उदास होकर भाई के लिए मौसंबी का रस निकाल रही थी। काँच का काँटे वाला कटोरा... मौंसबी को दबा-दबाकर नरम करने के बाद नींबू की तरह उसे बीच में से काटकर उस काँटे वाले उभरे हिस्से पर पूरी ताकत से दबाकर माँ रस निकाल रही थी। नीचे सारा रस इकट्ठा हो रहा था। काँच के ही गिलास पर गीला कपडा लगाकर सारा रस उसमें उँडेलती, फिर कपडे को भी पूरी ताकत से निचोड देती। ना तो छिलकों में कुछ बचता और न ही कपडे में जमा कूचे में... सारा रस गिलास में उतर आता और धीरे-धीरे गिलास में रस की मात्रा बढती जाती... वह बडी हसरत से गिलास में धीरे-धीरे बढते रस को देखती।
उसका मन होता कि छिलकों को उलटाकर आधी कटी निचुडी हुई फाँकों को खा ले... लेकिन माँ की झिडकी के डर से बस देखती रहती। माँ का ध्यान भंग हुआ तो उन्होंने आँखों से इशारा किया कि देख लें, यदि इसमें कुछ बचा हो तो... फिर जाने क्या सोचकर आखिरी वाली मौसंबी में थोडा-सा रस छोड दिया और उसने कृतज्ञ होकर माँ की तरफ देखा। रस में ढेर सारा ग्लूकोज डालकर जब भाई के दिया तो वह रोने लगा। वह समझ ही नहीं पा रही थी कि इसमें रोने की क्या बात है? वह कह रहा था मुझे नहीं पीना और सब उसे पुचकार कर और थोडा-सा पी लेने की मनुहार करते... एक घूँट पी ले, ऐसा कहकर फुसलाते।
उसे बडा आश्चर्य होता कि कोई कैसे फल और जूस के लिए भी इन्कार करता होगा। फिर भाई को समझाने के लिए गिलास में से थोडा रस किसी कटोरी में डाला कर उसे दे दिया.... कि देख अब कम कर लिया है, अब तो पी ले...।
फल काटकर उसे बहुत मान-मनौव्वल कर खिलाए जाते और वह सोचती कि कोई ऐसा बीमार कैसे हो सकता है कि फल खाने से ही इन्कार कर दे। फिर खुद से एक वादा करती, यदि वह बीमार हुई तो कभी...कभी... फल खाने से इन्कार नहीं करेगी... लेकिन वह ऐसी बीमार कभी हुई ही नहीं।
*
बाद के सालों में उसने अपने इर्द-गिर्द की लडकियों को ऑब्जर्व किया और निष्कर्ष निकाला कि लडकियाँ न तो जल्दी बीमार होती है और न ही जल्दी मरती हैं।


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