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घोंघा बसंत

एस.डी. वैष्णव
शहर की सुरम्य वादियों के बीच में साहित्य के एक प्रोफेसर ने अपना घर बना रखा था। वहाँ वह पत्नी सावित्री के साथ रहता था। उनके कोई संतान नहीं थी। दोनों सुखद जीवन यापन कर रहे थे।
बसन्त का महीना था। प्रोफेसर के घर के इर्द-गिर्द खेत, सरसों के फूलों से भरे पीले दिखाई दे रहे थे। कुछ वृक्षों की शाखाओं पर नये पत्ते आने लगे थे। आम के वृक्ष बौरों से लदने शुरू हो चुके थे। प्रोफेसर ने दालान के गमलों में कुछ सुगंधित पुष्पों से लकदक मेक्सिकन रुवेलिया सिम्प्लेक्स और डेजर्ट पिटूनिया के पौध लगा रखे थे।
रात का पहला पहर। ठण्डी बयार चल रही थी। सुहावने मौसम में सरसों के फूलों से आती सौंधी महक से सौंदर्य के देवता कामदेव प्रोफेसर के मन को राग-रंग से भर रहे थे। कामदेव के पुत्र ऋतुराज बसन्त के मदमाते यौवन को देखकर प्रोफेसर को देव की कविता याद आई, तो उसने रीतिकाल पढना शुरू किया। अगले दिन उसे कॉलेज में यही अध्याय पढाना था।
डार दु*म पलना बिछौना नव पल्लव के/सुमन झिंगूला सोहैं तन छबि भारी दै..।
प्रोफेसर बडे चाव से रस ले-लेकर अपने विद्यार्थियों को रसमय किया करता था। देव का बसन्त वर्णन पूरा करने के बाद वह बिहारी तक जा पहुँचा। बिहारी की नायिका का नख-शिख पढते-पढते उसे झेंप आने लगी, तो किताब अपनी चट्टान की मानिंद उभरी हुई तोंद पर रखकर सो गया।
जिस तरह घोंघा शंख के अन्दर-बाहर होता रहता है, उसकी तोंद भी वैसे ही हो रही थी। प्रोफेसर धीरे-धीरे स्वप्न लोक में चला गया। बिहारी ने एक दोहा फेंका। दोहा श्रृंगार का था। प्रोफेसर को भक्ति और नीति पर बात करना कम पसंद था। वह कई दिनों से एक अच्छी कहानी लिखने की सोच रहा था। कई कागज रंग चुका पर कहानी मूर्त रूप नहीं ले पा रही थी। पर आज जब स्वप्न में बिहारी ने दोहा उसके मानस पटल पर रखा, तो उसे एक प्रेम कहानी बनती दिखाई पडी..। लेकिन बता दूँ कि प्रोफेसर स्वप्न में है और आप कहानी तब तक ही सुन सकेंगे, जब तक स्वप्न चलता रहेगा या उसकी पत्नी आकर सुबह उसकी तोंद में हाँक नहीं भर देती।
प्रोफेसर समुद्र किनारे चला गया है। वहाँ रेत पर बैठा वह अपनी जवानी के दिनों में खोया हुआ है। इधर समुद्री लहरों के साथ बहकर दो घोंघे प्रोफेसर के पास आ टफ। वह खोया हुआ अवश्य था.. पर उसकी नजरें अनिमेष उन पर जमी हुई थीं। दोनों शंख से बाहर निकल कर एक-दूसरे के करीब आने के प्रयास में थे।
प्रोफेसर सोच रहा था कि इनके रीढ की हड्डी नहीं होती, फिर भी अथाह सागर नाप लेते हैं। मनुष्य के रीढ की हड्डी होती है। पर क्या फायदा। उसे याद हो आया.. वह भी कभी अपनी प्रेमिका के साथ यहीं रेत पर बैठा-बैठा, उसे बसन्त पर कविताएँ सुनाया करता था। प्रेमिका ने ही उसका नाम बसन्त रखा था।
रात के करीब दो बज गए। प्रोफेसर के चेहरे पर पानी की छोटी-छोटी बूँदें उग आई थीं। इसका अभिप्रेत यह है कि समुद्र किनारे कुछ विशेष घटने वाला है। अन्यथा बात तो श्रृंगार की चल रही थी। आप से गुजारिश है कि अन्त तक समुद्र किनारे पर ही टिके रहें, अन्यथा संशय पैदा होने की संभावना रहेगी। क्योंकि मैं और आप लेखक नहीं..पाठक हैं। और जो लेखक है, उनके हाल-ए-नजर आफ सामने हैं।
खैर, इधर दोनों घोंघा करीब आ चुके हैं। वे धूप सेकना चाहते हैं। प्रोफेसर ने सोचा.. शायद नर और मादा होंगे! तट पर रोमांस करने आए होंगे..। बिना वीजा के ये कई देशों के तटों पर घूम आते हैं। एक मैं हूँ.. कभी प्रेमिका को देश से बाहर न ले जा पाया.. खाली घनानंद बना रहा।
सहसा प्रोफेसर को झटका लगा। उसने घोंघा के मुँह से मनुष्य की आवाज सुनी..।
तुम्हें पता है! कई जन्म पूर्व मैं अंगकोर वाट के हिन्दू राजा की राज नर्तकी हुआ करती थी। वहाँ सभा में बसन्त नाम का एक विद्वान कवि भी था। वह मुझ पर आसक्त था। एक बार मीकांग नदी में प्रातः स्नान के समय उसे एक सर्प मणि हाथ लगी। बडी रहस्यमयी थी वह मणि। उस मणि के प्रभाव से ही मुझे पूर्व जन्मों की सारी घटनाएँ याद हैं। अपना मृत्यु समय निकट जानकर कवि ने वह मणि मेरे हाथ में रख दी थी।
क्या तुम्हें पता है कि वह रहस्यमयी मणि अब कहाँ है..?
हाँ..सिमरिप नदी के तट से कुछ दूरी पर खमेर साम्राज्य का भव्य महल बना हुआ है। वहाँ पर चोल शैली की.....।
मादा घोंघा मणि का सही ठिकाना बताती.. इससे पहले समुद्र से उठी एक जोरदार लहर दोनों को पानी में खींच ले गई।
प्रोफेसर ने झटके से उनको पकडने की नाकाम कोशिश की। उसके हाथ सिर्फ रेत आई। वह औंधे मुँह गिर पडा। उसके मुँह में पानी भर गया। घबराहट के मारे वह जाग गया। स्वप्न भंग हो गया। वह उठ बैठा। पानी पिया। अपना हुलिया दुरुस्त किया। उसे फिर देव की कविता याद आई -
चाहत उठाई, उठि गई सो निगोडी नींद, सोय गये भाग मेरे जागिवा जगन में..।
स्वप्न लोक में गोता लगा रहे प्रोफेसर की घोंघे से मुलाकात ने उन्हें चक्कर में डाल दिया।
उसने सोचा-सपने सच भी तो होते हैं! मन में सपनों का पलना भी जरूरी है, कडी मेहनत उन्हें हकीकत में तब्दील कर सकती ह।
दिन उगने वाला था। सुबह पर छाया झीना अँधेरा ढह रहा था। प्रोफेसर को अब नींद कहाँ..! उसने पत्नी को चाय बनाने के लिए उठा दिया और घर के अहाते में चहलकदमी करने लगा।
कॉलेज जाना है.. रीतिकाल पढाना है.. बसन्त पंचमी आ रही है.. बच्चे अवश्य कहीं भ्रमण की योजना बना रहे होंगे..! पर उन्हें कहाँ लेकर जाऊँ! कम्बोडिया! मणि..हाँ..!
मेरा नाम भी बसन्त। क्या उस नर्तकी से मेरा कोई सम्बन्ध तो नहीं..! मैं तो उससे कुछ पूछ ही नहीं पाया। कम्बख्त लहर! थोडी देर और ठहर जाती तो..मीकांग नदी..सिमरिप शहर..आज भी मौजूद होंगे..!
आज प्रोफेसर उधेडबुन में कॉलेज पहुँचा। आज उसे कोई सुधबुध नहीं थी। बस एक द्वंद्व भीतर चल रहा था। वह क्लास में पहुँचा। बच्चों से कहा कि आज कोई बसन्त पर कविता सुनाएँ। क्लास का सबसे होशियार लडका खडा हुआ और कविता सुनाना शुरू किया।
बरस जाए इस बसन्त भी, कुछ चाँदनी इस ओर.. यह तुम्हारा श्वेत आँचल, दुग्ध धवल चितचोर..।
चाँदनी शब्द सुनते ही क्लास की चाँदनी नाम की लडकी खडी हो गई।
सर! यह हर रोज मुझे इसी तरह चिढाता रहता है।
श्रीमान! क्या कविता में शब्दों के पर्याय होते हैं..?
नहीं। तुम आगे बोलना जारी रखो।
इधर चाँदनी के पास बैठी लडकी ने चाँदनी के चिकुटि काटी..वह धीमे से बुदबुदाई- घोंघा बसन्त।
प्रोफेसर को झटका लगा। घोंघा बसन्त! इनको कैसे पता चला मेरे स्वप्न के बारे में। कहीं उस मणि के बारे में इनको पता तो नहीं चल गया..!
प्रोफेसर कॉलेज के बाद घर के लिए निकला। कई सारे विचारों का दिमाग में जमघट लगा हुआ था। मस्तिष्क फटा जा रहा था, पर प्रोफेसर दिमाग पर जोर दिये जा रहा था। अचानक उसकी नजरों के सामने अँधेरा छा गया। उसकी गाडी एक चारपहिया वाहन से जा टकराई। कुछ देर बाद प्रोफेसर ने स्वयं को एक अस्पताल के बिस्तर पर पाया। पास के स्टैण्ड पर बोतल उल्टी लटक रही है। स्लाइन में रह-रह कर पानी की बूँदें गिर रही हैं।
मिलने आने वालों का अस्पताल में ताँता लगा हुआ है। प्रोफेसर स्वप्न में जाना चाहता है कि कोई न कोई मिलने आ जाता है। शाम के वक्त क्लास के कुछ बच्चे मिलने पहुँचे। चाँदनी भी आई थी।
बच्चे कुछ देर प्रोफेसर से हाल-चाल पूछते रहे। जब जाने लगे तब प्रोफेसर ने चाँदनी से पूछा- चाँदनी! तुमने क्लास में घोंघा बसन्त क्यों बोला..?
सर मैंने नहीं..निर्झरा ने बोला।
हाँ..तो निर्झरा तुम बताओ, क्यों बोला ऐसा?
निर्झरा स्तब्ध! सोच में पड गई कि अब प्रोफेसर को घोंघा बसन्त का मानक हिंदी शब्दकोश का अर्थ कैसे बताऊ! उसने कनखियों से चाँदनी को देखा। वह दाँतों को पीसते हुए चुपचाप खडी रही।
तभी कुछ और रिश्तेदार मिलने आ गए। इधर बच्चे खिसक लिए।
उस मणि के ठिकाने और आगे का रहस्य प्रोफेसर के स्वप्न पर निर्भर करता है। और बिना स्वप्न के आगे आपको कुछ बता पाना मेरी हद में नहीं है। मुझे अफसोस है..। उधर अस्पताल के बाहर बच्चे ठहाके पर ठहाके मारे जा रहे हैं.. घोंघा बसन्त.. घोंघा बसन्त..!
***
बसन्त का महिना बीत चुका था। ग्रीष्म के दिन शुरू हो चुके थे। इधर कई दिनों से मैं प्रोफेसर के स्वप्न के इंतजार में था, क्योंकि रहस्यमयी मणि का ठिकाना प्रोफेसर के स्वप्न पर निर्भर था।
उधर आपने देखा कि अस्पताल में प्रोफेसर अपने जख्म से नहीं, बल्कि नींद और स्वप्न के मध्य की दूरी से उपजी पीडा से बिलबिला रहा था। कुछ दिन अस्पताल में खपाने के बाद प्रोफेसर घर लौट आया। कईं दिनों तक उसे स्वप्न नहीं आया। वह आए दिन समुद्र किनारे जाता रहा, पर दोनों घोंघे उसे दिखाई नहीं दिए। धीरे-धीरे सात माह बीत गये। इधर उसकी सेवानिवृत्ति का समय भी करीब आ रहा था।
शीतकाल का समय था। प्रोफेसर ने अपनी पत्नी से कहा कि मेरे सो जाने के बाद मुझे कोई जगाए नहीं। जब मेरी नींद पूरी होगी, तब मैं प्रातःकाल स्वतः ही उठ जाया करूँगा। पत्नी भी हैरान रहने लगी। पर सोचा-इनका रिटायरमेन्ट नजदीक है। अच्छे खासे पैसे मिलेंगे। नया बाजूबंद.. नेकलेस.. बहुत कुछ खरीदना है। अभी कुछ कहना उचित नहीं होगा।
इधर अब प्रोफेसर पर बिहारी से ज्यादा उस रहस्यमयी मणि का जादू छाया रहने लगा। उसने रीतिकाल पढना-पढाना लगभग बन्द कर दिया था। एक दिन उसने मिस्ट्री और थ्रिलर से परिपूर्ण स्टीवेंसन के उपन्यास ट्रेजर आइलैंड का हिन्दी अनुवाद उठाया।
उपन्यास डरावना था। उपन्यास का नायक साँप के जहर का नशा करता था, जिससे उसकी आँखें खतरनाक और नीली पड गई थीं। एकबारगी प्रोफेसर को सिकुडन और सिहरन पैदा हुई। उसके रोंगटे खडे हो गए। उसने उठकर पानी पिया। घर के दरवाजे और खिडकियों की कुण्डी ठीक से जाँची। दूसरे कमरे में देखा, उसकी पत्नी औंधे मुँह खर्राटे मार रही थी। उसने फिर पढना शुरू किया। पढते-पढते नींद के आगोश से होते हुए वह स्वप्नलोक में पहुँच गया।
अब प्रोफेसर समुद्र के किनारे पर था। वहाँ उसने एक विचित्र दृश्य देखा। शीतकाल में एक बूढा मछुआरा अपना महीन जाल फैला रहा था। वह अपने जाल से मछलियों को निकाल कर वापस समुद्र में फेंक रहा था और जाल में फँसे घोंघों को अपनी टोकरी में भर रहा था। समुद्र किनारे उसका लॉज था। जहाँ वह घोंघों को पकाकर खाता था।
यह सब देखकर प्रोफेसर स्तब्ध था। वह मछुआरे के पास गया। उसकी टोकरी लगभग पूरी भर चुकी थी। आज संयोगवश दोनों घोंघा मछुआरे की कैद में थे। वे तडप रहे थे। नर घोंघा ने मादा घोंघा से कहा- तुम पर तो उस रहस्यमयी मणि का प्रभाव है। तुम बता सकती हो कि क्या यह मछुआरा हमें मार देगा?
नहीं..! मणि ने मुझे बताया था कि जब मैं समुद्री जीव के रूप में जन्म लूँगी और मेरे प्राण संकट में होंगे, तब मेरा अपना कोई मनुष्य रूप में मेरी सहायता करेगा।
यह सुनकर प्रोफेसर अवाक रह गया। वह मछुआरे से दोस्ती गाँठने लगा। वह मछुआरे के पीछे-पीछे उसके लॉज तक आ गया। उसने देखा कि लॉज में एक छोटी लाइब्रेरी बनी हुई थी। जहाँ ढेर सारे उपन्यास रखे हुए थे और एक कोने में शराब की कई खाली बोतलें पडी हुई थीं। चारों ओर बार्लो वाइन की सुगंध बिखरी हुई थी। सोचा, शायद मछुआरे को पीने का शौक होगा। उसने मछुआरे के सामने एक शर्त रख दी।
क्या तुम्हें शराब पसंद है?
हाँ..! बहुत ज्यादा.. तले हुये घोंघा के साथ मुझे शराब पीना पसंद है।
यदि तुम घोंघा से भरी यह टोकरी मुझे देते हो, तो मैं तुम्हें मन पसन्द इतालवी शराब खरीद कर दे सकता हूँ.. बार्लो.. रोसो और साथ में कुछ धन भी।
बूढा मछुआरा सोच में पड गया। सोचा, घोंघा तो मैं और भी पकड सकता हूँ। ऐसा अवसर फिर हाथ नहीं आयेगा। इतालवी शराब..! धन..! ज्यादा तकाजा करना भी ठीक नहीं हगा। मछुआरे ने सौदा पटा लिया।
प्रोफेसर ने टोकरी उठा ली। उसे समुद्र तट पर ले आया। तट पर हल्की धूप खिली हुई थी। उसने टोकरी रेत पर उडेल दी। दोनों घोंघा सबसे अलग बैठ कर सुस्ताने लगे।
तुम एक बार उस रहस्यमयी मणि के ठिकाने के बारे में बता रही थी! नर घोंघा ने पूछा।
हाँ..! याद है। वहाँ पर बौद्ध धर्म की महायान शाखा के देवता अवलोकितेश्वर की चोल शैली की मूर्ति लगी हुई है। जिसकी प्रतिदिन पूजा होती है। वह मूर्ति बरगद के एक रहस्यमय पेड के नीचे स्थित है। और वह मणि उसी मूर्ति के नीचे एक सन्दूक में बन्द है। पर बिना उस पेड की इजाजत के मणि तक नहीं पहुँचा जा सकता। उसके लिए एक मन्त्र का उच्चारण करना पडेगा।
वह मन्त्र क्या है?
वह मन्त्र में अभी नहीं बता सकती। यदि वह मन्त्र किसी और को समय से पूर्व बताऊँगी, तो मेरी मृत्यु हो जाएगी।
तो क्या कोई मनुष्य उस मणि तक नहीं पहुँच पाएगा?
अवश्य पहुँचेगा। खमेर साम्राज्य के उस महल में रहस्यमयी पेड के मन्त्र का राज छिपा हुआ है। मणि को प्राप्त करने वाले को उस महल में जाने पर सब कुछ हाथ लग जाएगा। जैसे ही कोई उस मणि को प्राप्त करेगा, मेरी और उसकी मृत्यु एक साथ हो जाएगी। परन्तु जो उसे प्राप्त करेगा, अगले जन्म में वह खमेर साम्राज्य का सम्राट बनेगा और मैं उसे एक सुन्दर राजकुमारी के रूप में प्राप्त होऊँगी।
मृत्यु की बात सुनकर प्रोफेसर अन्दर तक काँप उठा। उसकी हड्डियाँ ठण्डी पड गई। पर अगले ही पल उसे सुन्दर राजकुमारी और खमेर साम्राज्य नजर आया।
इधर सूर्य क्षितिज की ओर बढ रहा था। तट पर कोहरा छाने लगा था। प्रोफेसर विचारों में खोया हुआ था। रेत पर कई घोंघे चहलकदमी करते हुए पानी की ओर बढ रहे थे। एक घोंघा ने प्रोफेसर के पैर पर काट खाया। वह जोर से चिल्लाया। दर्द के मारे वह जाग बैठा। उसका स्वप्न टूट गया। प्रोफेसर के चिल्लाने से उसकी पत्नी भी उठ बैठी।
प्रोफेसर ने एकटक अपनी पत्नी की ओर देखा। जिसे पीछे छोडकर वह एक लम्बी यात्रा पर निकलने वाला था। अब उसे विश्वास हो गया कि वही उस नर्तकी का प्रेमी बसन्त है। अब उसकी भी मौत निकट है, और कोई भी उसे नियति से बचा नहीं सकता। कुछ भी हो, वह मणि प्राप्त करके ही रहेगा। उसकी आँखों में फिर उस सुन्दर राजकुमारी का प्रतिबिम्ब उभर आया।
मौत के डर से सपनों को रौंदा नहीं जा सकता। मृत्यु शाश्वत सत्य है। अमरेन्द्र ने ठीक ही कहा है -
मध्य निशा की नींद, मृत्यु है; जीवन मध्य दिवस है
योगी हो, या नर हो, सुर हो, किसका इस पर बस ह।
उसी दिन उसने बीमा एजेण्ट को बुलाकर दोनों का संयुक्त बीमा करवाया ताकि उसकी मृत्यु के पश्चात् सारी रकम पत्नी को मिल सके। वह एक तीर से दो निशाने साध रहा था। अंततः प्रोफेसर ने फैसला किया कि सेवानिवृत्ति के तुरन्त बाद वह समुद्री मार्ग से मणि की खोज में निकल पडेगा।
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धीरे-धीरे प्रोफेसर के रिटायरमेंट का दिन भी आ पहुँचा। उस दिन वह अपने विद्यार्थियों और स्टाफ के साथियों के साथ बहुत भावुक हो रहा था। कोई विद्यार्थी माला पहना रहा था, तो कोई उपहार दे रहा था। चाँदनी ने भी प्रोफेसर की प्रशंसा में लम्बा-चौडा पुल बाँध दिया। इधर प्रोफेसर की आँखों से आँसू बह निकले।
विभाग का एक साथी प्रोफेसर के पास आकर बोला- सर! जब भी विभाग कोई साहित्यिक कार्यक्रम करेगा, आपका वक्तव्य और आतिथ्य हमेशा रहेगा। ऐसी हम आशा करते हैं।
प्रोफेसर सोच रहा था कि इन सब को कैसे बताऊँ कि मैं अब इनसे कभी मिल नहीं पाऊँगा..। यह अंतिम अवसर है, जो भी वैचारिक उद्बोधन, वक्तव्य चाहते हो; आज ही करवा लो.. कल किसने देखा!
प्रोफेसर ने आज अपनी ओर से वह सब कुछ बोला, जो विद्यार्थियों को लाभान्वित कर सके। बिहारी के कुछ नीति और भक्ति के दोहे भी रखे। आज श्रृंगार का अवसर न था। लगे हाथ उसने जैसे किसी दैवीय शक्ति के प्रभाव से सबको घर पर शाम के भोज का निमंत्रण भी दे दिया। छात्रों ने जोरदार तालियाँ पीट दीं। सब इसी घोषणा की ताक में थे। पर निर्झरा थोडी संकोच में थी कि कहीं प्रोफेसर शाम को घर पर फिर न पूछ ले कि तुमने घोंघा बसन्त क्यों बोला! अगर पूछा, तो कोई गोलमाल जवाब दे दूँगी। उन्हें मुँह पर घोंघा बसन्त कहना भी ठीक नहीं होगा..। ऊखली में सिर दिया, तो मूसल से क्या डरना। खैर, जो भी होगा; देखा जाएगा। स्वादिष्ट भोजन का अवसर छोडना उचित नहीं होगा। पता नहीं, फिर कब ऐसा अवसर आयेगा..!
शाम का वक्त है। प्रोफेसर के घर के अहाते में मेहमानों का जमघट लगा हुआ है। कौन क्या उपहार लाया या कौन लिफाफा लाया, इससे प्रोफेसर को कोई फर्क नहीं पड रहा। उसे सिर्फ सुन्दर राजकुमारी का बार-बार ख्याल आ रहा है। अब उसे मरने का भी डर नहीं रहा। जो निश्चित है, वह होकर रहेगा। सहसा उसकी नजरें चाँदनी और निर्झरा पर पडीं। वे दोनों कोने में दुबकी भोजन का लुफ्त उठा रही थीं। उनको देखकर प्रोफेसर के कान में एक ही ध्वनि गूँजती है- घोंघा बसन्त..घोंघा बसन्त।
वह आहिस्ता-आहिस्ता दोनों के पास पहुँच गया। निर्झरा तो सहमी हुई थी कि प्रोफेसर शान्ति से भोजन भी गले उतरने देगा या नहीं!
भोजन कैसा लगा निर्झरा..? प्रोफेसर ने पूछा ।
सर हम आफ लिए उपहार लाए हैं..। चाँदनी बीच में ही बोल पडी।
नहीं, नहीं.. तुम बच्चों से कोई उपहार नहीं लूँगा।
वातावरण में थोडी-सी खामोशी.. सन्नाटा..। सब एक-दूसरे के मन की बात को ताड रहे हैं..।
निर्झरा! उस दिन तुमने घोंघा बसन्त क्यों बोला..?
..कैसा आदमी है! बाल की खाल निकाल रहा है। वाकई में घोंघा बसन्त है..। चिराग तले अँधेरा! निर्झरा मन ही मन बुदबुदाई।
अरे सर! बसन्त नहीं, बसन्त बोला था। बसन्त.. बसन्त ऋतु के बारे में।
हाँ.. पर क्यों बोला था? वही तो पूछ रहा हूँ।
सर! मुझे बसन्त में तले हुए घोंघे खाना बहुत पसंद है। पर आप यह बात किसी को बताइयेगा मत।
नॉनवेज!्
जी सर!
निर्झरा इधर आओ.. आइसक्रीम खाते हैं। चाँदनी इस बहाने उसे दूसरी ओर ले गई ।
इधर प्रोफेसर फिर सदमे में है। उसे आश्चर्य होता है कि इन लडकियों को मेरे स्वप्न के बारे में कैसे पता चल जाता है! क्या यह संयोग मात्र तो नहीं! इन दोनों से दूर रहना ही ठीक होगा। इस विषय पर इनसे ज्यादा बात की, तो बात चारों ओर फैल भी सकती है। घर का भेदी लंका ढाहे..।

सम्पर्क - दुर्गा भवन विश्वविद्यालय मार्ग,
गणेश नगर, उदयपुर-३१३००१
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