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हिये तराजू तौल के..

दिव्या विजय
चीटर, चीटर बब्बा वहाँ से गुजरा, तो लडकों ने चिल्लाना शुरू कर दिया। बब्बा ने तीखी नजरों से उनको देखा। इनमें तो दूसरी कक्षा के लडके भी शामिल हैं। मतलब बात उन तक पहुँच चुकी है। यह जरूर काजू का काम होगा..कुत्तन कहीं का। बहुत सगा बनता है बडी क्लास के लडकों का। ये बडी क्लास के लडके किसी के अपने नहीं होते। काम निकलते ही, मौका पा कर कचर-पचर कर फेंक देते हैं। बब्बा भी तो कभी दोस्त होता था उनका। क्रिकेट खेलते समय पिदाते रहते थे। स्सालेज्हमेशा बॉल के पीछे मैदान का चक्कर कटाते। बल्लेबाजी का नम्बर तो कभी लगा ही नहीं। एक दिन मना किया, तो उसे धुन दिया। हुँह! किसी दिन यह भी पिटेगा। बोलचाल होती तो उसे आगाह करता, लेकिन काजू उसकी बात नहीं सुनता। क्या करे वह! इन दिनों कोई उस पर यकीन नहीं करता।
नलकों के सामने मैदान है जहाँ आधी छुट्टी में लडके खेलते हैं। कोई भी मौसम हो खेल नहीं रुकता। लडकों के शरीर पर जैसे कोई अदृश्य कवच हो, जो उन्हें मौसम की मुश्किलों से बचा लेता है। अब भी सूरज के आक्रोश का उन पर असर नहीं हो रहा है। लडकों की चिल्लाहट तेज हुई, तो बब्बा दीवार की आड में खडा हो गया। इस ओर प्राइमरी कक्षाएँ हैं। उसने भीतर झाँका। कुछ बच्चे खेल रहे थे, दो-तीन नींद में लुढके पडे थे और कुछ बाईजी के हाथ से खाना खा रहे थे। बब्बा को अचानक माँ की याद हो आयी। घर पर सब कितना अच्छा होता है। कूलर की ठण्डी-ठण्डी हवा, माँ की बगल में सोना। माँ पर्दे लगाकर दिन को ढक देती हैं, सब कैसा सुहाना हो उठता है। उसे लगता है जैसे माँ ही घर है। लेकिन उसे माँ की एक बात पसंद नहीं.. वह जबरदस्ती बब्बा को स्कूल भेजती हैं, जबकि उन्हें सब कुछ पता है। माँ कहती हैं ये बातें तो जीवन का हिस्सा हैं। इन सब को पीछे धकेल कर ही आगे बढा जा सकता है। उसे समझ नहीं आता, बातों को पीछे कैसे धकेलते हैं। वह अज्जू दीदी की ओर देखता है। अज्जू दीदी खिलौने वाली नाव हाथ में पकड कर कहती हैं, मान लो यह नाव नदी में है, कहते हुए वह नाव पानी भरी परात में डाल देती हैं। और इस नाव में बैठे हो तुम। वह प्लास्टिक के एक गुड्डे को नाव पर बिठा देती हैं। अब तुम पानी को पतवार से पीछे धकोलेगे और आगे बढोगे। देखो ऐसे। बब्बा देखता है, दीदी की छुटकी उँगली पतवार बनी, परात में भरे पानी को पीछे धकिया रही है और नाव डगमग-डगमग आगे बढ रही है। वह अब भी नहीं समझ पाता। बातें तो साथ-साथ चलती हैं, हर रोज..जैसे आगे बढने पर भी पानी नाव के साथ चलता है। वह चुपचाप कमरे से बाहर निकल जाता है। पीछे मुड कर भी नहीं देखता, उसे भय होता है कहीं गुड्डा नाव से गिर न पडे।
पापा सिर पटकते हैं कि उस जैसा लडका दुनिया में कैसे सर्वाइव करेगा। वे अक्सर उस से नाराज रहते हैं। कहते हैं यह लडका लुटिया डुबो देगा। उन्हें लगता है दुनिया के सारे बच्चे उस से *यादा स्मार्ट हैं, खासकर उनके दोस्तों के बच्चे। पापा बात-बात में उनका उदाहरण देते हैं। वे घर आते हैं तो उनसे कहते हैं, बब्बा को भी अपने जैसा बनाओ। बब्बा ने कहीं पढा था, एक-दूसरे से जुडने के लिए हम समानताएँ खोजते हैं किंतु ऐसा करते हुए खुद से दूर हो जाते हैं। असल में हमें अपनी असमानताओं को पोषित करना चाहिए। तब ही स्वस्थ समाज बनेगा जहाँ लोग एक-दूसरे को मूल रूप में स्वीकार सकेंगे अन्यथा सब एक-दूसरे की फोटोकॉपी होकर रह जाएँगे। अज्जू दीदी न होतीं तो शब्दों की इस भूल-भुलैया में वह खो जाता। दीदी से इस बात का मतलब समझ वह खुशी से कूदने लगा था। उसने तय किया था यह बात वह पापा को समझाएगा, लेकिन इतना दिलेर वह कभी न हो सका।
पापा कहते हैं..बी प्रैक्टिकल! हाथों-हाथ सबको मुँहतोड जवाब दो। जरूरत पडने पर हाथ-पाँव का इस्तेमाल भी करो पर उसे डर लगता है। वह कैसे लडे-झगडे सबसे! किसी ने मैडम को शिकायत कर दी तो स्टिक से मार-मार कर हाथ छील देंगी। काश, अज्जू दीदी, दीदी न होकर भैया होतीं, तो इसी स्कूल में पढतीं। वह इन सबको लताड लगातीं। मैडम को भी समझा देतीं कि उनका भाई ऐसा नहीं है। बब्बा तो अच्छा, ईमानदार बच्चा है। वह तो बिना पूछे सामने रखी टॉफी भी नहीं उठाता। दूसरे बच्चे तो इधर-उधर पडे हुए कटर, रबड, स्केल सब ले जाते हैं।
काँय-काँय की आवाज गूँजी तो बब्बा ने पलट कर देखा। कौओं का झुंड आपस में झगड रहा था। लडकों का ध्यान उधर ही था। वे उन्हें पत्थर मार कर उडा रहे थे। पत्थर किसी कौवे को जा लगता, तो वह चीखता हुआ उड जाता। वातावरण में उज्जड आक्रामकता भरी हुई थी। बब्बा का साहस टूट रहा था, किंतु वह दोबारा आगे बढा। पसीने से भीगी उसकी हथेली में एक पत्थर भिंचा हुआ था। उसे देख लडके दोबारा चिल्लाने लगे। कौओं से हट कर उनकी दिलचस्पी फिर से बब्बा पर आ टिकी थी। बब्बा को उनके चेहरों पर कौओं का रक्त दिखाई दे रहा था। सहमी हुई कडवाहट उसके गले को बींध गयी। बब्बा की रही-सही हिम्मत जवाब दे गयी, पत्थर उसके हाथ से फिसल गया और वह आज भी रोज की तरह बगैर हाथ धोए लौट आया। कक्षा तक पहुँचते-पहुँचते वह रुआँसा हो चला था। उसने खाली बेंचों पर दृष्टि डाली। उसका एक भी दोस्त नहीं बचा। सब पर कठफोडवे बैठते हैं जो उसकी आत्मा पर अपनी नुकीली चोंच से वार कर उसे खोखला बनाने की साजिश रचते हैं। नहीं, उसे पशु-पक्षी बुरे नहीं लगते। बल्कि खरगोश, कुत्ते, बिल्लियाँ और चिडियाँ तो उसके दोस्त हैं, लेकिन जो उसे नुकसान पहुँचाए उन्हें वह कैसे दोस्त मान ले।
दीवार पर लगा हुआ चार्ट फडफडाया। बब्बा के मन में आया चार्ट फाड दे। उसका चार्ट शालू मैडम में नहीं चुना, जबकि कितना सुन्दर बना था। कहती थीं नीट नहीं है। यह जो सामने है वही कहाँ साफ-सुथरा है। मिटाने के निशान साफ नजर आ रहे हैं, पर वंश बन्सल मॉनिटर है न, मैडम का चहेता, इसलिए उसका कभी कुछ रिजेक्ट नहीं होता। उसने पीछे वाली सीट पर बैठकर आँखें मूँद लीं। पूरे छह घण्टे, सबकी कैसी चुभती हुई दृष्टि झेलनी पडती है जैसे तेज धूप में उसकी पीठ पर नुकीली सुइयाँ उग आती हैं। खुजलाने से वे सुइयाँ तो गायब हो जाती हैं मगर ये वालीं..। सब उसे घूरते हुए कानाफूसी करते रहते हैं। वह सबके मनोरंजन का केन्द्र हो चला है। पुरी सर तो उस दिन के बाद से बिना नागा उसे खडा कर सवाल पूछते हैं। जवाब न आने पर स्केल हथेली पर दे मारते हैं। पीछे-पीछे वह नाटा नन्हा गाता जाता है,
अकल-अकल कित्ती
नकल-नकल जित्ती
उसे अचानक गुस्सा आया। वह उठा और सबके बस्तों की जगह बदल दी। फिर उसने बस्तों में से किताबें निकालीं और दूसरे बच्चों के बस्तों में डाल दीं।। कुछ देर ठहर कर वह यह बदलाव देखता रहा। फिर जीआमट्री बॉक्स से प्रकार निकाल कर पीछे वाली दीवार खुरच डाली। बाद इसके, कक्षा के सारे पंखे और लाइट जला कर वह बाहर भाग गया। अब वंश की डाँट पडेगी, मॉनिटर जो ठहरा। उसी के कहने पर तो सब हुआ था। न वह झूठी शिकायत लगाता, न शालू मैडम कुछ कहतीं और न सब उसे गलत समझते। शालू मैडम ने प्रिया मैडम को भी बतला दिया। उसकी ड्राॅइंग वाली मैडम। एक वही थीं जो उसे प्यार करती थीं। उसे कोई परेशानी होती, तो वह उन्हीं से कहता। दुलार से उसके बालों पर हाथ फेर कर वह उसकी समस्या हल कर देतीं। अब वह भी उस से नाराज हैं। उस दिन उनकी क्लास थी। वे बब्बा से एक शब्द नहीं बोलीं। वह बार-बार उन्हें अपना चित्र दिखाने गया, लेकिन उन्होंने देखा तक नहीं। जाते समय वह पूरी कक्षा के सामने बोलीं,
बब्बा तुमसे यह उम्मीद नहीं थी।
बब्बा को काटो तो खून नहीं। यह वही प्रिया मैडम थीं जो सबको कहती थीं,

स्केचिंग सीखनी हो, तो बब्बा से सीखो, कितनी सफाई है उसके हाथ में। देखना एक दिन बब्बा बहुत बडा पेंटर बनेगा।
बब्बा धीमे-धीमे मुस्कुराता, तो वे हँसते हुए उसके गालों को सहला कर कहतीं, सच अ शाय बॉय।
वह उनके पीछे गया कि सच बता सके। रुँधे गले से किसी तरह उसने कहा था, मैंने नकल नहीं की मैडम। सब लोग झूठ कह रहे हैं।
अन्तिम सीढी पर वह रुकी थीं, सब लोग! बब्बा अपनी गलती मानना सीखो।
मैं सच कह रहा हूँ। शब्द धीरे-से फिसले थे। प्रिया मैडम कुछ क्षण एकटक उसे देखती रहीं। उनका ऊपरी होंठ तिरछा हुआ, आँखों में तिरस्कार उतरा। फिर बोलीं,
मुझसे नहीं, अपने आप से सच बोलना सीखो। दिखते सीधे हो, लेकिन हो नहीं। बब्बा अवाक रह गया। कठोर शब्द भाले की तरह गडे थे। जिस से सदा प्रेम मिला हो, उस से घृणा पाना कैसी यातना देता है! बब्बा जान गया था कि वह उनका विश्वास खो चुका है। उस दिन घर लौटकर तकिए में चेहरा छिपाकर वह खूब रोया था। माँ-पापा बारी-बारी आए, पर उसे सोता समझ लौट गए लेकिन अज्जू दीदी से कुछ नहीं छिप सकता। उन्होंने उसे पुचकारा, इमली वाली कैण्डी दी और उसने सिसकते हुए सब बता दिया। कारण जानने पर अज्जू दीदी ने उसे गले लगा कर कहा, किसी का सम्मान करो पर उसे इतना अधिकार न दो कि वह तुम्हें चोट पहुँचा सके। और सुनो..दुनिया तुम्हें जो चाहे समझे, तुम खुद पर यकीन रखो। उसने हैरत से दीदी को देखा। ऐसी बडी-बडी बातें कहाँ से सीखी होंगी उन्होंने। किन्तु सुनने में बातें जितनी भी अच्छी हों, उन्हें नहीं मालूम वह रोज क्या झेलता है। दीदी उसकी बहुत प्यारी हैं, किन्तु फिर भी एक अंतर है। एक निश्चित ऊँचाई पर पहुँचने के पश्चात व्यक्ति शायद अपने से नीचे वाली दुनिया को भली प्रकार नहीं समझ पाता। दीदी और अपने अक्स को आईने में वह देख रहा था।
बब्बा चुपचाप फिसलपट्टी पर आकर बैठ गया। यहाँ छोटे बच्चों के लिए झूले हैं। धूप की वजह से वे इस समय अन्दर रहते हैं लेकिन वह यहाँ छाँव पा जाता है। उसने गर्दन घुमा कर देखा, कोई नहीं था। डहलिया और गुडहल के पौधे दम साधे खडे थे। वह खुल कर रो सकता है। आँसू पटपटा कर बह निकले। वे पहले गालों पर फिसले फिर उसकी हथेली पर आ गिरे। वे ताजा लावा की तरह गर्म थे। उसके हाथ पर जरूर फफोले पडेंगे। अच्छा है! शायद माँ कुछ दिनों की छुट्टी करवा दें। अकेले रह जाने की इस पीडा में कितनी पीडाएँ मिली हुई थीं, वह स्वयं भी नहीं जानता। जानता है तो बस इतना कि रोते रहने से मस्तिष्क शिथिल पड जाता है और कुछ देर के लिए उसके सवालों की उमड-घुमड बंद हो जाती है। रोते-रोते उसकी नाक बहने लगी और मुँह से लार गिरने लगी। उसने उन्हें आस्तीन से पोंछ डाला। हवा की चिल्ल-पों बढ रही थी। हवा ने अपने धूल भरे हाथों से बब्बा के बालों को सहलाया। बब्बा ने उन खुरदुरे हाथों को सीने से चिपटा लिया। अब मैदान की रेत किसी जादू से हल्का-सा ऊपर उठेगी और तैरने लगेगी, फिर पेन की स्प्रिंग की तरह गोल-गोल घूमेगी। उसके आसपास के सारे लोग इसे बवण्डर कहते हैं। उसने सुना है बवंडर में कोई फँस जाए, तो बाहर नहीं निकल सकता। यह उडा ले जाता है और किसी दूसरी दुनिया में पहुँचा देता है। इंसान हमेशा के लिए वहीं कैद होकर रह जाता है। बब्बा कुछ देर देखता रहा, फिर भागकर रेत के उस बगूले के बीचोंबीच खडा हो गया। वह इस दुनिया में नहीं रहना चाहता।
तीन महीने पहले की ही तो बात है, परीक्षाएँ थीं। बब्बा ने इस बार पूरी तैयारी की थी। हर बार वह खेलने में इतना तल्लीन रहता था कि पढाई में मन नहीं रमता था पर इस बार वह चाहता था माँ को जन्मदिन पर अच्छे अंकों का तोहफा दे। पिछले दिनों उसने एक फिल्म देखी थी जिसमें माँ यही उपहार माँगती है, लेकिन बच्चे के कान पर जूँ तक नहीं रेंगती। माँ किसी बीमारी से चल बसती है और बच्चा पछतावे से भर जाता है। यह फिल्म देखकर वह बहुत रोया था और उसी दिन तय कर लिया था कि माँ को बहुत खुश रखेगा। अज्जू दीदी और माँ ने दो-दो बार रिवीजन भी करवाया था।
तीसरे दिन विज्ञान का पेपर था। प्रश्नपत्र मिला तो हमेशा की तरह उसका दिल जोर से उछला। वह सरसरी निगाह से ऊपर से नीचे तक पढ गया। एक-दो प्रश्न थे जिनमें संशय था, बाकी सब आता था। दिल वापस जगह पर आ गया। वह जल्दी-जल्दी लिखने लगा। परीक्षाओं में हाथ आप ही तेजी से चलने लगते हैं। कुछ देर बाद लिखते-लिखते पेन ने अचानक चलना बन्द कर दिया तो दूसरा पेन लेने के लिए वह रुका था। उसने देखा नन्नू उचक कर उसकी कॉपी में झाँक रहा है। वह दूर खिसक गया और लिखा हुआ छिपा लिया। तैयारी करके न आओ और नम्बर पूरे पा जाओ। हुँह।
थोडी देर बाद वह पानी पीने के लिए रुका, तो देखा नन्नू चुपचाप बैठा है, लिख नहीं रहा। उसने घडी देखी, वक्त *यादा नहीं बचा था। पानी पीकर, दुगुनी रफ्तार से वह लिखने लगा। कुछ क्षणों बाद नन्नू ने उसे कोहनी मारी। बब्बा ने बेरहमी से उसका हाथ झटक दिया। उसने इस बार बब्बा के पैर पर काँपता हुआ हाथ रख दिया। हाथ की सिहरन बब्बा तक पहुँची। उसने नन्नू को देखा। भयाकुल, विनती करती, भरी हुई आँखें। समय खत्म होने वाला है। बब्बा ने उसकी कॉपी देखी। एक पन्ना भी ठीक से नहीं भरा था। इस परीक्षा के नम्बर, फाइनल रिजल्ट में लगते हैं। इसमें पास नहीं हुए तो फेल कर दिए जाते हैं। यह कोरी धमकी नहीं थी। पिछले साल सिबिन सचमुच पिछली कक्षा में रह गया था। हेडमास्टर साहब किसी के कहने पर नहीं माने थे। कितना रोया था वह।
नन्नू बहुत दिनों बाद स्कूल आया था। बब्बा को मालूम है उसकी दादी बीमार थीं। वह अपने मम्मी-पापा के साथ गाँव गया था। हो सकता है इस कारण वह पढ न सका हो। उसे याद है जब उसके दादाजी की तबियत खराब हुई थी तब घर में भागमभाग मची रहती थी। बब्बा और उसकी पढाई की, तो किसी को फिक्र तक नहीं थी। सब लोग दवाई, डॉक्टर और दादा की देखरेख में व्यस्त रहते थे। कितने मुश्किल दिन थे वे। ऐसी मुश्किल किसी के साथ भी आ सकती है। अज्जू दीदी कहती हैं सबसे जरूरी मनुष्य है। उसे नहीं खोया जा सकता, जब तक वह सचमुच न खो जाए। नन्नू यही काम तो कर रहा था, अपने दादाजी को बचाने का। उसके आगे क्या परीक्षाएँ जरूरी हैं? वह समझता है, अज्जू दीदी समझती हैं, पर इतनी जरूरी बातें स्कूल वाले क्यों नहीं समझते। इतने बडे-बडे सर-मैडम, खूब-खूब पढे-लिखे। बब्बा कभी टीचर बना, तो समझदार टीचर बनेगा। उसने मन ही मन कसम खायी।
बब्बा ने मदद करने की ठान ली। इस तरह वह भी एक मनुष्य को बचाएगा। उसने हाथ हटा लिया। लिख ले नन्नू, चाहे पूरा लिख ले। कुछ अंकों का हेर-फेर ही तो होगा। इस से *यादा क्या बनेगा-बिगडेगा। नन्नू की आँखें कृतज्ञता से उज्ज्वल हो उठीं। बब्बा गर्वीले भाव से भर गया। देने का सुख पहली बार महसूस किया उसने। मुस्कुराहट उसके होंठों पर आकर बैठ गयी। वह चोर निगाहों से चारों तरफ देख रहा था जैसे नन्नू का पहरुआ हो। नन्नू पूरा कर ले, तो वह रिवाइज कर लेगा। घडी टिक-टिक करती रही। थोडी देर बाद उसने उचक कर देखा, नन्नू का थोडा ही बचा है। तभी वंश चिल्लाया, मैडम, बब्बा टीप रहा है।
सुनकर बब्बा चौंक कर सीधा बैठ गया और कॉपी पास खिसका ली। एक मिमियाती हुई आवाज उसके मुँह से निकली, नो, मैडम। शालू मैडम से आँख मिलाने की हिम्मत उसमें नहीं थी। वह मना रहा था कि मैडम इस बात को इग्नोर कर दें। नन्नू ढीठ की तरह अब भी कॉपी के ऊपर झुके जा रहा था। वंश की शिकायत का भी असर नहीं हुआ उस पर। बब्बा ने उसे चिकोटी काटी, तो उसने दाँत निकाल दिए। बब्बा को गुस्सा आया। उसने कॉपी पूरी तरह बन्द कर ली।
हो गया। नन्नू ने गहरी साँस भरी और दबी-दबी खिखियायी हुई हँसी हँस दिया। बब्बा बेंच को पकड कर टचवुड टचवुड जप रहा था। कुछ क्षण होने वाली घटना के न घटने की प्रतीक्षा में बीते, किन्तु शालू मैडम आयीं और उस से कॉपी छीन ली। उनका चेहरा गुस्से से भभक रहा था, लाल मुँह के बन्दर जैसा। वह डर कर पीछे हो गया, तभी जाने कहाँ से पुरी सर आए और कान मरोडते हुए बब्बा को खडा कर दिया। वह दर्द से बिलबिला उठा। वह कुछ कहता उस से पहले शालू मैडम नन्नू की कॉपी से उसकी कॉपी का मिलान करने लगीं। हर एक वाक्य के साथ उनके भाव सख्त होते जा रहे थे। बब्बा के खून की गति धीमी हो गयी। उसे लगा वह यहीं जम जाएगा। उसने नन्नू को देखा जो पैर के अँगूठे से खुरदुरी फर्श को खसोट रहा था। उसके चेहरे के भाव ऐसे थे जैसे किसी नवजात पिल्ले को उसकी माँ बगैर दूध पिलाए छोड गयी हो। उस पर किसी को संशय नहीं होगा।
उधर शालू मैडम कह रही थीं, क्यों बब्बा, पढ कर नहीं आए जो नकल कर रहे थे। शब्द गहरी चोट के साथ उसके कान के आर-पार हो रहे थे। उसने नन्नू की ओर देखा जो अनजान बना खडा था। वह पढाई में टॉपर नहीं है, लेकिन दूसरी गतिविधियों में अव्वल नम्बर। गाने में तो उसे कोई पीछे छोड ही नहीं सकता। फिर उसके पापा ठहरे शहर के जाने-माने डॉक्टर। दो दफा चीफ गेस्ट बन कर आए हैं स्कूल में। सबका चहेता है नन्नू।
नहीं मैडम, मैंने चीटिंग नहीं की। उसकी आवाज जैसे किसी संकरी गली में फँस गई थी जिसे बाहर आने के लिए मशककत करनी पड रही थी।
शालू मैडम की आँखों में टहकते टेसुओं की जगह अब भूरा पतझड था जिस से बब्बा को डर लग रहा था। तो क्या नन्नू ने की? देखो, इसने तो सारा पेपर लिखा है। डायग्राम भी कितने सुंदर बनाए हैं। जबकि तुमने तीन सवाल छोड दिए हैं। वह तो वंश ने देख लिया वरना तुम यह भी देख कर लिखते। तुम्हें क्या लगता है मुझे पता नहीं चलता? वह चीख रही थीं। बब्बा सिकुडा हुआ खडा था।
उस के सामने माँ और अज्जू दीदी का चेहरा घूम गया। उन दोनों ने कितनी मेहनत से उसे पढाया था। कल रात वे प्रश्न पूछ रही थीं और वह गा-गा कर जवाब दे रहा था। पापा भी हँस रहे थे। कह रहे थे अब लग रहा है न मेरा बेटा। सब कितना सुंदर था। आज सुबह माँ ने मीठा दही खिला कर और अज्जू दीदी ने अपना गुड लक बैंड देकर भेजा था। वह जानता है माँ ने आज उसके लिए भगवान से भी प्रार्थना की होगी। बब्बा की आँखें आँसुओं से झिलमिलाने लगीं। वह उन्हें क्या उत्तर देगा।
अजी शालूजी, क्लास में दुबका बैठा रहता है। कुछ भी पूछ लो, कभी जवाब नहीं आएगा। सूतने का ऐसा मन करता है न पर ये नियम-कायदे। छडी और स्केल पर ही संयम रखना पडता है। पुरी सर आग में घी डालने का काम कर रहे थे। सब टिपाई का कमाल है वरना मैं कहूँ इस बार गणित में बढिया पेपर कैसे कर दिया इस ठस्स ने। सारे बच्चे हँसने लगे। शायद उनको भी याद आ गया होगा किस तरह ब्लैकबोर्ड पर सवाल हल करते समय उसकी उँगलियाँ काँपती थीं। पुरी सर उसकी उँगलियों में पेन फँसा कर मोड देते थे। उसका बदन लरजता तो मुर्गा बना देते। कभी वह रो पडता, तो पीटते हुए कक्षा से बाहर निकाल देते।
बब्बा कहना चाहता था उसने इस बार बहुत मेहनत की थी। उस से कोई भी सवाल पूछ कर देख लें, वह जवाब दे देगा, लेकिन वह कुछ नहीं बोल सका। उसके गले में बाढ का पानी अटका था। उसकी आँखों के आगे धुएँ में सना कोहरा आ बैठा था। इधर नन्नू पूरे समय ऐसी प्रतिक्रिया देता रहा जैसे जो हुआ उसके लिए सचमुच बब्बा जिम्मेदार हो। बब्बा इंतजार में था कि नन्नू अपनी गलती मान लेगा, उसे बचा लेगा। भलाई का बदला उसे भलाई से मिलेगा, किन्तु नन्नू ने इतनी सरलता से अपना पल्ला झाड लिया जैसे बब्बा अपरिचित हो। बब्बा पहली बार जान रहा था यह सब किताबी बातें हैं जिन्हें सिर्फ परीक्षाओं में लिखने के लिए पढा जाता है। वर्षों के आदर्श उसकी आँखों के आगे ध्वस्त हो रहे थे। कक्षा की दीवारें भरभरा कर ढह रही थीं ज्यों गत्ते की बनी हों। सारे छात्र, अध्यापक छायाओं की तरह विलीन हो रहे थे। गलत समझे जाने का, पूरी कक्षा के सामने अपमान का बोध ऐसा तीव्र था कि वह मुँह छिपा कर भाग जाना चाहता था, लेकिन वह खडा रहा।
वह आज तक वहीं खडा है। एकदम अकेला। सबने उस से बातचीत बन्द कर दी है, उस अपराध के लिए जो उसने किया ही नहीं। नन्नू भी उस से बात नहीं करता। अज्जू दीदी को लगता है अपना दोष छिपाने के लिए वह अबोले का सहारा ले रहा है। बब्बा ने उस से प्रश्न किए तो उनका जवाब वह दे नहीं सकेगा। चोर सबसे *यादा अपने विवेक के जागने से डरता है, इसलिए उसे अनभिज्ञता का धीमा विष देकर सुला कर रखता है। न करे बात, बब्बा भी अब उस से बात नहीं करना चाहता। एक नम्बर का झूठा। उसका तो कुछ नहीं बिगडा, बब्बा बेचारा भुगत रहा है। वह दिन है और आज का दिन है, उसे हर टेस्ट में अलग बिठाते हैं। कभी उसके नम्बर अच्छे आते हैं, तो सब उसे चिढाते हैं, टिपाई का फल। टीचर भी उसे बात-बेबात डाँटते रहते हैं। शालू मैडम सबको बब्बा पर विशेष नजर रखने की ताकीद करती फिरती हैं। इस कारण अब उसका मन पढाई में नहीं लगता। किताब खोल कर बैठता है, तो नकलची, नकलची की आवाजें सुनाई देती हैं। किताब से निकलकर हरे-पीले साँप उसकी ओर रेंगते हैं। वह घबरा कर किताब छोड देता है।
अभी पिछले हफ्ते की बात लो। उस का जन्मदिन आया, तो माँ ने बडे जतन से उसे तैयार कर भेजा था। चायनीज कॉलर वाला मैरून शर्ट और आसमानी रंग की जैकेट। काम करने वाली अम्मा ने उसकी बलैयाँ ले ली थी। कक्षा में बाँटने के लिए, पापा से जिद करके फाइव स्टार मँगवाई थी उसने। कक्षा में पहुँचा, तो किसी ने विश तक नहीं किया। शालू मैडम सारे बच्चों का जन्मदिन पहले पीरियड में मनवाती हैं। वह इंतजार में था कि मैडम उसको भी बुलाएँगी, पूछेंगी कितने साल के हो गए, उसे बर्थडे क्लैप्स मिलेंगे लेकिन शायद उनकी नजर ही नहीं पडी उस पर। वह आस भरी नजरों से सबको देखता रहा कि कोई तो कहेगा बब्बा का जन्मदिन है, पर सब मुँह सिले बैठे रहे। उसे अपने कपडे चुभने लगे थे। स्पेशल टिफिन आँख बचाकर उसने फेंक दिया था। फाइव स्टार बैग में पडी पिघलने लगी थीं। सारा दिन वह अनमना रहा।
कुछ बच्चों की नजरे चॉकलेट पर थी, आखरिी घंटे में उन्होंने उस से कहा था कि क्यों न खुद ही मना लें जन्मदिन। वह जानता था इसमें उन लडकों का लालच था, पर वह इसमें भी खुश था। कम से कम उसका जन्मदिन मनेगा, बहाने से सही लडके उस से बात करेंगे, लेकिन कक्षा के बाकी लडकों ने ऐसा करने से मना कर दिया था। टीचर के चमचे थे वे। कह दिया था उन्होंने, शालू मैडम की अनुमति के बिना जन्मदिन नहीं मनाएँगे। बब्बा जानता था, अगर उन्होंने शिकायत कर दी तो मैडम और भी नाराज हो जाएँगी। मरे कदमों से वह खुद ही मैडम के पास गया था। मैडम ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और कक्षा में आकर बेरुखी से छात्रों को जन्मदिन का गीत गाने का आदेश दिया था। मुँह बिचकाते हुए सबने बेसुरी आवाज में हैपी बर्थडे गाया था जैसे किसी के मरने का मातम मन रहा हो। उनका व्यवहार ऐसा था जैसे कोई अपराधी भले लोगों के बीच आकर उन्हें खराब कर रहा हो। चोटिल मन से सबको चॉकलेट बाँट कर वह चुपचाप सीट पर बैठ गया था। अज्जू दीदी ने इस पर ईसा मसीह के शब्द दोहरा दिए थे, उन्हें माफ कर दो, उन्हें नहीं मालूम वे क्या कर रहे हैं। किसी को माफ करने से पहले अपना अंतस पवित्र करना पडता है। बब्बा अभी उस स्तर तक नहीं पहुँचा है। अभी तो वह क्रोध, उद्वेग और प्रतिशोध की भावना से भी नहीं उबर सका है।
घंटा बजा तो बब्बा को होश आया कि ब्रेक खत्म हो चुका है। वह चौंका। उसने अपने इर्द-गिर्द देखा। देर तक बवण्डर में खडे रहने के बावजूद वह वहीं था। बवण्डर उसे कहीं नहीं उडा ले गया था। इसका मतलब सब झूठ बोलते थे। उसे पहले तो निराशा हुई, फिर तुरन्त अपनी खोज पर उसे गर्व हुआ। यह उसके बहादुर होने की निशानी थी। बडे लडके भी यह करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। उसकी आँख और नाक मिट्टी से पट चुके थे पर वह अपनी सारी परेशनियाँ भूल गया था। यह बात वह किसी से बाँटना चाहता था। सीढियाँ फलाँगते हुए वह कक्षा तक पहुँचा तो ठिठक गया। कक्षा में घमासान मचा हुआ था। सब अपना-अपना सामान खोज रहे थे। बैग उल्टे पडे थे, सामान बिखरा पडा था। लडके एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे थे। कोने में सिर झुकाए खडे वंश बंसल पर पुरी सर चिल्ला रहे थे। कोई और दिन होता, तो देर से आने पर बब्बा को सजा मिलती पर आज किसी ने उसे नोटिस नहीं किया। सर ने अपनी ऐनक उतार दी और जोर से दहाडे। इसका अर्थ सब जानते थे। दो मिनट के भीतर सब ठीक नहीं हुआ तो सर कचूमर बना देंगे। जो जहाँ था, वहीं थम गया। फिर केंचुओं की तरह बेआवाज रेंगते हुए अपनी-अपनी बेंच तक आए और जम गए।
सर ने सरप्राइज टेस्ट की घोषणा कर दी। सारे बच्चों ने आँखों से दुःख और आश्चर्य जताते हुए कॉपी निकाल ली। जुबान के इस्तेमाल की इजाजत आज नहीं थी। सर की मुखमुद्रा बब्बा को रामलीला के रावण की याद दिला रही थी। वह भी जाकर अपने नियत सीट पर बैठ चुका था। खिडकी के पास एक कुर्सी रखी थी, वहीं बैठ कर उसे टेस्ट करने होते हैं। आज सर का ध्यान उस पर नहीं था। प्रश्न बोर्ड पर लिख कर सर एक किताब में सिर दिए बैठ गए। एक प्रलोभन उसे जकडने लगा था। सब कहते हैं न उसने नकल की है, क्यों न वह सचमुच नकल कर ले। सामने बैग है, नोटबुक किनारे से खोल कर हल देख लेगा। जब ठप्पा लग ही चुका है, तो वैसा करने में क्या बुराई है। उसने नोटबुक जरा-सी बाहर निकाल ली। पर नहीं, ऐसा करने से वह सचमुच वैसा बन जाएगा, जैसा बाकी लोग समझते हैं और जिसका वह निरंतर विरोध करता आ रहा है। उसने वह विचार वहीं त्याग दिया। उसने चारों तरफ देखा, लडके सिर खुजाते हुए, बेचारगी के भाव से बैठे थे। उसकी दृष्टि फिसलते हुए आगे जा टिकी। नन्नू और वंश की गणित की किताब उनके पास पडी थीं। शायद थोडी देर पहले जो अफरा-तफरी हुई उसी में ये किताबें बाहर रह गयी होंगी। उसके दोनों दुश्मनों को एक साथ मात दी जा सकती है। जो गलत उसके साथ हुआ, उसकी भरपाई हो जाएगी। हमाम में सभी नंगे हो जाएँगे, तो उसके ऊपर उँगली उठाना बन्द कर देंगे। इतने दिनों की यातना से उसे मुक्ति मिल जाएगी। प्रिया मैडम, शालू मैडम की नजरों में वह खटकना बन्द कर देगा। शिकायत भर करने की देर है, सुबूत जुटे हुए हैं ही। इस बार उसे कोई झुठला भी न सकेगा। सोचकर वह खुश हुआ, किन्तु माँ का चेहरा उसकी आँखों के आगे आ गया। उन्होंने उसे झूठ बोलना नहीं सिखाया। वह सकुचाया। सही-गलत के फेर में पडा। फायदे-नुकसान में उलझा। जो तकलीफ उसने झेली है, वही तकलीफ किसी और को देकर क्या वह ग्लानि मुक्त हो सकेगा। असत्य दूसरे का ही नहीं, अपना जीवन भी बदल देता है। हर झूठ के साथ हमारा एक अंश मृत्यु को प्राप्त होता है।
अज्जू दीदी कहती हैं, अपनी करनी पार उतरनी। दूसरों के कर्मों का लेखा-जोखा वह क्यों रखे। इनका झूठ यही ढोएँ, वह अपने सच पर सवार रहेगा। इतने दिनों का उत्ताप, निराकुलता में बदल रहा था। चीसते हुए घाव का कष्ट इस संशयहीनता ने हर लिया था। उसे चाहे नकलची कहे, चाहे बात न करे तो भी वह क्लेश नहीं करेगा। वह अपने बनाए रास्ते पर निश्शंक होकर चलेगा। अपने इस निर्णय के पश्चात उसे राहत मिली। वह हल्का महसूस कर रहा था। अब शायद वह नन्नू और वंश को देखकर भी मुस्कुरा सकता है। जाँचने के लिए वह उनकी ओर देखकर मुस्कुराया कि वंश ने सिर उठाया। उसकी और बब्बा की आँख मिली, तो बब्बा की मुस्कुराहट और गहरी हो गयी। उसने मन में खुद को शाबाशी दी कि वह दूसरों को माफ करने के स्थिति में पहुँच चुका है। वंश को बब्बा का इस समय हँसना अटपटा लगा। उस की दृष्टि बब्बा की मेज के नीचे गयी। कॉपी निकली हुई थी, लेकिन बब्बा नकल नहीं कर रहा था। उसने सर को देखा, वे कोई किताब पढ रहे थे। आज उन्होंने उसे इतना डाँटा है। अपनी लापरवाही से ध्यान हटाने का और सर पर इम्प्रेशन जमाने का एक ही तरीका है। किसी को संदेह नहीं होगा। वह चिल्लाया,
सर, बब्बा टीप रहा है।
बब्बा जैसे आसमान से गिरा। उसकी मुस्कुराहट पर किसी ने डस्टर फेर दिया। उसने अविश्वास से वंश को देखा। क्या यह शब्द उसी ने कहे हैं, जिसे उसने अभी-अभी माफ किया था। अब दोबारा वह उसे कैसे क्षमा कर सकेगा। एक बोझ उसके सीने पर आकर लद गया। उसे भय हुआ.. आने वाले क्षण से, जीवन से। उसने मनाया काश यह झूठ हो। उसने वंश को दोबारा देखा, उसके होंठ भिंचे हुए थे, वह बब्बा को एकटक देख रहा था। झूठे होने की मलिन छाया वहाँ नहीं थी। बब्बा ने आँखें बन्द कर अपना चेहरा देखा। सच की आभा को डर ने ढक लिया था। अज्जू दीदी और माँ के चेहरे भी छिप गए थे। एक साँस ने उस से प्रश्न किया वंश ने ऐसा क्यों किया होगा! दूसरी साँस ने उत्तर दिया, बुरे लोगों के पास बुरे होने की कोई वजह नहीं होती। फिर उसकी साँस रुक गयी। पूरी कक्षा ने लिखना बन्द कर दिया था। सबकी नजरें अब उस पर टिकी थीं। पुरी सर ने चश्मा उतार कर छडी हाथ में ले ली थी। उनके मुँह से धीमी फुँफकार निकल रही थी। उनकी कसैली मुस्कुराहट विषैली बेल की तरहबब्बा को घेर रही थी। वे झूमते हुए आगे बढ रहे थे, शिकार पकड लेने के आनन्द से भरे हुए। बब्बा आँखें बंद किए-किए धीरे से बुदबुदाया, मैं बवण्डर में कैद हो गया हूँ।

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