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लता खत्री की कविताएँ

लता खत्री
लता खत्री

1
मेरी पुरानी पडोसन से मैं अक्सर पूछ लिया करती थी
क्या मेरी कोई कटोरी है उनके पास,
वह कहती थी
खाली नहीं दूँगी
कुछ अच्छा बनाऊँगी तब भर कर दूँगी!

मैंने उसकी कटोरियों में कभी चीनी,
कभी घी भरकर दिया

मेहमानों के अचानक आ जाने पर
पिछले दरवाजे से लेनदेन किया
कटोरियों का

बिस्तर, रजाई या अतिरिक्त रखे तकियों का

हमने कटोरियों के लेनदेन को छुपाकर रखा
सबकी नजरों से

मेरी माँ की एक कटोरी मेरे पास रह गई है
चाहती हूँ बेटी के पास रह जाए मेरी भी एक!

यूँ कटोरियाँ हमें बचाती रहेगी बैरागी हो जाने से।
***
2

माँ कच्ची खिचडी और घी दान देती थी
पोलके के लाल कपडे में बाँधकर रख लेती थी गुप्त दान

तिल के लड्डू में छिपाकर रखती थी
पाँच पैसे,दस पैसे पाव रूपया और अठन्नी
मैं हमेशा ध्यान रखती बडे पैसे वाले लड्डू का चेहरा
मगर रात भर में सभी लड्डूओं की शकल
एक जैसी हो जाती

मेरा अठन्नी वाला लड्डू
पाँच पैसे वाले लड्डू के अगल बगल लुढक जाता...
जब पूछती
सूखी लालामिर्च क्यूं देती हो सीधे के साथ!
कहती
तीखे का महत्त्व बराबर है मीठे के
नमक की डली,मिश्री की डली पर विजय पाती है हमेशा
जब मीठे का दान करो,नमकीन का भी करना...

***



3
दिन अपने अंदर खुशी लेकर आएगा, सुबह पाँच बजे की करवट ने कहा...उठ जाऊँ मगर ठण्ड है,उठकर बाहर जाने का मन नहीं
गरदन पर चींटी के काटने पर फिर नींद टूटी...
कहीं आरती की आवाज आई
यह आरती बिल्कुल अच्छी नहीं मन ने कहा...
तुकबन्दी में कुछ का कुछ जोड दिया है,मैं बस जय जगदीश हरे को आरती मानूंगी...

गरदन पर चींटी के काटने से जलन हो रही है, ड्रेसिंग टेबल तक हाथ फैलाकर बोरोलिन ढूँढ लूँ?
अरे नहीं, बहुत सारा सामान गिर जाएगा...

एक नाव हिलौरे ले रही है... ऐसा लगा हल्की-हल्की थपकी दे रही
धीरे-धीरे वह बहुत तेज डोलने लगी...
अब ये पानी में उलट जाएगी!
मन ने फिर कहा!
मैं इसे कसकर पकड लूँ?
मन से पूछा...
नाव में पकडने के लिए बस नाव है...
नाव की लकडी पर शैवाल जमे हैं
या शायद अँगुलियों पर!

नाव में खूँटी नहीं होती?

मन ने सर धुना

तुम कभी भी अपना होमवर्क नहीं करती हो!
मोटी फ्रेम के चश्मे वाली प्रिंसिपल चिल्लाई...
***




4

आप दूर खडे होकर दृश्य को देखते हैं
आपकी आँखों के सामने खडा
वह आपको एक तरफ खडे हुए देखता है
आपकी और उसकी आँख मिलती हैं
आप मुस्कुराते हैं,ठीक उस समय वह भी मुस्कुराता है
आप उसमें न होते हुए भी उसमें छलछलाते हैं
वह वहाँ होकर भी आफ साथ घटता है...
सहसा पीछे से एक धक्का सा आता है और आप दृश्य की फ्रेम में प्रवेश करते हैं
थोडी झिझक से
थोडे अनाडीपन से
दृश्य अपनी धीमी चाल से आगे बढता है
आप खडे रहते हैं
वह अपने साथ सारे पात्रों को लेकर चलता है
आप कुछ पीछे होते हैं
दृश्य आपको अपनी एक डोर थमाता है कि
मेरे साथ चलो
रेशमी धागा छूटता है
अब आप उसे जाते हुए देखते हैं
आप तय करते हैं
दृश्य को स्मृति में समेटना
वह तय करता है एक रिहर्सल रोज दोहराना

***
सम्पर्क-प्लाट नं. 1,
रामनगर इण्डिस्ट्रीयल एरिया,
फालावास रोड, सांगरिया
जोधपुर, राजस्थान।
मो. 7568678361