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शुभम् आमेटा की कविताएँ

शुभम् आमेटा
1. नयी दुनिया

उसने कहा रोटी मैं बनाउँगी,
मैंने उसे बेलन-चकला थमा दिया।
उसके नन्हे हाथ रोटी बेलने लगे,
और इसके साथ ही एक नयी दुनिया का निर्माण होने लगा।
नयी दुनिया छोटी थी
असमान थी
किन्तु
सुंदर थी
गर्म थी।

2. घर

ऊपर की ओर जाती सीढियाँ वीरान हैं,
उन पर बिछी है धूल की चादर
बताती है
आखिरी बार कदम कब रखे गए
नीचे के आँगन से ऊपर के बरामदे तक।

बरामदे में,
खेलने की आवाजें सुनाई नहीं देती
खामोशी पसरी है वहाँ,
अपनी अदृश्य भुजाओं को
कोनों तक फैलाकर।

जिन दीवारों पर कभी बडी-बडी तस्वीरें थीं,
उनकी जगह अब चूने की पपडियाँ हैं।

कुछ चीजें नहीं बदली हैं,
जैसे हर सुबह,
धुप का आँगन से आलिंगन
और
दिन भर के साथ के बाद,
शाम होते ही लौट जाना।

ऊपर जाती सीढियों के सहारे बढती बेल
उन पर चिडियाओं का आना-जाना
जारी है बरल का बढना
जारी है चिडियाओं का चहचहाना,
बिखर चुके घर में, अपना एक घर बनाना।





3. घटना और पीडा

घटना का कोई निश्चित समय नहीं होता है।
वह आ-धमकती है,
दिन में,
रात के किसी भी पहर।
उसके लिए
सुबह
या
शाम, अर्थहीन है।
लेकिन,
घटना से उत्पन्न हुई पीडा का समय होता है।
वह शाम होते बढना शुरू होती है
और
रात के तीसरे पहर तक छा जाती है पूरी तरह,
दबोच लेती है उस घडी होने वाली हर त्रि*या-प्रतित्रि*या को,
समय तक को।

रात के तीसरे पहर में,
उफनते विचारों की एक श्रृंखला बनती है,
जो ले जाती है गहरे कुएँ में,
जहाँ से बाहर आने का
कोई रास्ता दिखाई नहीं देता है।
दिखाई देता है
तो
तल से,
ऊपर की ओर,
मुंडेर से आती रोशनी से बनता चाँद।
जहाँ पहुँचने का सपना लिए,
बचपन में,
उसे देखते-देखते सो जाया करते थे।



4. गधे

एक कविता की शुरुआत,
यह हो सकती है कि
कुछ गधे सडक के बीच खडे थे।
या
कुछ गधे जहाँ खडे रहते थे
वहाँ सडक बना दी गयी।

अब यह कवि पर निर्भर करता है कि
वह शुरुआत कैसे करे?
स्वभाव कहता है कि
कवि होने के लिए भी सबसे पहले मनुष्य होना बनना होगा।
गधे लिखना नहीं जानते
न ही सडके बनाना।
हाँ
वे खडे रहना जानते हैं।



11. सर्दियों का आना

सर्दियाँ धीमी गति से आती है।
जैसे,
रेगिस्तान में आता तूफान एक समय बाद
ढक देता है आसमान को गुबार से,
सर्दियाँ भी ओढा देती है एक ठण्ड की चादर,
पूरे शहर को।
जिसके ऊपर जमती जाती है ओस की बूँदे
और
सोता रहता है शहर गर्म साँसे छोडता, उसके नीचे।

सर्दियों का आना,
सबसे पहले महसूस करता है सडक किनारे सोता बेघर,
जिसकी साँसों से फटी कम्बल में रिसती है जमी ओस,
जिसकी रात गुजरती है करवटों में,
जो सिमटता चला जाता है अपने से छोटी कम्बल में।
और
सबसे आखिर में महसूस करता है सर्दियों को
एक बच्चा,
जिसे आग नहीं,
गुब्बारा चाहिए।

सम्पर्क 22, श्री राम विहार कॉलोनी, मनवाखेडा,
उदयपुर, राजस्थान।
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