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आधुनिक संदर्भ और महाभारत

मूलचन्द बोहरा
रामायण और महाभारत दोनों ऐसे ग्रंथ हैं जिनकी कथाएँ लोक में रची-बसी हैं और टीवी सीरियल के रूप में प्रसारित होने के बाद तो इन्होंने और भी विस्तार पाया है। इनकी कथाओं के श्रोता या पाठक वर्ग में आस्तिक या भक्ति भाव वाले लोगों की संख्या अधिक है। तर्क, काल और इतिहास-संस्कृति विमर्श करने वाले लोग कम हैं और अनुपात में तो बहुत ही कम हैं। ऐसी स्थिति में महाभारत के पात्रों के चरित्र को आधुनिक समय के संदर्भ में समझ कर उन्हें राजनीतिक, नैतिकता सामाजिक व्यवस्था व सांस्कृतिक परम्परा के बरक्स खडा करना बेहद चुनौती भरा काम है। यह काम तब बहुत जटिल व जद्दोजहद भरा हो जाता है जब इसमें पहले से ही साहित्य धर्म, राजनीति, नैतिकता आदि के विविध आयाम हैं।
पुस्तक सत्ता का मोक्ष द्वार- महाभारत में लेखक इस चुनौती से बहुत बेबाकी और तर्क साथ के जूझते हैं। उन्होंने पत्रकारिता के लहजे में कोरोना की महामारी सरकार की तैयारी, प्रोपेगैण्डा और तत्कालीन घटनाओं से पुस्तकों को प्रारम्भ करते हुए करीब डेढ दर्जन से अधिक पात्रों के चरित्र को आधुनिक संदर्भों में समझने का प्रयास किया है। लेखक ने महाभारत के कथा चरित्रों को एक कारण विशेष से चुना है। इस संदर्भ में वे महाभारत की तुलना होमर की ओडिसी से करते हुए लिखते हैं -इस युद्ध में यूनान के कई देवताओं की मृत्यु हो जाती है और रह जाता है इन्सानी चरित्रों का आख्यान। महाभारत की तरह यहाँ भी सबकी अपनी-अपनी कमजोर कडी है। हर चरित्र न तो पूरा स्याह है और ना सफेद। सबके अपने-अपने धूसर सत्य है। चूँकि रामायण की कथा और उसके पात्र आदर्श रूप में है, जहाँ या तो अच्छाई है या बुराई, दोनों का मिला-जुला रूप नहीं, जबकि महाभारत के सभी पात्रों में यह मिला-जुला रूप मिल जाता है जो आज की दुनियावी जिन्दगी के ज्यादा करीब है। इसी कारण लेखक ने महाभारत के कथा चित्रों को विमार्श के तौर पर चुना है ।
पुस्तक में छपे सभी आलेख जनसत्ता के स्तम्भ बेबाक बोल में पूर्व में छप चुके हैं। सचमुच ये बेबाकी इनके लेखन में भी नजर आती है। गीता और कृष्ण जिस पर प्रश्न उठाना भारतीय जन के लिए बहुत मुश्किल भरा और तिरस्कार प्राप्ति का कारण बन सकता है । उस पर भी वे बेबाक बोलने से नहीं चूकते। प्रस्तावना के आखिरी खण्ड में वे लिखते हैं कि गीता का संदेश कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन युद्ध के लिए प्रेरित करता है। कारण, गीता सदैव लक्ष्य पर नजर स्थिर करने को को कहती है। कर्तृत्व की इस स्थिरता को ही धर्म या कर्म का नाम दिया गया है। कर्ता पुरुषार्थ से कोई अमानवीय स्थिति उत्पन्न होती है, तो कर्ता न तो स्वयं को दोषी मानता है और न स्वयं को पश्चाताप का पात्र मानता है । इसलिए वामपंथी, दक्षिणपंथी तथा राष्ट्रीय आंदोलन के सभी नेताओं ने गीता को सत्ता प्राप्ति के साधन की तरह इस्तेमाल किया है। क्योंकि गीता में कई विरोधी बातें हैं जो शासक वर्ग को वांछनीय लगती है। उसमें हिंसा,अहिंसा व भक्ति सत्ता प्राप्ति के साधन के रूप में वर्णित हैं। लेखक के शब्दों में यह हमेशा से सत्ता का मोक्षद्वार रहा है। हालाँकि इस वर्णन में लेखक अतिरेक के शिकार हुए प्रतीत होते हैं क्योंकि गीता केवल सत्ता का मोक्षद्वार ही नहीं, बल्कि भ्रम व संशयग्रस्त व्यक्ति के लिए संगत मार्गद्वार भी है। यह बात केवल अनुभूतिपरक ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक भी है। इसकी पुष्टि लिए दो उदाहरण काफी है।
वैज्ञानिक आइंस्टीन अपने जीवन काल में इस ग्रंथ के बारे में नहीं जान सके, तो उन्हें इसका अफसोस था। वे कहते हैं कि अगर मैं उसको पहले पढ लेता तो उनके जीवन की दशा कुछ और होती। महात्मा गाँधी का कहना था कि जब कभी संदेह मुझे घेरते हैं और मेरे चेहरे पर निराशा छाने लगती है। मैं क्षितिज पर गीता रूपी एक ही उम्मीद की किरण देखता हूँ। इसमें मुझे अवश्य ही एक छन्द मिल जाता है जो मुझे सान्त्वना देता है।
इन सब के बावजूद गीता के अंदर विरोधी बातें पाठक को नए सिरे से सोचने को विवश करती है। कहाँ हो कृष्ण अध्याय में कृष्ण गीता के उपदेशक से ज्यादा कन्हैया रूप में सामने आते हैं । ऐसा देखा भी गया है कि लोक में गीता श्रवण परमार्थ सुधार के लिए तो मान्य है परंतु लोक मन में कृष्ण के बाल, नेही तथा और ग्वाल रूप के प्रति भक्तिभाव व पूज्य भाव अधिक है । उत्तरी भारत के घर -घर में लड्डू गोपाल की पूजा, मीरां, सूर के पदों का गान, मथुरा वृंदावन की यात्रा इस तथ्य की पुष्टि करने के लिए काफी है।
वे कर्ण के चरित्र आख्यान को भी इसी लोक से जोडकर देखते हैं। उनका मानना है कि पहचान का संकट हर युग में रहा है। महाभारत में कर्ण तथा एकलव्य इस संकट से सबसे ज्यादा जूझे हैं। हालाँकि युद्ध के मैदान में यही संकट अर्जुन के सामने था, लेकिन उसके पास कृष्ण थे जिसके कारण वह इस संकट से उबर गया और वह नायक बना। दोनों योग्य होते हुए भी नायक निर्माण में स्वाहा हो गए। लेकिन वे आज भी सभ्यता के इतिहास में स्वर्णिम पहचान के साथ खडे हैं। आज के समय का जिक्र करते हुए लेखक लिखते हैं कि भारत जैसे देश में भूख और कोरोना के बीच जनता अपनी पहचान की खोज कर रही है।
इसी क्रम में लेखक ने प्रण व रण शीर्षक वाले अध्याय में द्रौपदी के चरित्र का वर्णन किया है, लेकिन उसके हर प्रश्न को मर्दवादी व्यवस्था को मजबूत करने का बँधन माना है तथा मर्द को हिंसा पर उतारू होने के लिए प्रेरक माना है। इसलिए वे कहते हैं कि आम घरों में महाभारत की किताब नहीं रखी जाती और द्रौपदी नाम रखने से भी परहेज किया जाता है, वस्तुतः ऐसा है नहीं, लगता है, बात कहने के अतिरेक में लेखक ने ऐसा कहा है। लोक में एक दोहा चर्चित है- सीता कुन्ती द्रौपदी, अनसूया ऋषिनार, तारा देवि मंदोदरी, सात सती संसार। इसमें द्रौपदी को सीता के बराबर सती माना गया है, रही बात महाभारत घर में नहीं रखने की, तो यह तथ्य निराधार है। क्योंकि लोक मान्यता में और कहीं-कहीं शास्त्रों में भी घर में इसे रखने पर कोई निषेध या पाबन्दी नहीं है, बल्कि इसे पाठ करने को लेकर कुछ मान्यताएँ है कि इस ग्रन्थ का पाठ घर में नहीं होना चाहिए।
लेखक ने द्रौपदी के साथ कुन्ती को भी युद्ध का दोषी माना है, कुन्ती अगर समय रहते कर्ण के जन्म का राज युधिष्ठिर को बता देती, तो युद्ध न भी होता। कर्ण को यूँ छला भी नहीं जाता। एक कोख से जन्म में दो भाई जानी दुश्मन न बनते। इसलिए स्त्री को लेकर लोकोक्तियों में युधिष्ठिर का शाप आज भी स्थिर है। इस कथा की एक पात्र गान्धारी और है जिसके प्रति लेखक की पूरी सहानुभूति है। लेखक ने गांधारी के आँखों पर बँधी पट्टी को स्त्री प्रतिरोध व पराधीनता के रूप में वर्णित किया है
लेखक का मानना है कि बल के साथ बुद्धि, धीरज व कर्म जरूरी है। केवल बल के सहारे नायक नहीं बना जा सकता। भीम ने सौ कौरवों को मारा था, फिर भी वह नायकत्व से वंचित रहा क्योंकि उसमें धीरज व बुद्धि का अभाव था। वह कभी द्रोपदी द्वारा निर्देशित हुआ, तो कभी कृष्ण द्वारा।
यहाँ हजारीप्रसाद द्विवेदी का निबंध भीष्म को क्षमा नहीं किया गया बरबस याद आता है। दिवेदीजी भीष्म को समय पर निर्णय न लेने या चुप रहने की स्थिति को अवतार न मानने की वजह बताते हैं। ऐसा कुछ ही भारद्वाज भीष्म तथा युधिष्ठिर के बारे में के बारे में लिखते हैं। वे कहते हैं कि भीष्म का ब्रह्मचर्य व्रत पालन, कौरव सेना का सेनानायक बनना या अनिर्णय की स्थिति में रहना तथा युधिषिठर का द्यूत क्रीडा, द्रौपदी व भाइयों को दाँव पर लगाना, द्रोण के मामले में आधा सच बोलना उनके चरित्र को धुँधला बना देते।
विदुर के साथ भी ऐसा ही है। विदुर यों तो पाण्डवों साथ है, इसलिए लोक मन में उनके प्रति श्रद्धा है। लेकिन लेखक द्वारा समझाने का प्रयास किया कि विदुर कागजी क्रांति का, अगुआ है और यह अगुआपंथी बदस्तूर आज भी राजनीति में जारी है । जनमत निर्माण के नाम पर ऐसे लोगों की भारी-भरकम फौज सभी पार्टियों में मौजूद है। (महाभारत, सत्ता का मोक्षद्वार)
लेखक ने महाभारत के खलपात्रों को भी एक अर्थवत्ता दी है। उनका कहना है कि महाभारत में शकुनि की सर्जना ना होती, तो कथ्य नीरस हो जाता। शकुनी का छल ऐसा प्रभावशाली बना कि खलनायक दुर्योधन को मारने के लिए भी उसी छल का सहारा लेना पडा।
इस संदर्भ में वे कहते हैं कि सत्ता के लिए धर्म का इस्तेमाल हुआ, इसकी शुरुआत दुर्योधन के जन्म से पहले हो चुकी थी। उनका जन्म हुआ धर्मराज से पहले हुआ होता, तो सत्ता प्राप्ति के नए प्रतिमान बनाए जाते हैं अन्यथा महत्त्वाकांक्षा और प्रतिशोध की भावना के साथ दुर्योधन राजनीति में स्वपक्षीय तर्क खडा करता।
इसी ग्रंथ के पात्र गुरु द्रोण जातिवादी व वर्गवादी सामन्ती सोच के प्रतिनिधि पात्र हैं। जो आज की शिक्षा में भी मौजूद है। नगर की बडी-बडी मिशनरी अंग्रेजी स्कूल जहाँ बडी आय व संस्कृति विशेष के बच्चे पढने जा सकते हैं, इसी प्रवृत्ति का एक नमूना भर है। इसी द्रोण के बेटे अश्वत्थामा का जीवन मौत से भी बदतर हो जाता है जब वह कृष्ण से शापित होकर मरने के लिए तडपता है। इस सम्बन्ध में लेखक अश्वत्थामा के चरित्र की तारीफ करता है। उनका कहना है कि कुछ भी हो उन्होंने अंतिम समय तक मित्र धर्म निभाने के लिए दुर्योधन का साथ दिया और पाण्डवों को मारने के लिए तत्पर हो गया। इसी क्रम में एक पात्र और है जो लेखक की निगाह में साफ-सुथरा है, वह है बलभद्र । वह जुए के लिए दुर्योधन और युधिष्ठिर दोनों को दोषी ठहराता है और गदा युद्ध में नियमों के उल्लंघन करने पर भीम को अंतिम समय तक माफ नहीं करता । लेखक के अनुसार यह पात्र अहिंसा व निष्पक्षता का प्रतिनिधि पात्र है, और यह बात काफी हद तक ठीक भी लगती है।
धृतराष्ट्र जिंदा है का मूल भाव भारतीय राजनीति में वंशवाद के रूप में आजादी के बाद से लेकर आज तक बदस्तूर जारी है। गाँव के सरपंच से लेकर देश के मुखिया तक यही वंशवेल का सिलसिला पल्लवित पुष्पित हो रहा है कहने का भाव यह कि इस पुस्तक में सभी के लिए कुछ न कुछ है संदेश उपदेश या एक सीख । लेखक के शब्दों में महाभारत में अलग-अलग समय और जगह का पाठक अपने अपने धर्म क्षेत्र और कुरुक्षेत्र तलाशता है। रचने वाले और पढने वाले के बीच युद्ध के बाहर हर बार जो एक नई महाभारत बनती है वहीं पर साहित्य सार्थक होता है। काफी हद तक यह सार्थकता समीक्ष्य पुस्तक द्वारा सिद्ध हुई है।
पुस्तक रमणीय कलेवर और विविध शीर्षक चित्रों से पूरित है। इस कारण यह पठनीय तथा रोचक बनी है। कईं जगह नए भाषायी मुहावरों पर काम हुआ है, पर भाषा की रवानगी व रमणीयता का थोडा-सा अभाव खलता है। लेखक की सपाटबयानी कई जगह अखरने लगती है। कहना न होगा कि यह कृति भाषा के लिहाज से रमणीयता की माँग करती है। कथ्य की दृष्टि से पुस्तक अच्छी बनी है उम्मीद है, यह कृति विमर्श के नए द्वार खोलेगी।
पुस्तक - सत्ता का मोक्षद्वारः महाभारत
लेखक - मुकेश भारद्वाज
प्रकाशक - वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
संस्करण - प्रथम, 2021
मूल्य - 299
विधा - निबन्ध
सम्पर्क - रामेश्वरम , 2- ए, 34 मुरलीधर व्यास नगर विस्तार बीकानेर मोबाइल नंबर 94140 31502