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उत्तर पैगम्बर : मंजिल से पहले रास्ता

बृजेश अम्बर
पैगम्बरी का वक्त पडना एक मुहावरा है जिसका मतलब होता है -सख्त मुसीबत आना। आज कोरोना महामारी के कारण पूरी दुनिया पर पैगम्बरी का वक्त ही तो है। ठीक इसी वक्त उत्तर पैगंबर नाम से एक काव्य संग्रह सामने आया। न जाने क्यों लेकिन संग्रह का नाम पढते ही ऐसा लगा कि कविता एक ऐसा माध्यम है जो इस कठिन समय में हमारा आत्मबल बढा कर जीने की नई उम्मीद जगा सकता है। आज चाहे-अनचाहे सोशल मीडिया की हमारे दैनिक जीवन में अनिवार्यता हो गई है या यूँ कहें कि लत पड गई है। इसी मीडिया के जरीये कविताएँ कमोबेश हर कहीं देखी-सुनी जा सकती हैं। मीडिया ने एक ओर जहाँ शारीरिक दूरी को घटाते हुए इंसान को साक्षात् तो कर दिया, लेकिन वहीं दूसरी ओर संवेदनात्मक स्तर पर कहीं फासले बढा दिए। जिसका असर निस्संदेह भाषा पर भी पडा। भाषा में कई बदलाव हो रहे हैं। ऐसे में कवि का यह कहना सहज ही ध्यानाकर्षित करता है कि- 21वी सदी में जहाँ यथार्थ और आभास का अंतर मिटा दिया गया है और चित्रों के अंतहीन आईने में हम कैद हैं वहाँ कविता का साफ-साफ कुछ कहना एक अलहदा काव्य- व्याकरण बने, तो क्या हर्ज है।
कोई माने न माने लेकिन दुनिया आज एक वैश्विक गाँव में तब्दील हो गई है। इस वैश्विकता में हमारा सब कुछ दूसरों के सामने खुला-खुला है ।हमें अपनी निजता बनाए-बचाए रखने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने पड रहे हैं। ऐसे में सब कुछ दिखा भी कुछ महत्त्वपूर्ण को छुपा लेना कला बन जाता है। कवि यही काम भाषा के लिए करता है। भाषा कविता से कुछ पंक्तियाँ देखिये-
स्वर्ग से निर्वासित आदम
रहता है उस घर में .....
वह भाषा में खुद को देखता है
वह भाषा में ही बनता है
भाषा के पात्र में
किसी दिन कुछ अस्फुट ध्वनियों के साथ
वह हमेशा के लिए गिर जाएगा।
कविता पढते हुए अनायास ही रिल्के की आदिम अबोध की अवस्था याद आ जाती है। जब वे कहते हैं कि हर नई रचना से पहले अबोध हो जाना पडता है। कविता की आखिरी पंक्ति भी अस्फुट ध्वनियों की तरफ इशारा करती है। जहाँ कवि किसी शब्द नहीं, बल्कि अस्फुट ध्वनि के साथ की बात करता है। यह अस्फुट ही काव्य-भाषा का केंद्र हो जाता है। जैसा कि डब्ल्यू एच ऑडन के बारे में कहा जाता है कि कोई नवोदित कवि जब उनसे कविता के बारे में पूछता है, तो वे यह कहते हैं कि तुम्हें अपने कानों के पास कुछ शब्दों की गूँज महसूस हो जिन्हें तुम सृजनात्मक रूप से समझना चाहते हो, तो ऐसे में कविता लिखना जारी रखना चाहिए। भाषा कविता भी इसी तरफ इशारा करती प्रतीत होती है।
संग्रह में राजनीतिक धार्मिक सामाजिक और आर्थिक विषयों पर कविताएँ हैं लेकिन कवि किसी खास पैराये में खुद को नहीं बाँधता है, बल्कि उन्मुक्तता के आँगन में चहकता- महकता है। वह प्रेम कविताएँ भी लिखता है और प्रेम को इन सभी सत्ताओं के ऊपर रखने का तरफदार भी दिखाई देता है। जिसकी मिसाल संग्रह की पहली कविता रफी के लिए एक शाम है। प्रेम के लिए लोगों में सम्मान न होने पर वह दुखित भी होता है। शायद यही कारण है कि वह अपनी कविताओं में मनुष्यता के स्वर को अनसुना नहीं होने देना चाहता है। ऐतिहासिक और पौराणिक पात्रों को केन्द्र में रखकर लिखी उस की कविताएँ भी अपना विशेष महत्त्व रखती हैं। जैसे- सुजान के हवाले से मुहम्मद शाह रंगीला को याद करते हुए कहता है कि-
आह! हमारी हिंदी के पास
300 साल पुरानी उस प्रेम के लिए
न सम्मान हैं न शब्द।
यह कवि का प्रेम के प्रति गहरा लगाव ही है कि वह इस ऐतिहासिक घटना को अपनी अनुभूति में प्रकट करता है। इसी तरह जायसी कविता की अंतिम पंक्तियां देखिये-
ऐसा कहा जाता है कि अपने अंत समय में मलिक मुहम्मद बाघ में बदल गए थे।
अगर ठीक से पढें पद्मावत तो उसमें भी यह दहाड सुनाई पडती है।
सत्ता के अहंकार पर एक कवि की दहाड।
उपरोक्त दोनों कविताओं में प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि कवि कोई कहानी कह रहा है लेकिन गौर से पढने पर पता चलता है कि इन कहानियों में प्रेम की अनुभूति और उसकी त्रासदी का संवेदनात्मक रूप से प्रस्तुतीकरण हुआ है। वर्तमान में इनकी प्रासंगिकता को भी सोचा गया है।सत्ता का मद और कला की स्थिति तो आज भी वैसी ही है।
कहते हैं कविता पाने का नाम नहीं, बल्कि एक यात्रा का नाम है- सच तलाशने की यात्रा -और यात्रा में मंजिल से पहले रास्ता होता है। कवि की यात्रा उसके रचना-संसार ही में होती है इसलिए उसका सच भी रचना के भीतर ही मौजूद होता है। और जब शब्द ही ब्रह्म है, तो फिर शब्द से तो सृष्टि होनी ही है। सृष्टि कविता से कुछ पंक्तियाँ देखिये-
प्रकाश ने चुना सूर्य को
आलोक ने नक्षत्रों को
चन्द्रमा को आकार दिया पूर्णिमा ने
जल से प्राण के लिए उछली मछली ने
रच डाली यह सृष्टि
अन्तिम पंक्ति देखें -
और पत्थर से किसी ने
अतिरिक्त हटाकर गढ दिया ईश्वर को।
यहाँ रचना और गढना शब्दों के अर्थ पर गौर किया जाना आवश्यक है। साथ ही अगर कविता की अंतिम पंक्ति को प्रथम पंक्ति मानकर पढा जाए, तो इसका अर्थ और अलग हो जाता है।
उत्तर पैगंबर श्रृंखला की कविताएँ भी ध्यान आकर्षित करती हैं। इन कविताओं में कहीं तो लगता है कि यह पैगम्बर बोल रहे हैं और कहीं लगता है कि कवि बोल रहा है क्यों कि एक कविता की पंक्ति इस तरह है-उसे किसी संदेशवाहक की जरुरत नहीं /न कभी उसने भेजे। और यह भी कि/ यह धरती सिर्फ तुम्हारी नहीं है/आकाश, समुद्र और जमीन साझे के हैं उत्तर पैगम्बर का अर्थ पैगम्बर के बाद हुआ और ऐसी दुनिया जहाँ कवि कहता है कि -वह तुम्हें खुशहाल चाहता है, जंजीरों से मुक्त चाहता है, वह सर्वशक्तिमान है, उसे सभी भाषाएँ आती हैं, वह न्यायप्रिय है ,सर्वव्यापी है ,उसने किसी को कोई निर्देश नहीं दिया, यह तुम खुद तय करो। फिर कहता है कि-
जहाँ हो
वही बना लो स्वर्ग

खिलो और फिर अपनी संततियों में खिलते रहो
अपने कर्मों में महकते रहो
यही अमरता है ।
अंतिम कविता में वह खुद कहता है कि-
मैंने तो तुम्हें साफ-सुथरी पृथ्वी दी थी
कल-कल करती नदी
और चमकती हवा।
स्त्रीवादी होने का दावा नहीं करने के बावजूद स्त्रियों के लिए इन कविताओं में खास कोना रखा गया है। इस कोने से न सिर्फ यह कि स्त्रियों की हालत देखी गई है, बल्कि उनकी त्रासदी को महसूस करते हुए उनके अस्तित्व के लिए व्यथा भी प्रकट की गई है। विज्ञापन और स्त्री, मिलना किसी स्त्री की तरह, अपनी प्रिय एंकर के लिए, स्त्रियों की हँसी, दूसरी परंपरा और महादेवी की बेटियाँ ऐसी ही कविताएँ हैं जो तवज्जो तलब हैं। कुछ पंक्तियां देखें-
अब भी इस भरे- पूरे संसार में उनका कोई अपना कोना नहीं था
न कोई मुकम्मल परिचय
वंश वृक्ष में औरतों के नाम उल्लिखित नहीं थे।
(महादेवी की बेटियाँ)
संग्रह में छोटी रचनाएँ भी हैं जिनमें सार्थक, स्पर्श, प्रेम, दीया और चाहत प्रमुख हैं। चाहत कविता से पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं-

नदी के पार मेरा घर है
पर मुझे अपने साथ बसा लो
मैं लंबे रेगिस्तानों को पार करता हुआ सदियों से तलाश रहा हूँ तुम्हें
मेरे पास सिवाय चाहत के और कुछ नहीं है।
काव्य-व्याकरण ही की तरह काव्य-परम्परा भी एक चीज होती है और भारतीय काव्य परंपरा में तो मिलन और जुदाई का महत्त्वपूर्ण स्थान है। चाह की तलाश में प्रेमी नदियों और रेगिस्तानों को पार कर जाता है। यहाँ भी कुछ ऐसा ही लगता है यह रेगिस्तान हिज्र का सहरा मालूम होता है और नदी के उस पार ही मिलन मुम्किन है। जैसा कि पहले भी कह चुका हूँ कि कवि प्रेम को ही सर्वोपरि मानता है। कविता की आखिरी पंक्ति भी यही कह रही है कि मेरे पास चाहत के सिवा और कुछ नहीं है।
उत्तर पैगम्बर अरुण देव का दूसरा काव्य संग्रह है। संग्रह की कविताएँ पाठक को ठहर कर सोचने के लिए मजबूर करती हैं और शायद यही इनकी सार्थकता है। संग्रह में इनका उर्दू प्रेम जाबजा प्रकट होता है, बल्कि यूँ कहना चाहिए कि संग्रह की शुरुआत ही वे इस मकौले से करते हैं कि शायरी कारे-सद पैगम्बरी अस्त।
संग्रह की कविताओं पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है। लेकिन मैं अपनी बात फिर रिल्के ही के शब्दों में समाप्त करना चाहूँगा कि जहाँ तक हो सके समीक्षा कम पढो।....रचना के प्रति प्रीति ही उसे अस्ल में वहाँ तक पहुँचा सकती है और न्याय कर सकती है।
अरुण देव इक्कीसवीं सदी के कवि हैं और अपने पाठक पर पूरा भरोसा करते हैं, तो अब यह दायित्व पाठक का हो जाता है कि वे कवि की रचनाओं के साथ पूरा न्याय करते हुए इन कविताओं से स्वयं रूबरू होवें ताकि उसी अनुभव से वे भी दो-चार हो सकें।

पुस्तक का नाम - उत्तर पैगम्बर
लेखक - अरुणदेव
प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन प्रा. लिमिटेड ,
प्रकाशन वर्ष - 2021
मूल्य - 160/
विधा - कविता
सम्पर्क कल्लों की गली, जोधपुर