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संवाद निरन्तर

मधुमती के हर नये अंक की उत्कण्ठा रहती है
मालचन्द तिवाडी
आज से कोई छह दशक पहले राजस्थान साहित्य अकादमी के मुखपत्र मधुमती का पहला अंक मोतीलाल मेनारियाजी के सम्पादन में प्रकाशित हुआ था। पहले अंक के अपने सम्पादकीय में उन्होंने लिखा था कि असत्य से सत्य, अशिव से शिव व असुन्दर से सुन्दर को खोजकर लाता है, वही तो साहित्य होता है। मेनारियाजी का यह सम्पादकीय जिस मेनिफेस्टो की प्रस्तावना करता है, उसकी प्रतिपूर्ति जिस उत्कर्ष और उपलब्धि तक अब पहुँची है, वह अपूर्व है। बहुत समय तक यह पत्रिका मोहल्ले का अखाडा बनी रही और इसमें राजस्थान के साहित्यिक सींकिया पहलवान ही दण्ड पेलते नजर आते रहे। मेरे जैसे पाठक के लिए तो एक दौर ऐसा भी रहा कि जब डाक से मधुमती आती थी, तो मैं उसके पन्ने तक पलटने को फालतू जहमत समझकर, उसे रद्दी के हवाले कर देता था। यह कितना सुखद है कि आज उसी मधुमती के हर नये अंक की उत्कण्ठा के साथ बाट जोहता हूँ और अंक आते ही उसका पारायण-परायण होकर बैठ जाता हूँ। यह चमत्कार घटित करने का सारा श्रेय इस पत्रिका के नये सम्पादक श्रीयुत डा.ब्रजरतन जोशी को क्यों न दूँ, जिन्होंने कोरोना के घोर कलिकाल के आरम्भ होने से कुछ ही पेशतर वर्ष 2019 में सम्पादकीय दायित्व स्वीकार किया था। जोशीजी ने इस पत्रिका के कलेवर को कुछ ऐसे क्रांतिकारी लहजे में बदला है कि आज इसका शुमार हिंदी की सर्वाधिक संजीदा-साहित्यिक पत्रिकाओं में होने लगा है। कुछ कमसुखन मीडियाकरों को यह शिकायत है कि इसमें राजस्थान के लेखकों के लिए जगह नहीं है। मैं उन मरगिल्ले महापुरूषों से पूछना चाहता हूँ कि सिवाय इसके कि आप राजस्थान के लेखक हैं, आफ लिखे की ऐसी कौन-सी पात्रता है कि उसे मधुमती समेत कोई पत्रिका अपने पन्नों में जगह दे? जहाँ तक राजस्थान के हिन्दी में सार्वदेशिक प्रतिष्ठावान लेखकों का सवाल है, उनमें से एक भी ऐसा न होगा जो मधुमती के नवोन्मेषी कलेवर के साथ अपनी रचनात्मकता की साझेदारी न कर रहा हो। डॉ.नंदकिशोर आचार्य हों या अनिरुद्घ उमट, सभी पीढियों के सृजनशील लेखक तो लगातार मधुमती में लिख रहे हैं। मेरे अभिन्न मित्र जयपुर निवासी राजाराम का ही उदाहरण लूँ, तो उन्होंने इस नई मधुमती में ऐसा कुछ लिखा है जिसका महत्त्व सार्वकालिक हो गया है। सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय ने कुल 67 कहानियाँ लिखीं और कहानी को अपर्याप्त विधा मानकर कहानी-लेखन का त्याग कर दिया। उन 67 में से एक हीलीबोन की बतखें पर राजाराम ने जो विवेचना मधुमती में की, उससे अज्ञेय का समग्र कहानी लेखन एकबारगी पुनः चर्चा में आ गया। ऐसी उथल-पुथल न मचाए, तो कोई साहित्यिक पत्रिका भला देश का कागज काहे को बर्बाद करे ? फिर मधुमती के इस नये अंतराल में कितने तो महत्त्वपूर्ण लेखकों पर एकाग्र विशेषांक ही निकल चुके। अभी हाल ही में बीकानेर के जाये-जनमे हिंदी फिल्मों के कालजयी गीतकार भरत व्यास पर जोशीजी ने जिस मनोयोग और परिश्रम से सामग्री जुटाकर, जो अंक निकाला है, वह तो अपनी मिसाल आप है। जोशीजी के रचनात्मक हठ और कोमलकान्त विनम्रता की पराकाष्ठा यह है कि उन्होंने मुझ प्रमादी तक को नहीं बख्शा और भरतजी के फिल्मी गीतों पर मुझसे लिखवाकर ही माने। फिर इस दौरान पत्रिका के अंकों में छपे लेखों के दृष्टिपूर्ण चयन के आधार पर कुछ नये पुस्तक प्रकाशनों का सुयोग भी राजस्थान साहित्य अकादमी को बरसों बाद लब्ध हुआ। महात्मा गाँधी पर जो पुस्तक आई है और जिसका लोकार्पण स्वयं प्रदेश के मुख्यमंत्रीजी ने किया, वह क्या कोई ऐसी उपलब्धि है कि उसे अंग्रेजी मुहावरे में लेफ्टहैण्ड कोम्पलीमेंट देकर हाथ झाडे जा सकते हों ! नहीं, आप अगर बडे हैं, तो इस युवा, उत्साही, कर्मठ, सर्जनात्मक और सर्वदा सौजन्यशील सम्पादक डॉ.ब्रजरतन जोशी के सिर पर आपको अपना दाहिना हाथ रखकर आशीर्वाद देना ही होगा और श्रीयुत बी.डी.कल्ला साहब जो कि राज्य के साहित्य, कला और संस्कृति मंत्री हैं, का शुकराना भी अदा करना पडेगा कि उन्होंने मधुमती को जोशी और जोशी को मधुमती सँभलाकर प्रदेश के साहित्य में एक नये अध्याय का श्रीगणेश किया। इति आनन्दम्!

- सुख्यात कवि-कथाकार श्री मालचन्द तिवाडी की फेसबुक वॉल से साभार