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पदुमलालपुन्नालाल बख्शी : याद रहोगे, मास्टरजी!

कनक तिवारी
1. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी-हिन्दी साहित्य और खडी बोली के वाङ्मय का अब पुराना पडता जा रहा, लेकिन उस सफर का शुरुआती मील का पत्थर है। लेखकी बिरादरी के लिए बख्शीजी, परन्तु अपनों के लिए मास्टजी का सम्बोधन यादों के धुँधले तहखाने में डूब रहा है। उनका मूल्यांकन समकालीनों और बाद की पीढी ने भी नहीं किया। मास्टरजी के लेखन का भूगोल खैरागढ से उत्तरप्रदेश की साहित्यिक राजधानी इलाहाबाद के मार्फत सारे हिन्दी जगत में फैला। डायरी विधा या ठर्र बुद्धिजीवी गद्य या कथा विधा या कथा-आलोचना या कथा-निबन्ध, मास्टरजी उस दुनिया के एक उद्धारक थे। पोस्टकार्ड पर आवेदन क्या कर दिया,सरस्वती के संस्थापक संपादक आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी उन्हें नियुक्त करने इलाहाबाद स्टेशन पर स्वागत करने आ गए।
2 लगभग गुमनाम कस्बे खैरागढ में रहते हुए सूचनातंत्र और ताजातरीन पुस्तकों तक के अभाव के बावजूद बख्शीजी ने असाधारण रचनात्मक प्रतिभा का परिचय देते कुछ नई विधाओं के प्रयोग करते हिन्दी वांङमय की दहलीज पर दस्तक दी कि श्रेष्ठि वर्ग भौंचक हो गया। उनके पहले माधवराव सप्रे ने लगभग चमत्कृत करते छत्तीसगढ के बीहड पेन्डरा रोड कस्बे से छत्तीसगढ मित्र नामक महत्त्वपूर्ण पत्रिका का प्रकाशन शुरु किया था जो 1902 में बंद हो गई। यह लगभग सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है कि माधवराव सप्रे की कहानी टोकरी भर मिट्टी हिन्दी की पहली कहानी है। माधवराव सप्रे के बाद पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और मुकुटधर पाण्डेय ने यह दाय लिया कि स्थापित आचार्यों के मुकाबले युवा छत्तीसगढी लेखकों की बौद्धिक चुनौतियों के स्फुलिंग बिखेरे जाएँ। मुकुटधर पाण्डेय और बख्शी ने छायावादी काव्य और गद्य में पहली दस्तकों में एक बनने का श्रेय प्राप्त किया। मुकुटधर पाण्डेय ने ही पहली बार छायावाद शब्द का इस्तेमाल किया। बख्शी ने हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ आलोचक रामचंद्र शुक्ल के बरक्स कहा नई कविताओं का जो सैलाब है उसे रहस्यवाद नहीं, स्वच्छंदतावाद कहा जाना चाहिए। आलोचकों ने बख्शीजी की मान्यता को स्वीकार भी किया।
3. कविता बख्शीजी की कुदरती अभिव्यक्ति नहीं थी। उन्होंने लगभग सौ कहानियाँ लिखी हैं। निबन्ध और आलोचना के क्षेत्र में वे सचमुच मास्टरजी हैं। कहानी और निबन्ध विधाओं का बख्शीजी ने एक मिश्रण या यौगिक या पारदमिश्रण (अमलगम) तैयार किया। निबन्ध पढने से कहानी झाँकने लगती है। कहानी की उँगली पकडकर चलने से कविता की तरलता महसूस होती है। फिर विचार ही विचार झकझोरने लगते हैं। फिर पाठक निबन्ध के ठौर पहुँच जाता है। यह एक अद्भुत प्रयोग था। इसका नोटिस नहीं लिया गया। साहित्य के सूबेदार भौंचक थे कि छत्तीसगढ के एक देहाती कस्बे का गदहपचीसी की उम्र का निम्न मध्यमवर्गीय गुमनाम युवक इलाहाबाद, बनारस और आगरा जैसे कुलशील नगरों के स्थापित साहित्यकारों और मानदण्डों के बरक्स समानांतर बडी लकीर खींचकर उन्हें चुनौती दे रहा है।
4 बख्शीजी मुख्यतः अंगरेजी के निबंधकारों के सम्पर्क में थे क्योंकि हिन्दी में वैसे रोल मॉडल नहीं थे। चार्ल्स लैम्ब, एडगर एलेन प्रो, जोसेफ एडिसन, ए. जी. गार्डिनर, स्टील, कार्लाइल, ऑस्कर वाइल्ड, मैथ्यू आर्नाल्ड, जार्ज बर्नार्ड शा, आल्डुअस हक्सले, हैजलिट, वर्जीनिया वुल्फ, स्टीवेन्सन वगैरह युवा पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के भ्रूण में एक अनोखी विधा का वर्णसंकर रूपांतरण उनकी निजता के साथ प्रजनित करने का संस्कार रच रहे थे। भारतेन्दु हरिश्चंद्र, बाबू पूर्णसिंह, बालकृष्ण भट्ट, गुलेरी, गुलाबराय, प्रतापनारायण मिश्र, रामचंद्र शुक्ल, महावीरप्रसाद द्विवेदी, बालमुकुन्द गुप्त, शिवपूजन सहाय, श्यामसुंदर दास, रामेश्वर प्रसाद, राजा लक्ष्मण सिंह, बद्रीनारायण चौधरी, ठाकुर जगमोहन सिंह, अम्बिकादत्त व्यास, माधव मिश्र, पदुमसिंह शर्मा, वियोगी हरि, पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र, लाला शिवनिवास दास, स्वामी दयानन्द, गोविन्द नारायण मिश्र, जैसे गद्याचार्यों के गुरुकुल के साथ एक युवा, मध्यवर्गीय, शिष्ट, परम्परावादी उत्तराधिकार का लेखक चुनौतियाँ बिखेर रहा था। उसका मिट जाने में तो विश्वास रहा होगा, किसी स्थापित विधा, शैली, व्यक्तित्व या समझ को मिटाने में नहीं। बख्शीजी ने मुख्यतः पश्चिमी साहित्य या बांग्ला उस्तादों को पढ लिया था।
5. हिन्दी गद्य का गर्भगृह आजादी के आन्दोलन और आधुनिकता की सुगबुगाहट में भी है। गद्य ने विचार की भाषा की भूमिका तो स्वीकार कर ली, लेकिन बीसवीं सदी में उसका काफी चिन्तन अनुवाद या अन्योक्ति की भाषा में टर्राता रहा। कई बार हिन्दी गद्य जटिलता, सूक्ष्मता, परिष्कार और गहरी दार्शनिक उपपत्तियों से मुँह फेरे दिखाई पड रहा है। वह भाषायी लाक्षणिकता के आडम्बर के कारण सम्प्रेषणीय भी नहीं हो पाता था। कविता में शायद वैचारिक, बौद्धिक लेखन की पूरी गुंजाइश नहीं होने से बडे से बडे कवि को गद्य में अभिव्यक्त होने के विकल्प का उपयोग करना पडा है। जयशंकर प्रसाद, महादेवी, अज्ञेय, मुक्तिबोध, शमशेर, नागार्जुन, रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा, विजयदेवनारायण साही और औपन्यासिक गद्य को लेकर विनोदकुमार शुक्ल तक कवि होने के साथ गद्यकार भी हैं। अशोक वाजपेयी कहते हैं कि इस सदी को हिन्दी कविता में गद्य की घुसपैठ की सदी भी कहा जा सकता है।
6. बख्शीजी ने भी शुरुआत में कविताएँ लिखीं। बख्शीजी के पास गद्य का कोई जैविक संसार, पूर्वज या गुरुकुल आसपास नहीं था। खैरागढ में रहते हुए महज एक पोस्टकार्ड से इलाहाबाद के केन्द्र से संचालित समग्र साहित्य का जनपद अपने लिए स्वायत्त किया! बख्शीजी ने इतिहास के गुरूर को समझा और भूगोल के मिथक को तोडा। एक नामालूम कस्बे के नामालूम मध्यवर्गीय युवक ने साहित्यपीठ के अधिष्ठाताओं की रचनाओं का सरस्वती के लिए सम्पादकीय परीक्षण करके जोखिम भरी चुनौतियाँ बिखेरीं यही मेरा कहना नहीं है। बख्शीजी की कलम से साहित्य के नियामक मूल्यों, नये प्रयोगों और लेखन की ताकत के प्रामाणिक और स्वीकार्य ईंधन बने।
7. खडी बोली का इतिहास लगभग बख्शीजी का समकालीन ही कहा जाएगा। बेहद आश्चर्यजनक है कि उनसे अधिकांश समकालीनों की भाषा पढने पर लगती है मानो कपडा धुल तो गया हो, परंतु उस पर इस्तरी नहीं की गई हो। बख्शी की भाषा आज भी समकालीन, ताजा और आधुनिक लगती है। लेखक वही है जो कथ्य के साथ ऐसी भाषा रचे जो पीढियों को पढने में लगे कि उन्हें भी ऐसी भाषा लिखनी चाहिए। बख्शीजी की भाषा शास्त्रीय, अलंकारिक, टकसाली या पंडिताऊ किस्म की ठर्र नहीं है। वह आमफहम, चुस्त, तरल और तराशी हुई है।
8. बख्शीजी का सोच पूरे विश्व और भारत को अपनी परिधि में समेटता है। उनके साहित्य में छत्तीसगढ स्थानों और चरित्रों का ज्यादा उल्लेख है कि वे छत्तीसगढी अस्मिता के पहले सशक्त हस्ताक्षर बन गए हैं। बख्शीजी का भूगोल किसी एक जनपद का भूगोल नहीं, लेकिन उसमें छत्तीसगढ की अन्तध्र्वनि है। ऐसी ही अंतर्ध्वनियाँ मुकुटधर पाण्डेय, श्रीकांत वर्मा, शानी, बलदेवप्रसाद मिश्र, सुंदरलाल शर्मा, विनोदकुमार शुक्ल, विभु कुमार, रमाकांत श्रीवास्तव, लालमोहम्मद रिजवी, शंकर शेष, शषि तिवारी, परदेशीराम वर्मा आदि के लेखन में भी हैं। छत्तीसगढ के चरित्रों, घटनाओं, अनुभवों, अवलोकन और प्रसंगों को अपने साहत्य का कच्चामाल समझकर जो उत्पाद बख्शीजी के कारखाने में बना उसमें क्षेत्रीयता का आग्रह नहीं है। वह साहित्य के आचार्यों को विनम्रतापूर्वक सूचित करता है कि भूगोल की इकाइयों में ऐसी रचनात्मक ताकत होती है कि वह इतिहास का हिस्सा बनाया जाए।
9. हिन्दी के स्वनामधन्य आलोचक शायद अतिरिक्त उत्साह में बख्शीजी को हिन्दी का एजी गार्डिनर कह देते हैं। एजी गार्डिनर लेकिन-अंगरेजी के बख्शी नहीं हैं। न उन्होंने संस्थापक गद्यकारों की तरह अंगरेजी भाषा का शिल्प या वैचारिक संस्कार गढे, न उन्होंने विधाओं की पारस्परिकता के प्रयोग करके टेस्टटयूब बेबी या रोबोट पैदा किए। अंगरेजी गद्य की शुचिता, शराफत, विनयशीलता, सादगी, तरल भाषा, वैचारिकता, संकेतिक व्यंग्य और अकूत संभावनाओं पर अपनी रचनात्मकता का सेटेलाइट उठाए, जो यह सब रच जाता है, वही संस्थापक विद्याचार्य जोसेफ एडिसन है। बख्शीजी हिन्दी गद्य के जोसेफ एडिसन हैं, हालाँकि उसका रूपांतरण नहीं। बख्शीजी में कबीर के तेवर का नहीं, लेकिन नस्ल का वैचारिक फक्कडपन और गाँधी की तरह की आर्द्र मानवीय गरिमा है। बख्शीजी को द्वारिकाप्रसाद मिश्र ने आजन्म प्राध्यापकी करने और मानद डीलिट् देने जैसे निर्णय लिए थे। उन्हें साहित्य वाचस्पति वगैरह उपाधियों से नवाजा भी गया।
10. बख्शीजी ठण्डे रचनाकार नहीं थे। उनमें जीवन्त मनुष्य बैठा हुआ है। जोखिम उठाने में बख्शीजी ने स्थापित आचार्यों का पूर्व अनुमोदन प्राप्त करने की जरूरत नहीं समझी। बख्शीजी का सिर सम्मान व्यक्त करने या धरती को देखते रहने की आदत की वजह से झुका दिखता होगा, लेकिन रीढ की हड्डी को अपनी नैसर्गिक अभिव्यक्तियों का आधार बनाए रखने के विश्वास का नाम भी है पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी। उन्हें मालूम था अंगरेजी बौद्धिक अवधारणाओं की भाषा है। इसलिए उन्होंने अंगरेजी में खूब पढा। बौद्धिकता की जाति, धर्म, या लिंग नहीं होते। भाषा की जाति होती है और जाति की भाषा भी होती है। तत्सम या तद्भव शब्द हों, या भाषा की लाक्षणिकता हो, अभिधा या व्यंजना हो, बख्शी ने अपने समकालीनों के मुकाबले पहाडी नदी-सी बहती हिन्दी के बीसवीं सदी के दूसरे, तीसरे, चौथे दशक में जिस भाषा का परिष्कार किया, वह आज भी समकालीन लगती है। उनके कई पूर्वज, अग्रज, अनुज और सहोदर ऐसी हिन्दी लिख गए हैं जो सतत कुलशीला नहीं लगती, पपडियाँ गई है।
11. बख्शीजी का छत्तीसगढ, लेकिन भूगोल नहीं है। कारी हो या विद्याभूषण ठाकुर, नलिनी हो या डाकू रघुनाथ-छत्तीसगढ के भूगोल को इतिहास के रसायन में घोलकर बख्शीजी ने शिल्पगत नहीं विचारगत प्रयोग किया है कि छत्तीसगढ कोई टापू नहीं, बल्कि धरती और उसकी अभिव्यक्ति का जरूरी अवयव इस तरह समझा जाए कि साहित्य की प्रामाणिकता के लिए जनवादिता के नारों की नहीं, नर-नारियों की जनवादिता के साहित्य रूपक तलाशे जाएँ। छत्तीसगढ की आत्मा जैसा निबन्ध आत्मा का छत्तीसगढ ज्यादा है।
सवाल है, बख्शीजी ने छत्तीसगढ की आत्मा को तो उकेरा, लेकिन छत्तीसगढी में क्यों नहीं लिखा? क्या छत्तीसगढी में लिखकर वह भूमिका अभिनीत की जा सकती थी जो इतिहास ने उन्हें चुनौती के रूप में सौंपी थी। क्या हिन्दी वाङ्मय को पूरे का पूरा बख्शी जज्ब होता? क्या इस छत्तीसगढ सुत को आम आदमी के वंशज के रूप में साहित्य की जागीरदारी की अभिव्यक्तियों की बौछार में अक्षत रखा जा सकता था? बख्शीजी को एक जनपद की नहीं, पूरे विराट भूगोल की चिन्ता थी। इसलिए उनका छत्तीसगढ भौगोलिक नहीं, बौद्धिक जनपद ज्यादा है। लोग यह क्यों समझते हैं कि उन्हें केवल अपने तत्काल को सम्बोधित करने की चिन्ता थी। उन्होंने बीसवीं सदी को केवल संघर्ष या जिजीविषा की शताब्दी रेखांकित करने के बदले उसे सुन्दरता की शताब्दी बनाने का अभिनव प्रयास किया। इसलिए आलोचक बख्शी, रामचंद्र शुक्ल जैसे श्लाका पुरुष के बरक्स (एक बुजुर्ग ब्राह्मण के मुकाबले एक युवा कायस्थ) कहने का साहस संजो सका कि जो कविता का सैलाब आया है, वह रहस्यवाद नहीं, अपने रोमान्टिसिज्म के कारण स्वच्छंदतावाद है। पोस्टकार्ड या सरस्वती की सम्पादकी ऐसा ही जोखिम उठाने से मिलती है।
12. वे राजा-रानियों की खिलाफत नहीं कर सके। अपने शिष्य के इस पुत्र को पोते की उम्र के बावजूद महाराज कहते हुए उससे पैर छुलाने में परहेज करते रहे। खुद को मास्टरजी के सम्बोधन का पेटेंट कराकर उस शब्द का बहुब्रीहि समास बन गए। प्रकाशक नहीं ढूँढ सके। छले गए। मंच पर चढने को राजसिंहासन पर बैठना समझते रहे। बीडी फूँकते रहे। पद्मलाल के बदले पदुमलाल बने रहे। क्रोध भी करते रहे। छात्रों को मारते भी रहे। डॉक्टरों की अनसुनी करके अपनी देह को गलाते रहे। लेकिन पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने इतिहास की नींव में अपनी मिट्टी को अपने अलाव में पकाकर एक अलग ईंट रखी। भूगोल को स्वायत्त, विस्तृत और बहुधर्मी किया। अर्थशास्त्र को सामाजिक संघर्ष का प्रकट हथियार बनाने के बदले विषमता से उत्पन्न करुणा का बौद्धिक गायन किया। आलोचना विधा को उसकी जातीय कुलीनता से अलग हटकर उसे कडियल धरती के बेटों की वाग्मिता और अर्थमयता की घुट्टी पिलाई। छत्तीसगढ की शशि तिवारी को तो श्रेष्ठ कहानीकार घोषित करते रहे, लेकिन भगवतीचरण वर्मा और सुमित्रानन्दन पन्त को सरस्वती प्रेस में आने के बाद ही मुठभेड के बाद छापने को सहमत हुए। छायावाद और स्वच्छंदतावाद की संज्ञाएं इसलिए ढूँढीं कि अंगरेजी साहित्य के न केवल अनुसंधित्सु पाठक थे, बल्कि बकौल किशोरीलाल शुक्ल रामानन्द चटर्जी के मॉडर्न रिव्यू में अंगरेजी में लिखते थे जब फकत बी.ए. पास थे।
13. बीसवीं सदी का पूर्वार्द्ध भारत के लिए खलबली का समय रहा है। दो विश्व युद्धों के अतिरिक्त भारतीय आजादी की लडाई का यही कालखण्ड है। बख्शीजी का शुरुआती लेखन प्रथम विश्वयुद्ध के साथ साथ शुरू हुआ। उनका प्रौढ लेखन दूसरे विश्वयुद्ध के साथ परवान चढा। 1920 में उन्हें सरस्वती की संपादकी मिली जिस वर्ष महात्मा गाँधी ने तिलक के अवसान के बावजूद कांग्रेस की बागडोर सँभाली। जाहिर है अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं और देश में चल रही राजनीतिक उथलपुथल से भी बख्शी का परिचय रहा होगा क्योंकि बख्शीजी से ज्यादा पढाकू व्यक्ति हिन्दी साहित्य के इतिहास में इने गिने हैं। दोनों विश्वयुद्धों तथा कांग्रेस के जनयुद्ध से उत्पन्न बौद्धिक चुनौतियों और अभिव्यक्तियों का जो जखीरा बना था उससे लेखक बख्शी ने किस तरह आत्म साक्षात्कार किया, वह भी अध्येताओं के लिए एक दिलचस्प विषय होना चाहिए। छायावाद की पहली कविता मुकुटधर पाण्डेय क्यों लिखते जबकि उन्हें अंगरेजी राज में हिन्दी के सत्ताधीशों के तिलिस्म के इस गुरूर को तोडना था कि छायावाद की मौलिक रचनाएँ छत्तीसगढ के रायगढ में बैठकर लिखी जा सकती थीं। बख्शीजी भारतीय मनीषा के अनुकूल पश्चिम के बडे विचारकों से प्रेरणा लेकर आधुनिक गद्य का एक अलग ड्राफ्ट हिन्दी को दिखा रहे थे। उन्होंने आलोचना के महारथियों से भी लोहा लिया और विश्व साहित्य तक की समीक्षा की। बख्शीजी न शीतल और तरल भाषा का आविष्कार किया है। ऐसे ही साहित्य में डूब जाने का मन करता है।
14 उनकी छप्पन किताबें हैं। साठ वर्षों तक लेखनरत रहते 18 निबंध संग्रह हैं। तीन सौ से ऊपर निबंध हैं। करीब सौ कहानियाँ हैं। दो काव्य संग्रह हैं। तीन कहानी संकलन हैं। आलोचना के ग्रंथ हैं। 17 वर्ष की उम्र में लिखी कहानी सोना निकालने वाली सीपियाँ और भाग्य से प्रभावित महावीरप्रसाद द्विवेदी ने उन्हें आमंत्रित किया। पंचपात्र, झलमला, कथाचक्र, कुछ, नाम, मोटर स्टैण्ड, बंदर की शिक्षा, हिन्दी साहित्यः एक ऐतिहासिक समीक्षा, विश्व साहित्य जैसी कुछ बडी सीपियों में मोती मिलते हैं। वे कहते थे मुझे भाषा की कारीगरी नहीं आती। उनकी भाषा अलबत्ता साहित्यिक कारीगरों को रन्दा चलाना सिखा रही है। वे लगभग 1935 तक के अपने लेखन को वे मौलिकता और प्रौढता के अभाव के कारण बहुत निर्ममतापूर्वक खारिज कर देते हैं। वे अपने एक दर्जन निबंधों को छाँटकर छपाना चाहते थे। बख्शीजी लेखन को पार्ट टाइम गतिविधि नहीं, पूर्णकालिक जीवन प्रयोजन मानते थे। बख्शी में अपनी गलतियाँ स्वीकार करने की साहसी आत्मा थी। उन्होंने कोई गुट नहीं बनाया। आन्दोलन नहीं चलाए। वे पेड की तरह थे। जो छाया देता है। फल देता है। जरूरत पडने पर खुद को यज्ञ की समिधा बना देता है।
15. यह प्रगतिशील फतवा है कि बख्शीजी बौद्धिक किस्म के लेखक नहीं थे। जिस व्यक्ति ने अपने स्कूली जीवन से लेकर आखिरी साँस तक देश के इने गिने पढाकुओं के बीच सम्मानजनक स्थान सुनिश्चित किया, उसकी अध्यवसायिता को लेकर सवाल खडे नहीं किए जाने चाहिए। यह बात वे लोग कहते हैं जो प्रतिबद्धता का साहित्य पढते हैं और साहित्य के किसी फॉर्म को तोड तक नहीं पाते। बख्शीजी ने जो कुछ पढा उसे जज्ब या हजम नहीं किया? यह अलग बात है कि जो कुछ उन्होंने लिखा उससे वैचारिक सहमति जरूरी नहीं है। बौद्धिक मतभेद ही लोकतंत्रीय साहित्य का निर्माण करते हैं। क्या रामचंद्र शुक्ल के बरक्स स्थापना करना, धनंजय वर्मा के अनुसार कथा- निबन्ध की विधा का आविष्कार करना, हिन्दी साहित्य के कालखण्ड को लौकिक काल, रस काल और बौद्धिक काल में विभक्त करना, अंगरेजी भाषा की बौद्धिक अवधारणाओं को हिन्दी में जाँच परख कर युगधर्म के अनुसार रचनात्मक साहित्य में तब्दील करना ऐसे कृत्य नहीं हैं जिन्हें बौद्धिक कहा जाए?
16. रामचंद्र शुक्ल और उनके अनुयायियों ने उन्हें हिन्दी भाषा के निर्माताओं में शामिल नहीं किया। पंक्ति-च्युत कर दिया। बख्शीजी ने सिद्ध किया कि साहित्य भी संसार को समझने का एक जायज, विश्वसनीय और कारगर तरीका हो सकता है। मुख्यतः शरद गुप्ता और पोती नलिनी, गणेश खरे आदि राजनांदगाँव के दिग्विजय महाविद्यालय परिवार ने ही उन पर शोध किया है। गणेशशंकर शर्मा की किताब सरकार ने छापी है। उनके लेखन का बडा हिस्सा कालजयी जीवाणुओं से युक्त भले न हो, पूरा नश्वर भी नहीं है। हम लोग बख्शीजी के व्यक्तित्व इस कदर अभिभूत हैं कि उनके कृतित्व का मूल्यांकन करने के लिए कलम की स्याही खर्च करने के बदले उनकी याद में अब भी श्रद्धांजलियों की बरसात बहाये जा रहे हैं। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के लेखन पर विश्वविद्यालय शोध तो किए गए हैं, परन्तु हिन्दी के आला दर्जे के आलोचकों ने उनके बारे में सोचने का मौसम ही अब तक नहीं ढूँढा है।
17. धनंजय वर्मा ठीक कहते हैं कि कथा-आलोचना की जिस विधा को समुन्नत करने का ढोंग करते बहुत से आलोचक पहले हुए हैं, उसकी शुरुआत मास्टरजी के शिल्पी हाथों ने की है। कमलेश्वर बख्शीजी पर फिदा रहे हैं। अपनी पत्नी को माधवराव सप्रे पर शोध कराते उन्होंने कहीं जरूर सोच रखा था कि बख्शीजी के साहित्यिक अवदान पर सामूहिक ऐलान की एक मुहर लगवाई जाए। ललित निबंधकार के रूप में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का अप्रतिम योगदान है। जीवंत ललित निबंधकारों में अग्रणी रमेशचन्द्र शाह इस विधा में बख्शीजी को अपना गुरु मानते हैं। उनके निबन्ध एक साथ चन्द्रकान्ता-सन्तति, गोदान, छोटी बहू और अरे यायावर रहेगा याद के सम्मिश्रण का घोल हैं। मिथक के स्पर्ष, रहस्यात्मकता की चादर, धर्मशीलता की भित्ति और किसी गाँव की पगडण्डी की तरह अर्द्धवर्तुल, किन्तु निश्चित पाथेय वाली वृत्ति लिए पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का साहित्य नई पीढी के लिए अराकान की चट्टान की तरह अबूझा नहीं छोडा जाना चाहिए।
18 बख्शीजी की ठोस धरातल पर खडी शिष्ट कहानियाँ तीक्ष्ण नहीं हैं। वे हमारी बुनियाद को झकझोरने की कोशिश नहीं करतीं। उनके विशाल जखीरे की कई कहानियाँ अपने भ्रूण में हेनरी जेम्स, वर्जीनिया वुल्फ और जेम्स जॉयस की कहानियों की याद दिलाती हैं, लेकिन उन कहानियों की वय बढते-बढते न केवल शैली बदल जाती है, परन्तु प्रयोजनीयता भी। कभी कभी लगता है कि मास्टरजी को छत्तीसगढ में रहकर गृहस्थी के बोझ से दबाकर विश्वविद्यालय की पढाई तक पूरी नहीं कराकर, संघर्ष के बीजाणु तो उनकी आत्मा में नियंता ने भर दिए, परन्तु यदि इस लेखक को रवीन्द्रनाथ टैगोर के परिवार जैसा शैशव मिला होता, तो किसी श्रेष्ठ पुरस्कार पर अधिकार मेरे गृह जिले राजनांदगाँव के एक लेखक का भी अवश्य होता। व्यक्ति अपने कर्तृत्व का वास्तविक अन्तिम नायक नहीं होता। सदैव संभावनाओं का नायक होता रहता है। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी भी दंतकथाओं के नायक बनकर न रह जाएं, इसका डर है। बख्शीजी का संघर्ष एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार के औसत हिन्दुस्तानी का संघर्ष रहा है जिसे उसके चाहने पर भी कोई बौद्धिक महानायक की भूमिका नहीं दे पाता।
19. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी कई मायनों में प्रगतिशील विचार रखते थे, तो पुरातनपंथी हिन्दू भी थे। सामाजिक वर्जनाओं, जडताओं और वहशी प्रथाओं के विरुद्ध मास्टरजी ने जगह-जगह और समय-समय पर कुछ न कुछ लिखा है। वहीं दूसरी ओर अनेक ऐसे संस्मरण-उद्धरण मौजूद हैं, जब उन्होंने सामाजिक व्यवहार के यथास्थितिवाद का पोषण किया है। बख्शीजी ने निबंध जैसे शुष्क, अनुशासनप्रिय और विचार प्रधान माध्यम का सहारा लेकर सरस्वती के मंदिर में इस तरह प्रवेश किया जैसे छप्पनभोग और विभिन्न तरह के फल-फूलों के बदले कोई औसत निम्न मध्यमवर्गीय परिवार का भक्त सूखा नारियल लिए चला जा रहा हो। आप नारियल चबाते जाइए, रस उसमें से अपने आप मिठास के साथ निकलता आएगा। शब्द उसका बयान नहीं कर सकते। जिह्वा उसको केवल भोगती भर है, मन किन्तु मिठास से भर जाता है।
सम्पर्क- एचआईजी 155,
पदमनाभपुर, दुर्ग (छत्तीसगढ)-४९१००१
मो. ९१३१२५५८६४