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मन्नू भण्डारी : आग और राख का संगम

मधु कांकरिया
कुछ यादें ऐसी होती हैं जो पानी से मिले पानी की तरह इस कदर घुल मिलकर रस बस जाती है। मन में दूसरी यादों के साथ कि एक अलग ही जलधारा बन जाती है। फिर बरसों बाद उन यादों को जुडा करना कुछ ऐसा ही होता है जैसे पानी से मिले पानी को अलग करना। किनारे खडी मैं आज कोशिश कर रही हूँ, मुड - मुड कर देखने की ,उन जल तरंगों को पकडने की... कि कोई मुक्कमल तस्वीर उभर सके।
सच कहूँ तो मन्नूजी का नाम तो कानों में तभी पड चुका था जब मैं पंद्रह सोलह साल की रही होंगी। कारण? शायद मेरी माँ ने भी कभी मन्नूजी जैसा बनना चाहा था। इसका प्रमाण तब मिला, जब कोलकाता में मन्नूजी की भतीजी की शादी नीना (आजतक नाम भी याद है !) में हमें सपरिवार शरीक होने का मौका मिला। मेरी माँ बहुत उत्साहित थी उस शादी में शरीक होने के लिए क्योंकि लडकी अम्मा के मइके वालों की जो थी और अपनी जाति की थी और लडका कोई बंगाली बाबू ...मिस्टर बोस! अम्मा अपने के यह पहले अन्तर्जातीय विवाह में शरीक होने वाली थी।
बहरहाल इतने चकमक ,चकचौंध और बुलंद हस्तियों के बीच मेरी मानसिक स्थिति लगभग वैसी ही थी जैसी किसी मल्टीनेशनल के समक्ष किसी मुहल्ले के मोदी खाने के दुकानदार की। मैं अपने सर्वश्रेष्ठ सजधज के साथ खोई हुई ,खामोश ,निस्संग किनारे खडी हुई थी कि तभी माँ की जोशभरी आवाज मुझसे टकराई और मुझे भीतर से बाहर किया-इनसे मिलो, ये मन्नू बाईसा!
औपचारिक नमस्ते और हूँ हाँ के बाद मन्नूजी चली गयीं ,शायद उनमें मेरी माँ जितना उत्साह नहीं था।अम्मा धीमे से फुसफुसायी- इनके पति भी नामी गिरामी लेखक हैं। दूसरी जाति के हैं, प्रेम विवाह किया था मन्नू बाईसा ने। देखो, यहीं कहीं होंगे। थोडी देर बाद ही मेरी नजर दूर बैठे हुए एक गोरे से ,कुछ लोगों से घिरे हुए ,काले चश्में वाले रोबीले व्यक्ति पर पडी। पत्रिकाओं में उनकी तस्वीर देख चुकी थी, समझ गयी, ये ही हैं हमारे राजेंद्रजी!
लेकिन वह दुनिया मेरे किसी काम की थी ही, नहीं इसलिए उस मुलाकात को वहीं झटक मैं वापस अपनी दुनिया के कारोबार में लौट आयी। अम्मा तो लेकिन अम्मा ही थी, जब-जब देखती मुझे शब्दों की दुनिया में खामोश डुबकी लगाते ,उनसे रहा नहीं जाता। कहने लगती- मन्नू बाईसा को बताओ कि तुम भी लिखती हो। अरे बडे ऊँचे घर से रिश्ता आया था उनके लिए, लेकिन जाने क्या हुआ कि दूसरी जाति वाले लडके से विवाह कर लिया वह भी अपने से उन्नीस से। बेचारे मासासा तो उसी गम में चल बसे। अम्मा की बातों में मन्नू बाईसा ही नहीं, पूरा अजमेर, लाखन कोठरी, नया बाजार, अजमेर का सावित्री कॉलेज, उनके पिता सुखसम्पत राय भण्डारीजी का लिखा हिंदी, अंग्रेजी शब्दकोश, मन्नू बाईसा के तेवर, माँ का सहमापन, सुशीला बाईसा का मन्नू बाईसा के प्रति प्रेम.. सब कुछ झिलमिलाने लगता। जाने अनजाने मन्नूजी किसी रहस्य्मयी चिडिया की तरह खरामा-खरामा मेरे भीतर अपने पंख फैलाने लगती।
लेकिन अम्मा नहीं जानती थीं कि जिन मन्नूजी को उन्होंने बीजरूप में देखा था वे अब साहित्य का वटवृक्ष बन लहरा रही थीं। इसका हल्का-सा अहसास अम्मा को शायद तब हुआ होगा जब हम सबने मन्नूजी की कहानी यही सच है पर बनी फिल्म रजनीगंधा देखी थी। दो प्रेमियों के इश्क में एकसाथ पडी लडकी के कश्मकश और अंतर्द्वन्द्व को माँ ने कितना समझा नहीं कह सकती, लेकिन पर्दे पर मन्नू भंडारी नाम पढकर सीना चौडा हो गया था उनका।
किसी चलचित्र की तरह तैर रहा है अतीत। देश और समाज करवटें ले रहा था। समाजवादी समाज का सपना अब संसदीय प्रणाली से विकास के रास्ते में तब्दील हो चुका था। लेखन की दुनिया में अभी तक मेरा बपतिस्मा भी नहीं हुआ था। लेकिन इन गुजरते वर्षों में मैं मन्नूजी के दो कद्दावर उपन्यास, आपका बंटी और महाभोज पढ चुकी थी। वह एक सांस्कृतिक, राजनीतिक और पारिवारिक प्रयोगवाद का दौर था जिसमें पुरुष ही नहीं स्त्रियाँ भी बढ-चढ कर हिस्सा ले रही थीं। पारिवारिक विघटन और पारिवारिक सौंदर्य के अवमूल्यन की शुरुआत हो चुकी थी, ऐसे बदलते समय में एक बदलती स्त्री के अंतःकरण को न केवल पहचाना, बल्कि उसे रचा भी मन्नूजी ने। स्त्री कहीं की भी हो, महानगर की या गाँवों की या कस्बे की, अपनी सारी समस्याओं, आंतरिक कमजोरियों और हिम्मत के साथ, खूबियों और कमियों के साथ, अपने अदम्य जीवट के साथ उनकी कलम की नोक पर उतर ही जाती थी। कोमल भाषा और गहन संवेदना में रचा बसा आपका बंटी में जहाँ मातृत्व और स्त्रीत्व के बीच शकुन की कसमसाहट, दर्द और अंतर्द्वन्द्व है, बिखरते परिवार की त्रासदी का शिकार होता नन्हा मुन्ना बंटी है, वहीं उनकी रचनात्मकता को नयी दिशा और व्यापक सरोकार देता, महिलाओं के तयशुदा दायरों के बाहर कदम रखता राजनीतिक क्रियाकलापों की क्रूरता और चुनावी दाव पेंच को उजागर करता बडे फलक पर लिखा उनका दूसरा उपन्यास महाभोज है। दो-दो कालजयी कृतियाँ एक ही लेखिका के खाते में। आग और राख का अनूठा मिश्रण थी मन्नूजी। महाभोज की लोकप्रियता का अनुमान इसी से आप लगा सकते हैं कि उसके अभी तक 31 संस्करण और देश भर में सौ से भी ज्यादा नाट्य मंचन हो चुके हैं। खुद आडवाणीजी ने उनके महाभोज नाटक को तीन बार देखा। इतने प्रभावित थे वे ! रचना की शादी में भी आए थे वे। (शायद इन्हीं कारणों से उन पर बीजेपी का लेवल भी लगता रहा)
कुछ अम्मा के चलते, कुछ साहित्य जगत में उनकी गगनचुम्बी ख्याति के चलते मेरे लिए मन्नूजी जहाँ एक प्रकाश स्तम्भ-सी थी, वहीं उनको देख मेरे अंदर बौने पन की अनुभूति जोर मारने लगती। मैं अक्सर सोचती, क्या कभी मैं भी कुछ ऐसा रच पाऊँगी कि दिखा सकूँ मन्नूजी को देखिए यह मैंने, आपकी छन्ना की बेटी ने लिखा है! इसीलिए 2000 में जब मेरा पहला उपन्यास खुले गगन के लाल सितारे राजकमल से छपकर आया, तो अम्मा ने लगभग मनुहार करते हुए कहा-एक प्रति मन्नू बाईसा को भी भेज दो और लिखो कि तुम मेरी बेटी हो।
मैं झुँझला गयी- अम्मा मुझे मजबूर न करो। मेरा लिखा छप रहा है न ! दम होगा तो कभी न कभी उन तक पहुँच भी जाएगा। अम्मा का भी जवाब नहीं, उन्होंने कहा- हाँ, तुम्हारा लिखा तो पहुँच जाएगा, पर यह खबर कैसे पहुँचेगी कि तुम मेरी बेटी हो। अम्मा के ममत्व पर सचमुच मुझे लाड आया। फिर समझाते हुए कहा मैंने- अम्मा, अभी वे सफलता के हाईवे पर हैं और मैं एक अदना-सी लेखिका। सम्पादकों के मिजाज पर हर दिन बनता बिगडता मेरा घरौंदा। इस वक्त मैं यदि आफ परिचय की दुम पकडकर अपना परिचय दूँगी, तो वे यही समझेंगी कि मैं रिश्तेदारी निकाल उनकी ऊँची हैसियत का फायदा उठाना चाहती हूँ। आप सब्र करो, जब सही वक्त आएगा, मैं खुद अपना परिचय दूँगी।
वह सही वक्त आसमान से टपका जब एक बार किसी काम से मैंने हंस के दफ्तर में फोन घुमाया। यूं राजेंद्रजी ने मुझे कभी भाव दिया ही नहीं। इसलिए उनसे मैं हमेशा दफ्तरी भाषा में दफ्तरी बात कर फोन रख देती थी। पर उस दिन जाने कैसे मुँह से गैर दफ्तरी संवाद निकल गया - आप कोलकाता कब आ रहे हैं? राजेंद्रजी ने जैसे गोली दागी - अभी अर्चना कोलकाता आयी हुई है, पहले उससे तो मिलो। राजेंद्रजी से अर्चनाजी का नंबर लेकर मैंने उन्हें फोन घुमाया। औपचारिक बातचीत के बाद जाने किस बात पर अर्चनाजी ने कहा - मन्नूजी को आपका उपन्यास बहुत पसंद आया। शुभान अल्लाह! मन्नूजी ने पढा है मेरा उपन्यास!
खुदा झूठ न बुलाए। कानों पर जैसे विश्वास ही न हुआ। मन किया, फिर पूछूँ, पूछती रहूँ- क्या कहा उन्होंने? किन शब्दों में की तारीफ? भाषा के बारे में क्या कहा? कथानक कैसा लगा? पर अर्चनाजी भी राजेंद्रजी की ही पाठशाला से निकली हुई थी, मुझे अधिक भाव कैसे देती। उनकी आवाज की अदृश्य रुखाई ने हिम्मत पस्त कर दी। मैंने कुछ भी न पूछा। डेढ दिन मैं उसी खुमारी में रही। मेरे आत्मविश्वास को अनजाने ही एक किक जो मिल गयी थी।
उसी का परिणाम यह हुआ कि सोलह पंक्तियों का एक पत्र लिखा मैंने मन्नूजी को। अंतिम पंक्ति में जोड दिया कि मेरी माँ आपकी छन्नाबाई आपको प्रणाम लिखवा रही है। शायद आपको ध्यान हो कि अजमेर में लखन कोठरी में आप दोनों ने बचपन के अनेक चित्र साथ में उतारे थे।
पत्र भेज तो दिया पर विश्वास और अविश्वास के बीच डोलता रहा मन - क्या आएगा जवाब?
करीब महीना बीत गया। जवाब नहीं आया। निराश मन को फिर दार्शनिकता ने सँभाला- बडे लोग ! उपन्यास पसंद आना एक बात, लेकिन किसी के पत्र का जवाब देना अलग बात है।
एक सुबह चाय की प्याली में ब्रिटानिया बिस्किट डुबो-डुबो कर खा रही थी कि फोन घनघना उठा। उठाया भी मैंने ही। कोमल से आवाज - मधु से बात करनी है।
- जी, बोल रही हूँ। आप कौन?
- मैं मन्नू भण्डारी ,दिल्ली से !
- क्या? उत्तेजना से हकलाने लगी मैं। सौ-सौ गुलमोहर जैसे एकाएक खिल उठे। खुशियों का भर सँभाले न सँभले। मेरी हीनता की सारी ग्रंथियाँ उनके एक वाक्य से खुल गयी - तुमने इतने सालों तक मुझे पत्र क्यों नहीं लिखा? उन्होंने मेरी माँ से भी बात की और अंत में मुझसे कहा- अपने बारे में सबकुछ बताना, अच्छा लिख रही हो।
***
एक चमकीली सुबह, एक फोन और खुशियाँ फिर कबूतर की तरह उडकर मेरी मुण्डेर पर ! मन्नूजी कोलकाता में आ चुकी थीं और मुझसे मिलना चाह रही थीं।
मिलने पर पहला अहसास यही हुआ कि यथार्थ कल्पना से कहीं ज्यादा सुन्दर था। और यह भी कि कितना जीवन देता है एक जीवंत संवाद। खूब बातें हुई। साहित्य की, साहित्यकारों की। पुस्तकों की। मनुष्यत्व में लग चुके कीडे की। खण्डित होते मनुष्य की नियति की। रक्तरंजित पृथ्वी की। पुरुषों के सामंती मिजाज की।
मन्नूजी की दिलचस्पी व्यक्तियों में नहीं, प्रवृत्तियों में थी। मेरी दिलचस्पी थी उनके मन की रामायण सुनने में। बहरहाल वे घुमाती रहीं मुझे साहित्यिक गलियारों में। लेकिन उस दिन मैं जितना गयी थी उससे कहीं ज्यादा लौटी। आत्मीयता उँडेलती दो गहरी आँखों के अलावा ऐसा कुछ भी रोमानी नहीं था उनके चेहरे पर। फिर वह क्या था जो चुम्बक की तरह खींचता था मुझे उनकी ओर। उनके पास बैठना किसी चलते-फिरते साहित्य के पास बैठना था। शब्द संस्कृति के पास बैठना था। यश प्रतिष्ठा, विद्वता, लोकप्रियता एवं व्यक्तित्व के भारी भरकम वजन के बावजूद मैं उनके साथ कम्फर्टेबल जॉन में थी। उन दिनों मैं अपने उपन्यास सूखते चिनार की समीक्षा से दुखी नहीं विचलित थी, क्योंकि समीक्षा नकारात्मक तो थी ही, उसमें कुछ तथ्य ऐसे डाल दिए गए थे जो मैंने उपन्यास में लिखे ही नहीं थे। समीक्षा किसी नामचीन लेखक ने लिखी थी जो आज दिवंगत हो चुके हैं। मैंने जब अपना दुःख उनसे बाँटा, तो उन्होंने अपनी बात मुझसे साझा करते हुए कहा- मधु, इनको गंभीरता से मत लो। जानती हो नामवरजी ने एक मंच से कहा था-मन्नू का सारा लेखन बेहद सपाट है। सपाट शब्द को रबर की तरह खींचा था उन्होंने।
बहरहाल लौटते हुए मैं बहुत खुश थी क्योंकि साहित्य की भरपूर खुराक लेकर लौटी थी। संस्कारित और चैतन्य होकर लौटी थी। लेकिन मेरी माँ थोडी दुखी थी, मन्नू बाईसा से मिलकर। लौटते वक्त टैक्सी में सारे रास्ते उन्हीं की बातें होती रही। माँ का दुःख बोला, - पहले वाली बात तो रही ही नहीं। पहले तो बाईसा कितना हँसती थी, बात-बात पर ठहाके। आज कैसी शांत-शांत, थकी-थकी और उदास लग रही थी। मैं क्या जवाब देती, मैंने तो हिलोर लेते,गर्जन करते समुद्र को नहीं ,शांत बहती नदी को ही देखा था। पर अम्मा की बात पर जाने कहाँ से एक शेर दिमाग में फुदकने लगा। मैंने सुनाया अम्मा को वह शेर- मैं बहुत खुशनुमा अरमानों की चादर थी /मुझको मगर मेरी जिंदगी ने ओढकर मैला किया।
अम्मा ने पूछा क्या मतलब हुआ इसका। मैं क्या जवाब देती? बस सोचती रही कि स्त्री के अंतरंग को यदि स्वीकारा ही नहीं जाए, तो जिंदगी की यह कमी एक टीस बन रह रह कर उठती है, वह कभी मरती नहीं।
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दो दिनों बाद मैं फिर उनकी मुँडेर पर। कामना थी कि उनके भीतर दबे पडे मुअनजोदडो को निकलवा सकूँ। अपनी इस कला पर थोडा बहुत भरोसा था भी मुझे। सलाम आखिरी उपन्यास के दौरान वेश्याओं के पेट में घुसकर उनसे उनका सत्य उगलवा चुकी थी मैं। और माओवादियों के एरिया कमाण्डर रणधीर भगत से भी। लेकिन मेरी सारी चालाकियाँ धरी रह गयीं। कईं बार मैंने उन्हें राजेंद्रजी के गलियारे में ठेलने की चेष्टा भी की। उन्होंने बॉउण्ड्री लाइन क्रॉस भी की, लेकिन रही वे निस्संग, निर्विकार और निर्लिप्त। कोई असंयमित, हल्की या नकारात्मक टिप्पणी नहीं निकली उनके मुख से।
दरअसल उन्हें नफरत करनी आती ही नहीं थी। निजी पीडा या पुरुष नकारात्मकता उनके साहित्य में उस प्रकार मुखरित हुई ही नही,ं बल्कि इस पीडा ने उन्हें उस उच्च और उदात्त भावभूमि पर पहुँचा दिया कि वह सार्वजनिक बन गयी। स्त्री सुबोधिनी में उन्होंने अपनी नहीं, मीता की पीडा को काया दी। कौन विश्वास करेगा कि जिस मीता ने पहले दिन से ही उनका मीत छीना, उसी मीता के लिए मन्नूजी करुणा और सहानुभूति दोनों रखती थीं। मन्नूजी के शब्दों में - इसमें बेचारी मीता का क्या कसूर है, कसूर यदि किसी का है तो राजेंद्र का है। दरअसल इसके बीज भी मुझे रचना की शादी के दौरान ही मिले। मीता आयी थी, पर उसे किसी ने अटैण्ड तक नहीं किया। खण्डित, उपेक्षित सबसे कटी-कटी अलग-थलग रही। नाते रिश्तेदार सब मुझे जानते थे, उसे कौन जानता, मैं भी कितना समय दे पाती? उसे छोडने स्टेशन तक भी मैं ही गयी। राजेंद्र को कहा, तो उसने टाल दिया - मुझे नींद आ रही है।
मन्नूजी बोलती जा रही थी और मैं गौर से देख रही थी उनके चेहरे के भावों को। वे खूबसूरत थीं। क्या इसीलिए कि वहाँ अपनी सत्ता के साथ किसी और की सत्ता की भी सहज स्वीकृति थी ?
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लगभग साल भर बाद मन्नूजी फिर कोलकाता में। इस बार मन्नूजी बहुत कुछ मेरे बारे में भी जान चुकी थी। इस कारण अनायास ही वह संवाद कायम हुआ जो स्वतः प्रस्फुटित था क्योंकि इस बार दो लेखिकाएँ नहीं वरन दो ऐसी भुक्तभोगी मिल रही थीं जो नदी के प्रवाह में बहते जीवन दीप की आस्था के साथ अपने को खामोश बहते देख रही थी। मन्नूजी ने कभी अपने अस्तित्व को लेखन में ढाल देना चाहा था। तब लेखन उनके लिए जीवन था, उसी जीवन को सही अर्थों में पाने के लिए उन्होंने सामाजिक विधान में बहुत तोड-फोड की थी। 1959 का वह समय और मारवाडी समाज जहाँ औरत की ऊँची आवाज और ऊँची हँसी तक पितृ सत्ता को विचलित कर देती थी। ऐसे समय और समाज में परिवार के विरुद्ध जाकर विजातीय राजेंद्रजी का हाथ थामना। मन्नूजी की इस बगावत ने पूरे अजमेर को हिला कर रख दिया था। माँ कहती थी - ऐसे विद्वान् पिता (उनके पिता श्री सुखसम्पतजी भण्डारी ने 1930 में हिंदी अंग्रेजी- शब्दकोश तैयार किया था) की पुत्री ! लेकिन मति मारी गयी। बेचारे मासासा तो अंत तक इस विवाह को रोकने के लिए तार पर तार भेजते रहे थे।
जाहिर है कि जितनी तोड-फोड उन्होंने की, उतनी ही हैवी रिपेयरिंग की जरूरत भी थी उन्हें, क्योंकि इस तोड-फोड में कहीं भीतर के आत्मीय अंश भी टूटे होंगे, तो भीतरी रिपेयरिंग की माँग भी रही होगी। पर क्या वह रिपेयरिंग हो पाई? जिस अकल्पनीय शिखर तक पहुँचने के लिए विप्लव का बिगुल बजाया उस शिखर तक पहुँचना तो दूर की बात, पाँव के नीचे की जमीन तक धचकी मिली। जिसे जैकपॉट समझा वह सेकंड हैंण्ड निकला, उस पर त्रासदी यह कि न तो उन्हें छोड पाई, न रह पाई। बस वर्ष दर वर्ष स्थगित करती रही खुद को।
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बहुत कम लोग जानते हैं कि मन्नूजी को पद्मश्री दिया गया था। सरकारी पत्र से सूचना मिली थी, जिसे मन्नूजी ने अस्वीकार कर दिया था।
उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि डाकिया तक पहचानता था उनको। एक बार एक विदेशी पाठक ने उन्हें पत्र लिखा। लिफाफे पर पता था-मन्नू भण्डारी, दिल्ली। पत्र उन तक पहुँच गया था। वे सिर्फ साहित्य ही नहीं, अपने समय को भी पढती थीं। अपने समय की राजनीतिक चेतना धडकती रहती थी उनके भीतर। अन्ना आंदोलन के दौरान अस्वस्थ होने के बाबजूद वे अन्ना हजारे के पास अपनी शुभकामनाओं के साथ पहुँची थीं।
मन्नूजी के व्यक्तित्व में जो एक चीज शिद्दत से उभर कर आती है वह है उनकी उदारता। उन्हीं की तरह उनका साहित्य भी उदार विचारों के बीज बिखेरता चलता है ।
ऐसी अनुरागी, वीतरागी, आत्मीय और मानवीय मन्नूजी को मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि।
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