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मन्नू भण्डारी का रचना संसार- स्त्री संघर्ष का एक सम्पूर्ण दस्तावेज

सुधा अरोडा
“A woman has strength that amazes men .
She can handle troubles and carry heavy burdens
She holds happiness and love,
Her love is unconditional !
There is only one thing wrong with her ,
She sometimes forgets what she is worth !"

एक औरत के पास पुरुष को अभिभूत कर देने वाली ताकत है
वह मुसीबतों से जूझ सकती है
और झाड झंखाडों से उबरने की कूवत रखती है
वह प्यार और खुशियाँ बाँटती है,
बिना किसी अपेक्षा के प्यार करती है ।
अगर उसमें कोई कमी है तो बस यही
कि खुद उसे अपनी ताकत का अहसास ही नहीं होता ........

बरसों पहले जब ये पंक्तियाँ पढी थीं, तो एकबारगी मन्नूदी का ख्याल हो आया था, जो मेरी बेहद आत्मीय अग्रज , परम मित्र और मार्गदर्शक रहीं और जिन्हें अपनी कलम की ताकत का और गलत के प्रतिरोध में खडे हो सकने की अपनी अदम्य क्षमता का बिल्कुल भी अहसास नहीं था। अब, जब वह नहीं है, तो ज़्यादा शिद्दत से इसे समझ पा रही हूँ। काश ! वह देख पाती कि अपना बहुत छोटा-सा रचनात्मक संसार जो उन्होंने गढा था और जिससे वह कतई संतुष्ट नहीं थी, आज भी कैसे जनमानस में दर्ज है और पाठकों ने कैसे थाती की तरह उसे संजो रखा है।

यह तो सच है कि एक रचनाकार जितना लिखता है, उससे ज़्यादा अनलिखा उसके भीतर के तहखाने में बंद होता है। घर गृहस्थी, परिवार समाज, पति और एक विशालकाय सामाजिक दायरे को एक साथ निभाती मन्नू भण्डारी की वह छोटी-सी काया अपने आप में कितनी ताकत न सिर्फ अपने लिये बल्कि एक बडी साहित्यिक बिरादरी के लिए भी समेटे हुए थीं, वह कभी नहीं जान पाईं। एक लंबी उम्र बिताकर वे चली गईं । इसमें से पिछले दस बरस तो सिर्फ इस जद्दोजेहद में बीते कि वे लिख क्यों नहीं पा रही हैं। अपने लिखे हुए से असंतुष्ट और बेचैन रहना उनके जीवन का स्थायी भाव बन चुका था ।
एक रचनाकार जीवन की बहुत सी आंधियाँ झेल ले जाता है पर अपनी कलम को निश्चेष्ट पडा नहीं देख सकता। अपने विस्मृति के दिन में भी वह कलम से कागज पर वह यही लिखतीं रहीं - बस, मुझे लिखना है .... मैं लिखना चाहती हूँ ....
हिन्दी कथा साहित्य में पाठकों का एक बेहद चहेता और सम्मानित नाम है- मन्नू भण्डारी। पाठकों और समीक्षकों में समान रूप से लोकप्रिय, अनेक देशी-विदेशी भाषाओं में वे एक से आदर सम्मान के साथ पढी जाने वाली रचनाकार हैं, पर एक बेहद सामान्य स्त्री के रूप में देखें, तो भी उनका जीवन एक अद्भुत जीवट और जिजीविषा की अद्भुत मिसाल है। अपने को हमेशा कम करके आँकना मन्नूजी के स्वभाव में हमेशा रहा। आम पाठक उनके नाम से आतंकित होकर उनसे मिलने आते और सरलता, सहजता और स्नेह से सराबोर होकर लौटते। हिन्दी साहित्य की प्रख्यात लेखिका वे बाद में थीं, पहले एक परम स्नेही, पारदर्शी व्यक्तित्व थीं, जो पहली ही मुलाकात में आपको बनावट और दिखावट से परे अपने आत्मीय घेरे में ले लेतीं ।
मन्नू भण्डारी का जीवन संघर्ष, सिर्फ साहित्यकार के नाते नहीं, उस पीढी की भारतीय औरत की बनावट और सामाजिक मानसिकता को गहराई से समझने वालों के लिए एक अलग और विशिष्ट किस्म की शख्सियत है। हर औरत में एक इन बिल्ट सर्वाइव्हल सिस्टम होता है। उसे इसके लिए अलग से मेहनत नहीं करनी पडती। शायद यह जन्म से न होता हो पर जिस तरह के माहौल में वह पलती बढती है, यह उसके भीतर विकसित हो जाता है। फिर भी बहुत सारे झटके हैं जो इससे बाहर खडे आघात पहुँचाते रहते हैं । ....एक औरत इन आघातों को कभी भूल नहीं पाती ।
उपेक्षा, संवादहीनता, असंवेदनशीलता और चुप्पी की हिंसा को झेलने में ही मन्नूजी की ऊर्जा चुक गई। अपने जीवन की विकट स्थितियों को कलम की नोक पर लाकर झेल ले जाने का अद्भुत कौशल मन्नूजी ने शुरु से ही साध लिया था । साहित्य और कला में ऐसी ताकत होती है कि सर्जक अगर उसमें पूरी तरह डूब जाए तो अपने जीवन की त्रासदियों से जूझने का हौसला भी उसमें पैदा हो जाता है। तभी वे स्थितियाँ जो किसी भी नवविवाहिता को तोड कर रख दें, उन्हें उस हद तक तहस-नहस नहीं कर पाईं । उन स्थितियों और उनसे जन्मे आघातों का एक निरपेक्ष दृष्टि से आकलन कर उन्होंने बेहद संयम और कुशलता के साथ कुछ अविस्मरणीय कहानियाँ रच दीं -यही सच है (1960) और एक बार और (1965 )। सृजन के इस संतोष ने बाद के सालों में इतनी तटस्थता और दूरदर्शिता भी पैदा की कि वे उन स्थितियों का मखौल उडाते हुए, हँसी हँसी में एक चुभने वाली कहानी लिखने में भी समर्थ रहीं -स्त्री सुबोधिनी (1984) और मन्नूजी के लेखन की अब तक की सबसे ताजा और असंकलित कहानी करतूते-मरदां (2002) तो उनके कहानी लेखन के धारदार शिल्प का अप्रतिम और बेजोड नमूना है जिसमें व्यंग्य कुछ ज़्यादा तीखा और तंज कुछ ज़्यादा नुकीला होकर सामने आ गया है ।
मन्नूजी एक ओर घोर नैतिकतावादी हैं - संस्कारों और मूल्यों के प्रति गहरा सरोकार और लगाव, लेकिन अपने टूटने की कीमत पर संस्कारों और मूल्यों को बचाने का सवाल हो तो वे बेहद निर्मम होकर अपने को बचाने की कोशिश करेगी, अपने जीने की कीमत पर वह मूल्यों के लिए अड नहीं जाएँगी । ....और संस्कारों और अपने आत्मसम्मान को बचाए रखने के इस संतुलन ने ही उन्हें सिर उठाकर अपने मूल्यों को भी बचाकर रखते हुए जीने की ताकत दी है। यह ताकत उनकी अपनी कमाई हुई है- किसी के कहने से या किसी दबाव के तहत नहीं आई है। आखिर एक परंपरागत संस्कारी जैन परिवार से आयी लडकी के लिए अपनी मर्जी से अन्तर्जातीय विवाह का फैसला लेना और फिर शादी के पैंतीस साल बाद अपने पति को अपने से अलग करने का निर्णय बहुत आसान तो नहीं रहा होगा।
मन्नू भण्डारी को हिंदी का आम पाठक रजनीगंधा फिल्म से पहचानता है जो नई कहानियाँ के कहानी विशेषांक में प्रकाशित उनकी बहुचर्चित कहानी यही सच है पर आधारित थी जिसने हिंदी फिल्मों में एक साथ कला सिनेमा और व्यावसायिक सिनेमा में सफलता के नये प्रतिमान रचे और सिनेमा में अति नाटकीय और रोमांचकारी विषयों से अलग, रोजमर्रा की मामूली घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में भावनात्मक ऊहापोह और द्वंद्व के रेशे खंगालने की शुरुआत की। यह उन दिनों की बात है जब दो नायकों में एक स्त्री को लेकर रस्साकशी होती थी। स्त्री के अपने चुनाव के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी। किसी पुरुष के जीवन में दो स्त्रियों से संबंध या दो स्त्रियों को लेकर द्वंद्व तो लंबे समय से चली आ रही एक सामान्य परम्परा अनुमोदित स्थिति है, पर एक स्त्री के जीवन में अनैतिक हुए बिना दो पुरुषों को लेकर स्वस्थ और सात्विक प्रेम की अवधारणा को संप्रेषित करने वाली यह रचना एक नयी जमीन तोडने का उद्घोष करती है । कहानी के अंत तक पाठक के मन में यह उत्सुकता बनी रहती है कि आखिर नायिका किस नायक का वरण करेगी क्योंकि खलनायक तो यहाँ उपस्थित ही नहीं हैं । दोनों ही प्रेमी अपने अपने चरित्र की विशिष्टताओं के साथ बहुत स्वाभाविक रूप से खडे हैं। इसकी रचना प्रक्रिया बेहद दिलचस्प थी जिसपर मैं लिख चुकी हूँ। ऐसी कहानियों के लेखन ने एक रचनाकार स्त्री को जीने के कितने कारगर औजार थमा दिए, वह भी अपने आप में एक अलग कहानी है ।
1984 में जब मैंने कलकत्ता दूरदर्शन के लिए मन्नू भण्डारी का साक्षात्कार लिया था, तो उनसे एक सवाल पूछा था - क्या कारण है कि आपकी नायिकाएँ त्रासदी से गुजरती हैं, तो भी समझौता करती दिखाई देती हैं या अपने जीवन की विसंगतियों को पहचान भी लेती हैं, तो भी विद्रोह नहीं करतीं, तो उन्होंने फौरन उत्तर दिया था - यह बताओ, हमारे भारतीय समाज में कितनी औरतें हैं जो विद्रोह का झण्डा हाथ में लेकर बगावत पर उतर आती हैं ? जब जीवन में यह नहीं होता, तो कहानी में हम ऐसा होते हुए कैसे दिखा सकते हैं। यह उस समय का सच भी था जो आज बेहतरी के हक में बदल गया है।
मन्नूजी के उस जवाब को याद करते हुए डॉ. आंबेडकर का वक्तव्य याद आता है कि गुलाम को गुलामी की पहचान करवा दो, विद्रोह करना तो वह अपने आप सीख जाएगा। और यह काम मन्नूजी की कहानियों के स्त्री पात्रों ने बखूबी किया। मध्यवर्गीय भारतीय औरत की सबसे बडी त्रासदी यह है कि उसे अपने अस्तित्व को कुचलने वाली स्थितियों की, अलग अलग स्तरों पर अपनी गुलामी और गुलाम बनाए रखने वाली स्थितियों की पहचान ही नहीं होती। मन्नूजी की अपनी स्थिति इससे काफी अलग थी। उन्हें अपने को त्रास देने वाले माहौल और स्थितियों की पहचान थी और उनसे निकल आने की उन्होंने कोशिश भी की पर उनके मानवीय गुणों ने उन्हें कई बार हथियार डालने पर मजबूर किया। रेखांकित करने वाला तथ्य यह है कि सन् 1984 में कितनी औरतें हैं जो विद्रोह का झंडा हाथ में लेकर बगावत पर उतर आती हैं? के सवाल के उत्तर से आश्वस्त मन्नूजी ने दस साल बाद सन् 1994 में 63 साल की उम्र में अपने ही जीवन में विद्रोह का बिगुल बजा ही दिया और फिर तमाम आश्वासनों, सामाजिक दबावों ,शारीरिक तकलीफों और मानसिक तनावों के बावजूद अपने निर्णय पर अडिग रहीं ।
मन्नूजी के जीवन में प्रतिकूल स्थितियों से लडने की उनकी ताकत और एक निर्णय लेकर उस पर अडिग रहने की उनकी जिद-उनके जीवन को एक समाज वैज्ञानिक के नजरिए से विश्लेषित किए जाने की माँग करता है जो आनेवाली सदियों तक बीस के दशक में जन्मी औरतों के समाज, परिवेश और मूल्यों की पडताल के लिए एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहेगा। मन्नूजी का अपना जीवन जीने, उसे सँभालने और संजोने की उनकी अपनी निजी क्षमता और बेहद निजी तौर तरीका आज की पीढी के लिए भी जीने का एक सबक बन सकता है। उनकी लेखकीय यात्रा जिसे आत्मकथा कहा गया, पढने के बाद एक युवा लेखिका ने बडी तकलीफ से कहा - मैं मन्नू भण्डारी बनना नहीं चाहूँगी। इसे मैं एक सकारात्मक प्रतिक्रिया की तरह देखती हूँ।
कहानी हो या उपन्यास, फिल्म हो या पटकथा, मन्नूजी ने जो लिखा, उसमें जिन्दगी का यथार्थ इतनी सहजता, आत्मीयता और बारीकी से झलकता है कि वह पाठकों को भीतर तक छू लेता है । चरित्रों और स्थितियों का फोटोग्राफिक विवरण और पैना बयान उनकी विशेषता है। वे अपनी कहानियों में पात्रों के भीतरी कक्ष के हर संवेदनशील कोने को बेहद मार्मिकता और प्रामाणिकता से खंगालती हैं। भाषा की तरलता और सहज प्रवाह में, बाहर से आरोपित या अनावश्यक रूप से थोपा हुआ नहीं होता। मन्नूजी के शब्दों में- थोपा हुआ तो कुछ भी हो- बौद्धिकता, नैतिकता, करुणा या विचारधारा- जिन्दगी के असली रंग को धुँधला और कहानी के संतुलन को डगमगा तो देता ही है।

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