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मन्नू भण्डारी : अपने समय से आगे की रचनाकार

हेतु भारद्वाज
महाभोज, आपका बंटी और एक इंच मुस्कान नामक उपन्यासों और यही सच है, त्रिशंकु, तीन निगाहों की एक तस्वीर, आँखों देखा झूठ, एक प्लेट सैलाब जैसी अविस्मरणीय कहानियों की सर्जक मन्नू भण्डारी आज हमारे बीच नहीं है। किन्तु मन्नू जी ने इतना महत्त्वपूर्ण लिखा है कि वे हमेशा पाठक के सामने रहेंगी। उनका लेखन अपने समय से बहुत आगे का लेखन है। मन्नू भण्डारी का मूल्यांकन करने के लिए बहुत श्रम और साधना चाहिए। यहाँ मैं उनका आकलन उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करने की दृष्टि से कर रहा हूँ।
बीसवीं शताब्दी का छठा दशक हर क्षेत्र में भारत के निर्माण की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। 1950 में भारतीय संविधान लागू हुआ। देश के शासन की बागडोर पूरी तरह भारतवासियों ने संभाली। भारत के निर्माण के नए सपने लेकर जो पीढी सरकार में आई थी, उसने पूरे उत्साह, निष्ठा और तत्परता से देश निर्माण का कार्य आरम्भ किया। इस दशक में हम देखते हैं कि सभी क्षेत्रों में नई-नई और बडी-बडी परियोजनाओं का आरंभ हुआ। रचनात्मक दृष्टि से भी यह दशक बहत समृद्ध रहा। लेखकों की एक नयी पीढी सृजन के क्षेत्र में उभरी और हिन्दी के लेखकों ने नयी ऊर्जा के साथ अपनी रचनात्मक क्षमताओं का परिचय देते हुए साहित्य के क्षेत्र में नए-नए और मौलिक प्रयोग किए।
अज्ञेय के तार सप्तक के साथ हिन्दी कविता का नया युग आरम्भ हुआ, जो धीरे-धीरे नई कविता आंदोलन में परिणत हो गया। अज्ञेय ने ही स्वतंत्रता के बाद प्रतीक नाम से एक नई पत्रिका निकाली, जिसमें प्रकाशित रचनाओं ने हिन्दी साहित्य में एक नये युग के सूत्रपात का संकेत दिया। 1950 के बाद कल्पना, कृति, निकष, संवेद, संकेत, नये पत्ते, विहान, नयी कविता, हंस जैसी अनेक साहित्यिक पत्रिकाएँ इसी दशक में निकलीं, जो पूरी तरह रचनाकारों के प्रयासों का परिणाम थी। दूसरी तरफ धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी, सारिका जैसी पत्रिकाओं का प्रकाशन बडे घरानों से आरंभ हुआ। जिनमें भी नए लिखे जा रहे रचना संसार का प्रदर्शन हुआ। माया जैसी शुद्ध व्यावसायिक पत्रिका ने भी वर्ष में कम से कम एक विशेषांक तो तत्कालीन साहित्य को केन्द्र में रखकर निकाला, जिसमें तत्कालीन नये लेखकों की रचनाएँ प्रकाशित हुईं।
इसी समृद्ध वातावरण में कविता के साथ गद्य की अन्य विधाओं का लेखन आरम्भ हुआ, लेकिन इस दशक में सर्वाधिक समृद्ध और चर्चित विधा कहानी और उपन्यास रहे। नयी कविता के समानान्तर नयी कहानी का आरम्भ इसी दशक में हुआ तथा दुष्यन्त कुमार ने कल्पना में प्रकाशित अपने एक लेख में नयी कहानी पद का प्रयोग किया। यह देखकर सुखद आश्चर्य होता है कि इस दशक में प्रकाशित परिन्दे (निर्मल वर्मा), कोसीका घटवार (शेखर जोशी), हंसा जाई अकेला (मार्कण्डेय), गुल्लकी बन्नो (धर्मवीर भारती), जार्ज पंचम की नाक (कमलेश्वर), मलबे का मालिक (मोहन राकेश), बादलों के घेरे (कृष्णा सोबती), वापसी (उषा प्रियवंदा), यही सच है (मन्नू भण्डारी), गदल (रांगेय राघव), तलवार पंच हजारी (राजेन्द्र यादव), कर्मनाशा की हार (शिव प्रसाद सिंह) जैसी अनेक आस्वादों की कहानियाँ नयी कहानी के अन्तर्गत चर्चित हुई। यह अलग बात है कि छठे दशक के अंत तक नयी कहानी आंदोलन राजेन्द्रव यादव, कमलेश्वर तथा मोहन राकेश की त्रयी के हाथों में आ गया और एक बडे बहुआयामी और विविधतापूर्ण फलक से आरम्भ हुई नयी कहानी इन तीनों के प्रयास से स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के वर्णन तक सिमट कर रह गई। यहाँ महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस दौर में कृष्णा सोबती, मन्नू भण्डारी और उषा प्रियवंदा इन तीन महिला कहानकारों ने अपनी अलग पहचान बनाई और इन्होंने हिन्दी कहानी के बदलते स्वरूप को रेखांकित किया। समय की संवेदना को और बदलते जीवन परिप्रेक्ष्य को जितनी गहराई से पुरुष कहानीकारों ने अपनी कहानियों में रूपायित किया, उतनी ही शिद्दत से इन तीनों महिला कहानीकारों ने नये बदलावों को अपनी कहानियों में चित्रित किया। हम देखते हैं कि कृष्णा सोबती तो बदलती परिस्थितियों में अपने पात्रों को निर्णय की स्थिति तक ले जाती हैं, जबकि मन्नू भण्डारी और उषा प्रियवंदा बडी सहजता के साथ बदलती जीवन स्थितियों की गूँज को रेखांकित करती हैं। ये तीनों कथाकार ही किसी प्रकार के आंदोलन के विवादों में नहीं पडतीं, यद्यपि तीनों की गिनती नयी कहानी के श्रेष्ठतम स्तम्भों में की जाती है।
इनमें भी मन्नू भण्डारी बडी सहजता से समय के परिवर्तन को अपनी कहानियों में चित्रित करती है। उनकी बहुचर्चित कहानी यही सच है, जिस पर रजनीगंधा नामक फिल्म भी बनी थी, स्त्री-पुरुष प्रेम सम्बन्धों को सर्वथा नए ढंग से परिभाषित करती है, और प्रेम को लेकर प्रचलित लैला-मजनू, शीरी फरहाद, जैसे पागल प्रेम के भ्रम को तोडती है। इस कहानी की नायिका प्रेम के भावुक स्वरूप के विरुद्ध उसके वास्तविक रूप को प्रस्तुत करती है तथा नायिका को लगता है कि वह अपने दोनों नायकों के साथ अलग-अलग समयों पर गहरा लगाव महसूस करती है। प्रेम के क्षेत्र में मन्नू भण्डारी की यह कहानी एक नए प्रस्थान की ओर संकेत करती है।
वस्तुतः मन्नू भण्डारी बचपन से ही समय के बदलावों की थापों को सुन रही हैं और अपने विद्यार्थी जीवन में वे लडकियों को एकत्र कर अजमेर के मुख्य चौराहे पर जोशीले भाषण देती हैं। उनके पिता सुखसम्पतराय भण्डारी स्वयं लेखक थे और शिक्षक थे। उन्होंने मन्नू भण्डारी को ऐसे संस्कार दिए जिनसे वे बदलते समय की ध्वनियों को आत्मसात कर सकीं। 3 अप्रेल 1931 को मध्यप्रदेश में जन्मी मन्नू भण्डारी की पूरी शिक्षा अजमेर में हुई, उनका मूल नाम महेन्द्र कुमारी था, किन्तु मन्नू भण्डारी के नाम से लेखन किया और प्रसिद्धि प्राप्त की। उन्होंने अजमेर से हिन्दी में एम.ए. किया तथा पहले कलकत्ता में स्कूल अध्यापिका बनीं और बाद में वे दिल्ली के मिरांडा हाउस में प्राध्यापक बनीं। जीवनभर वे लेखन करती रहीं, शिक्षिकाओं और छात्राओं के साथ अनेक सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेती रहीं। सामाजिक, सांस्कृतिक मोर्चो पर सक्रियता दिखाती रहीं। 91 वर्ष की उम्र में 21 नवम्बर, 2021 को उन्होंने अंतिम साँस ली।

मन्नू भण्डारी ने अपनी इच्छा से राजेन्द्र यादव से विवाह किया। किन्तु उनका वैवाहिक जीवन कभी बहुत मधुर नहीं रहा क्योंकि राजेन्द्र यादव में व्यक्तिगत निष्ठा का अभाव था। मन्नू भण्डारी ने विवाह का निर्णय स्वयं लिया था, उनके पिता इस निर्णय से प्रसन्न नहीं थे, लेकिन मन्नू भण्डारी ने पूरी गरिमा के साथ अपने दाम्पत्य जीवन को सुखमय बनाने की कोशिश की। एक स्त्री के लिए इससे बडी पीडा क्या होगी कि सुहागरात की रात राजेन्द्र यादव मन्नू भण्डारी के पास न होकर मीता नामक अपनी महिला मित्र के पास थे। अपने दाम्पत्य जीवन में उन्हें बहुत झटके झेलने पडे, लेकिन यह मन्नू भण्डारी के व्यक्तित्व की विशेषता थी कि उन्होंने जीवनभर संतुलन बनाए रखा। साहित्य जगत में इन दोनों के सम्बन्धों की खूब चर्चा रही, राजेन्द्र यादव ने अपने सम्बन्धों के विषय में खुल कर लिखा और मन्नू भण्डारी को एक साधारण खांटी मध्यवर्गीय औरत तक कहा। किन्तु मन्नू भण्डारी ने पूरी शालीनता के साथ अपने सम्बन्धों का खुलासा एक कहानी यह भी नामक कृति में किया। अपने खुलासे में भी वे बहुत संतुलित बनी रहती है। जीवन के सभी संकटों में उन्होंने राजेन्द्र यादव का साथ दिया, उन्होंने नौकरी की, घर चलाया, लेखन किया और अपने पति की ज्यादतियाँ सहन कीं, फिर भी चाहे अक्षर प्रकाशन में हुआ घाटा हो या घर खर्च में सहयोग हो, मन्नू भण्डारी ने सदा राजेन्द्र यादव का साथ दिया।
असल में मन्नू भण्डारी एक ऐसी प्रबुद्ध महिला थीं, जो मानव जीवन में होने वाले सभी तरह के बदलावों को निर्विकार भाव से देखती थीं, उन परिवर्तनों की उपयोगिता समझती थी, अपने रचनात्मक अनुभव के स्तर पर उनको महसूस करती थीं और अपनी रचनाओं में उतारती थीं। इसीलिए मन्नू भण्डारी का लेखन पाठक के हृदय के अधिक निकट है और पाठक पर उनका प्रभाव भी बहुत गहराई से पडता है। रचनात्मक ऊँचाई की दृष्टि से मन्नू भण्डारी का लेखन राजेन्द्र यादव के लेखन से कहीं सशक्त है। इस अंतर को हम इन दोनों के सहकार में लिखे एक इंच मुस्कान नामक प्रयोगशील उपन्यास के विभिन्न परिच्छेदों को पढकर अच्छी तरह समझ सकते हैं। उपन्यास की कथा को जिस गहराई के साथ मन्नू भण्डारी उठाती हैं, राजेन्द्र यादव उसका निर्वाह नहीं कर पाते।
इसका कारण यह भी हो सकता है कि मन्नू भण्डारी विशुद्ध रचनाकार हैं जबकि राजेन्द्र यादव के लेखक का निर्माण अनेक प्रकार के चक्रों-कुचक्रों, धन्धों तथा उठा-पटक की कार्रवाइयों से हुआ है। राजेन्द्र यादव ने पश्चिमी साहित्य को बहुत पढा है, इसका नतीजा यह है कि उनकी रचनाओं में पच्चीकारी, कृत्रिमता की सीमा तक बढती गई है, जबकि मन्नू भण्डारी की सहजता उनकी रचनाओं में उत्तरोत्तर कलात्मक होती गई है। राजेन्द्र यादव की आरम्भिक छोटे-छोटे ताजमहल, किनारे से किनारें तक, बिरादरी बाहर आदि कहानियों के अन्तर को प्रतीक्षा, नए-नए आने वाले, प्रश्नवाचक पेड जैसी परवर्ती कहानियों के शिल्प को देखकर समझा जा सकता है, जबकि मन्नू भण्डारी की कला निरन्तर निखरती जाती है।
नयी कहानी आंदोलन की शुरुआत बीसवीं शताब्दी के छठे दशक में हुई है। दरअसल स्वयं कवि होते हुए भी दुष्यन्त कुमार ने कहानी पर नयी कहानी परम्परा और प्रयोग शीर्षक से एक लेख लिखा जो कल्पना के जनवरी 1955 के अंक में प्रकाशित हुआ। इस लेख में नयी कहानी पद का प्रयोग उन्होंने जरूर किया, लेकिन उनका मन्तव्य किसी आंदोलन के चलाने से नहीं था। वस्तुतः उन्होंने उस काल की कहानी में आये नये प्रकार की वस्तुपरकता, सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति चेतना, अनुभूति की सघनता, सुगठित कथानक, प्रौढ चिन्तन, संकेतात्मकता, प्रतीकात्मकता, सामाजिक यथार्थ के प्रति जागरूकता आदि को रेखांकित किया। उन्होंने जिन कहानीकारों के नाम गिनाए- उनमें मन्नू भण्डारी का नाम नहीं था। जनवरी 1956 की कहानी पत्रिका के नववर्षांक में डॉ. नामवर सिंह का एक लेख छपा, जिसमें उन्होंने कहानी के क्षेत्र में नयी तरह की चेतना की सुगबुगाहट का संकेत दिया। नामवर जी ने भी नये कहानीकारों द्वारा लिखी गयी कहानी के नये कोणों को रेखांकित किया। धीरे-धीरे नयी कहानी पद एक आंदोलन के रूप में प्रचलित हो गया, जो कमलेश्वर, मार्कण्डेय, दुष्यंत कुमार, भैरवप्रसाद गुप्त, राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश आदि के प्रयासों का फल था। इस प्रयास में जिन कहानीकारों के नाम उभरे उनमें मन्नू भण्डारी का नाम भी प्रमुखता से सामने आया।
डॉ. नामवर सिंह ने उस काल की कहानी के नयेपन को रेखांकित करते हुए लिखा कि नये कहानीकार अपनी कहानियों को स्थूल उपादानों के स्थान पर सूक्ष्म उपादानों से सगिात कर रहे हैं। कहानी की भाषा बिल्कुल नया रूप धारण कर रही है। इस प्रकार नयी कहानी नामक पद एक आंदोलन में परिणत हो गया, जिसकी बागडोर कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, मोहन राकेश की त्रयी के हाथ में आ गयी, इनके साथ मार्कण्डेय और दुष्यंत कुमार का नाम भी जुड रहा था। ये सभी लोग वस्तुतः कहानी के क्षेत्र में अपने आपको स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे। इसी दशक में इन लोगों ने विभिन्न कहानीकारों की कहानियों का विश्लेषण आरम्भ कर दिया था। ये सभी लोग नयी कहानी को स्थापित करने के लिए अपनी-अपनी तरह से नयी कहानी की व्याख्या करने में लगे हुए थे।
इस काल में जिन महिला कहानीकारों का नाम प्रमुख रूप से उभरा, उनमें कृष्णा सोबती, मन्नू भण्डारी तथा उषा प्रियवंदा के नाम प्रमुख थे। यद्यपि इन तीनों में से किसी ने भी न तो आंदोलन विषयक चर्चा की न कहीं ऐसा लिखा कि वे किसी आंदोलन का हिस्सा हैं तथापि छठे दशक में मन्नू भण्डारी ने एक अच्छे और नये कहानीकार के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बना ली थी। उनकी कहानियाँ धर्मयुग, सारिका, कहानी, नयी कहानियाँ जैसी महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रही थीं। उनकी यही सच है कहानी की खूब चर्चा हुई और 1966 में उनका यही सच है और अन्य कहानियाँ शीर्षक से संग्रह प्रकाशित हुआ। उन्होंने सधे हुए शब्दों में लिखा यही सच है की कहानियाँ अधिक सधी हुई और अधिक मंजी हुई है। इकहरे की जगह द्वन्द्वग्रसत पात्र, संवेदना की गहराई, भाषा शैली का निखार- यह मेरी राय नहीं पाठकों ओर समीक्षकों की है। विचार, विवेक और अन्तदृष्टि इन कहानियों का आधार है। (मेरी सम्पूर्ण कहानियाँ, 2008, मेरी कथा यात्रा)
बदलते हुए समय की नब्ज को रेखांकित करते हुए मन्नू भण्डारी ने एक साक्षात्कार में कहा है इस दशक में लडकियों ने शिक्षा पानी शुरू की, उसके बाद अपनी मर्जी से विवाह भी करने लगीं। कमाने लगीं। शहरों में अकेले रहने लगीं। स्त्री की इस बदलती स्थिति का प्रभाव मैंने अपने जीवन और समाज दोनों में महसूस किया, उस पर संजीदगी और संवेदनशीलता से कहानियाँ लिखीं। (पाखी, प्रवेशांक, 2008, पृ. 76)
वास्तव में मन्नू भण्डारी की कहानियों के कथ्य के रूप में हमें एक बदलाव तो यह दिखाई देता है कि वे बदलते हुए मध्य वर्ग को अपनी कहानियों का विषय बना रही हैं। दूसरे उनकी कहानियों में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में बदलाव की नयी अनुगूँज सुनाई दे रही है। कई बार इन दोनों उपादानों को हम उनकी एक ही कहानी में घुला-मिला पाते हैं। क्षय, तीसरा आदमी, सजा, इनकम टैक्स और नींद, छत बनाने वाले, संख्या के पार, रेत की दीवार, जैसी कहानियों में भारत में बदलते मध्यवर्ग के जीवन की आहटें सुनाई देती है। जैसे क्षय कहानी में वे मध्यवर्गीय जीवन की आर्थिक विवशताओं तथा मजबूरियों के कारण नैतिक मूल्यों से समझौता आदि की गहरी संवेदना को अभिव्यक्ति दी है। मन्नू स्वयं इस कहानी के विषय में लिखती है- कहानी के अंत में उस लडकी को खाँसी उठती है, अपनी खाँसी में उसे अपने पिता की खाँसी की आवाज सुनाई देती है, मतलब यह है पिता का शारीरिक क्षय बेटी के नैतिक क्षय में विस्तार पाता है, उसे समझौता करना पडता है। (मेरी सम्पूर्ण कहानियाँ, मेरी कथा यात्रा, पृ.) मन्नू भण्डारी जैसे यह स्वीकार करती हैं कि जीवन की विवशताएँ हमारे नैतिक मूल्यों का हृास कर रही है और हमें अनैतिक समझोतों के लिए विवश कर रही है।
यही सच है कहानी मन्नू भण्डारी के दृष्टिकोण को बडी गहराई से प्रकट करती है। इस कहानी की नायिका दुविधा की शिकार है और दो युवकों से बराबर प्रेम को स्वीकार करती है। इसी तरह एक बार और कहानी भी प्रेम की दुविधा को लेकर ही लिखी गयी है, इस दृष्टि से मन्नू भण्डारी की ऊँचाई कहानी और भी मुखर होकर इन संबंधों की व्याख्या करती है इस कहानी में शिशिर और शिवानी का आठ वर्ष का सुखद दाम्पत्य जीवन है। प्रिटी नाम का उनका एक छोटा बच्चा भी है। एक बार शिवानी अपने बेटे के साथ अकेले घूमने गयी है, वहाँ अचानक उसकी मुलाकात अपने पुराने प्रेमी अतुल से होती है, यहाँ वे दोनों पुराने सम्बन्धों को दोहराते हैं, शिवानी को इसमें कुछ भी गलत नहीं लगता। शिवानी और अतुल के सम्बन्धों के विषय में शिशिर को पता चलता है, तो वह शिवानी पर धोखाधडी और बेवफाई का आरोप लगाता है। शिवानी इन आरोपों से विचलित नहीं होती, और बडी सहजता से शिशिर से कहती है- शरीर देने के बाद औरत के लिए अस्वाभाविक हो जाना क्या अनिवार्य ही है? और छिपाने के लिए भी तुम्हें धोखा देने या छलने का उद्देश्य कतई नहीं था, सिर्फ इसलिए छिपाया था कि तुमसे सहा नहीं जाएगा, तुम बहुत कष्ट पाते। और अपने आपको सही सिद्ध करने के लिए वह आगे कहती है- यदि हमारे सम्बन्धों का आधार इतना छिछला है, इतना कमजोर है कि एक झटके को भी सँभाल नहीं सकता, तो सचमुच उसे टूट ही जाना चाहिए।
इस कहानी में मन्नू भण्डारी की नायिका शिवानी किसी प्रकार के पश्चाताप या अपराध बोध का अनुभव नहीं करती, बल्कि अपनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए शिशिर को समझाने का प्रयास करती है। शीनू केवल तुम्हारी है, केवल तुम्हारी। पति के रूप में तो मैं किसी और की कल्पना ही नहीं कर सकती, अतुल की भी नहीं। तुम्हें लेकर मन का कोना कुछ इस तरह भरा हुआ है कि उसमें और कोई कहाँ से आएगा भला। इसी सहजता के कारण शिशिर के मन का अवसाद भी जाता रहता है। इस कहानी में मन्नू भण्डारी जैसे यह प्रतिपादित करना चाहती है कि जिन चीजों को हम जीवन में गिरना समझते हैं, वास्तव में उनका कोई महत्त्व नहीं है। इस तरह के गिरने से चारित्रिक ऊँचाई में कोई फर्क नहीं पडता।
मन्नू भण्डारी की कहानियों का फलक स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की दुनिया का बहुआयामी और विस्तार भरा आकाश प्रस्तुत करती है। उपेन्द्रनाथ अश्क ने ठीक ही लिखा है, मन्नू भण्डारी की कहानियाँ स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को बडी सहजता से व्यक्त करती है और प्रेम और उसकी दुविधाओं और नारी शरीर की माँगों को बडी कुशलता से उभारती है। *अश्क साहित्य धारा (आलोचना, खण्ड)* बाँहों का घेरा, बंद दराजों का साथ, नयी नौकरी, कमरे, कमरा और कमरें, दरार भरती दरार आदि कहानियों में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के द्वन्द्वों की गहराई को समझा जा सकता है। कहीं-कहीं कहानियों में यह भी लगता है जैसे मन्नू भण्डारी अपने स्वयं के जीवन के द्वन्द्वों को कहानियों में चित्रित कर रही है। उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में यह स्वीकार भी किया है, राजेन्द्र ने मेरे पत्नी पक्ष को इतना त्रस्त किया कि उसका प्रभाव मेरे लेखन पर भी पडा, मेरे लेखन की बडी क्षति हुई (पाखी, प्रवेशांक, 2008) तथापि उन्होंने अपने रचनाकार को अपने जीवन की कुण्ठाओं से बचाकर रखने का पूरा प्रयास किया है। इसीलिए उनकी कहानियों में जीवन की विविध समस्याएँ बडी सहजता से चित्रित हुई है, जैसे- उनकी सजा कहानी में भारतीय न्याय व्यवस्था की शिथिलता का मार्मिक चित्रण हुआ है। एक प्लैट सैलाब में उन्होंने उभरते महानगरों में उपजी विसंगतियों का चित्रण किया है, तो संख्या के पार कहानी में मजदूर माँ की विवशता का हृदयस्पर्शी अंकन है। छत बनाने वाले, नकली हीरे जैसी कहानियों में वे आर्थिक अभावग्रस्तता से उपजने वाली समस्याओं का चित्रण करती है। त्रिशंकु नामक कहानी में मन्नू भण्डारी लडके-लडकियों के सम्बन्धों को लेकर समाज में जो अंतर्विरोध पैदा होते हैं, उनकी व्याख्या करती हैं। इसी तरह मन्नू भण्डारी की आते-जाते यायावर, दरार भरने की दरार, बाहों का घेरा जैसी कहानियों में जीवन के अनेक तरह के संघर्ष-द्वन्द्व और भटकाव प्रकट होते हैं।
यहाँ यह उल्लेख करना भी आवश्यक है कि राजेन्द्र यादव और मन्नू भण्डारी के दाम्पत्य जीवन के द्वन्द्व उनकी कहानियों में बडी सूक्ष्मता के साथ चित्रित हुए हैं। मन्नू भण्डारी की एक कहानी यह भी तथा राजेन्द्र यादव की मुड-मुड कर देखता हूँ आत्मकथात्मक कृतियों के छपने के बाद यह द्वन्द्वात्मकता बहुत स्पष्ट रूप से पाठकों के समक्ष आ गई थी। किन्तु यहाँ हमें यह स्वीकार करना पडेगा कि मन्नू भण्डारी का कथाकार इन सम्बन्धों से पार जाकर जीवन के बहुआयामी पक्षों को भी बहुत गहराई से देखता है। इस तथ्य को मन्नू भण्डारी की अलगाव शीर्षक कहानी के कथ्य से समझा जा सकता है। 1977 में बिहार के बेलछी गाँव में हरिजनों के घर जलाये जाने की एक सनसनीखेज और मर्मान्तक घटना घटी थी। इस कहानी में मन्नू भण्डारी ने बडी कुशलता, मानवीयता और मार्मिकता के साथ इस धटना को प्रस्तुत कर दिया है। अखबार में पढी खबरों के आधार पर ऐसी हिला देने वाली कहानी लिख देना एक सामान्य प्रतिभा का काम नहीं हो सकता। इस कहानी में मन्नू भण्डारी इस जघन्य घटना से उपजने वाली संवेदना को पाठक से जोडती है, इतना ही नहीं यह घटना उनके मानस को इतना उद्वेलित करती है कि अलगाव कहानी मन्नू भण्डारी के महाभोज नामक उपन्यास की भूमिका तैयार करती है। महाभोज उपन्यास में मन्नू भण्डारी का एक ऐसा रूप हमारे सामने आता है कि उन्हें राजनीति तथा उसके दुष्परिणामों की कितनी गहरी समझ है।
इसी तरह बंद दराजों का साथ कहानी उनके प्रसिद्ध उपन्यास आपका बंटी का आधार बनती है। इस कहानी में मंजरी और विपिन पति-पत्नी हैं। मंजरी अपने पति के प्रति पूरी तरह समर्पित है तथा वह यह मानकर चलती है कि विपिन भी उसके प्रति उतना ही एकनिष्ठ है। किन्तु जब मंजरी को पता चलता है कि विपिन किसी अन्य स्त्री से प्रेम करता है है तो उसका हृदय टूट जाता है। मंजरी अपने बेटे को हॉस्टल में रखती है और एक नए तरह के द्वन्द्व से गुजरती है। यही कहानी आपका बंटी उपन्यास के कथ्य की सूचना देती है। डॉ. गोपाल राय ने इस कहानी के विषय में उचित ही लिखा है कि इस कहानी में आधुनिक दाम्पत्य जीवन की त्रासदी, सम्बन्धों में किसी ना किसी तरह पडने वाली दरार, भावना के स्थान पर बौद्धिकता, घुटन, अकेलापन, अलग होने की संवेदना, कचोटते हुए तनाव भी संवेदना आदि की प्रभावशाली अभिव्यक्ति हुई है। (हिन्दी कहानी का इतिहास-2, पृ. 277) इस कहानी का ताना-बाना जैसे आपका बंटी उपन्यास की भावभूमि तैयार कर देता है।
जीवन के सारे झंझटों के बावजूद मन्नू भण्डारी ने अपने व्यक्तित्व को न बिखरने दिया न टूटने दिया। उनके संतुलित सोच का ही परिणाम है कि उनका रचना संसार भी बहुत संतुलित और स्थायी प्रभाव छोडने वाला रहा। कहानी के अलावा उन्होंने उपन्यास के क्षेत्र में प्रवेश किया तो आपका बंटी लिखकर हिन्दी उपन्यास को एक नई दिशा प्रदान की। जब हिन्दी उपन्यास स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की राह चल रहा था और स्त्री को लेकर जो देहवादी चिन्तन सामने आ रहा था, उसके समानान्तर मन्नू भण्डारी ने आपका बंटी लिखकर हिन्दी उपन्यास को एक नई दिशा दी। इस उपन्यास में भी मन्नू भण्डारी स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की जटिलताओं को उठाती हैं, उनके द्वन्द्वों को रेखांकित करती हैं, और परस्पर मतभेदों को एक नया गवाक्ष प्रदान करती है। वे स्त्री-पुरुष सम्बन्धों का आकलन केवल उन दोनों तक ही सीमित रखकर नहीं करतीं, बल्कि बीच में बंटी को एक बडे प्रश्नवाचक चिन्ह की तरह ला खडा करती हैं, जिसे उनके मतभेदों की सजा भुगतनी पडती है।
मन्नू भण्डारी इस उपन्यास में स्त्री-पुरुष सम्बन्धों को संकीर्णता से निकालकर नयी पीढी के भविष्य से जोडती है, जिससे उपन्यास का फलक बहुत विशाल हो जाता है। स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की पीडा को बंटी के माध्यम से वे एक नया आसमान प्रदान करती हैं, जिसमें नयी पीढी का भविष्य प्रमुखता के साथ महत्त्वपूर्ण हो उठता है। यहाँ मन्नू भण्डारी अपने अनुभव संसार को बालमनोविज्ञान के क्षेत्र में ले जाती हैं और स्त्री-पुरुष से कहीं अधिक बच्चों के जीवन को गरिमा और महत्ता प्रदान करती हैं। ऐसा लगता है कि स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की जटिलता-संकीर्णता छोड हमें एक व्यापक धरातल पर सोचने पर विवश कर देती है। और स्त्री-पुरुष से भी अधिक महत्त्वपूर्ण उस बच्चों का जीवन हो जाता है, जो उन दोनों के सम्बन्धों का परिणाम है। इन सम्बन्धों की कटुता से बालमन किस प्रकार आहत और कुण्ठित होता है, इसका सूक्ष्म चित्रण आपका बंटी में हुआ है।
महिला रचनाकारों पर यह आरोप लगता रहा है कि उनका लेखन प्रेम अथवा स्त्री-पुरुष सम्बन्धों के चारों ओर घूमता रहता है, किन्तु मन्नू भण्डारी ऐसी कथाकार है जिनका अनुभव संसार बहुत बडा है, जब वे कॉलेज में पढती थीं, तभी से उनमें देश के राजनीतिक परिदृश्य को समझने की क्षमता आ गयी थी। वे स्वयं भी अपनी साथिनों को एकत्रकर आंदोलन की दिशा में निकल पडती थीं। अपने लम्बे जीवन काल में वे देश के राजनीतिक परिदृश्य को गहराई से समझती हैं और देश में आई राजनीतिक स्वार्थपरता को संवेदना के स्तर पर महसूस करती है। उनके इसी बडे सोच का परिणाम उनका उपन्यास महाभोज है, जिसका नाट्य रूपान्तर उन्होंने स्वयं महाभोज के नाम से ही किया है। मूलतः उपन्यास के रूप में लिखा गया महाभोज नामक उपन्यास स्वतंत्रता के बाद देश में आई राजनीतिक गिरावट का विश्वसनीय चित्र प्रस्तुत करता है। मन्नू भण्डारी के महाभोज उपन्यास को श्रीलाल शुक्ल के राग दरबारी, राही मासूम रजा के आधा गाँव, अमृतलाल नागर के बूँद और समुद्र जैसे राजनीतिक उपन्यासों की कोटि में रखा जा सकता है। लगता नहीं कि यह उपन्यास आपका बंटी लिखने वाली कथाकार ने ही लिखा है। मन्नू भण्डारी महाभोज में राजनीतिक पाखण्डों को जिस सूक्ष्मता के साथ उकेरती हैं, उससे पाठक को लगने लगता है कि स्वतंत्र भारत में राजनेता अपनी राजनीति तथा अपने पदों का इस्तेमाल अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए कर रहे हैं। देश और लोकहित उनकी राजनीति का लक्ष्य ही नहीं है। उनके लिए राजनीति एक ऐसा हथियार बन गयी है जिसके द्वारा राजनेता अपने जीवन को उत्सवमय बना सकते हैं। व्यक्तिगत स्वार्थ के समक्ष न कोई मानवीय मूल्य है, न जनता की पक्षधरता। देश के उत्थान का तो सवाल ही नहीं उठता। क्या हमने स्वतंत्रता अपने क्षुद्र स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए ही प्राप्त की थी। महाभोज बडी शिद्दत से इस सवाल को उठाता है और पाठकों को यह सोचने पर विवश करता है कि ऐसी राजनीति का क्या लाभ इस देश के नागरिक मिला? वर्तमान राजनीति का क्रूरतम चेहरा यह उपन्यास पाठक के समक्ष प्रस्तुत कर देता है। और यह सिद्ध कर देता है कि महाभोज जैसा उपन्यास लिखकर मन्नू भण्डारी ने अपनी विरल प्रतिभा का परिचय दिया है।
मन्नू भण्डारी के साथ व्यक्तिगत जीवन में मेरा बडा आत्मीय सम्बन्ध रहा, उनसे मुझे पर्यापत स्नेह मिला तथा उनके बडप्पन का मुझे अनेक बार परिचय मिला। एक शाम अचानक उनका फोन आया हेतु भैया मैं मन्नू बोल रही हूँ, तुमने मेरी एक कहानी किसी संकलन में शामिल की थी, जिसका पारिश्रमिक भी तुमने मुझे भेजा था, मुझे उस पारिश्रमिक की रसीद नहीं मिल रही है, तुम्हें तकलीफ तो होगी, पर अपने प्रकाशक से उस पारिश्रमिक का विवरण कल भेज दो, मैं प्रतीक्षा करूँगी। मैंने उनके स्वास्थ्य के बारे में पूछा और यह भी जानना चाहा कि पारिश्रमिक के विवरण का वे क्या करेंगी तो उन्होंने बताया कि मुझे आयकर रिटर्न भरना है जिसमें पारिश्रमिक की राशि को भी जोडना है। मैं लेखन से प्राप्त होने वाली सारी राशि अपनी आय में हर साल जोडती हूँ। मुझे सुनकर आश्चर्य हुआ कि इतनी वरिष्ठ रचनाकार आयकर देने के प्रति कितनी सचेत और ईमानदार है। मैंने उनसे दूसरे दिन विवरण भेजने के लिए कह दिया। दूसरे दिन प्रातःकाल ही उनका फोन आया, भैया, परेशान मत होना, मुझे वह विवरण वाला कागज दूसरी फाईल में मिल गया है। मुझे आश्चर्य हुआ कि उन्होंने दूसरे दिन सूचना देकर मुझे मेरी परेशानी से बचाया, यही तो उनकी संवेदनशीलता थी।
व्यक्तिगत स्तर पर मैं राजेन्द्र यादव और मन्नू भण्डारी दोनों से बहुत गहराई से जुडा हुआ था। सातवें दशक में साहित्यिक कार्यक्रम बहुत होते थे जिनमें मेरी उनसे मुलाकातें हो जाया करती थीं। मन्नूजी मुझे बहुत स्नेह देती थीं तथा मुझे भैया कहकर संबोधित करती थीं। किन्तु मेरी मुलाकातें राजेन्द्र यादव से जयादा होती थीं। जब भी मैं दिल्ली जाता, हंस कार्यालय पहुँच जाता और राजेन्द्र यादव से खूब बातें करता। मुझे याद है कि राजेन्द्र यादव और मन्नू भण्डारी के बीच का विवाद कथादेश और हंस आदि पत्रिकाओं में बराबर छप रहा था। पाठक वर्ग उनके विवादों में आनंद ले रहा था। मुझे यह सब कभी अच्छा नहीं लगा। उन्हीं दिनों एक दिन मैं हंस कार्यालय में पहुँच गया, तो राजेन्द्र यादव ने मुझ से पूछा, पण्डित मेरे और मन्नू के बीच चल रहा विवाद तुम्हें कैसा लग रहा है? मेरी यह आदत रही है कि मैं अपनी स्पष्ट राय देने में कभी संकोच नहीं करता। मैंने राजेन्द्र यादव से कहा- मुझे कैसा लगेगा? इस देश में अनगिनत पति-पत्नियों के बीच न जाने कितने तरह के विवाद हैं। लेकिन चौराहे पर खडे होकर अपने विवादों का खुलासा तो कोई नहीं करता। और एक आप हैं कि अपने व्यक्तिगत विवादों को लोगों के सामने परोस रहे हैं। मुझे लगता है आपको इसमें मजा आ रहा है और आप चाहते हैं कि और लोग भी इस मजे में शामिल हों, वे बोले मन्नू भी तो मुखर है- मैंने प्रतिवाद किया, मन्नूजी कतई मुखर नहीं है, वे अपने बयानों में शालीन बनी रहती हैं। लेकिन आप यह बताएँ कि आफ इन संबंधों का हम क्या करें? मुझे तो लगता है कि आप किसी रणनीति के तहत यह सब कर रहे हें। राजेन्द्र यादव हँसे और बोले- तुम साले राजस्थान के हो इसलिए मन्नू का ही पक्ष लोगे। तो मैंने कहा- मन्नूजी इतनी शक्तिवान है कि किसी को उनका पक्ष लेने की जरूरत नहीं। राजेन्द्र यादव ने तुरन्त विषय बदल दिया। वे अपनी कमजोरियों पर प्रहार सहन नहीं कर पाते थे।
एक बार का किस्सा मुझे याद है- राजेन्द्र यादव को और मुझे कानोडिया महिला कॉलेज, जयपुर में दो दिन की रचनात्मक कार्यशाला के लिए आमंत्रित किया गया था। उस समय इस कॉलेज में डॉ. मेहतानी प्रिंसिपल थीं। उनका व्यक्तित्व बहुत प्रखर था। उस समय हिन्दी प्राध्याक डॉ. प्रभा सक्सेना ने इस कार्यक्रम का आयोजन किया था। राजस्थान विश्वविद्यालय की गतिविधियों में बराबर शिरकत करने के कारण डॉ. मेहतानी मुझे अच्छी तरह जानती थीं। उस समय कानोडिया कॉलेज में ऐसी कार्यशाला हर साल हुआ करती थी। राजेन्द्र यादव अपनी हरकतों से बाज नहीं आते थे और अपने सामने सुंदर लडकियाँ देख तो उनका मन कुलाचें भरने लगता था।
वे मुझे बराबर कहते पण्डित इन लडकियों को खोलो। लेकिन स्थानीय और अध्यापक होने के कारण मैं बराबर शिष्टता के साथ साहित्यिक बातें करता रहा। इस कार्यक्रम के समापन समारोह में डॉ. मेहतानी भी उपस्थित थीं। प्रारंभ में मैंने रचनात्मकता को लेकर अपनी बात कही और मेरे बाद राजेन्द्र यादव ने अपनी बार-बार दोहराए जाने वाली भडकी, लडकी, खिडकी और झिडकी वाली नीति का खुलासा करते हुए कुछ ऐसी अशोभन बातें कहीं कि डॉ. मेहतानी नाराज हो गईं। वो बहुत दबंग महिला थीं। कार्यक्रम के तुरन्त बाद उन्होंने प्रभा सक्सेना को और मुझे ऑफिस में बुलाया और प्रभा सक्सेना को बुरी तरह डाँटा? ऐसे आदमी को लडकियों के सामने बोलने के लिए क्यों आमंत्रित किया? प्रभा सक्सेना स्वयं लेखिका थीं और उन्होंने कहा, राजेन्द्र यादव का चयन मैंने नहीं किया था, आपका ही आग्रह था- मैंने तो उनके साथ हेतु भारद्वाज को बुलवाने के लिए कहा था। लेकिन आप राजेन्द्र यादव के बारे में तो जानती थीं कि वे ऐसा बोलते हैं। तुम्हें उन्हें आमंत्रित नहीं करना चाहिए था। मुझे मन्नू भण्डारी का फोन मिलाकर दो मैं उनसे बात करती हूँ। मैंने हस्तक्षेप करना चाहा, मैडम मन्नू जी को फोन करके क्या करेंगी- वे और दुखी होंगी। अब छोडिए जो हो गया सो हो गया, इसमें प्रभा सक्सेना का भी कोई दोष नहीं है, राजेन्द्र यादव हमारे समय के बडे लेखक हैं। डॉ. मेहतानी मुझसे बोलीं, बडे होने से उन्हें कुछ भी बोलने का अधिकार तो नहीं मिल जाता, क्या वे नहीं जानते कि वे लडकियों के कॉलेज में बोल रहे हैं, फिर आपने इस तरह की बातें क्यों नहीं की? डॉ. मेहतानी को मैंने जैसे-तैसे शांत किया, प्रभा सक्सेना बहुत डर गईं।
कार्यक्रम के बाद मैं राजेन्द्र यादव को लेकर होटल चला गया। तो उन्होंने पूछा इस बुढिया को मेरा भाषण बुरा लगा? तो क्या अच्छा लगता- यह बहुत हार्ड टास्क मास्टर है। आपको यह तो ध्यान रखना चाहिए था कि आप लडकियों के सामने बोल रहे हैं- पता है, डॉ. मेहतानी मन्नूजी को फोन करने पर आमादा थीं। राजेन्द्र यादव अपनी सहज मुद्रा में बोले- तो मेरा क्या कर लेती, मन्नू से शिकायत करने से क्या फायदा होता? यार! सब औरतें एकसी होती हैं। पण्डित तुम बहुत चालाक हो, अपनी मास्टरी दिखा गए और भले बने रहे। ऐसे प्रसंग मेरे और उनके बीच कई बार गुजरे और उनका समापन इसी वाक्य के साथ होता रहा- पण्डित तुम बहुत चालाक हो।
एक बार मैंने उन्हें कानोडिया कॉलेज में घटी इस घटना के बारे में बताया और कहा कि प्राचार्य डॉ. मेहतानी आपको फोन कर रही थीं, मैंने उन्हें रोक दिया। सुनकर वे बहुत हँसी और बोलीं, अरे राजेन्द्र का तो ऐसे ही है, उनके लिए यह सब छोटी बातें हैं। उनसे कुछ भी कहना बेकार है। तुम्हारे बारे में राजेन्द्र की राय यह जरूर है कि तुम उनसे डरते नहीं हो। मुझे यह अच्छा लगता है, क्योंकि मैं जानती हूँ कि तुम्हें किसी से कुछ पाने की इच्छा नहीं है। तुम्हारी यह बात मुझे भी बहुत अच्छी लगती है। तुम प्रसन्न रहो यही कामना है। ऐसी संवेदनशील महिला के स्नेह का मूल्यांकन करना आसान नहीं है। किन्तु मैं यह जानता हूँ कि ऐसा निर्मल-स्नेह कोई असाधारण प्रतिभा वाली महिला ही दे सकती है।
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