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मन्नू भण्डारी : परम्परिक देह में आधुनिकता की आत्मा

प्रियदर्शन
हिंदी की प्रख्यात लेखिका मन्नू भण्डारी के निधन के बाद हिंदी संसार ने उनको जिस तरह से याद किया, उसमें कुछ अभिभूत होने की वजहें थीं तो कुछ उदास होने की भी। बहुत सारे लोगों ने उनकी कहानी यही सच है पर बनी फिल्म रजनीगंधा की मार्फत उनको याद किया, कुछ को उनके द्वारा लिखा हुआ रजनी नाम का धारावाहिक भी याद आता रहा। निस्संदेह ये दोनों महत्त्वपूर्ण काम थे, लेकिन ये मन्नू भण्डारी के समग्र रचनात्मक अवदान के शिखर नहीं थे। इनसे उनके हिस्से कुछ अतिरिक्त लोकप्रियता भी संभवतः आई होगी, लेकिन अगर रजनीगंधा न बनी होती या रजनी जैसा धारावाहिक उन्होंने न लिखा होता, तब भी उनकी कीर्ति में कुछ कमी आई होती या उनका रचनात्मक अवदान कुछ कम और फीका मालूम पडता, ऐसा कतई नहीं है।
दूसरी बात यह कि उनके जाने के बाद जो कीचडउछाल किस्म की बहस सोशल मीडिया पर दिखी, उससे पता चलता है कि हिंदी का संसार वैचारिक और बौद्धिक स्तरों पर इन दिनों विपन्न और संकीर्ण हुआ है। इस बहस में एक सिरे पर नकली श्रद्धा दिखी, दूसरे सिरे पर उद्धत अवहेलना भाव और तीसरे सिरे पर रिश्तों के प्रति गहरा असम्मान। यह बात ज़्यादा दुखद इसलिए थी कि मन्नू भण्डारी अपने जीवन काल में जीवन और लेखन के पाखण्ड पर लगातार प्रहार करती रहीं- उन्होंने अपने साथी लेखकों और अपने जीवन साथी तक को इस मामले में नहीं बख्शा। कितने कमलेश्वर नाम का उनका लेख हो या एक कहानी यह भी नाम की उनकी आत्मकथात्मक किताब- वे बहुत बेबाकी से रिश्तों के छल उधेडती रहीं। बल्कि स्त्री सुबोधिनी में एक छली गई स्त्री द्वारा बाकी स्त्रियों के नाम लिखी गई उनकी चिट्ठी भी इस लिहाज से बार-बार पढी जाने योग्य है।
मन्नू भण्डारी एक साथ हिंदी कहानी के केन्द्र और हाशिए दोनों में रहीं। एक तरफ उन्हें राजेंद्र यादव, मोहन राकेश और कमलेश्वर जैसे लेखकों का बेहद निकट सहचर्य मिला और दूसरी तरफ वे इस त्रिकोण के बाहर मानी जाती रहीं। यही नहीं, उनके भीतर इन्हीं दिनों ऐसी यशविमुखता पैदा हुई कि उन्होंने खुद को चर्चाओं से भी काटे रखा।
लेकिन इसके बावजूद मन्नू भण्डारी अपने समकालीन लेखकों से लोकप्रियता या पहचान में कहीं पीछे नहीं रहीं। उनकी कृतियाँ आलोचकों को पार कर सीधे पाठकों से जुडती रहीं। उनका उपन्यास आपका बंटी हिंदी में लगभग छलछलाती आँखों से पढा गया। माँ-पिता के टकराव के बीच फँसे बंटी की कथा बहुत सारे लोगों को रुलाने वाली थी। बाद के वर्षों में कई बार यह पढने को मिला कि इस उपन्यास ने कई घरों को टूटने से बचाया, दम्पतियों के बीच के तलाक स्थगित कराए। यह अनायास नहीं था कि आपका बंटी हिंदी के सर्वाधिक बिकने वाले उपन्यासों में रहा।
इत्तिफाक से उसी के आसपास मैंने राजेंद्र यादव का सारा आकाश भी पढा। यह भी वैसी ही लोकप्रिय कृति साबित हुई। लेकिन आपका बंटी ने मुझे जितना जोडा या तोडा, सारा आकाश ने नहीं। शायद इसलिए भी कि मूलतः मेरी कच्ची-किशोर संवेदनाएँ बंटी की छटपटाहट से कहीं ज़्यादा जुडती थीं, सारा आकाश के संवादहीन पति-पत्नी की विकलता-व्याकुलता से नहीं। सच तो यह है कि यह इकलौता उपन्यास मन्नू भण्डारी को हिंदी साहित्य में बनाए रखने के लिए पर्याप्त था।
लेकिन मन्नूजी को रचनात्मकता के नए पडाव जैसे लगातार पुकारते रहे। उन्होंने इसको लेकर प्रयोगों में भी कोई संकोच नहीं किया। एक उपन्यास अपने जीवनसाथी राजेंद्र यादव के साथ मिलकर लिखा। राजेंद्र यादव और मन्नू भण्डारी की यह साझा औपन्यासिक कृति एक इंच मुस्कान पढते हुए भी मुझे मन्नू भण्डारी का हिस्सा ज़्यादा सहज, तरल और प्रवाहपूर्ण लगता रहा। बल्कि इस उपन्यास की भूमिका में राजेंद्र यादव ने माना कि उनको अपना हिस्सा लिखने में खासी मशक्कत करनी पडती थी जबकि मन्नू भण्डारी बडी सहजता से अपना अंश पूरा कर लेती थीं। शायद राजेंद्र यादव की किस्सागोई की राह में उनकी अध्ययनशीलता और उनका वैचारिक चौकन्नापन आडे आते होंगे (हालाँकि जिस दौर में यह कथाएँ लिखी जा रही थीं, उस दौर में राजेंद्र यादव का वह मूर्तिभंजक व्यक्तित्व सामने नहीं आया था जो बाद के वर्षों में हंस के संपादक के तौर पर उनमें दिखता रहा और जिसकी वजह से स्त्री विमर्श और दलित विमर्श को उन्होंने लगभग हिंदी साहित्य के केंद्र में ला दिया। )
हालाँकि इसका मतलब यह नहीं कि मन्नू भण्डारी अध्ययनशील नहीं रहीं या उनमें वैचारिक चौकन्नापन नहीं रहा। उनका कथा-लेखन दरअसल यह बताता था कि मन्नू भण्डारी अध्ययन से ज्यादा अनुभव को महत्त्व देती थीं और वैचारिक चौकन्नापन उनके लिए कहीं से उधार लिया हुआ अभ्यास नहीं था, बल्कि अपने अनुभव संसार से परखा गया एक निष्कर्ष था जो उनकी कहानियों में बडी खूबसूरती से खुलता था।
यह भी एक वजह है कि वे सहज और लोकप्रिय कथाकार रहीं। उनको जितने पाठक मिले, उतने आलोचक नहीं मिले। इस ढंग से देखें, तो लगता है कि हिंदी आलोचना ने एक कथाकार के तौर पर उनकी उपेक्षा की। उनकी लगभग समकालीन कृष्णा सोबती को उनसे कहीं ज़्यादा पुरस्कार मिले और आलोचकों का प्यार भी। शायद इसलिए भी कि कृष्णा सोबती के भीतर एक आक्रामक स्त्रीवाद दिखाई पडता था जो मुखर भी था और अपनी मुखरता में लुभावना भी। उन पर वैचारिक तौर पर रीझना आसान था। मित्रो मरजानी या डार से बिछुडी की नायिकाओं में जो विद्रोही तेवर हैं (यह बहसतलब है कि सिर्फ तेवर हैं या वास्तविक विद्रोह भी) वे बहुत आसानी से कृष्णा सोबती को स्त्रीवाद के प्रतिनिधि लेखक के रूप में पढे जाने में मददगार होते हैं।
लेकिन मन्नू भण्डारी की कहानियाँ ऊपर से जितनी सरल हैं, भीतर से उतनी ही जटिल भी हैं। उनको पढते हुए भ्रम होता है कि वे परंपरा का पोषण कर रही हैं, जबकि सही बात यह है कि पारंपरिक दिखने वाली उनकी नायिकाएँ अपनी आधुनिकता का अपने ढंग से संधान करती हैं। इसकी मिसाल है उनकी बहुत प्रसिद्ध कहानी यही सच है जिस पर रजनीगंधा जैसी फिल्म बनी। इस कहानी में पहली बार हमारे सामने एक लडकी
है जिसे दो लडकों के बीच अपने प्रेम को लेकर चयन की दुविधा है। इसके पहले हिंदी साहित्य और सिनेमा दो लडकियों के बीच नायकों के चुनाव की कशमकश पर तो कहानियाँ बुनते हैं, लेकिन पहली बार मन्नू भण्डारी अपनी नायिका को यह आजादी देती हैं कि वह अपने वर्तमान और पूर्व प्रेमियों में किसी एक को चुन सके और ऐसा करते हुए किसी नैतिकता के द्वंद्व से मुक्त रहे। अच्छी बात यह है कि मन्नू भण्डारी की कहानी में यह बात किसी आरोपित विचार की तरह नहीं आती, वह उनके भीतर की कशमकश से, उनके भीतर के द्वंद्व से उभरती हैं। मन्नू भण्डारी के यहाँ पहली बार वे कामकाजी स्त्रियाँ दिखती हैं जो अपने स्त्रीत्व का मोल भी समझती हैं और उसको लेकर चले आ रहे पूर्वग्रहों को तोडने की अहमियत भी। साहित्य में दैहिक शुचिता की बहस पुरानी है और देह को अपनी संपत्ति मानने या यौन मुक्ति को स्त्री मुक्ति बताने तक का विचार भी लगातार सुर्खियों में रहा है- इस थीम पर लिखने वाले लेखक विद्रोही माने जाते रहे हैं और बाद के वर्षों में राजेंद्र यादव अपने इस विचार को लेकर कुछ बदनाम भी हुए, लेकिन दिलचस्प यह है कि यह मन्नू भण्डारी हैं जो बिना किसी क्रांतिकारी मुद्रा के इस दैहिक शुचिता की अवधारणा की धज्जियाँ उडा देती हैं। उनकी कहानी गीत का चुंबन की नायिका कणिका एक कवि निखिल के करीब आती है। किसी भावावेश के क्षण में निखिल कणिका को चूम लेता है। तिलमिलाई कणिका उसे थप्पड मार देती है। निखिल शर्मिंदा-सा लौट जाता है। यह पश्चाताप उसका पीछा नहीं छोडता और एक हफ्ते बाद वह कणिका को चिट्ठी लिखकर अपने कृत्य के लिए माफी माँगता है। उसके शब्द हैं- मुझे अफसोस है कि मैंने तुम्हें भी उन साधारण लडकियों की कोटि में ही समझ लिया, पर तुमने अपने व्यवहार से सचमुच ही बता दिया कि तुम ऐसी-वैसी लडकी नहीं हो। साधारण लडकियों से भिन्न हो, उनसे उच्च, उनसे श्रेष्ठ। लेकिन निखिल को पता नहीं है कि जैसे पश्चाताप उसका पीछा नहीं छोड रहा, वैसे चुंबन की स्मृति भी कणिका का पीछा नहीं छोड रही। उसके भीतर कहीं फिर से उस अनुभव को दुहराने की चाहत है। कहानी जहाँ खत्म होती है वहाँ कनिका गुस्से में उस पत्र को टुकडे-टुकडे कर फेंक रही है- साधारण लडकियों से श्रेष्ठ, उच्च! बेवकूफ कहीं का- वह बुदबुदाई और उन टुकडों को झटके के साथ फेंक कर तकिए से मुँह छुपा कर सिसकती रही, सिसकती रही...। अगर ठीक से देखें, तो यह कहानी उसी दौर में बेहद प्रसिद्ध हुए धर्मवीर भारती के उपन्यास गुनाहों का देवता के सुधा और चंदर के प्रेम को कहीं ज़्यादा ठोस धरातल देती है, उससे आगे चली जाती है। मन्नू भण्डारी की कहानियाँ गुनाहों के देवताओं की नहीं, पश्चाताप करते इंसानों की कहानियाँ हैं। बेशक, कहानी के भीतर इस साधारणता पर जो चोट की गई है, वह शायद उस मध्यवर्गीय मानसिक चौखटे का भी असर है जिसमें वह पूरा नई कहानी आंदोलन विकसित हुआ था।
लेकिन उनका पूरा कथा संसार बताता है कि परंपरा उनके लिए कोई जड चीज नहीं थी- विरासत में मिली कोई धरोहर नहीं थी जिसे बहुत सँभाल कर रखा जाए और न ही आधुनिकता उनके लिए ऐसा लिबास भी जिसको पहन कर वे नए दौर की हो जातीं। वे परंपरा से आती थीं और आधुनिकता तक चल कर जाती थीं। कभी वे परंपरा के बोझ को भी प्रश्नांकित करती थीं और कभी आधुनिकता के खोखलेपन को भी।
निस्संदेह, मन्नू भण्डारी की अपनी सीमाएँ रही होंगी- आलोचकों को कई ढंग से वे अनाकर्षक और अनुपयुक्त लगती रही होंगी। मूलतः मध्यवर्गीय जीवन के अभ्यास और विन्यास से निकला उनका कथा संसार न माक्र्सवादी आलोचकों के काम का था जो इसे बूर्जुवा मुहावरे की हिकारत के साथ देखते होंगे और न उन आधुनिकतावादियों की समझ में समाता था जिनके लिए विद्रोह बिल्कुल जीवन शैली का हिस्सा लगे, जो परिधानों में, संवादों में और आदतों में दिखे।
लेकिन क्या मन्नू भण्डारी ने इस मध्यवर्गीयता का अतिक्रमण नहीं किया? मन्नू भण्डारी महाभोज जैसा उपन्यास लिखकर अपने समय के कई लेखकों से आगे दिखाई पडती हैं। उपन्यास के एक दलित नायक को जहर देकर मार दिया जाता है तो दूसरे नायक को जेल में डाल दिया जाता है। निस्संदेह यह उपन्यास दलित अनुभव को नहीं रखता, लेकिन इस उपन्यास में लगभग गिद्धवत होती भारतीय राजनीति में दलितों के इस्तेमाल और उत्पीडन का जो आख्यान वह रचती हैं, वह उन्हें अपनी तरह की अचूक समकालीनता देता है। यह अनायास नहीं है कि बाद के वर्षों में भारतीय रंगमंच पर इसे बार-बार एक उत्तेजक अनुभव की तरह खेला जाता रहा।
इस बात को भी याद करना जरूरी है कि मन्नू भण्डारी अपने समकालीन लेखकों को प्रसिद्धि और रचनात्मकता में लगभग बराबर की टक्कर देती रहीं। अपने पति राजेंद्र यादव के अलावा मोहन राकेश, कमलेश्वर, धर्मवीर भारती, निर्मल वर्मा और भीष्म साहनी जैसे कथाकारों के बीच संभवतः वे अकेली थीं जो इनके पाये में मानी जाती थीं और यह पात्रता उन्होंने बस अपनी कहानियों और पाठकों के बीच उनकी लोकप्रियता के बूते हासिल की थी।
क्या इत्तिफाक है कि बीसवीं सदी के तीसरे-चौथे दशकों के बीच भारतीय भाषाओं की कई बडी लेखिकाएँ सामने आती हैं। उर्दू की इस्मत चुगतई, पंजाबी की अमृता प्रीतम, बांग्ला की महाश्वेता देवी, उर्दू की ही कुर्तुलऐन हैदर और हिंदी की कृष्णा सोबती- सब जैसे एक ही दशक के आसपास की संतानें हैं। निस्संदेह इस सूची में उम्र में सबसे छोटी मन्नू भण्डारी सबके बीच और सबसे अलग दिखती हैं। बल्कि हिंदी में कृष्णा सोबती और उषा प्रियंवदा के साथ वे महिला लेखन का वह त्रिकोण बनाती हैं जिसके साथ एक पूरी परंपरा बनती है। आने वाले वर्षों में हम इस कडी में मृदुला गर्ग, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल, राजी सेठ, मृणाल पाण्डे और नासिरा शर्मा जैसी लेखिकाओं को जुडता देखते हैं। यह बहुत समृद्ध परंपरा है जिस पर हिंदी नाज कर सकती है।
मन्नू भण्डारी का जाना याद दिलाता है कि अब बीसवीं सदी के लेखकों की वह पीढी चली गई जिस पर भारतीय भाषाएँ गुमान करती थीं और जिसकी विपुल संपदा हमारे लिए अब भी एक थाती है।
सम्पर्क - इ-4 जनसत्ता सोसाईटी, सेक्टर-9,
वसुंधरा, गाजियाबाद-201012