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मन छलनी तन काहे ना बिहरे

रेनू यादव
जिस समय साहित्य पर पुरूष लेखकों का पूरी तरह से वर्चस्व था, वैसे समय में मन्नू भण्डारी ने लिखना शुरू किया । उनसे पूर्ववर्ती लेखिकाएँ कभी दबे-दबे स्वर में तो कभी मुखर होकर अपनी आवाज उठा रही थीं और अनेक आरोपों के बीच-बचाव में कभी पुल्लिंग में तो कभी स्त्रीलिंग में लिखते हुए पायी जाती थीं । परंतु मन्नूजी की पीढी की लेखिकाओं में कृष्णा सोबती अपने बोल्ड लेखन के लिए, राजी सेठ मनोवैज्ञानिक लेखन के लिए और मन्नू भण्डारी संवेदनात्मक लेखन के लिए पहचानी जा रही थीं । सीधे सपाट रूप से भावों को उकेरने वाली मन्नूजी समाज के उस यथार्थ को बिना लाग-लपेट के इस तरह से प्रस्तुत करती थीं कि उनकी कहानियाँ सीधे-सीधे पाठकों के हृदय में उतर जाती थीं।
28 सितम्बर, 2019 को रचनाजी के घर पर सुधा अरोडा और मन्नू भण्डारी जी से मिलना हुआ । उस दिन मन्नूजी कुछ विस्मृत्त अवस्था में थीं! मैं दोनों ही लेखिकाओं के लिए साक्षात्कार के कुछ प्रश्न साथ ले गई थी, मन्नूजी अपने प्रश्नों को पढतीं और जो समझ में आता उसका जवाब देतीं और बीच बीच में उन जवाबों को सुधाजी पूरा करतीं । मैं वहाँ लगभग डेढ-दो घंटे तक रही, लगातार मेरा संवाद सुधाजी से जारी रहा । सुधाजी बात करते समय बीच-बीच में उन्हें भी शामिल करते हुए बताती जातीं कि हम किस विषय पर बात कर रहे हैं अथवा उनका ध्यान हमारी बातों पर खींचने का प्रयास करतीं । संवादों के बीच में ही आदरणीय राजेन्द्र यादव जी की भी चर्चा शुरू हो गई । हमें लग रहा था कि मन्नूजी का ध्यान हमारी बातों पर नहीं होगा अथवा हमें अन्दाजा नहीं था कि वे इस प्रसंग पर ध्यान दे रही होंगी । उसी समय उन्होंने हमारी बात काटते हुए सुधाजी से पूछा, क्या बात कर रही हो?
हम राजेन्द्रजी के विषय में बात कर रहे हैं सुधाजी ने बहुत ही प्यार से बताया।
किसके विषय में शायद वे नाम सुन नहीं पायी थीं
राजेन्द्रजी सुधाजी ने ऊँची आवाज में बताया ताकि वे सुन सकें।
मत करो मन्नूजी का दो टूक जवाब और हम दोनों चुप। फिर थोडी देर बाद विषय बदल गया।
मिलकर आने के बाद मैं कई दिनों तक इस यह सोचती रही कि उन्हें कुछ भी याद नहीं, फिर भी उन्हें एक इन्सान याद है, वे हैं - राजेन्द्र यादव। विस्मृति में भी राजेन्द्रजी की स्मृति रखने वाली मन्नूजी का वह कौन-सा स्नेह सूत्र अथवा कसकती पीडा रही होगी जिससे वे उबर नहीं पा रहीं! 35 सालों तक अनेक टूटन-घुटन के पश्चात भी जिस रिश्ते को वे सँभाले रहीं, कितना तो टूटी होंगी अलगाव के फैसले के समय! क्या सचमुच वे अलग होकर भी अलग हो पायीं !
जो जूझता है, वह सींझता है और जो सींझता है वो पिघलता भी है और अपने अंतस से मजबूत भी होता है, जिसका अंतस मजबूत होता है वही लिखने का साहस भी कर पाता है । पाठकों के दिल में उतरने वाली मन्नूजी किस तरह अपने व्यक्तिगत जीवन में जूझ रही हैं, यह किसी को नहीं पता था क्योंकि मन्नूजी का स्वयं मानना था कि व्यक्ति में इतना साहस होना चाहिए कि वह अपने दुःख को झेल सके । कुछ बेहद निजी संबंधों के अतिरिक्त वे अपनी पीडा किसी से नहीं बताती थीं। धीरे-धीरे उनकी पीडा मन से लेकर शारीरिक व्याधियों में बदल गई । कथादेश और तद्भव में प्रकाशित साक्षात्कारों और आलेखों ने जिस तरह से उन्हें झकझोरा कि मवाद बना पीडा एक बार बहना शुरू किया तो बहता ही चला गया और इस तरह से बह गया कि कईं प्रसंगों को तो राजेन्द्रजी ने स्वयं ही खोल रखा था उस पर मोहर लगाने का काम मन्नूजी ने कर दिया ।
किसी के व्यक्तिगत जीवन पर बात करने का हमें कोई अधिकार नहीं होता किंतु जब कोई व्यक्ति / लेखक स्वयं अपनी आत्मकथा / आत्मकथांश / आत्मकथ्य के माध्यम से व्यक्तिगत जीवन को सार्वजनिक कर दें तो पाठक उस पर बात करने का अधिकार रखता है क्योंकि आत्मकथा लिख कर प्रकाशित ही इसी उद्देश्य से किया जाता है कि उनका व्यक्तिगत जीवन सार्वजनिक हो सके। राजेन्द्र यादवजी की आत्मकथा मुड मुडकर देखता हूँ (सं. प्रथम 2001, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली) तथा मन्नू भण्डारी जी आत्मकथा एक कहानी यह भी (सं. प्रथम 2007, राधाकृष्ण प्रकाशन, नई दिल्ली), जिसे दोनों लेखकों ने आत्मकथा न मानकर आत्मकथ्यांश माना है, का प्रकाशन सार्वजनिक करने के ही उद्देश्य से हुआ है । राजेन्द्रजी लम्बे समय तक अतीत में जीने और वर्तमान तक पहुँचने की यात्रा को आत्मकथा मानते हैं जिसमें आत्मकथाकार को अपनी यात्रा के लिए जस्टीफिकेशन या वैधता की तलाश होती है, इसलिए वे अपने ग्रंथ को आत्मकथा न मानकर आत्मकथ्यांश मानने पर बल देते हैं और मन्नू भण्डारी अपने इस ग्रंथ को अपने लेखकीय व्यक्तित्व और लेखन यात्रा पर केन्द्रित जीवन का एक टुकडा मानती हैं ।
दोनों ही लेखक बडी ही सजगता से अपने-अपने आत्मकथ्यांश को साहित्यिक यात्रा का अंश बनाने का प्रयास करते हैं। किंतु आत्मकथ्यांश में स्व और स्व से जुडें पर का भी उल्लेख होना स्वाभाविक था। साथ ही बचाव हेतु पर की प्रतिक्रिया और प्रतिक्रिया पर प्रतिक्रिया लिखना अथवा लिखवाये जाना भी जस्टिफिकेशन की ही अपेक्षा है। किंतु यह भी ध्यान रखने योग्य बात है कि किन्हीं दो व्यक्तियों के आपसी निजी संबंधों पर कोई तीसरा मात्र अपना मत दे सकता है, समस्याएँ समझ सकता है, घटनाओं को उछाल सकता है, पर घटी घटना को (वह भी निरंतर चलने वाले रिश्ते को) कभी भी जस्टिफाई नहीं कर सकता।
एक कहानी यह भी एक आत्मनिर्भर, नैतिक, बौद्धिक स्त्री की कहानी है जो बिफर-बिफर कर अपनी बात न तो पुस्तक में कर सकती हैं और न ही व्यक्तिगत जीवन में। शायद बौद्धिकता की खोल ही ऐसी है कि जीवन की संपूर्ण पीडा को हृदय सोख लेता है, पीडा कहानियों-कविताओं में उतरती है पर लेखक प्रत्यक्ष रूप से कहने का साहस नहीं जुटा पाता । कदाचित् इसीलिए साहित्यकारों को कईं-कईं प्रकार की शारीरिक व्याधियों से जूझना भी पडता है । मन्नूजी अपनी आत्मकथा में वैवाहिक जीवन के विषय में जितना भी प्रस्तुत करती हैं उन वाक्यों के अन्दर कई कई वाक्य गूढ रहस्य लिए उभर आते हैं। कोई भी व्यक्ति लिखते समय अथवा बात करते समय अपने जीवन की घटनाएँ गिना सकता है, हो सकता है कुछ घटनाओं से जुडी संवेदना को भी प्रस्तुत करने में कामयाब हो जाए, लेकिन उस घटना के घटित होते समय, उसे झेलते समय तथा उबरने के बाद स्मृत्ति में भी जिस पीडा, टूटन-घुटन से वह गुजरा है, उसकी यात्रा शब्दों में नहीं समझाया जा सकता। बहुत-सी संवेदना सिर्फ समझी जा सकती हैं पर कही नहीं जा सकती। मन्नूजी कहते हुए भी चूक जाती हैं ।
ख्यातिलब्ध राजेन्द्रजी का साथ साहित्य जगत में साहचर्य और समानता के भाव से एक दूसरे को सम्मानपूर्वक कदम से कदम मिलाकर आगे बढने की उम्मीद ने दोनों लेखकों को सहजीवन बना दिया, अधिकतर समय यह हुआ भी है कि कभी मन्नूजी ने अपने उपन्यास की थीम दे दी और कईं बार राजेन्द्रजी मन्नूजी की कहानियों एवं उपन्यासों का नाम रखते थे। लेकिन जैसे ही गृहस्थ जीवन का जिक्र आता है, वहाँ मन्नूजी मात्र प्रेम करने वाली विशुद्ध पत्नी के रूप में ही नजर आती हैं। पति-पत्नी का रिश्ते में सबसे अधिक निःस्वार्थ और सबसे अधिक स्वार्थ दोनों का समान रूप से समावेश होता है। ऐसे में समानांतर जिन्दगी के पैटर्न में समान ध्यान न मिलने पर उपेक्षा का आभास होना स्वाभाविक ही है । लेखक के प्रति श्रद्धा से परे व्यक्तिगत संबंधों में रिश्ता हर रोज दोनों तरफ से निभाने की, जीने की प्रक्रिया का नाम है। कदाचित् आर्थिक और पारिवारिक जीवन के उत्तरदायित्वों का वहन करते समय मन्नूजी ने एक सामान्य पत्नी की भाँति चाहा था, तो एक अटूट विश्वास, एक निर्द्वन्द्व आत्मीयता और गहरी संवेदना।
ऐसा नहीं था मन्नूजी अपनी कहानी में सिर्फ पीडा ही व्यक्त करती हैं, बल्कि राजेन्द्रजी का विवाह से पूर्व मिलन का एहसास, स्वप्न और विवाहोपरांत कभी-कभी राजेन्द्रजी का उन्हें अस्पताल ले जाना, टिंकू के लिए रोना तथा साहित्यिक चर्चाओं का वर्णन करती हैं, इसी प्रकार राजेन्द्रजी भी अपनी यात्रा की सफलता में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हैं । मन्नूजी का कलकत्ता के बन्द समाज में खुलेआम इनसे विवाह करना, पैर तथा आँखों को लेकर हीनता-ग्रंथि से उबारने में इनका सहयोग करना, घर-परिवार में आर्थिक आधार बनना, अक्षर प्रकाशन की स्थिति सुधारने के लिए रॉयल्टी लेना, इनकी सहायता के लिए वेतन का प्रॉविडेंट फंड तक निकाल देना, मित्रों से सहायता लेकर कुर्की हो रहे घर को बचाना, चिट फण्ड के पैसे न चुका पाने पर इन्हें धोखे के आरोप से बचाना तथा एक्सीडेंट और बीमारियों में इनके लिए रात-दिन एक देने वाली भूमिकाओं से राजेन्द्रजी प्रभावित भी थे । ठहराव और गहराई तो मन्नू ने ही दी कहते हुए भी मन्नूजी के साथ ठहर न पाने की हीनताग्रंथि पर विजय पाने की लालसा थी अथवा कुछ नया पा लेने की चाह अथवा कुछ कर गुजरने की चाह ! ऐसे कईं सारे प्रश्नों के उत्तर उनके निजी जीवन के अंतरगता में छुपे हैं, जिसका पता मन्नूजी को बहुत बाद में चलता है । वे उनके बाहरी और भीतरी व्यक्तित्व के अंतर्संबंधों और भेद के सूत्र को तलाशती रह गईं और सूत्र इस तरह एक-दूसरे में उलझे हुए थे कि उन्हें सुलझाना आसान नहीं था !
विवाह की प्रत्यंचा पर चढे कई प्रसंगों के बीच विवाह को निर्विघ्न रूप से निभा ले जाने की जिद्द ने मन्नूजी को कहीं और सूत्र होने का संकेत तो दिया, किंतु यह उनका राजेन्द्रजी पर अटूट विश्वास ही था कि जिसके आगे संशय टिक नहीं पा रहा था। जिसके लिए मोहन राकेश का विवाह न करने की सलाह देना, ठाकुर साहब का राजेन्द्रजी के भविष्य की चिंता करते हुए सब छुपा ले जाना तथा स्वयं राजेन्द्रजी का अपारदर्शी एवं अंतर्द्वन्द्व भरा व्यवहार और मन्नूजी का सत्ता के खिलाफ जाकर राजेन्द्रजी का चयन आदि ऐसे अनेक कारक हैं जो एक चुनौती बनकर इनके सामने खडे थे और प्रत्येक चुनौतियों को चुनौती देने के लिए मन्नूजी तैयार थीं ।
गर्भावस्था हो अथवा बेटी टिंकू का जन्म, अपनी बीमारी हो अथवा बेटी टिंकू की तबीयत खराब होना अथवा उनकी पढाई, आर्थिक उत्तरदायित्व हो अथवा पारिवारिक... आदि चुनौतियों के समय समानांतर पैटर्न की जगह इकहरा पैटर्न का ढाँचा तैयार हो जाता है, जिसके भीतर स्वतंत्रता के समानांतर पैटर्न की खोखली आवाज का इको हृदय को खोखला करता गया, जिसकी भरपाई जब-तब लेखन से ही पूरा हो सकता था और मन्नूजी ने उन्हीं व्यस्ताओं में से समय निकाल कर उन्हें पूरा करने की भरपुर कोशिश भी की हैं। विशिष्ट जीवन शैली और रचनात्मकता की स्वतंत्रता मन्नूजी के लिए भी उतनी ही आवश्यक थीं जितनी की राजेन्द्रजी के लिए। किंतु विशिष्ट जीवन शैली का चयन करना परिवार और विवाह को हारने देना होता, जो कि मन्नूजी के लिए संभव नहीं था। वर्चस्ववादी सत्ता का दबाव जितना अधिक अरेंज्ड मैरिज निभाने की होती हैं उससे भी कहीं अधिक लव मैरिज निभाने की होती है । मन्नूजी किसी भी हाल में उसे निभा ले जाना चाहती थीं । कहीं न कहीं निभा ले जाने के पीछे गहरी संवेदना ही थी जिसके लिए पूरी दुनियाँ से लडकर उन्हें पाया था अब उनसे ही लड कर उन्हें पाना था और उनके कातर शब्दों और आँसुओं को देखकर आज नहीं तो कल सब ठीक हो जाने की उम्मीद भी थी ।
प्रेम में एकनिष्ठता भी एक दायित्व है और दायित्व को निभाने से ही प्रेम टिका रह सकता है । मन्नूजी का एकनिष्ठ प्रेम करते जाना तथा एकनिष्ठ प्रेम की चाह उनके वैवाहिक सफर को और भी अधिक दुखदायी बना दिया । ऐसे में पति के होते हुए भी न होने का बोध उनके वैवाहिक बंधन को निभा ले जाने के संकल्प को कमजोर बनाता गया। दूसरी तरफ राजेन्द्रजी भी जीवन के उस छोर पर थे जब जिन्दगी के दोराहे पर खडे होकर किसी विशेष रास्ते की तलाश कर रहे थे । किंतु यह भी सत्य है कि दोराहे पर खडे होकर पलायन मन में प्रेम का संचारी भाव तो जाग सकता है किंतु स्थायी भाव कभी नहीं जाग सकता। ऐसे में सामने वाला ही स्थायी भाव लिए ठगा-सा रह जायेगा। मन्नूजी के साथ भी यही हुआ। गुमसुम राजेन्द्रजी को निरंतर अंतरंग परिचय से बिल्कुल अपरिचय की दुनियाँ में लौटते हुए देखना असह्य हो गया । राजेन्द्रजी तो वेश्या लिलियन रॉथ की आत्मकथा आई विल क्राई टुमारो से प्रभावित होकर खुद का रोना टाल सकते थे, पर जो रूदन ही जी रहा हो ऐसा सहजीवन क्या करे? इन सबमें उनकी विद्रोही संवेदनतंत्रियाँ हार गईं और न्यूरोलॉजिया की शिकार हो गईं। 35 वर्ष जीवन के प्रकृतिप्रदत्त सुनहरे स्वप्न से लेकर पतझड के पडाव तक की एक लम्बी यात्रा होती है। फिर भी कईं बार उन्हें आरोपों में घेरने की कोशिश की जाती है कि मन्नूजी ने बहुत जल्दी अलग होने का फैसला ले लिया!
हमारे समाज का अभी भी इतना मानसिक विकास नहीं हुआ है कि वह एक सधवा पत्नी का दुख समझ पाये। वैसे तो स्त्रियों का दुःख ही वर्चस्ववादी सत्ता के लिए महत्त्व नहीं रखता, किंतु सधवा स्त्री की पीडा प्रेयसी, विधवा, छोडी हुई औरत अथवा परदेश गए पति की वियोगिनी स्त्री से कमतर आंका जाता है । सामान्यतः यह मान लिया जाता है कि जिसका पति साथ है उसे भला कौन-सा दुःख !
व्यक्तिगत जीवन का असर मात्र सेहत पर ही नहीं बल्कि व्यवसाय और लेखन पर भी पडता है। मन्नूजी जिस आत्मकथांश को साहित्यिक बनाना चाहती थीं, वह राजमार्ग व्यक्तिगत कारणों से ही अवरूद्ध हो गया, भले ही उसका नाम बीमारी क्यों न हो? किंतु यह भी सत्य है कि मन्नूजी को अपनी रचनाओं के मूल्यांकन के लिए साथ तो मिला, किंतु उन्हें कंधे की जरूरत नहीं पडी। दो लेखकों का एक साथ होने पर भी दोनों की रचनाओं का, एक-दूसरे पर बिना आरोपित, अवलम्बित किए अलग-अलग मूल्यांकन किया जा सकता है। दोनों की भाषा-शैली और कथ्य की बुनावट में अंतर स्पष्ट नजर आता है।
इस ग्रंथ को लिखने से जीवन में कोई बदलाव आया या नहीं यह नहीं कहा जा सकता, किंतु यह संभव है कि मन्नूजी के मन का कुछ बोझ हल्का हो गया हो । प्रो. गरिमा श्रीवास्तव ने सच ही लिखा है, आत्मकथा लेखक का न सिर्फ विरेचन करती है, बल्कि जिस समाज में वह रह रहा है, उसकी उत्थान-पतन के लिए उत्तरदायी परिस्थितियों का विश्लेषण भी उसमें स्थान पाता है. आत्मकथा रचनाकार के साथ-साथ उसके परिवेश को परिवर्तित-निर्मित करने का प्रयास होती है । इसके साथ शर्त इतनी-सी है कि उसके लेखन में ईमानदारी बरती जाए. आत्मकथा की पुकार सच की पुकार होती है, लेकिन सच बोलकर हमारी सामाजिक संरचना में रचनाकार की छवि निष्कलंक रह पाएगी इसमें संदेह है।
प्रेम गली अति सांकरी साथ चले तो कैसे चले और छोडकर भी चला न जाए । छूट जाने पर सब छूट जाए यहाँ तक स्मृति भी। पर उसकी स्मृति कैसे छूटे जिसने मन को जोडा भी और छलनी भी कर दिया। साहित्यिक यात्रा या रचना-प्रक्रिया जानने के लिए यह आत्मकथा/ आत्मकथांश / जीवन का टुकडा पढना जरूरी है । इसलिए भी जरूरी है कि हम समझ सकें कि विशुद्ध प्रेम की पीडा किस प्रकार स्मृति से विस्मृति तक पहुँचाती है । और इससे भी अधिक इसलिए जरूरी है कि लेखन में कोई दूसरी मन्नू भण्डारी तो नहीं हो सकतीं लेकिन व्यक्तिगत जीवन में त्याग, बलिदान, प्रेम और पीडा के नाम पर कोई दूसरी मन्नू भण्डारी न बन जाए...

सम्पर्क -फेकल्टी असोसिएट
भारतीय भाषा एवं साहित्य विभाग
गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय,
यमुना एक्सप्रेस-वे, गौतम बुद्ध नगर,
ग्रेटर नोएडा - 201 312
ई-मेल- renuyadav0584@gmail.com