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बहरहाल यही सच है

उमा
ठीक ठीक तो याद नहीं कि दूरदर्शन पर कब मैंने रजनीगंधा के फूलों को खिलते हुए देखा था,लेकिन फिल्म को देखकर अवचेतन में बस गया था कि जीवन को महकाने के लिए अलग-अलग किस्म के फूलों पर विचार किया जा सकता है और फिर किसी एक फूल को चुना जा सकता है। यही सच है कि कुछ क्रांतियाँ बिना शोर किए चुफ-चुफ दाखिल होती हैं। ये बहुत बाद में जाना था मैंने कि बासु चटर्जी के निर्देशन में बनी यह फिल्म मन्नू भण्डारी की कहानी यही सच है पर आधारित है। मन्नूजी आज हमारे बीच मौजूद नहीं है,पर क्या सच में!
मन्नूजी अंतरंग आत्मीयता की कहानियाँ रचने वाली सबसे सशक्त रचनाकार रही हैं,जिनमें व्यक्ति-मन के आंतरिक संघर्ष का उद्घाटन और पहचान हुई है। इस संदर्भ में राजेन्द्र यादव ने एक बडी रिमार्केबल बात कही है,उनके शब्द हैं कि,व्यर्थ के भावोच्छवास में नारी के आँचल का दूध और आँखों का पानी दिखाकर मन्नू भण्डारी ने पाठकों की दया नहीं वसूली... वह एकदम यथार्थ के धरातल पर नारी का नारी की दृष्टि से अंकन करती है। मन्नूजी की नारी देवी और दानवी के दो छोरों के बीच टकराती पहेली नहीं, हाड-माँस की मानवी भी है।
बहरहाल यही सच है कहानी में मन्नूजी अपनी नायिका को उसकी पूरी मासूमियत के साथ प्रेम के दो पात्रों के बीच चुनाव की छूट देती है, यह एक ऐसी क्रांति थी जो फूलों के सहारे आई और स्त्रियों को इस सोच से मुक्त कर गई कि अगर वे भली महिलाएँ हैं तो दो पुरुषों के बारे में एक साथ नहीं सोच सकतीं. कहानी गीत का चुम्बन में भी वे स्त्री पात्र की उस बेचैनी को सामने लाती है जो भली महिला के तमगे से हैरान है,खुद हम भी कभी न कभी इस तमगे से हैरान परेशान हुए हैं, सामान्य इंसान बन पाने की हमारी जिद में भी मन्नूजी की सोच धडकती है,तो ये कैसे कह दें कि वो अब नहीं रहीं।
मन्नूजी से कभी प्रत्यक्ष न मिल पाने का अफसोस रहेगा मुझे, पर एक सच यह भी है कि ऐसा मुझे कभी लगा ही नहीं कि उनसे मुलाकात नहीं हुई। आपका बंटी वो कडी है,जो मुझे उनसे जोडती है। उनके इस उपन्यास को पढकर मैं बहुत रोई थी,बार बार,कई बार. इससे पहले मैंने कोई ऐसी कहानी या उपन्यास पढा ही नही था,जो एक बच्चे की नजर से लिखा गया हो,परिवार टूटता है तो स्त्री का जीवन कैसे बिखरता है,यही जाना था,एक बच्चे का बिखरना कभी उस रूप में सामने आया ही नहीं था. इस उपन्यास को पढने के बाद तलाक की दहलीज तक पहुँचे कई जोडों ने अपने फैसलों पर फिर से विचार किया होगा. पलटना या लौटना कभी आसान नहीं होता,पर बंटी की तकलीफ को भूलना तो नामुमकिन ही बना दिया मन्नूजी ने। उस मासूम बच्चे की तकलीफ काँटें की तरह मुझे भी चुभती रही,इसी चुभन ने मुझसे मेरा पहला उपन्यास जन्नत जाविदां लिखने को मजबूर किया। कुछ भी हो, कितनी भी वर्जनाएँ टूटें,पर बंटी को आँच नहीं आनी चाहिए,जब ये खयाल किसी के जेहन में आता है,तो मन्नूजी भी उस खयाल में सहज शामिल होती हैं।
मन्नूजी की लिखीं वे समस्त लैंडमार्क कहानियाँ मैं हार गयी, अकेली, खोटे सिक्के ,स्त्री सुबोधिनी, तीसरा हिस्सा, यही सच है, सजा, रानी माँ का चबूतरा, एक बार और, चश्में, दो कलाकार आदि अनेक कहानियाँ अब आँखों के आगे से किसी फिल्म की रील की तरह गुजर रही हैं। वे जब-तब बहुत याद आएँगी, विशेषकर अपने ही संदर्भ में कहूँ, तो आपका बंटी के लिए। सुना है,जब वे इस उपन्यास को लिख रही थीं,तब उनकी बेटी भी बहुत छोटी थी, करीब-करीब बंटी के उम्र की ही। लेखन के लिए उन्हें घर से दूर रहना पडा था। तकरीबन एक महीना कॉलेज के हॉस्टल में बिताया उन्होंने,बीच-बीच में घर जातीं और कभी-कभी बेटी किसी के साथ उनसे मिलने चली आती थी। बताया था मन्नूजी ने कि एक बार रोई थी बेटी। चोट लगी थी उसे,जब पूछा कि कैसे लगीतो गले लगकर रो पडी और बोली-आपको क्या फर्क पडता है,आप तो अपना लिखो।
सुनकर मन्नूजी अंदर तक हिल गईं थीं,उन्हें लगा कि उनका बंटी ही उदास है, दुखी है, तो फिर वह किस बंटी के लिए लिख रही हैं, उन्होंने घर लौट जाने का मन बना लिया, पर उनके मन को बदला उनके पति राजेंद्र यादव ने। टेलीफोन पर उन्होंने बेटी की हँसी सुना दी थी और बोले थे, इस उपन्यास को पूरा किए बिना लौट आई, तो फिर कभी इसे लिख नहीं पाओगी।
ऐसा भी कहते हैं कि मन्नूजी ने यह उपन्यास नाटककार-उपन्यासकार मोहन राकेश के जीवन संदर्भों से प्रभावित होकर लिखा था। मोहन राकेश ने कभी इस पर ऐतराज नहीं उठाया था,शायद हो सकता है कि इसे पढकर वे खुद भी भावुक हो गए हों।
मन्नूजी ने भी अपने निजी जीवन में अलगाव झेला, इसका असर उनकी रचनात्मकता पर भी पडा। मन्नूजी ने वैवाहिक जीवन में पति से ज्यादा जिम्मेदारियाँ उठाईं, पति के साथ एक उपन्यास लिखकर नया प्रयोग भी किया। उपन्यास एक इंच मुस्कान में उनका लिखा ज्यादा बेहतर था, इसे खुद राजेन्द्र यादव ने स्वीकारा, पर वे अलगाव से भीतर तक प्रभावित हुईं थी, हालाँकि तब भी उन्होंने अपना सहज स्वभाव नहीं छोडा था, वे अपनी कहानी की तरह ही थीं, ऊपर से सहज और भीतर से जटिल!
जटिल उपन्यास महाभोज को भी उन्होंने सहज रूप में ही लिखा। दलितों के शोषण को उजागर करते इस राजनीतिकउपन्यास को पढते हुए मन्नूजी का एक अलग ही व्यक्तिव सामने आता है। महाभोज को उनकी राजनैतिक चेतना की उपज कहा जा सकता है।
उनका यह विचार कि,हमारा परिवेश ही हमारे व्यक्तित्व और नियति को निर्धारित करता है। इस परिवेश के प्रति किसी भी दायित्वशील व्यक्ति को जवाबदेही महसूस करनी चाहिए। जब घर में आग लगी हो, तो सिर्फ अपने अंतर्जगत में बने रहना या उसी का प्रकाशन करना क्या खुद ही प्रसांगिक, हास्यास्पद और किसी हद तक अश्लील नहीं लगने लगता। उनके राजनीतिक दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है।
आजादी का आंदोलन जब अपने पूरे उज्र पर था, तब मन्नूजी कॉलेज में थीं, उन पर उनकी एक अध्यापिक का असर था, जो छात्राओं को ललकारती और कहती थी कि यह कक्षा में बैठकर पढने का वक्त नहीं है, यह घर की बैठक में राजनीतिक बहस का भी वक्त नहीं है, यह जुलूस निकालने का वक्त है,यह प्रभात फेरी निकालने का, भाषण देने का वक्त है, यह एकजुट होकर आजादी की लडाई में हिस्सेदारी करने का वक्त है। मन्नूजी बेहद प्रभावित हुईं और उन्होंने रैलियों में भाग लेना, भाषण देना शुरूकर दिया। कोई उनके पिता से शिकायत करता, पिता खफा होते, पर तभी कुछ ऐसा होता कि कोई आकर कह देता है- गर्व है हमें मन्नू पर।
पिता खुश हो जाते,वो पिता ही तो थे, जो अपनी सबसे छोटी बेटी पर तब ध्यान देने लगे थे, जब बाकी बच्चे अपने जीवन में व्यस्त शादी हो गए थे। घर पर तब राजनीतिक बहसें चला करती थीं। मन्नू जब चाय-पानी लेकर पहुँचती थीं,तो पिता बिठा लेते थे और बोलते थे, यहीं बैठो और सुनो। यह जानना जरूरी है कि देश में क्या चल रहा है।
आजादी मिलने के बाद मन्नूजी का वास्ता राजनीति से नहीं रहा, लेकिन पिता की सीख उनके साथ रही। दिल्ली में रहते हुए उन्होंने देखा-समझा कि चुनावों के दौरान क्या कुछ नहीं होता! एक सच्ची घटना ने उन्हें विचलित कर दिया था। कुछ समय बाद जब उस घटना का असर दिल से नहीं गया,तो महाभोज उपन्यास में तब्दील हो गया। इस उपन्यास ने बतौर लेखक उनकी रेंज को बहुत अधिक बढा दिया। उपन्यास का प्रवाह इतना कमाल का है कि आप एक बार पढना शुरू करेंगे,तो इसे खत्म करके ही उठना चाहेंगे। इसे पढते हुए पाठक को लग सकता है कि लेखक ऐसे किसी पॉलिटिकल माहौल के बीच रहा है और अपने अनुभवों को जस का तस लिख रहा है,लेकिन ऐसा नहीं था, बिलकुल भी नहीं था,राजनीति से मन्नूजी का कोई वास्ता नहीं था,वास्ता था तो बस इतना कि वे सजग थीं,वे नोट्स लिया करती थी,वे कहती थीं, जो भी घटना मुझे विचलित करती थी,मैं उसे नोट कर लेती थी,मेरे पास मेरा भण्डारगृह था, फिर महीनों बाद मैं उनपर विचार करती थी और लिखती थी,पर सच तो यह है कि वे जितना लिख सकती थीं,उन्होंने उतना नहीं लिखा था। माँ होना और फिर शिक्षक होना,उनपर हावी रहा। बेटी की सारी जिम्मेदारियां उन्हीं के हिस्से आई और बतौर शिक्षक भी उन्होंने अपने दायित्व को सर्वोपरि रखा। उन्हें बनाने में दो लोगों का अहम योगदान रहा था,एक उनके पिता का और दूसरी उनकी शिक्षक का। एक उम्र के बाद इन दो लोगों को उन्होंने जीया,वे अभिभावक बनीं, वे टीचर बनीं और वे जानती थीं कि नई पीढी को बनाने में इन दो लोगों का कितना अहम योगदान होता है। एक पूरी पीढी तैयार कि उन्होंने लेखकों की,सजग नागरिकों की। दूरदर्शन के रजनी धारावाहिक की पटकथा जब उन्होंने लिखी तो दो क्रांतियाँ एक साथ हुई,एक तो हिंदी लेखकों का रुझान पटकथा लेखन की ओर हुआ और दूसरी यह कि धारावाहिकों में दमदार महिला चरित्रों के लिए स्पेस बना। मन्नूजी ने एक पुराने साक्षात्कार में बताया था कि‘रजनी सीरियल की वजह से ऑटो वाले उनसे खफा हुए थे,सिलेंडर भरने वाले उनसे डरने लगे थे। मन्नूजी लोकप्रिय लेखक तो थीं ही, रजनी की पटकथा लिखने से उनकी लोकप्रियता और भी बढ गई। समकालीन आलोचकों ने उनके साथ भले ही पूरा न्याय नहीं किया,लेकिन उसकी भरपाई पाठकों ने की,जो लेखक पाठकों के दिलों में बसता हो,उस लेखक को कोई कैसे विदा कह दे!
- सम्पर्क - 3 विष्णु विहार, अर्जुन नगर के पास, दुर्गापुरा, जयपुर 302018