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हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोडा करते.....

रेणु व्यास
प्रेम कमबख्त है ही ऐसी चीज। चाहे कितनी ही पुरानी और घिसी-पिटी क्यों न हो जाए... एक बार तो दिल फडक ही उठता है...... चेहरे चमचमाने ही लगते हैं। खैर, यह कोई अनहोनी बात नहीं। डॉक्टरों का नर्सों से, प्रोफेसरों का अपनी छात्राओं से, अफसरों का अपनी स्टेनो-सेक्रेटरी से प्रेम हो जाने का हमारे यहाँ आम रिवाज है। (पृ.81) मन्नू भंडारी की कहानी स्त्री-सुबोधिनी की इस सूची को आप और लंबा कर सकते हैं, अपने आस-पास के प्रेक्षण से। पर ध्यान दीजिएगा कि इस युग्म-सूची में पहले स्थान पर आने वाले एक ही लिंग के होते हैं और अनिवार्यतः पुरुष। दूसरे स्थान पर स्त्रियाँ हैं, और अनिवार्यतः अधीनस्थ। सदियों से वे प्रेम की पात्र रही हैं। तू हुस्न है, मैं इश्क हूँ टाइप लाइनें सुनकर ही वे धन्य होती रही हैं। यह भी क्या बात हुई/ कि आदमी खुद को इश्क कहे/ यानी कि रूह/ और औरत को हुस्न कहे? जब भी उन्होंने प्रेम किया है, मीराँ से लेकर महादेवी तक, उनके प्रेम का पात्र दुनिया से परे, अलौकिक क्यों है? सूरदास की गोपियों से लेकर गदल तक, श्रमशील वर्ग की स्त्रियाँ तो प्रेम के अपने मानवीय अधिकार का प्रयोग पहले भी करती रही हैं। पर मध्यवर्गीय स्त्रियों का क्या? शरतचन्द्र के श्रीकान्त की अभया को अपवाद मान लें, तो आधुनिक साहित्य में भी प्रेम करने की हिमाकत करने वाली स्त्रियों की जिन्दगियाँ त्रासदियाँ ही हैं, चाहे वह रवीन्द्रनाथ के नष्टनीड की चारुलता, चोखेर बाली की बिनोदिनी हो या जैनेन्द्र कुमार के त्यागपत्र की मृणाल। ज़्यादा से ज़्यादा उसके हिस्से तेरी कुडमाई हो गई? की धुँधली गूँज आ सकती है।
प्यारी बहनो, न तो मैं कोई विचारक हूँ, न प्रचारक, न लेखक, न शिक्षक। मैं तो एक बडी मामूली-सी नौकरीपेशा घरेलू औरत हूँ ..... (पृ.81) बूढी माँ और तीन छोटे भाई-बहनों वाले घर की मशीन में हर महीने मनीऑर्डर का तेल डालने वाली स्त्री-सुबोधिनी कहानी की नायिका, अपने भीतर उठने वाली हजार-हजार इच्छाओं की माँग पर दुनियावी किस्म का प्रेम, वह भी इस क्षेत्र के एक शातिर खिलाडी से, अगर कर बैठ,े तो उसे जोर का झटका लगना ही था। उसका यह प्रेम कैरियर-ओरियंडेड कतई नहीं था। आठ साल तक प्रेम की अखण्ड जोत जलाने के बाद एक दिन उसने जो देखा, प्राण, प्रेरणा, जैसी लफ्फाजी हवा हो गई, और सच्चाई सामने आ गई, इस सारे खेल की -
तुरूप का इक्का यानी घर... उसके पास
तुरूप का बादशाह यानी बच्चा... उसके पास
तुरूप की बेगम यानी बीवी और
प्रेम करने के लिए प्रेमिका... उसके पास
तुरूप का गुलाम यानी नौकर-चाकर
गाडी-बंगला... उसके पास
लब्बो-लुबाब यह कि तुरूप के सारे पत्ते उसके पास और मुझे मिले उसके दिए हुए छक्के-पंजे, यानी टोटके की तरह पुडिया में बँधे, दार्शनिक लफ्फाजी में लिपटे हवाई प्यार के चंद जुमले। इन टटपूँजिया पत्तों के सहारे मैं ज्यादा-से ज्यादा इतने ही कर सकती थी कि जिन्दगी-भर उसकी पूँछ पकडे रहती और उसे ही अपनी उपलब्धि समझ-समझकर सन्तोष करती। (पृ.91) इस तरह कहीं जिन्दगी कहीं चल सकती थी भला? हजार-हजार मासूम किशोरी बहनों को चेताती स्त्री-सुबोधिनी की इस उपदेशिका ने उस पूँछ को छोड दिया। और अपने प्रेम में शादी का ताला लगा लिया।
सवाल यह उठता है कि ये पढी-लिखी, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर आधुनिक मध्यवर्गीय स्त्रियाँ क्यों इतनी कमजोर हो जाती हैं? प्रेम का रूमान उनके विवेक का अपहरण क्यों कर लेता है? एक बार और की नायिका बिन्नी भी एक आत्मनिर्भर स्त्री है, आर्थिक रूप से। पर मात्र इस तथ्य से क्या भावनात्मक सम्बल पाने की उसकी आकांक्षा अनावश्यक हो जाती है? बिन्नी, शादी मुझे इतना संकीर्ण नहीं बना सकेगी कि मैं कि मैं अपने और सारे सम्बन्धों को झुठला ही दूँ। शादी अपनी जगह रहेगी और मेरा-तुम्हारा सम्बन्ध अपनी जगह! (पृ.96) अन्त में, फिर वही, तुरूप के सारे पत्ते - इक्का, बादशाह, बेगम, गुलाम-उसके पास! और बिन्नी के पास, इस खेल में, फिर टटपूँजिया पत्ते। फिर बौद्धिक आवरण में वही लम्पट लफ्फाजी - हम उस अभागी पीढी के हैं बिन्नी, जो नए विचारों और नई भावनाओं को जन्म देने में हमेशा ही खाद बन जाती है। (पृ.109)
खाद बिन्नी को ही बनना था, वह बनी। पर क्या कुछ नए विचार और भावनाओं ने जन्म लिया? इस पूरी पीढी के खाद बनने के बाद? हाँ, स्त्रियों की एक ऐसी पीढी ने भी जन्म लिया, जिन्होंने प्रेम किया, प्रेम पाया, केवल खाद नहीं बनीं। यही सच है ऐसी ही पीढी की स्त्री के विकास की कथा है। रास्ता तो बिन्नी के सामने भी था, जो कुँज के मोह से निकल कर नन्दन की ओर जाता था। मगर सिर के ऊपर साफ नीले तने आकाश में सप्तर्षि मंडल की प्रश्नवाचक दिप्-दिप् के साथ कहानी खत्म हो जाती है। यद्यपि यही सच है कहानी एक बार और से पहले लिखी गई है, पर यह उससे आगे की पीढी की स्त्री की कहानी है।
ये मध्यवर्ग की पढी-लिखी, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर स्त्रियाँ जानते-बूझते अपने आपको ऐसे भावनात्मक भँवर में डालती ही क्यों हैं, जिसे प्रेम कहते हैं? क्या वे सचमुच पागल हैं या मूर्खा? जैसे संजय प्यार में दीपा को इन दो विशेषणों से नवाजता है, अक्सर, उसकी रूमानियत को दुलराते हुए। इस प्रश्न पर विचार करने से पहले यह भी जान लेना चाहिए कि ये मामूली मध्यवर्गीय स्त्रियाँ, जो अब पढी-लिखी और नौकरीपेशा भी हैं, आखिर कितनी पीढियों से प्रेम कर रही हैं, जो इनसे प्रेम की रूमानियत से पार पाकर परिपक्वता की आशा की जा रही है? प्रेम को खेल समझने वाले कुशल शिकारियों की बात हम नहीं कर रहे, पर कुछ पीढियों पहले के प्रेमी नायक भी तो किसी तोते से किसी सुन्दरी का रूप-वर्णन सुनकर ही रास्ते की सारी कठिनाइयों से अनजान, सात समन्दर लाँघने, जोगी बनकर निकल पडते थे; तेरी कुडमाई हो गई? के प्रत्युत्तर में बरसों पहले के धत् के प्रतिदान में अपनी जान तक कुर्बान कर देते थे। रूमानियत की मारी ये स्त्रियाँ भी एक दिन जान जाएँगीं, परिपक्व प्रेम, यथार्थ प्रेम। यही सच है स्त्री की इसी यात्रा का एक रूपक है।
यात्रा की शुरुआत रूमानी है। पर्दे के जरा-से हिलने से धडकन बढ जाती है और बार-बार नजर घडी के सरकते हुए काँटों पर दौड जाती है। हर समय यही लगता है, वह आया!... वह आया! (पृ.09) और संजय आता है, हमेशा ही तय समय से घंटे-दो घंटे देरी से, हमेशा ही रजनीगन्धा के फूल लिए, मुस्कुराते हुए। वह फूलदान के पुराने फूल फेंक देता है, और नए फूल लगाता है। फूल सजाने में वह कितना कुशल है। (पृ.10) दीपा का कमरा और उसका जीवन हमेशा रजनीगन्धा से महकता रहता है, और संजय की उपस्थिति से भी। अब तो मुझे भी ऐसी आदत हो गई है कि एक दिन भी कमरे में फूल न रहें तो न पढने में मन लगता है, न सोने में। ये फूल जैसे संजय की उपस्थिति का आभास देते रहते हैं। (पृ.10) जाने क्यों, अक्सर मुझे भ्रम हो जाता है कि ये फूल नहीं हैं, मानो संजय की अनेकानेक आँखें हैं, जो मुझे देख रही हैं, सहला रही हैं, दुलरा रही हैं। (पृ.13) संजय को यह बात बताने पर उसने दुलार के साथ कहा था मैं निरी पागल हूँ, निरी मूर्खा हूँ! (पृ.13) दीपा के जीवन का केन्द्र संजय है। उसकी कोमल भावनाओं और भविष्य की योजनाओं का भी। यह बात दूसरी है कि चाँदनी रात में, किसी निर्जन स्थान में, किसी पेड-तले बैठकर भी मैं अपनी थीसिस की बात करती हूँ या वह अपने ऑफिस की, मित्रों की बातें करता है। (पृ.14) मन्नू भण्डारी इस कहानी में प्यार के कई मिथक तोडती हैं, जिसमें पहले प्यार का मिथक भी है। ....फिर अट्ठारह वर्ष की आयु में किया हुआ प्यार भी कोई प्यार होता है भला! निरा बचपन होता है, महज पागलपन! उसमें आवेश रहता है पर स्थायित्व नहीं, गति रहती है पर गहराई नहीं। जिस वेग से वह आरम्भ होता है, जरा-सा झटका लगने पर उसी वेग से टूट भी जाता है। ...और उसके बाद आहों, आँसुओं और सिसकियों का एक दौरा, सारी दुनिया की निस्सारता और आत्महत्या के करने के अनेकानेक संकल्प और फिर एक तीखी घृणा। जैसे ही जीवन को दूसरा आधार मिल जाता है, ...... इस बात का अहसास होता है कि ये सारे आँसू, ये सारी आहें उस प्रेमी के लिए नहीं थीं, वरन् जीवन की उस रिक्तता और शून्यता के लिए थीं, जिसने जीवन को नीरस बनाकर बोझिल कर दिया था। (पृ.13) दीपा प्रेम के रूमानी पडाव को पीछे छोड आई है, जिसका नाम निशीथ था। आज हमारी भावुकता यथार्थ में बदल गई है, सपनों की जगह हम वास्तविकता में जीते हैं! हमारे प्रेम को परिपक्वता मिल गई है, जिसका आधार पाकर वह और गहरा हो गया है, स्थायी हो गया है। (पृ.14) पर प्रेम है ही ऐसी चीज कि जब-तब ऐसा कुछ हो जाता है कि इंसान को पैरों-तले की ठोस जमीन भुरभुरी महसूस होने लगती है। दीपा को कलकत्ता नौकरी के इंटरव्यू के लिए जाना था। कलकत्ता की यह नौकरी उसके और संजय के भविष्य की योजनाओं के लिए आवश्यक थी। इस कलकत्ता प्रवास से दीपा के मन में निशीथ की उपस्थिति फिर जी उठी, जो पहले भी जब-तब संजय के मन को सशंकित करती रहती थी। विश्वास करो संजय, तुम्हारा-मेरा प्यार ही सच है। निशीथ का प्यार तो मात्र छल था, भ्रम था, झूठ था। (पृ.14) जिस विश्वास से दीपा कहती थी, वह विश्वास डिग गया है, उसका। नौकरी पाने के जुगाड में सारा दिन साथ घूमने के बावजूद निशीथ ने काम की बात के अतिरिक्त एक भी बात नहीं की। पर एक वाक्य - इस साडी में तुम बहुत सुन्दर लग रही हो। एक प्रश्न - नौकरी के बाद क्या इरादा है? और एक क्षणिक स्पर्श - प्लेटफॉर्म से सरकती ट्रेन की खिडकी पर टिके हाथ से हाथ का। प्रथम प्रेम ही सच्चा प्रेम होता है; बाद में किया हुआ प्रेम तो अपने को भूलने का, भरमाने का प्रयास-मात्र होता है...। (पृ.28) प्रेम की परिपक्वता का सारा दर्शन हवा हो गया। पूरी कहानी दीपा के भीतर की उथल-पुथल की है। कहाँ जाऊँ? लगता है, जैसे मेरी राहें भटक गई हैं, मंजिल खो गई है। मैं स्वयं नहीं जानती, आखिर मुझे जाना कहाँ है। (पृ.29) स्पष्ट शब्दों में निशीथ को सबकुछ लिख देने के बाद भी, कई दिनों बाद निशीथ का जवाब आया उसमें था - अच्छी तरह पहुँच जाने पर प्रसन्नता, नियुक्ति पर बधाई, मैं खुश हूँ, मेहनत सफल हो गई। शेष फिर। दीपा जिस जवाब का इंतजार कर रही थी, उसके लिए शेष फिर। केवल शेष फिर! नीचे - शुभेच्छु निशीथ। मात्र शुभेच्छु। दीपा जो कुछ सोच गई, क्या वह उसका भ्रम था? निशीथ के मन में अब भी दीपा के लिए प्यार था या अब वह उसका शुभेच्छु मात्र ही था। यह तो निशीथ ही बता सकता है। पर उसका संक्षिप्त पत्र कह रहा था कि अगर पहले प्यार जैसा कुछ है भी, तो भी जिन्दगी आगे की ओर बढने का ही नाम है। उसे कोशिश करके भी पीछे लौटाया नहीं जा सकता। निशीथ के पास प्रेम के बारे में कई सदियों का, कई पीढियों का अनुभव था। घडी की टन्-टन् हुई। समय यही कह रहा था। घडी संजय की लाई हुई थी। फूलदान का सूनापन दीपा के मन के सूनेपन को गहरा कर रहा था। तभी उसका कमरा फिर सुगन्धित हो उठा, रजनीगन्धा के फूलों और संजय की उपस्थिति से। दीपा का तन-मन भी। तभी मैं अपने भाल पर संजय के अधरों का स्पर्श महसूस करती, और मुझे लगता है, यह स्पर्श, यह सुख, यह क्षण ही सत्य है, वह सब झूठ था, मिथ्या था, भ्रम था....। (पृ.31)
यही सच है मात्र क्षणबोध की कहानी नहीं है। यह पहले प्यार और बाद में हुए प्रेम के द्वंद्व की कहानी भी नहीं है। यह उस मनुष्य के अंतर्द्वंद्व की कहानी है जो एक पढी-लिखी, आत्मनिर्भर, शहर में रहने वाली आधुनिक स्त्री है। आधुनिक मनुष्य के भीतर का जो द्वंद्व आषाढ का एक दिन के कालिदास और लहरों के राजहंस के नन्द के चरित्रों में अभिव्यक्त हुआ था, वह पुरुष का अंतर्द्वंद्व बनकर रह गया था। और इन नाटकों की स्त्रियाँ द्वंद्व से ऊपर थीं। मल्लिका तो कुछ-कुछ छायावादी श्रद्धा जैसी। इन पुरुषों का द्वंद्व प्रेम और महत्त्वाकांक्षा, प्रेय और श्रेय के बीच था पर यही सच है की स्त्री का द्वंद्व प्रेम और प्रेम के बीच था। दीपा के सामने प्रेम के दो विकल्प हैं, एक किशोर रूमानी प्रेम, और दूसरा यथार्थ परिपक्व प्रेम। दोनों के बीच हिचकोले खाने के बावजूद वह यथार्थ को चुनती है। वैयक्तिक प्रेम और राष्ट्रप्रेम के बीच मधूलिका का द्वंद्व यथार्थ का चुनाव नहीं करता, एक पूर्वनिर्मित आदर्श का चुनाव करता है। दीपा किसी आदर्श को नहीं, उस पुरुष को चुनती है जो उसके व्यक्तित्व को स्वीकार करते हुए उसका खयाल रखता है। उसके एक बार कह देने से कि मुझे रजनीगंधा के फूल बडे पसन्द है, उसने इन फूलों को लाने का नियम ही बना लिया है। वह दीपा पर रौब नहीं जमाता, उसके प्रति दुनियाभर का लाड-दुलार दिखाता है। दीपा के प्रति संजय का प्रेम न तो लम्पटता है और न ही प्लेटोनिक लव। वह दीपा को स्थिरता और आश्वस्ति देता है, अपनी उपस्थिति मात्र से। संजय फूल सजाने में बडा कुशल है। दीपा उसके लिए पुराने बासी फूलों का मोह छोड सकती है। एक आधुनिक स्त्री यदि ऐसे पुरुष को चुनती है, अतीत की एक छाया के मुकाबले, तो क्या आश्चर्य है? दीपा के रूप में यह आधुनिक स्त्री हिन्दी कहानी में मन्नू भंडारी की बडी देन है। यह स्त्री रोती भी है। रोने के लिए किसी कंधे की चाह भी रखती है। दीपा पीछे मुडकर देखती जरूर है, पर चुनती है, आगे बढना। यही आज की स्त्री का प्रस्थान बिंदु है। यही सच है केवल स्त्री-मन के द्वंद्व की कहानी नहीं है, यह आधुनिक स्त्री-मनुष्य के अंतर्द्वंद्व की कथा है। वरण की स्वतंत्रता यदि उसे प्राप्त हुई है, तो उसके साथ जुडी यातना से वह कैसे बच सकती है! मन्नू भंडारी इन्हीं स्त्री-मनुष्यों की कथा कहती हैं। आपका बंटी की शकुन का द्वंद्व स्वाभाविक निजी इच्छाओं और ममता के बीच है। त्रासदी केवल बंटी के जीवन की ही नहीं है, शकुन के जीवन की भी है। जीने का अधिकार उसे भी है, एक माँ को भी। त्रिशंकु दो पीढियों के संघर्ष की सरल कहानी नहीं है। यह किशोर लडकी की आजादी के बारे में पुरानी पीढी के विचार और यथार्थ, कथनी-करनी का द्वंद्व भी इसका कथ्य नहीं है। यह, उस किशोरी की कहानी है जिसकी स्वतंत्रता के बारे में निर्णय कोई और ले रहा है, अपनी पिछली पीढी की तरह। यह भी कोई आजादी हुई भला! बेटी की स्वंतत्रता को अपने दायरे में रखने वाली यह माँ भी कोई टाइप चरित्र नहीं है। यह एक आधुनिक स्त्री, जो एक किशोर लडकी की माँ भी है, की स्वातंत्र्य-चेतना और युवा होती लडकी के बारे में अनजाने ही विरासत में मिले पूर्वाग्रहों से उसकी जद्दोजहद की कहानी है। यह स्त्री अपने से जूझते हुए घर-परिवार को, और अपने आपको जिस तरह लगातार बदलती है, वह एक नई पीढी की स्त्री को तैयार करती है जिस पर अतीत के अंकुश अपेक्षाकृत कम हों। ममी का अपने आपसे निरन्तर जारी संघर्ष, पीढियों के संघर्ष के फॉर्मूले से अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता।
महिलाओं के लेखन की चुनौतियाँ एक अपने कमरे के मिल जाने से खत्म नहीं होतीं, शुरू होती हैं। साहित्य का भी एक चूडी बाजार है। इसमें लेखिका से एक विशेष तरह के लेखन की ही अपेक्षा की जाती है। उनके लिए भौतिक कठिनाइयों से भी बडी मानसिक दीवारें हैं। मन्नू भण्डारी के रचनाकर्म में विविधता है। कथ्य और भाषा दोनों में। महाभोज उपन्यास और अ-लगाव, तीसरा हिस्सा जैसी कहानियाँ सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि उन्हें केवल स्त्री-मन, प्रेम और पारिवारिक सम्बन्धों की कथाकार कहकर सीमित नहीं किया जा सकता। मन्नू भण्डारी की रचनाओं में स्त्री है, वाद नहीं। उनके यहाँ स्त्री न तो त्याग-करुणा-ममता बरसाती आदर्श भारतीय नारी का प्रोटोटाइप है, न ही क्रांति की मशाल लिए मुक्ति के नारे लगाती स्त्री का। उनके पास कोई फॉर्मूला नहीं है, यही एक कथाकार के रूप में उनकी सफलता का रहस्य भी है। उनकी कहानियाँ इसी दुनिया में रच-पचकर जन्म लेती हैं और बौद्धिक आतंक और शैल्पिक चमत्कार नहीं, जीवन को रचती हैं, अपनी सहज संवेदना से। कभी-कभी कोई ब्रिलियंट आइडिया जरूर लिखने के लिए उकसाता है, पर जब तक वह जीवन के साथ पूरी तरह गुँथ नहीं जाता, कहानी के रूप में उसे ढालना मेरे लिए सम्भव नहीं होता। जीवन की धडकन से भरपूर स्थितियाँ, विचार या समस्याएँ ही मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती हैं। मन्नू जी के रचना संसार में हाड-माँस की जीती-जागती स्त्रियाँ हैं, अपने यथार्थ किन्तु विविध रूपों में। हर वर्ग और उम्र की स्त्रियाँ, ग्रामीण-शहरी, बाहरी जीवन में संघर्ष करतीं, हर क्षण अपनी दुविधा से लडतीं, भीतर की शक्ति बटोरतीं और अपनी कमजोरियों से ऊपर उठने की कोशिश करतीं। कभी वे जीततीं हैं, कभी नहीं भी। पर एक अदम्य जिजीविषा है, उनके भीतर। अकेली की सोमा बुआ, रानी माँ का चबूतरा की गुलाबी इसी अदम्य जिजीविषा के उदाहरण हैं। वे न तो जीना छोडती हैं और न ही प्रेम करना। वे परिवार और सम्बन्धों के भीतर रहते हुए भी उन्हें लगातार बदलती रहती हैं।
मन्नू भण्डारी के कथा-जगत् में प्रवेश का युग पूर्णकालिक आंदोलन-कर्मियों का था। आंदोलन, यानी कहानी के आंदोलन। ऐसे आंदोलनों और उनके पुरस्कर्ता आलोचकों की अपनी राजनीति होती है और बहुधा उसमें दृश्य-अदृश्य पितृसत्ता भी छिपी होती है। यहाँ हम उसके कारणों की विवेचना नहीं करेंगे। काल के अखाडे में रचनाएँ अपने दम पर खडी रहती हैं, आलोचकों के सहारे नहीं। चाहे कितने ही तूफानी हों, आंदोलन अल्पजीवी होते है। तूफान गुजर जाते हैं, बची रहती हैं कहानियाँ। और उसमें निश्चित रूप से उषा प्रियंवदा की वापसी, कृष्णा सोबती की सिक्का बदल गया, ऐ लडकी के साथ मन्नू भण्डारी की कहानियाँ भी रहेंगीं। यही सच है ऐसी ही बची रहने वाली कहानी होगी।
जब निर्णय का अधिकार ही नहीं था, स्त्री के पास, तो द्वंद्व कैसे होता? दीपा ने, एक मध्यवर्गीय आधुनिक स्त्री ने, अंतर्द्वंद्व से उबरकर जीवन की अपनी राह खोज ली है। वर्तमान में। यथार्थ में। वह बने बनाए रास्ते पर नहीं चलती, अपना रास्ता खुद बनाएगी। उस रास्ते में, फिर कहीं, पीछे मुडकर तो नहीं देखेगी वह? संजय दीपा के साथ कलकत्ता में बसना चाहता है, उसकी नौकरी भी कलकत्ता में लगी है, और निशीथ भी वहीं है! (क्या ऐसे ही किसी डर से बासु चटर्जी की फिल्म रजनीगन्धा में निशीथ को नवीन बनाकर बम्बई (अब मुम्बई) भेज दिया गया है और दीपा से बम्बई की यह नौकरी छुडवा दी है!) हमें तो लगता है, अब दीपा इतनी परिपक्व हो गई है कि अपने निर्णय की जिम्मेवारी उठाने को तैयार है, वह जीवन में आगे बढेगी! पर मानव-मन के गूढ रहस्यों को पूरी तरह जानने का दावा कौन कर सकता है?
संदर्भ -
इस लेख में मन्नू भंडारी की कहानियों के सभी सन्दर्भ प्रतिनिधि कहानियाँ, (पेपरबैक), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2020 से लिए गए हैं। पृष्ठ संख्या यथास्थान अंकित है।

सम्पर्क - ए-85-बी शिव शक्ति नगर, मॉडल टाऊन, जगतपुरा रोड, जयपुर-302017