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मन्नु भण्डारी : अनुभव की सच्चाई व संवेदन की गहराई

छबिल कुमार मेहेर
मन्नूजी की रचनाएँ मैं शुरू से पढता रहा हूँ। मुझे इसका अफसोस भी है और अपराधबोध भी कि मैंने कहानी पर अपनी लेखमाला में मन्नूजी पर कभी नहीं लिखा... ...विनोद में ही सही पर मन्नू और राजेन्द्र के सामने भी मैं कहता रहा हूँ कि राजेन्द्र का लेखन बहुत श्रमसाध्य होता है जिसे सायास लेखन कहते हैं। उसकी भाषा भी गाँठोंवाली, बनावटी और कृत्रिम होती है, उसकी तुलना में मन्नूजी के साफ, स्वच्छ हृदय और एक सहज व्यक्तित्व के कारण उनकी रचनाओं को पढते हुए सहज भाषा और अनायास लेखन का स्वाद-सुख मिलता है। राजेन्द्र का लेखन बहुत गँठीला (गठीला नहीं) है जबकि मन्नूजी में दूर-दूर तक बनावट और कृत्रिमता है ही नहीं।
- नामवर सिंह
मन्नू भण्डारी की कहानियाँ ऊपरी तौर पर परम्परागत ढंग से लिखी हुई प्रतीत होती हैं जिसमें भाषा तथा शिल्प का कोई प्रयोग परिलक्षित नहीं होता। उनका कथा कहने का अंदाज अत्यन्त सरल तथा सीधा है लेकिन गौर करें तो उनकी अनेक कहानियों का सच किसी वृहत्तर सच की ओर संकेत करता हुआ दिखाई देता है। उसे उनकी मैं हार गई कहानी से लेकर त्रिशंकु, नायक, खलनायक और विदूषक तक में लक्षित किया जा सकता है।
- विजयमोहन सिंह


1-सार्थक उपस्थिति
मन्नू भण्डारी-स्वातन्त्र्योत्तर वरिष्ठ हिन्दी महिला कथाकारों के बीच एक सशक्त हस्ताक्षर। अपने रचनात्मक दायित्वों की पहचान एवं वैचारिक स्पष्टता के अलावा, वैयक्तिक स्तर पर शालीनता, धैर्य, संजीदगी और रचना के स्तर पर सहजता, संवेदनशीलता, यथार्थता व संलग्नता मन्नूजी की अपनी विशेषता है। बिना किसी शैल्पिक आग्रह के वे अपनी कहानियों में अपने ही आसपास के जीवन-परिवेश को, जीवनानुभूतियों को पूरी ईमानदारी और सच्चाई के साथ उकेरती हैं। कहा जा सकता है कि अनुभव की सच्चाई व संवेदन की गहराई’ इनके कथा-साहित्य की आत्मा है। अपनी रचना के विज्ञापन को नकारतीं व आत्ममुग्धता से दूर रहती आ रहीं मन्नू भण्डारी न जीवन के हर रचनात्मक पडाव पर पाठकों को सुखद आश्चर्य ही दिया है। अपने समर्थ समकालीनों की तरह उन्होंने न सिर्फ विशिष्ट रचनाएँ दी हैं वरन् उन विशिष्टताओं के पीछे मौजूद सामाजिक अनिवार्यता व भयावहता को भी रेखांकित किया है। यही कारण है कि उनके कथा-साहित्य में हम अपने ही आसपास के परिवेश से, जीये जा रहे जीवन व उसकी धडकन से रूबरू होते हैं और उनके पात्र अगर हमें बेहद करीब के मालूम होते हैं, तो इसका कारण है उनका सीधे जिन्दगी से निकलकर आना।1
साठ के दशक के पूर्वार्द्ध से मन्नूजी ने कहानी लिखना प्रारम्भ कर दिया था। उनकी एक शुरुआती कहानी सन् 1954 में मोहनसिंह सेंगर के सम्पादकत्व में निकलने वाली पत्रिका नया समाज में प्रकाशित हुई थी, परन्तु कहानी-लेखिका के रूप में पाठकों की स्वीकृति उन्हें मैं हार गई कहानी से मिलती है जिससे कहानी लेखन की विधिवत शुरुआत होती है। यह कहानी भैरवप्रसाद गुप्त के सम्पादन में इलाहाबाद से प्रकाशित पत्रिका ‘कहानी’ में सन् 1956 में छपी थी। दरअसल कम और विशिष्ट लेखन को तरजीह देने वाली मन्नूजी ने हमेशा अपनी सृजनशीलता की सीमाओं को वृहत्तर आयाम दिया है तथा सन् 1956 से शुरू उनकी यह कथायात्रा कई मंजिलें तय करती हुई एक मुकम्मल जमीन हासिल कर चुकी है। यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि लेखक के रूप में उन्होंने जो अर्जित किया है, और पाठक के रूप में हिन्दी की पीढियाँ उनसे जो पा रही हैं, वह किसी कुण्ठित कलम का कारनामा नहीं है।2
समय के बदलते हालात और उसके अन्तस् में स्थित सुर्ख रंग से वाकिफ मन्नूजी अपने दो उपन्यास आपका बंटी और महाभोज की बदौलत हिन्दी कथा-जगत में आज भी बहुचर्चित हैं। एक में वे मार्मिक सामाजिक समस्या को उठाती हैं तथा दूसरे में ज्वलन्त राजनीतिक दाँव-पेंच को पूरी यथार्थता व प्रामाणिकता के साथ उकेरती हैं। एक इंच मुस्कान एक सहयोगी उपन्यास है जिसमें यह सवाल उठाया गया है कि कलाकारों पर नैतिक दायित्वों को निभाने के बंधन लगाये जा सकते हैं अथवा नहीं। बिना दीवारों के घर उनकी चर्चित नाट्यकृति है। हाल ही में उनकी नई नाट्यकृति उजली नगरी चतुर राजा प्रकाशित होकर आई है जिसके पहले पृष्ठ पर ही स्पष्ट कर दिया गया हैः भ्रष्टाचार के खिलाफ जन आऋोश को अभिव्यक्त करता नाटक। इसके अलावा इनके पाँच बहुचर्चित कहानी-संग्रह भी प्रकाशित हैं - मैं हार गई, त्रिशंकु, यही सच है, तीन निगाहों की एक तस्वीर, एक प्लेट सैलाब। एक कहानी यह भी उनकी चर्चित आत्मकथा है जो एक तरह से उनके समय, साहित्य और संस्कृति का ऐतिहासिक दस्तावेज भी है । जहाँ एक ओर उनके दोनों उपन्यास, आपका बंटी और महाभोज, क्लैसिक साहित्य का दर्जा पा चुके हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी यही सच है, स्त्री सुबोधिनी, त्रिशंकु, एखाने आकाश नाइं आदि कहानियाँ मील का पत्थर साबित हो चुकी हैं। बकौल नामवर सिंह मन्नूजी की दो दर्जन कहानियाँ और दो उपन्यास आपका बंटी और महाभोज अपने समय से आगे जाते हैं। दोनों उपन्यास आने वाले भारत की समस्याओं का आभास देने वाली रचनाएँ हैं जो मन्नूजी की दूरदर्शिता का सूचक हैं।3 इनकी कहानियों में हम नारी के पारम्परिक और आधुनिक दोनों रूपों से मुखातिब होते हैं, फिर भी तुलनात्मक दृष्टि से आधुनिकता का पलडा ही भारी है और यही कारण है कि आधुनिक नारी के लगभग सारे रूप इनकी कहानियों में विद्यमान हैं। बदलते हुए समाज और तदनुसार बदलती नारी के सूक्ष्म मनोविज्ञान, उसके बदलते तेवर, हम इनकी कहानियों में देखते हैं और यही मन्नूजी की विशिष्टता भी कही जा सकती है। राजेन्द्र यादव के शब्दों में कहें तो मन्नू की कहानियों में नारी के घरेलू और वैयक्तिक जीवन के विविध चित्र, कहानी की सम्पूर्ण परिकल्पना और उसे समुचित सामाजिक सन्दर्भ में प्रस्तुत करने की समझ और सबसे ऊपर तटस्थ, बेबाक और बोल्ड एप्रोच ही उन्हें समकालीन महिला-कथाकारों से अलग पहचान करा देती है।4 बावजूद इसके मन्नूजी की कहानियाँ तथाकथित स्त्री-विमर्श का डंका नहीं पीटतीं । उनके यहाँ स्त्री बहुत ही सहज भाव से आती-जाती है । शायद यही कारण है कि (नामवर जी के शब्दों में) मन्नूजी की कहानियों में बौद्धिक बहस नहीं है, उनकी कहानियों में घटनाएँ बोलती हैं, स्थितियाँ बोलती हैं, स्वयं कहानी बोलती है। उनके चरित्र स्वयं बहस नहीं करते। इससे यह भ्रम होता है कि बौद्धिक दृष्टि से वह उतनी प्रबल नहीं है, पर यह सोचना सरासर गलत है।5
2-अनुभूत सत्य
नई कहानी आन्दोलन के विशिष्ट कथाकारों में मन्नूजी अकेले ऐसी कथाकार रही हैं जो न सिर्फ इस आन्दोलन की मुख्य धारा से आनायास ही जुडती हैं वरन् उसका अनिवार्य हिस्सा भी बन जाती हैं। जो आलोचक यह कहते फिर रहे हैं कि, मन्नूजी ने नई कहानी आन्दोलन की प्रवृत्तियों को आत्मसात किया था।6 वे मन्नूजी की रचनाओं व रचना-प्रक्रिया के साथ उनके व्यक्तित्व का तालमेल बैठा नहीं पाते। यह महज संयोग ही था कि मन्नूजी ने जब लिखना प्रारम्भ किया तब नई कहानी आन्दोलन का शुरुआती दौर था। इस सूत्रपात के बारे में अनभिज्ञता प्रकट करते हुए मन्नूजी कहती हैं: नई कहानी का आन्दोलन...क्या बताऊँ । जहाँ तक मेरा सवाल है, ईमानदारी की बात तो यह है कि मैंने जब लिखना शुरू किया था तो मुझे लिखने की तमीज ही नहीं थी पूरी तरह...आन्दोलन की समझ क्या होती ? पर मैंने सुना और जाना कि मैं भी इस आन्दोलन की एक हस्ताक्षर हूँ, तो मान लिया कि हूँ।7 जिस लेखकीय गरिमा, वैचारिक विशिष्टता और रचनात्मक उद्घोष के बरक्स मन्नूजी नई कहानी आन्दोलन से आप ही जूड जाती हैं, उसके मूल स्रोत की खोज करती हुई मन्नूजी लिखती हैं: विचार या आइडिया को कहानी के रूप में फैला देने वाली कला के विरोध में ही नई कहानी का जन्म हुआ था और उसकी जगह रेखांकित किया गया था अनुभूत सत्य। मैं या अधिकांश लेखक भी यह तो नहीं कह सकते कि आइडियावादी कहानियों से अपने को सफलतापूर्वक मुक्त कर लिया है, लेकिन यह जरूर है कि मेरी अधिकांश कहानियों के मूल में कहीं-न-कहीं अनुभूति की वैयक्तिकता ही रही है।8 मन्नूजी की रचना-प्रक्रिया भी इस बात का समर्थन करती है-शुरू में कोई अनुभव, स्थिति या द्वन्द्व धुँधले-से रूप में मन पर छाया रहता है। पुनः सृजन के दौरान वही धुँधली आकृति कहानी का रूप लेती है। इस रूप लेने के दौरान मैं बराबर कुछ नया खोजने के उल्लास से गुजरती रहती हूँ। ...कभी-कभी कोई ब्रिलियेण्ट आइडिया जरूर लिखने के लिए उकसाता है, पर जब तक वह जीवन के साथ पूरी तरह गुँथ नहीं जाता कहानी के रूप में उसे ढालना मेरे लिए सम्भव नहीं होता। जीवन की धडकन से भरपूर स्थितियाँ, विचार या समस्याएँ ही मुझे लिखने के लिए प्रेरित करती हैं।9 और जीवन के साथ पूरी तरह गुँथ जाने पर जोर देना, अन्ततः सार्वजनिकता और निर्वैयक्तिकता को ही स्वीकारना है। अतः वैयक्तिक आन्तरिक अनुभूति (या कुछ हद तक स्वयं का भोगा हुआ यथार्थ) और निर्वैयक्तिक सामाजिक यथार्थ के द्वन्द्व से मन्नूजी की कहानियाँ आकार लेती हैं जिसके मूल में बदलते परिवेश, मूल्य संऋमण, नैतिक दबाव, देखी-भोगी हुई यातना व क्रूर सामाजिक सच्चाई विराजमान है। इस क्रम में मेरी प्रिय कहानियाँ की शुरुआत में दर्ज मन्नू भण्डारी की मार्मिक स्वीकारोक्ति द्रष्टव्य है- कहानियों की बात करते हुए सहसा ही मुझे लगता है कि उस पुरानी बात में कहीं एक बहुत बडी सच्चाई है । यातना और करुणा हमें दृष्टि देती है; अपने सुख और उल्लास के क्षणों म हम अपने से बाहर होते हैं, औरों के साथ होते हैं, यातना के क्षणों में हम अपने भीतर जीते हैं और वे हमारे अपने होते हैं । हो सकता है उल्लास और प्रसन्नता के क्षण मेरी जिन्दगी के सर्वश्रेष्ठ क्षण रहे हों लेकिन यातना के क्षण मेरे अपने हैं । इन्हें कहानियों में अभिव्यक्ति न मिली होती तो निस्सन्देह जिन्दगी का बहुत कुछ टूट-बिखर गया होता।
3-कहानी की दुनिया (एक)
जैसा कि पहले संकेत किया जा चुका है, मन्नूजी की कहानी-यात्रा की वास्तविक शुरुआत मैं हार गई कहानी से होती है। क्योंकि इसी कहानी से उनके कहानीकार-पक्ष को पाठकों की स्वीकृति मिलती है, जिससे उनका आत्मविश्वास ही नहीं बढता वरन् कहानी के प्रति वे अधिक सचेत, गम्भीर व जागरुक भी होती हैं। सच ही है कि स्वीकृति की सान पर चढकर ही शायद आत्मविश्वास को धार मिलती है। मैं हार गई कहानी जहाँ एक ओर समकालीन भारतीय राजनीति की पारदर्शिता पर प्रश्न-चिह्न लगाती है वहीं दूसरी ओर आज के तथाकथित राजनेताओं के चारित्रिक अवमूल्यन को दर्ज करती है। इससे बडी और क्या विडम्बना हो सकती है कि आज हम सपने में भी एक स्वच्छ-ईमानदार नेता की परिकल्पना करने में खुद को असमर्थ पा रहे हैं। नेता के सिंहासन पर विराजने से पूर्व अगर वह गरीब है तो मजबूरन और अमीर है तो आदतन, दोनों स्थितियों में वह भ्रष्ट है। अगर हम कहें कि आज नेता शब्द भ्रष्टाचार का पर्याय बन गया है तो अतिशयोक्ति न होगी। और मैं हार गई की यह हार किसी व्यष्टि की नहीं, वरन् समष्टि की हार का परिचायक है। सबसे बडी बात यह कि आज हम सब इस हार को ढोने के लिए विवश हैं। ईशा के घर इन्सान कहानी जहाँ एक ओर धार्मिक संस्थाओं के बन्द कमरों में हो रहे यौन-शोषण का खुलासा करती है वहीं दूसरी ओर अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए उकसाती है। कहानी में एंजिला धर्म के नाम पर हो रहे नारी-शोषण के विरुद्ध आवाज उठाती है साथ ही लूसी को भाग जाने के लिए आत्मबल भी देती है। खोटे सिक्के टकसाल में होने वाले मजदूर के शोषण व अमानवीय दुराचार को दर्ज करती है, जबकि सजा हमारी तथाकथित न्याय व्यवस्था की लापरवाही व विसंगति की गाथा सुनाती है। श्मशान पुरुष के ग्लिसरीनी आँसू और उत्कट जिजीविषा को उजागर करती है । लेखिका के शब्दों में जो इन्सान प्रेम करता है, उसे जीवन भी कब प्यारा नहीं...वह जीवन की पूर्णता के लिए फिर प्रेम करता है, जीवित रहने का प्रयत्न करता है। जीवित रहने की ललक के चलते ही तो वह हर वियोग झेल लेता है...व्यथा सह लेता है क्योंकि सबसे अधिक प्रेम तो मनुष्य अपने आप से करता है।10 ऐसे ही अभिनेता पुरुष के दोहरे मुखौटे का अनावरण करती है। नायक दिलीप ओझा के प्रति नायिका रंजना की व्यंग्योक्ति यहाँ द्रष्टव्य है- मैं तो केवल रंगमंच पर ही अभिनय करती हूँ, पर तुम्हारा तो सारा जीवन ही अभिनय है। बडे ऊँचे कलाकार और सधे हुए अभिनेता हो तुम मेरे दोस्त।11 पण्डित गजाधर शास्त्री पुरुष के व्यर्थ के अहंकार व भ्रम को व्यंग्यात्मक तरीके से उजागर करती है और चश्मे कहानी पूर्वदीप्ति (द्घद्यड्डह्यद्ध ड्ढड्डष्द्म) के जरिए पुरुष के स्वार्थी मनोभाव का यथार्थ चित्रण करती है। इनकम टैक्स और नींद में पुरुष की हीनगं*थिता के साथ-साथ नारी की परिपक्व मानसिकता का परिचय भी मिलता है। अकेली ऐसे दोहरे अकेलेपन को मार्मिक ढंग से उकेरती है जिसे कहानी की शुरुआती पंक्तियाँ सहज ही स्पष्ट कर देती हैं- सोमा बुआ परित्यक्ता है/सोमा बुआ अकेली है।12 पहली पंक्ति सामाजिक निस्संगता की परिचायक है तो दूसरी पारिवारिक शून्यता की। कहानी का मूल स्वर मानवीय संवेदना है। मन्नूजी इस कहानी के सृजन-प्रेरणा बिन्दु को याद करते हुए लिखती हैं- अकेली की सोमा बुआ को बचपन में जाने कब से देखा था कि किस प्रकार घर से उपेक्षित होकर वह अपने-आपको दूसरों के लिए महत्त्वपूर्ण बनाने के भ्रम में हास्यास्पद बनती जा रही थी। उसके अकेलेपन और दयनीयता ने मुझे उस समय केवल मानवीय संवेदना के धरातल पर ही आकर्षित किया था। उस समय कहानी सोमा बुआ की व्यथा को वाणी देने के लिए लिखी थी; पर बरसों बाद मुझे उसमें कहीं अपना अंश, अपनी व्यथा दीखने लगी।13 तीन निगाहों की एक तस्वीर में जहाँ एक ओर सहज शारीरिक सम्बन्ध को अहमियत दी गई है, वहीं दूसरी ओर नारी मनोविज्ञान का सूक्ष्म यथार्थ रूप भी दर्ज है । सेक्स को दैहिक अनिवार्यता स्वीकारते हुए यह कहानी स्त्री-पुरुष सम्बन्धों का एक नया पक्ष हमारे सामने रखती है। मजबूरी पीढियों के बीच स्थित मानसिक फासले व उनमें गहराते द्वन्द्व की कहानी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि आज की अत्याधुनिक अँग्रेजी स्कूल की पढाई ने हमारे बच्चों से उनका बचपन छीन लिया है- अँग्रेजी पोषकों के मतानुसार प्यार, ममत्व आदि समकालीन प्रतिस्पर्धावादी युग के लिए अप्रासंगिक ही नहीं, भविष्यत के कॅरियर निर्माण के बाधक तत्त्व भी हैं। पुरानी और नयी पीढियों के बीच के अन्तर व द्वन्द्व को नई कहानी ने बार-बार रेखांकित किया है। नयी पीढी की भविष्यत-कॅरियर की चिन्ता अब पुरानी पीढी के वर्तमान के प्यार, दुलार पर हावी है। मजबूरी कहानी इसी द्वन्द्व को व्यंजित करती है। त्रिशंकु नारी के अन्तर्द्वन्द्व और दो पीढियों के जीवनमूल्यगत संक्रमण को बखूबी दर्शाती है। यहाँ महीप सिंह का कथन स्वतः स्मरण आता है- आज का भारतीय मानस संस्कारों और आधुनिकता के द्वन्द्व में इस कदर घिरा हुआ है कि उसकी स्थिति अधर में लटके त्रिशंकु की-सी हो गई है। बौद्धिकता का दबाव उसे कथित आधुनिकता की ओर धकेलता है और संस्कारगत तथा सामाजिक स्थितियाँ उसे परम्परागत मूल्यों की ओर वापस खींच लाती हैं।14 विजयमोहनजी ने इसे और अधिक स्पष्ट करते हुए लिखा है- त्रिशंकु तथाकथित आधुनिक मध्यवर्गीय मानसिकता की कहानी है जिसके मनुष्य न तो पूरी तरह आधुनिक हो पाते हैं और न परम्परागत।15
4-कहानी की दुनिया (दो)
मन्नूजी की कहानियों में सबसे अधिक चर्चा यही सच है कहानी की हुई है, जिसका रजनीगंधा नाम से फिल्मांकन भी हो चुका है। आलोचकों का एक समूह इस कहानी को दो प्रेमियों के बीच झूलती नायिका के द्वन्द्व की कहानी कहा है, जबकि एक दूसरा वर्ग इसे त्रिकोणात्मक प्रेम-कथा मानता है। निश्चय ही यही सच है कहानी उस अर्थ में प्रेम कहानी नहीं है जिस अर्थ में गुलेरी जी की उसने कहा था । कहने की जरूरत नहीं कि प्रेम-पौधा शारीरिक भूख की आग के साये में नहीं पनपता गोकि उत्तर आधुनिकता के इस फैशनपरस्त दौर में प्रेम करना भी एक फैशन बन गया और खालिस दैहिक भूख-सुख को प्रेम का बदलता स्वरूप स्वीकारा जा रहा है। क्या यह सच नहीं कि आज के हजारों तथाकथित प्रेमी युगलों के प्रेम सम्बन्ध का आधार सेक्स्यूअल रिलेशनसिप है ! यही सच है की नायिका दीपा या उसका प्रेम (?) क्या इतना ही कमजोर है जो पहले निशीथ से नाराज होकर संजय के पास आ जाती है और फिर संजय से दूर होते ही पुनः निशीथ की गोद में बैठने के लिए मचल उठती है । यह पाठक को ही तय करना है कि नायिका की यह मनोदशा निर्मल प्रेम भावना है या अतृप्त शारीरिक भूख। शुद्ध प्रेम के मामले में, कम-से-कम भारतीय परिवेश में out of sight out of mind बाली बात तो लागू नहीं हो सकती। कहानी अगर अलग-अलग कोणों से अलग-अलग अर्थछटा देने में समर्थ है, तो इसके पीछे मन्नूजी का रचनात्मक औदात्य, बुनावट कौशल तथा सन्तुलित गरिमा का जादू काम कर रहा है। हिन्दी कहानी के परिदृश्य में मन्नूजी ने कदाचित पहली बार यह एहसास कराया है कि हर क्षण, हर पल का अपना महत्त्व है। और समकालीनता के दबाव में फँसा भावुक मन उन कोमल क्षणों को पकडना-भोगना तो चाहता है परन्तु उसमें बन्धकर रह जाना नहीं चाहता- यही सच है कहानी का मूल स्वर यही है । विजयमोहन सिंहजी ने स्पष्ट लिखा है- यही सच है ऊपरी तौर पर प्रेम के गहरे द्वन्द्व की कहानी प्रतीत होती है जहाँ एक युवती अपने दो प्रेमियों के बीच चुनाव न कर पाने की यातना से जूझ रही है। किन्तु सूक्ष्म स्तर पर वह स्त्री की उस आदिम मानसिकता की कहानी है जिसका सच यह है कि वह उसी पुरुष को वरण करती है जिसमें यह साहस या दुस्साहस है जो आगे बढकर उसका हरण कर सके। अतः कहानी में द्वन्द्व नहीं, मूल प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति है। कहानी में एक अन्तर्निहित उत्ताप है, एक सुलगती हुई आकांक्षा, जो उसे परितृप्त कर सकता है वह उसी की अंकशायिनी होगी। कहानी इसी सच को सामने लाती है।16 मधुरेशजी द्वन्द्व को तरजीह देते हुए लिखते हैं कि यहाँ दीपा का अन्तर्द्वन्द्व ही मुख्य है, जो अलग-अलग क्षणों में निशीथ और संजय, दोनों को सच मानता है।17 परन्तु उन्हें भी अन्ततः स्वीकारना ही पडा- नैतिक-अनैतिक से परे यह वस्तुतः वर्तमान को पकडने और भगने के दर्शन को प्रतिपादित करती कहानी है।18 घुटन सहज शारीरिक सम्बन्ध को तरसती मोना व प्रतिमा की व्याकुलता व विवशता को दर्शाती है, जबकि कील और कसक यौन अतृप्ति के दुष्परिणाम को रेखांकित करती है। घुटन की विवाहेच्छु मोना संग-सुख के लिए दिन-रात घुटती रहती है, जबकि विवाहिता प्रतिमा जबरन के यौनाचार से मुक्ति पाने के लिए व्याकुल है लेकिन कील और कसक की रानी को यौन अतृप्ति की कील कसक-कसक कर सालती है। हार कहानी विशेष मनोग्रंथी से परिचालित, किन्तु अन्तर्मन से पराजित आज की आधुनिक नारी दीपा के द्वन्द्व को दर्शाती है। एखाने आकाश नाई कहानी महानगरीय जटिल जीवनशैली और ग्रामीण स्वच्छ उन्मुक्त-परिवेश के बीच फँसी लेखा की कथा कहती है, जो कहीं भी सन्तुष्ट नहीं, शहर के शोर शराबे से थककर वह गाँव आती है और गाँव की निस्तब्धता से बोर होकर पुनः शहर को याद करती है। उसके लिए दोनों परिवेश, आबोहवा अलग-अलग होने पर भी कहीं भी उसे एक मुकम्मल जमीन व मुक्ताकाश नहीं दिला पाते। नशा एक समर्पित महिला आनन्दी के त्याग की कहानी है। पत्नी आनन्दी को पिलाने का नशा है तो पति शंकर को पीने का। नकली हीरे कहानी स्वीकारती है कि पति-पत्नी के बीच की असली दौलत तो पास्परिक प्रेम है, न कि लाखों-करोडों का बैंक बेलेन्स, एसी-कार, नौकर-चाकर। अजित कुमार के साथ बातचीत में मन्नूजी ने कहा भी था- आदमी भरापूरा केवल साधनों और उपलब्धियों से उतना महसूस नहीं करता, जितना मन से करता है 19 और नकली हीरे का प्रतिपाद्य यही है। क्षय कहानी आर्थिक दबाव में फँसी मध्यवर्गीय नारी के खण्डित आदर्श, टूटते नैतिक मूल्य की ओर इशारा करती है । स्थितियों के दबाव में अपनी इच्छा के विरुद्ध स्वयं के आचरण से नायिका कुन्ती का मन क्षयग्रस्त हो जाता है। ऐसे ही रानी माँ का चबूतरा कहानी एक ऐसी स्वावलम्बी नारी गुलाबी को पाठकों के सम्मुख लाती है जो अंधश्रद्धा में नहीं, कडी मेहनत में यकीन करती है। जीवनभर अपने बच्चे के प्रति कठोरता का रुख अपनाने वाली माँ (गुलाबी) का आन्तरिक ममत्व उजागर तब होता है जब उसके पल्लू से शिशु सुरक्षा केन्द्र की रसीद निकलती है। दीवार, बच्चे और बरसात प्रतीकात्मक शैली में कही गई ऐसी कहानी है जो बदलते हुए स्वातन्त्र्योत्तर परिवेश में नारी के नये तेवर, नयी सोच को रेखांकित करती है । कहानी की नायिका जहाँ एक ओर पारम्परिक चहारदीवारी बन्धन और पुरुष दमन को नकारती है वहीं दूसरी ओर अपने ही बूते समाज की मुख्य धारा से जुड कर कुछ कर दिखाने की चुनौती भी स्वीकार करती है। पुरानी दीवार को फोडकर एक नन्हीं-सी पौध निकल आना दरअसल पारम्परिक बन्धन को दरकिनार करने वाला एक नया चेहरा, एक नयी सोच के उदय का ही प्रतीक है। आज की स्त्री-मुक्ति, नारी-विमर्श के सन्दर्भ में इसे एक महत्त्वपूर्ण कहानी के रूप में परोसी जा सकती है। मन्नूजी के ये विविध नारी पात्र हमारे आस-पास के देखे-पहचाने स्त्रियों की याद दिलाते हैं और कहा जा सकता है कि मन्नूजी की कहानियों में स्त्रियाँ जबरन नहीं, सहज भाव से आती हैं। क्योंकि इनके नारी पात्र किसी थोपे हुए या गढे हुए कल्पित नारी पात्र नहीं, वरन् हमारे रोजमर्रा की ठोस जमीन पर साँस लेने वाली, रक्त, हाड-माँस धारी नारी हैं। कथाकार शैलेश मटियानी ने ठीक ही लक्ष्य किया था- सामाजिक भ्रम, पारम्परिक संस्कार और औरत होने के निजत्व की दोहरी-तिहरी जटिलताओं से संश्लिष्ट नारी चरित्रों के सच का साक्षात्कार जैसे मन्नू भण्डारी की कहानियों का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष है । उनकी लेखन-क्षमता का सबसे गहरा साक्ष्य उनकी जटिल नारी चरित्रोंवाली कहानियों में ही ज्यादा मिलता है- यही सच है।20 एक प्लेट सैलाब कहानी के केन्द्र में अत्याधुनिक रेस्तराँ है और इसी रेस्तराँ में बैठे भिन्न-भिन्न वर्ग, अलग-अलग मानसिकता की पोषाक पहने व्यक्तियों की सोच, विचार, अनुचिन्ता और उनके सरोकार को कहानी टुकडों में बयाँ करती चलती चली जाती है । कुल मिलाकर कहानी महानगर के निर्वैयक्तिक सम्बन्धों की एकरस तस्वीर को प्रस्तुत करती है। नायक खलनायक विदूषक मन्नूजी के अधूरे उपन्यास आत्महन्ता से आकार लेकर हंस के प्रवेशांक, 1986 में प्रकाशित हुई थी । यह कहानी जहाँ एक ओर आधुनिक दम्पत्ति के बीच गहराती वैचारिक असहमतियों की रेखांकित करती है वहीं दूसरी ओर पुरुष के स्वाभिमान-ऊहापोह को बखूबी दर्शाती है। इण्डिया टुडे की साहित्य वार्षिकी, 1996 में प्रकाशित नमक कहानी ऐसी गुलाम पीढियों की अँधेरी दासता की दास्ताँ सुनाती है जिन्हें अब मुक्ति के उजाले का इन्तजार है, परन्तु उनके जीवन में सुबह आए बिना ही बार-बार साँझ घिर आती है क्योंकि आजादी के 50 वर्ष (जब कहानी लिखी गई थी तब) बाद भी उनकी रगों में लहू नहीं, हवेली का वही पुराना नमक बह रहा है और उनका सुख-दुख अब भी हवेली के सुख-दुख से जुडा हुआ है। लेखिका उनकी रगों में बहने वाले नमक को लहू में तब्दील कर नई क्रान्ति लाना चाहती है- मुझे अपनी कलम से उसकी (भीमा की) रगों में जमे हुए नमक का खून में बदलना है- गरम-गरम खून में, जिसमें क्रान्ति की लपट उठ सके और उसे एहसास हो कि वह भी इन्सान है-एक जीता जागता इन्सान और उसकी जिन्दगी पर उसका अपना अधिकार है, किसी ठकुर-टीकरे और हवेली का नहीं।21 परन्तु मुरदों में कभी दौड लगी है भला ? और मन्नूजी इन्हीं मुरदों को जगाने का निष्फल प्रयास कर रहीं थीं ।
लम्बी प्रतीक्षा के बाद मन्नूजी की दो नई कहानियाँ करतूते मरदां और विडम्बना क्रमशः तद्भव(2002) एवं कथादेश-मन्नू भण्डारी केन्द्रित विशेषांक (2009) में देखने-पढने को मिली । विडम्बना आज की महानगरीय अजनबीयत व निस्संगता को दर्शाती है । भूमण्लीकरण के इस अत्याधुनिक दौर में विश्वग्राम (Global-village) का सपना तो हम साकार कर चुके, परन्तु विडम्बना यह है कि हम अपने ही पडोसियों, आसपास की हलचल से बेखबर हैं। दूसरी कहानी करतूते मरदां पुरुष के काले-कारनामों व सफेद-झूठ पर रोशनी डालती है। नामवरजी इसी कहानी के बारे में लिखते हैं- यह कहानी उनकी पहले की लिखी हुई कहानी स्त्री सुबोधिनी की थीम का ही परिपक्व विकास है ।... सन् 2002 में लिखी गयी और अब तक की उनकी सबसे नयी इस कहानी को उनकी एक कमजोर कहानी कहा गया पर मैं इसे एक बहुत सशक्त कहानी मानता हूँ...इस कहानी में भाषा का व्यंग्य चमत्कारी असर छोडता है । यह कहानी मन्नूजी की श्रेष्ठ कहानियों में शामिल होने लायक है। आगे वे लिखते हैं- इसमें उग्र और प्रभावी व्यंग्य है।... यह कहानी स्त्री-विमर्श की कहानी इसलिए भी बनती है कि आम तौर पर स्त्री-विमर्श पर रचनाकार-विचारक तमाम लेख लिखते रहे, पुरुष-वर्चस्व के खिलाफ यह एक कहानी काफी कुछ कह जाती है।22 हिन्दी के शीर्षस्थ आलोचक की इस सम्यक-आलोचनात्मक टिप्पणी के बाद करतूते मरदां की रचनात्मक विशिष्टता के पक्ष में और कुछ जोडने की जरूरत नहीं, फिर भी व्यंग्य की एक बानगी यहाँ द्रष्टव्य है- अब नायक ने बाकायदा ग्लिसरीनी नहीं, असली आँसू इतने तो बहा ही दिए कि पत्नी के दरारें पडे मुट्ठी भर दिल में बाढ ला दें, बाढ आयी और पत्नी का गुस्सा और निर्णय सब उसमें धराशायी।23
5-भाषा-विभाषा
मैं हार गई से करतूते मरदां तक आते-आते मन्नूजी के पाठक-आलोचक उनकी कहानियों में जो महत्त्वपूर्ण बदलाव देखते हैं, वह है- भाषा व्यंजना के स्तर पर जबरदस्त बदलाव-सीधी-सादी शैली, सपाट बयानी से प्रभावी-उग्र-चुटीली व्यंग्यात्मक कथा-भाषा। फिर भी मन्नूजी ने अपनी कहानियों में सामान्य बोलचाल की भाषा का प्रयोग अत्यन्त कौशल के साथ किया है। शायद अजमेर या इन्दौर में रहने के कारण-बोलचाल की औरतों की जबान के मुहावरे, लहजे, शब्द, वाक्य विन्यास अनायास बडे सहज और प्रभावी रूप में चले आते हैं।...उनकी यहाँ तनिक भी अँग्रेजी के वाक्य विन्यास नहीं । आम बोलचाल की भाषा है, अँग्रेजियत का कतई प्रभाव नहीं है।24
अस्तु, कहा जा सकता है कि सीधी, सरल और स्वच्छन्द भाषा व लय में कही गई मन्नूजी की कहानियाँ जहाँ एक ओर हमारे समकालीन आधुनिक जीवन को गाढे तौर पर रेखांकित करती हैं, वहीं दूसरी ओर गहन बौद्धिक विचार-विमर्श के लिए भी उकसाती हैं ।
सन्दर्भ एवं टिप्पणीः

1. आजकल, हीरक जयंती अंक सितम्बर 2004, पृ.10।
2. मन्नूजी की आत्मकथा एक कहानी यह भी के बैक-कवर से।
3. कथादेश, मन्नू भण्डारी केन्द्रित विशेषांक, जनवरी 2009, पृ. 83 ।
4. कहानीः स्वरूप और संवेदना, राजेन्द्र यादव, पृ. 268।
5. कथादेश, मन्नू भण्डारी केन्द्रित विशेषांक, जनवरी 2009, पृ. 84 ।
6. इग्नू के एमएचडी पाठ्यक्रम में त्रिशंकु कहानी की पूर्व-पीठिका में लिखा गया है- नई कहानी आन्दोलन के प्रवृत्तियों को आत्मसात करके कहानी-कला को प्रमाणिकता देनेवालों में मन्नू भण्डारी का प्रमुख स्थान है।
7. नया ज्ञानोदय, अंक 15 मई, 2004 में प्रकाशित मन्नू भण्डारी के साक्षात्कार से ।
8.मेरी प्रिय कहानियाँ, मन्नू भण्डारी, भूमिका से।
9. त्रिशंकु (कहानी-संग्रह), मन्नूजी के तमाम रंग, अजितकुमार से बातचीत ।
10. नायक खलनायक विदूषक, मन्नू भण्डारी, पृ. 30।
11. वही, पृ. 34 ।
12. वही, पृ. 119 ।
13. मेरी प्रिय कहानियाँ, मन्नू भण्डारी, भूमिका से।
14. महीप सिंह, श्रेष्ठ हिन्दी कहानियाँ, भूमिका से।
15. कथादेश, मन्नू भण्डारी केन्द्रित विशेषांक, अंक 15, जनवरी-2009 पृ. 85।
16. वहीं, पृ. 85 ।
17. नयी कहानीः पुनर्विचार, मधुरेश, पृ. 256 ।
18. वहीं, पृ. 256 ।
19. त्रिशंकु ,(कहानी-संग्रह), मन्नूजी के तमाम रंग, अजितकुमार से बातचीत।
20. विकल्प कथासाहित्य विशेषांक, सम्पादक-शैलेश मटियानी, पृ. 130 ।
21. नायक खलनायक विदूषक, मन्नू भण्डारी, पृ. 494।
22. कथादेश, मन्नू भण्डारी केन्द्रित विशेषांक, अंक 15, जनवरी, 2009, पृ. 84 ।
23. वहीं, पृ. 79 ।
24. वहीं, पृ. 84 ।
सम्पर्क - 100 यूटीडी कैम्पस,डॉ.
हरीसिंह गौर केन्द्रीय विश्वविद्यालय
सागर-470003