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स्त्री वजूद बचाए या भविष्य

कृष्णा जाखड
बीते कुछ वर्षों ने हमें कितना कुछ सिखाया और समझाया। हमारे सामने कितना कुछ नया लाकर खडा कर दिया और उस पर यह कोरोना काल, जो अभी भी गर्दन पर लटकती तलवार की तरह तैयार है। सत्ताओं के तमाशे तो खैर होने ही हैं, मगर कोरोना ने हमारी व्यवस्थाओं के चिथडे-चिथडे कर के हमें दिखा दिया कि हम कितने पानी में हैं। हम बैठे जाति-धर्म की गाँठें लगा रहे थे कि कोरोना ने आकर हमारे अस्तित्व की गाँठें ही खोल डाली। हमने कितने परिचितों को, अपनों को, गैरों को मरते हुए देखा-सुना। उखडती साँसों के बीच बुदबुदाते रिश्तों में कुछ बच गया तो निखालिस सन्नाटा। गहरी कालिमा लिए हुए दूर तक खींचा हुआ सन्नाटा। खोने-बिछडने के इस भयावह अंतराल में साहित्य-जगत भी स्तंभित, भौचक्क था। कितनी ही कलम मौन हो गईं। कितने ही ऊर्जावान युवा जो आने वाले समय को भरपूर ऊष्मा देते मगर मौत से लडती जिंदगी हार गए। कितने ही अनुभवी रचनाकार जीवन से कूच कर गए। हालाँकि मृत्यु जीवन का यथार्थ है मगर वह यथार्थ इतना भयावह भी हो सकता है यह पूरी दुनिया ने अपनी नंगी आँखों से देखा। साहित्य जगत इस आशंकित समय से मुक्त होने के प्रयत्न था ही कि तभी खबर आई कि मन्नू भण्डारी नहीं रही।
इसी पंद्रह नवम्बर को खबर मिली कि मन्नू भण्डारी नहीं रही। वही चिरपरिचित शब्द- अरे! ओ... हो....। फिर वही सन्नाटे का पाटने का प्रयत्न। अरे मरना तो एकदिन सभी को है। और वे तो नब्बे वर्ष का भरापूरा, सम्मानित जीवन जीकर गईं हैं और मरी कहाँ हैं? महाभोज, आपका बंटी, यही सच है एवं एक कहानी यह भी सहित तमाम रचनाएँ हैं ना उनकी हमारे साथ।
हाँ, होता भी यही है, व्यक्ति चला जाता है, परंतु रचनाकार नहीं मरता। मन्नू भण्डारी की मृत्यु के समाचार के आघात से या फिर पता नहीं किस कारण से कुछ स्मृतियां कुलबुलाने लगीं। स्मृतियों को दडबों से बाहर आने के लिए शायद सुख या दुख देने वाले किसी सहारे की जरूरत रहती ही होगी नहीं, तो इतनी शिद्दत से वो यादें पहले कभी नहीं कुलबुलाई।
हौजखास वाला उनका घर, रुचि से सजाया-सँवारा घर। इस घर ने दो रचनाकारों का जीवन देखा। सामाजिक सहचर, दो धाराओं में बहते रचनाकार, दो वैचारिक वैतरणियों पर सवार व्यक्ति। नदी के किनारों की तरह एक ही तत्व से निर्मित अस्तित्व जो अपनी पूर्ण अस्मिता के साथ अडिग, न ही एकाकार हो सकते और न ही बिछड सकते। यही कोई सन 2012 की बात रही होगी। हाँ, तब राजेंद्र यादव अलग घर में रहने लगे थे। मेरा शोध-प्रबंध प्रभा खेतान के साहित्य में नारी-विमर्शः एक अध्ययन प्रकाशित हुआ था और उस दिन राजेंद्र यादव एवं नामवरसिंह के हाथों एक कार्यक्रम के हिस्से के रूप में उसका विमोचन हुआ था। विमोचन से पूर्व हम पति-पत्नी मन्नू भण्डारी के घर गए थे। उनके घर जाने से पहले मन में कुछ भय मिश्रित झिझक थी। जैसे कि बडे-बडे नामी लोगों को लेकर मन में कुछ आशंकाएँ रहती ही हैं, वैसे ही सहमें मन से हम उनके घर पहुँच गए। हालाँकि हमने फोन द्वारा पहले से समय माँग लिया था।
मन्नू भण्डारी के घर पहुँचने के बाद चार-पाँच मिनट में ही मन इतना सहज हो गया कि जैसे किसी अपने ही बडे-बुर्जुग से मिल रहे हों। फिर तो घंटें भर बातें होती रहीं।
मैंने जब अपनी सद्य प्रकाशित पुस्तक की प्रति उनको भेंट की, तो उसको हाथ में लेकर बडी ही तन्मयता से पन्ने उलट-पलट कर देखती रहीं। किताब के पन्नों के साथ उनके चेहरे के भाव भी बदल रहे थे और फिर एक लंबा-सा साँस खींचकर कहीं दूर अतल गहराई से बुदबुदाई-सी आवाज में बोली- उसके जाने का समय नहीं था अभी। हृष्ट-पुष्ट शरीर के साथ स्वस्थ दिमाग की धनी थी वह। ऐसा कुछ नहीं हुआ था उसे कि वह चली जाए। गीता (प्रभा खेतान की बहिन) से बात हुई थी मेरी। और फिर प्रभा खेतान के विषय में कितनी ही बातें, जो मैं सोच भी नहीं सकती, वे बताती रहीं। बातों के साथ उनके चेहरे पर कभी गर्व, कभी खुशी तो कभी पीडी-मिश्रित आक्रोश की छाया आती-जाती रही। हाँ, लेकिन चार-पाँच मिनट में ही वे सँभल गईं और फिर धीरे-से विषय को बदला और चर्चा मेरे शोध से राजस्थान तक आ पहुंची। अजमेर से जुडी यादों को ताजा करते हुए उनके चेहरे की रंगत ही कुछ अलग हो गईं।
अजमेर! हाँ, यह वही शहर है जो मन्नू भण्डारी को किशोरवय की उत्साही यादों में ले जाता है। भानपुरा (मध्यप्रदेश) में जन्मीं मन्नू भण्डारी की स्कूल-कॉलेज की पढाई इसी शहर में हुईं। अजमेर का ब्रह्मपुरी मोहल्ला और घर में होती राजनीतिक बहसें, आर्य समाज की सुधारात्मक हलचलें, सन बयालीस के आंदोलन की सुगबुगाहटों के बीच मन्नू से मन्नू भण्डारी बनने की प्रक्रिया चलती रही।
मन्नू सन 1945 में कॉलेज में आ गईं और फिर तो व्यक्ति निर्मिति की तरफ एक सिलसिला शुरू हुआ और वही सिलसिला मन्नू को मन्नू भण्डारी बनाता है।
जब वे अजमेर के तत्कालीन स्वरूप का खाका खींच रही थीं, तो चेहरे की चमक देखने लायक थी। मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वे राजस्थान के किसी हिस्से की बात कर रही हैं, जहाँ हम आज तक सामंती बेडियों में जकडी मानसिकता के साथ जी रहे हैं, वहीं सन 1947 से पहले का अजमेर सामंती दासता से मुक्त, राष्ट्रीय आंदोलन के क्रिया-कलापों का केंद्र बना हुआ था। राजस्थान सेवा संघ जैसी अनेक संस्थाओं के माध्यम से जागरण का कार्य हो रहा था, साथ ही आर्य समाज के माध्यम से समाज-सुधार, स्त्री-शिक्षा, समानता जैसे अनेक कार्य चल रहे थे। राजस्थान में रजवाडी गुलामी से मुक्ति के लिए लगभग सभी कार्यऋमों की रूपरेखा अजमेर की धरती से ही बनती रही। रामनारायण चौधरी जैसे कितने ही लोगों ने देश के लिए अपना सबकुछ त्याग दिया। अर्जुन लाल सेठी जैसे क्रांतिकारी की अंतिम शरणस्थली भी यही शहर रहा।
मन्नू भण्डारी यह सब याद करते-करते बहुत गहराई में उतर रही थीं। मैं तो बस बीच-बीच में छोटे-छोटे सवाल भर कर रही थी। चाय आने के साथ ही बातों का सिलसिला कुछ रूका। चाय पीते-पीते ही जब मैंने महाभोज का जिक्र छेडा तो उनकी दा साहब फिर अजमेर के उसी मोहल्ले से निकल आए। और भी रचनाओं के कई पात्र ब्रह्मपुरी के घरों से झाँकने लगे, लेकिन मैंने जैसे ही आपका बंटी का सवाल किया, उनके भाव जरा बदल गए। बूढी आँखें क्षणभर में और भी बुढा गईं। उनकी आवाज जरा धीमी हो आई- हाँ, यह तो विडम्बना है, लेकिन स्त्री भी क्या करे, वजूद बचाए या भविष्य? उनको पाठक वर्ग से जरा शिकायत भी थी कि जितनी चर्चा बंटी की हुई शकुन की क्यों नहीं हुई। दोराहे पर खडा व्यक्ति कितना टूटे और क्यों? यह किसी ने सोचा ही नहीं। खैर, बातों का सिलसिला तो रूकना ही था, रूका भी।
विदा होते वक्त मैंने उनसे कहा कि मेरी इस पुस्तक का विमोचन आज राजेंद्र यादव के हाथों होना है और यही कोई दो-तीन घंटें बाद। उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई- अच्छा है, प्रभा को राजेंद्र ही अच्छे से समझ सकते हैं, वैचारिक मेल में वह राजेंद्र के ही करीब थी और हाँ, तुम्हें बधाई, तुमने अच्छे विषय पर काम किया है। मेरे सिर पर हाथ रखते हुए उनके चेहरे पर मुस्कान बराबर थी। उसी मुस्कान की कुछ तस्वीरों के संग हम वहाँ से रवाना हुए।
मुझे लग रहा था कि मैं मन्नू भण्डारी से मिलकर नहीं आई, बल्कि नई मन्नू भण्डारी खोजकर आई हूँ। आज तक पाठ्यक्रम में उनका जो परिचय पढा था उससे भिन्न आज मुझे एक अलग ही मन्नू भण्डारी मिली। तीन निगाहों की एक तस्वीर, मैं हार गई, यही सच है, नशा जैसी कहानियों से जिस स्त्री की निर्मिति मेरे विद्यार्थी मन में हो रही थी, वह आज धुलकर एक साफ-सुथरी व्यक्ति-निर्मिति में बदल गई। महाभोज हो या आपका बंटी, व्यक्ति के साथ सामाजिक सरोकार बराबर चलते हैं और कहीं-कहीं तो व्यक्ति पीछे छूट जाता है।

मैं उस दिन एक अलग व्यक्ति से मिली जो अपने पूरे वजूद के साथ मेरे सामने थी। पिता के एकाधिकार को चुनौती देती हुई लडकी, अपनी मर्जी से विवाह का निर्णय लेती लडकी, अपना भरण-पोषण करने के लिए कमाती हुई स्त्री, हर-एक सामान्य पत्नी की तरह पति पर आशंकित रहने वाली पत्नी और पितृसत्ता में पले-रंगे हरएक पति की तरह कमाने और घर चलाने का दंभ भरती हुई पत्नी। तमाम कोशिशों के बाद भी पति के न सुधरने पर उसे घर से बाहर का रास्ता दिखाती हुई पत्नी। इनमें से कौनसा रूप मन्नू भण्डारी है या फिर कहूँ एक व्यक्ति की निर्मिति परिवेश-परिस्थिति से ही होती है, लैंगिकता से नहीं।
घर आकर मैंने एक कहानी यह भी पढी और पढने के बाद मन्नू भण्डारी का संपूर्ण लेखन एक नए ही रूप में मेरे सामने खडा था।
हाँ, उसी रोज राजेंद्र यादव से भी मुलाकात हुई। कृति विमोचन के बहाने। अनेक आवरणों से ढका व्यक्ति जो एकदम आवरण-मुक्त था। हंस का संपादकीय पढते हुए हमेशा लगता था कि मारक हथियारों से लेश यह आदमी कितना खतरनाक है मगर पहली और आखरी एक ही मुलाकात में लगा- अरे! यह तो बडा सीधा और सहज व्यक्ति है। मन्नू भण्डारी के साथ रहने वाला राजेंद्र यादव, हंस का संपादकीय लिखने वाला राजेंद्र यादव और यह जो सामने बैठा है, यह क्या एक ही व्यक्ति है? खैर, वे खुश थे। मेरी किताब को देखते हुए कवर को बार-बार गौर से देख रहे थे। पता नहीं कौनसा मोह वहाँ उनको बाँध रहा था। विमोचन के हस्ताक्षर मेरे लिए थाती हैं। राजेंद्र यादव ने उस दिन एक बात जरा जोर देते हुए मुझ से कही थी- प्रभा को अच्छे से समझने के लिए बहुत अधिक अध्ययन की जरूरत है, वह जरा प्रखर बुद्धिवादी थी, अपना अध्ययन जारी रखना।

उस दिन हम दो व्यक्तियों से मिलकर आए, पति-पत्नी से मिलकर आए थे, दो रचनाकारों से मिलकर आए थे, या फिर कहूँ कि साहित्य की दो प्रखर धाराओं से मिलकर आए थे।
मन्नू भण्डारी स्त्री-लेखन का चेहरा होते हुए भी पितृसत्ता की आँखों में कभी नहीं चुभी और राजेंद्र यादव तमाम अखाडेबाजियों के साथ हमेशा पितृसत्ता के आँख की किरकिरी बने रहे। सामाजिक सरोकारों के संग सहज साहित्यिक स्वीकार्यता के साथ मन्नू भण्डारी और नकार की गूँज लिए विवादों से घिरा राजेंद्र यादव। आज दोनों ही हमारे बीच नहीं हैं, पर दोनों ही हमारे साथ हैं।
मन्नू भण्डारी का राजस्थान से विशेष लगाव रहा। वे मध्यप्रदेश की होते हुए भी राजस्थान की अपनी थीं और शायद इसीलिए हम लगभग राजस्थान के सभी विश्वविद्यालयों में उनको पढते-पढाते हैं। राजस्थान का हर एक विद्यार्थी या पाठक उनसे बखूबी परिचित है। उनका लेखन इसी धरा से ऊर्जा पाता रहा। राजस्थान में आंदोलनों का केंद्र रहा अजमेर आज भी गर्व कर रहा है कि मन्नू भण्डारी इसी मिट्टी से उठी और शिखर तक पहुँची। नमन।

सम्पर्क-पार्क के पास, गाँधीनगर,
चूरू-331001 राजस्थान
7597396725