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प्रतिरोध का सौंदर्यशास्त्र : विविध आयाम

पुरुषोत्तम कुंदे

कला और सौंदर्य का गहरा संबंध है। दोनों संकल्पनाओं को लेकर भारतीय तथा पाश्चात्य चिंतकों ने पर्याप्त विचार-विमर्श किया है। कला और सौंदर्य पर विचार करते हुए अनेक प्रश्न उठाए जाते हैं। कलाकार, कला का निर्माण कैसे करता है? सौंदर्य कलाकार की दृष्टि में है या कलाकृति पूर्ण होने पर उसमें सौंदर्य निर्माण होता है? सौंदर्य वस्तु में है या रसिक में? अथवा सौंदर्य वस्तु के गुण में है या आस्-वादक की मनोदशा में? आदि सवालों पर सदियों से चिंतन हो रहा है।
सौंदर्यशास्त्रीय आलोचना में भी उपर्युक्त सवालों पर गहराई से विचार हुआ है। चूँकि सौंदर्यशास्र की स्थापना भी इसी सूत्र को केंद्र में रखकर हुई है कि असल में सौंदर्य किसे कहना चाहिए? मूलतः पाश्चात्य दर्शन के तर्कशास्र, सौंदर्यशास्र, नीतिशास्र, राजनीतिशास्र और सद्वस्तुशास्र (पदार्थ विज्ञान) आदि आधार हैं। इससे यह ज्ञात होता है कि सौंदर्यशास्र पाश्चात्य दर्शन की एक शाखा है। जर्मन दार्शनिक अलेक्झेन्डर बामगार्टेन ने सन् 1735 में अपने शोध प्रबंध मे´ Aesthetics शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम किया है। उन्होंने आगे चलकर सन् 1750 में एस्थेटिका Aesthetica शीर्षक से एक किताब प्रकाशित की, जिसमें सौंदर्यशास्र का स्वतंत्र सिद्धांत, शास्र एवं दर्शन के रूप में प्रतिपादन किया है। Aesthetics शब्द मूल रूप से ग्रीक भाषा के Aesthetikos से बना है। अंग्रेजी में इसका प्रयोग Perception के अर्थ में हुआ है, जिसका हिंदी रूप प्रतिबोधन है। Aesthetics शब्द का मूल अर्थ है- ऐन्द्रिय संवेदना का शास्र । बामगार्टेन की मान्यता है कि सौंदर्य का संबंध ऐन्द्रिय संवेदन से है। सौंदर्यशास्र की संकल्पना के बारे में मानक हिंदी कोश में लिखा है- जिसमें कलात्मक कृतियों, रचनाओं आदि से अभिव्यक्त होनेवाले अथवा उनमें निहित सौंदर्य का तात्त्विक, दार्शनिक और मार्मिक विवेचन होता है, वही सौंदर्यशास्र है।
उक्त विचारों से यह ज्ञात होता है कि सौंदर्यशास्र कलात्मक कृतियों और रचनाओं में निहित सौंदर्य उद्घाटित करता है। लेकिन इस संदर्भ एक प्रश्न यह भी निर्माण होता है कि अगर मानव निर्मित वस्तुओं में ही कलात्मकता देखी गई, तो फिर प्रकृति के सृष्टिगत सौंदर्य का क्या होगा? उसे हम कैसे नकार सकते हैं ? क्योंकि कोई प्राकृतिक दृश्य देखकर हम स्वाभाविक रूप से कहते हैं कि कितना सुंदर दृश्य है! वहाँ महज आस्वादन कर हम सहजता से अपनी प्रतिक्रिया भले ही देते हैं, लेकिन किसी वस्तु या दृश्य को देखते हैं, तो विशिष्ट निर्णय प्रक्रिया शुरू होती है। चूँकि यह निर्णय प्रक्रिया सौंदर्यबोध से संबंधित होती है। हमने बचपन से ही जिन बातों को संस्कारगत सुना एवं पढा है, उसी आधार पर मस्तिष्क में निर्णय-प्रक्रिया आरंभ होती है। कोई चीज या वस्तु विशिष्ट रंग की है, तो वह सुंदर है, विशिष्ट आकार है, तभी सुंदर मानी जाती है। अर्थात् आस्वादन करते समय निर्णय प्रक्रिया निरंतर जारी रहती है। इससे स्पष्ट होता है कि सौंदर्यस्वादन करते समय कुछ तत्त्वों की कसौटी पर हमें सौंदर्यबोध होता है। हमारी दृष्टि से यदि सभी तत्त्व अनुकूल हैं, तो हम उसे सुंदर मानते हैं। मतलब यह कि सौंदर्य निर्णय में हमारी प्रतिक्रिया विवेकशील होती है। कोई चीज क्यों सुंदर लगती है ? अथवा किन तत्त्वों से सुंदर बनती है ? उसका तात्त्विक अध्ययन सौंदर्यशास्र के अंतर्गत किया जाता है। इस संबंध में पर्याप्त विवाद रहा है कि सौंदर्य वस्तु में है या प्रमाता में ? विवाद की यह परंपरा काफी लंबी रही है। इसलिए विवाद के पक्ष और विपक्ष की चर्चा न करते हुए सौंदर्य की प्रतीति सीधे समझना जरूरी है। असल में सौंदर्य पदार्थ या वस्तु का गुण है, उसकी संवेदना के धरातल पर रसिक को प्रतीति होती है। अतः सौंदर्यबोध में रसिक की भूमिका भी बहुत महत्त्वपूर्ण है, लेकिन रसिक को सौंदर्यानुभव कराने के लिए किसी वस्तु की या पदार्थ की आवश्यकता है। अब सवाल यह भी उठता है कि क्या सौंदर्य महज वस्तु और पदार्थ का ही गुण है? फिर भाव, विचार, मूल्य से संबंधित सौंदर्य को कहाँ रखा जाए ? इस संबंध में इतना ही कहा जा सकता है कि सौंदर्य के आंतरिक और बाह्य दोनां पक्षों को सम्मुख रखकर सौंदर्यानुभव प्राप्त किया जा सकता है। जहाँ वस्तु या पदार्थ की बात होगी, वहाँ बाह्य पक्ष पर ध्यान देना चाहिए और जहाँ भाव, विचार मूल्य की बात होगी, वहाँ आतंरिक पक्ष के रूप में सौंदर्य की आवधारणा ग्रहण करना आवश्यक है। सौंदर्य के चाहे आंतरिक पक्ष हो या बाह्य पक्ष, उसका आस्वादक रसिक ही होता है। इस दृष्टि से कह सकते हैं कि पदार्थ का गुण + प्रमाता की दृष्टि = सौंदर्य की संकल्पना साकार होती है। सौंदर्यशास्र में कलाकार, रचना प्रक्रिया, कलाकृति, कलावस्तु, रसिक, सौंदर्यानुभूति आदि संकल्पनाओं को वरीयता देकर ही किसी कला का तात्त्विक विवेचन संभव है।
वर्तमान संदर्भ में सौंदर्यशास्र पर विचार करें, तो कलाओं का स्वरूप, उनकी अभिव्यक्ति, अनुभूति प्रक्रिया में लगातार परिवर्तन हो रहा है। विद्वानों ने कलाओं का वर्गीकरण उपयोगी कला और ललित कला के रूप में किया है। वस्तुतः इस वर्गीकरण का आधार उपयोगिता रहा है। यथा- उपयोगी कलाओं में बढई, लोहार, सुनार, जुलाहा आदि की कलाओं का समावेश किया गया है। ललित कलाओं के अंतर्गत वास्तु कला, मूर्तिकला, संगीत कला चित्रकला, काव्यकला आदि का सन्निवेश है। इस तरह के वर्गीकरण में उपयोग और लालित्य दोनों महत्त्वपूर्ण शब्द हैं। चूँकि उपयोगी कलाएँ दैनंदिन जीवन से जुडी हैं। आमतौर पर ये कलाएँ दैंनदिन व्यवहार में सुविधायुक्त हैं। मानवीय व्यवहार में इन कलाओं की नितांत आवश्यकता है। ललित कलाओं के अंतर्गत उन कलाओं का समावेश है जिनमें लालित्य होता है। साथ ही इनका उद्देश्य सौंदर्यानुभूति है। उपयोग की दृष्टि से ये कलाएँ गौण मानी जाती हैं। लेकिन इस तरह का वर्गीकरण सदोष प्रतीत होता है क्योंकि ललित कलाओं में भी उपयोगिता होती है और उपयोगी कलाएँ भी लालित्य से लबरेज रहती है। एक महत्त्वपूर्ण तथ्य हमें यह भी समझना होगा कि कलाओं का यह वर्गीकरण भले ही एक समय में आवश्यक रहा हो, किंतु आज के दौर में कलाओं के स्वरूप में जो परिवर्तन हो रहा है उस आधार पर ऐसा वर्गीकरण कहाँ तक सुसंगत होगा? यह भी एक सवाल है। साहित्य के वर्तमान परिदृश्य का अवलोकन करें, तो स्पष्ट होता है कि विविध विमर्शों का प्रभाव बना हुआ है। चाहे वह दलित विमर्श हो या स्त्री विमर्श अथवा आदिवासी या मुस्लिम विमर्श। अब सोचनीय पहलू यह है कि क्या सौंदर्यशास्र के प्रतिमान भी बदल रहे हैं? अथवा सौंदर्यशास्त्रीय आलोचना इन परिवर्तनों से कहाँ तक साझा हो रही है? इसलिए कलाओं के बदलते स्वरूप के अनुरूप ही आलोचना ने भी अपना रूख बदलना चाहिए। वर्तमान दौर में विविध विचारधाराओं को केंद्र में रखकर साहित्य सृजन किया जा रहा है। फिर भी इस बात को लेकर प्रायः आपत्ति उठायी जाती है कि ये विमर्शो के लिए स्वतंत्र सौंदर्यशास्त्रीय मानदण्ड बनाने की क्या आवश्यकता है? इस तरह का भेद साहित्य की अखण्डता को बाधित करता है। कुछ लोग यहाँ तक कहते हैं कि इससे पाठक भ्रमित होता है। साहित्य का दायरा सीमित बनता है। सौंदर्यशास्र के तत्त्वों के साथ खिलवाड उचित नहीं है। इस तरह की चर्चा काफी जोर पकड रही है। लेकिन ऐसी धारणा प्रकट करते समय यह बात नजर अंदाज हो जाती है कि इन सभी विमर्श चाहे दलित, स्त्री, आदिवासी, मुस्लिम विमर्श हो, सभी में एक समान सूत्र दिखायी देता है। यह सूत्र है संघर्ष और अस्मिता की पहचान का। इस बात को कोई झूठला नहीं सकता कि सौंदर्यबोध व्यक्ति, स्थल, काल के अनुरूप बदलता रहता है। प्राचीन परंपरा से साहित्य का इतिहास देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि सौंदर्यबोध की अवधारणा तब भिन्न हुआ करती थी। समय के अनुरूप या परिस्थितियों के अनुरूप सौंदर्यबोध भी बदलता है। चूँकि कल्पना और श्ाृंगार में फँसे सौंदर्यबोध को यथार्थ की नींव पकडने में काफी समय लगा है। इस परिप्रेक्ष्य में यह तथ्य भी स्पष्ट रूप से समझना होगा कि सौंदर्यशास्र के तत्त्व नहीं बदले हैं, बल्कि सौंदर्यबोध बदला है, दृष्टिकोण बदला है। पहले भी कृति में निहित सौंदर्य का तात्त्विक अध्ययन होता था और आज भी इसी विचार को केंद्र में रखा गया है। कल्पना की जगह अब सघन संवेदना ने ली है। महज कलावाद की जगह अब जीवनवाद की प्रधानता है। साथ ही अब तक जो बातें साहित्य से या कला से नदारद थीं वे अब केंद्रीय बनी हैं क्योंकि साहित्य की नींव यथार्थ पर आधारित है। संघर्ष, अस्मिता पर आधारित साहित्य ही आज मनुष्य की वास्तविक आवाज है। या दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि अब तक जो वर्ग हाशिए पर रहा है, वही अब साहित्य में प्रधान बना है। यही कारण है कि सौंदर्यबोध में भी परिवर्तन हुआ है और होना स्वाभाविक है। इसलिए एक समय में महज कलाकृति के कलापक्ष पर विशेष ध्यान दिया जाता रहा है, लेकिन आगे आशय की सारगर्भिता को भी महत्त्वपूर्ण माना गया है। वर्तमान में किसी विचारधारा प्रधान कलाकृति का सौंदर्यशास्त्रीय मानदण्डों के आधार पर तात्त्विक विवेचन करते समय आशय और रूप दोनों को सम्मुख रखकर अध्ययन करना आवश्यक है। इसमें दोराय नहीं कि विचारधारा के स्तर पर भले ही दलित, स्त्री, आदिवासी, ग्रामीण में अंतर दिखता हो, किंतु केंद्र में मनुष्य है, न कि धर्म, जाति अथवा लिंग या समुदाय। अतः सौंदर्यशास्त्रीय आलोचना के विभिन्न आयामों को निम्नवत समझने का प्रयास है-
दलित साहित्य का सौंदर्यशास्र -
आदिकाल से आधुनिकाल तक हिंदी साहित्य का अवलोकन करें, तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सदियों से उपेक्षित, पीडित, संत्रस्त दलित वर्ग साहित्य की मुख्य धारा में अपनी जगह कभी नहीं बना सका है। साहित्य लेखन और समीक्षा के मानदण्ड निर्धारित करने का कार्य सवर्णों ने किया है। यही कारण है कि दलित साहित्य का मूल्यांकन स्थापित सौंदर्यशास्त्रीय मानदण्डों की अपेक्षा नए मानदण्डों से होना चाहिए। इसकी पहल मराठी भाषा में कॉमरेड शरद पाटिल ने की है। उन्होंने अब्राह्मणी साहित्याचे सौंदर्यशास्र किताब लिखकर इस बात पर बल दिया कि दलित साहित्य की समीक्षा हेतु स्वतंत्र सौंदर्यशास्र की आवश्यकता है। यह सच है कि स्थापित सौंदर्यशास्र आनंद पर टिका है, तो दलित सौंदर्यशास्र में वेदना, पीडा, दुख पर बल है। डॉ. शरणकुमार लिंबाळे के विचार इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं- सौंदर्य विचार में रसिक वृत्ति और दलित साहित्य में दलित चेतना का मेल कैसे संभव किया जाए? दलित चेतना क्रांतिकारी मानसिकता है। इसलिए दलित समीक्षाकों को सौंदर्य की कल्पना बदलना महत्त्वपूर्ण लगता है। सौंदर्य की कल्पना हर युग में होनेवाले विचारों से संबंधित होती है।
डॉ. लिंबाळे के विचारों से स्पष्ट होता है कि स्थापित सौंदर्यशास्त्रीय तत्त्वों के आधार पर दलित साहित्य की परख संभव नहीं है। यह तथ्य सर्वमान्य है कि दलित साहित्य में आशय महत्त्वपूर्ण माना गया है। लेकिन कलात्मकता की दृष्टि से भी इस पर विचार करना आवश्यक है। डॉ. ओमप्रकाश वाल्मीकि इसी बात की ओर इंगित करते हैं- दलित सौंदर्यशास्र पर विचार करने के लिए किसी भी कृति के आकार और आशय को दृष्टि में रखना होगा। जिस रूप को हम देखते हैं वह उस कृति का आकार होता है। आकार में जो सारतत्त्व या सारत्व बोध विद्यमान रहता है, वह आशय कहलाता है।
उपर्युक्त विचारों में डॉ. वाल्मीकि आशय और आकार के द्वारा भाव एवं कला पक्ष का समन्वय करते हैं। उन्होंने इसी आधार पर दलित सौंदर्यशास्र के मानदण्ड निर्धारित करने की पक्षधरता की है। दलित साहित्य की मूल संवेदना जाति के आधार पर होनेवाले शोषण, दमन, अन्याय, अत्याचार के खिलाफ विद्रोह करना है। इसकी वैचारिक पृष्ठभूमि डॉ. अंबेडकर के विचारों में निहित है। दलित सौंदर्यशास्र में स्वतत्रंता, बंधुता, समता, न्याय बुनियादी तत्त्व हैं। अर्थात् दलित सौंदर्यशास्र की नींव संवैधानिक तत्त्वों पर टिकी है।
संक्षेप में, दलित सौंदर्यशास्र का मूल स्वर महात्मा गौतम बुद्ध और महात्मा फुले के विचारों को उपयोगी मानकर आम्बेडकरवादी विचारधारा को चरम मानता है। दलित सौंदर्यशास्र में ऐसे अनेक तत्त्व हैं जो माक्र्सवाद की ओर ले जाते हैं, किंतु वे माक्र्सवादी सौंदर्यशास्र से भिन्न है।
माक्र्सवादी सौंदर्यशास्र
माक्र्सवादी सौंदर्यशास्र महज राजनीतिक एवं सामाजिक दर्शन की उपज नहीं है। इसके अंतर्गत सौंदर्यबोध में श्रम की भूमिका भी स्पष्ट की गई है। कार्ल माक्र्स तथा एंगेल्स ने कला का सृजन तथा यथार्थ के संबंध पर प्रकाश डाला है। साहित्य लेखन गतिशील प्रक्रिया है। लेकिन साहित्य का मूल्यांकन करने हेतु आलोचना में उतनी ही गतिमानता निर्माण हो रही है अथवा नहीं, असल में यही सोचनीय मसला है। इसीलिए यह जरूरी है कि समय के अनुरूप आलोचना के तत्त्वों में भी बदलाव हो। माक्र्सवादी सौंदर्यशास्र मूलतः जीवन से जुडे हर अनुभव में सौंदर्य देखने की बात करता है। उन्होंने तथाकित सौंदर्यशास्त्रीय प्रतिमानों को इसलिए नकारा है कि सौंदर्य कोई असीम सत्ता नहीं है। लेकिन माक्र्सवादी जीवन और यथार्थ के साथ सौंदर्य का संबंध जोडते हैं। इस संदर्भ में डॉ. रामविलास शर्मा के विचार उल्लेखनीय हैं- सौंदर्यशास्र का विवेच्य विषय साहित्य तथा अन्य ललित कलाओं के अतिरिक्त प्रकृति और मानव जीवन का सौंदर्य भी है। सौंदर्य और उसकी अनुभूति का विवेचन उत्सुकता की शांति के लिए ही नहीं है, उसका उद्देश्य हमारी सौंदर्य चेतना को उत्तरोत्तर विकसित करना, मानव जीवन और उसके सामाजिक तथा प्राकृतिक परिवेश को और भी सुंदर बनाना है।
जाहिर है कि स्थापित सौंदर्यशास्र जहाँ मानवनिर्मित ललित कलाओं के तात्त्विक विवेचन को ही सौंदर्यशास्र की परिधि मानता है, वही माक्र्सवादी सौंदर्यशास्र प्रकृति और मानव जीवन का सौंदर्य भी उसमें समाहित करता है। सौंदर्य के बारे में भी माक्र्सवादी विचारक अलग-अलग सोचते हैं। डॉ. रामविलास शर्मा के विचारों द्वारा इस बात की पुष्टि होती है। सौंदर्य किसे कहते हैं? प्रकृति, मानव जीवन तथा ललित कलाओं के आनंददायक गुण का नाम सौंदर्य है। इस स्थापना पर आपत्ति यह की जाती है कि कला में कुरूप और असुंदर को भी स्थान मिलता है, दुखांत नाटक देखकर हमें वास्तव में दुख होता है, साहित्य में बीभत्स का भी चित्रण होता है; उसे सुंदर कैसे कहा जा सकता है? इस आपत्ति का उत्तर यह है कि कला में कुरूप और असुंदर विवादी स्वरों के समान है, जो राग के रूप को निखारते हैं। वीभत्स का चित्रण देखकर हम उससे प्रेम नहीं करने लगते, हम उस कला से प्रेम करते हैं जो हमें वीभत्स से घृणा करना सिखाती है। वीभत्स से घृणा करना सुंदर कार्य है या असुंदर? जिसे हम कुरूप, असुंदर और वीभत्स कहते हैं, कला में उसकी परिणति सौंदर्य में होती है। इससे यह बात भी स्पष्ट होती है कि सुंदरता देखने के लिए यह जरूरी नहीं कि महज सुखदायी चित्रण कला में होना जरूरी है। दुखद घटनाओं, प्रसंगों में भी सौंदर्य की अनुभूति संभव है क्योंकि वहाँ कलात्मकता में सौंदर्य अनुभव किया जाता है। माक्र्सवादी सौंदर्यशास्र इसी विचार का आग्रह करता है।
स्त्रीवादी साहित्य का सौंदर्यशास्र
स्त्रीवाद का आरंभ एक आंदोलन के रूप में हुआ जो अस्मिता की बुनियाद पर खडा है। जिस तरह दलित वर्ग सदियों से शोषण सहते आया है वही बात नारी के संदर्भ में भी लागू होती है। स्त्रीवाद में यह आग्रह है कि नारी भी एक मनुष्य है। नारी विमर्श के अतंर्गत उसे देवी बनाकर पूजने की अपेक्षा मानव रूप में स्थापित करने पर अधिक बल दिया है। भारतीय साहित्य के संबंध में विचार करें, तो आजकल अनेक महिलाएँ लेखन कर रही हैं। लेकिन जब बात उनके साहित्य की आलोचना की आती है, तो पुरुष की दृष्टि से जो रचना में निहित है, वही आलोचना में उद्घाटित होता है। इसलिए यह आवश्यक है कि स्त्रीवादी साहित्य के सौंदर्यशास्त्रीय मानदण्ड बनाने के लिए महिला लेखिकाओं ने पहल करनी चाहिए। इसे विवाद का मसला न समझते हुए बहस की अपेक्षा अमल करने की आवश्यकता है। इसमें दोराय नहीं है कि नारी को प्रायः ही भोग की दृष्टि से ही देखा गया है। वर्तमान दौर में इतने सारे कानून और आंदोलनों के चलते भी हालतों में संतोषजनक सुधार नहीं है। वर्तमान व्यवस्था में भी नारी को महज वस्तु के रूप में प्रस्तुत करने पर अधिक जोर दिया जा रहा है। विविध मॉल में प्रस्तुत नारी देह के प्रतिरूप या सौंदर्य प्रतियोगिताओं का स्वरूप इसी बात की ओर इंगित करता है। सोचनीय तथ्य यह है कि स्त्रीवाद में इस संदर्भ में बहुत कम प्रतिरोध दिखायी देता है। इसका सीधा अर्थ निकलता है कि आज भी स्त्री को किस रूप में प्रस्तुत करना है, पुरुष ही तय करता है। लेकिन जब बात महिलाओं के अधिकार और समानता की आती है तब महिलाओं को यह लडाई स्वयं लडनी होती है क्योंकि वर्तमान में भी स्थितियाँ ऐसी ही दिखायी देती हैं। सूचना क्रांति और नॅनो टेक्नोलिजी के इस दौर में भी मंदिर में प्रवेश पाने के लिए महिलाओं को स्वतंत्र आंदोलन करना पडता है (शनि शिंगणापुर, महाराष्ट्र की घटना)।
इसलिए यह जरूरी है कि स्त्रीवादी साहित्य के मूल्यांकन के लिए और आस्वादन हेतु स्वतंत्र मानदण्डों का निर्माण भी महिलाओं के द्वारा होना चाहिए। इसे बँटवारा न मानते हुए सकारात्मक धरातल पर पहल जरूरी है। लेकिन इस तरह से स्वतंत्र स्त्रीवादी सौंदर्यशास्र की बात करने पर बहुत बार कुछ लोग नाक भौं सिकोडते हैं। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि वे जमीनी यथार्थ से रू-ब-रू नहीं होना चाहते हैं। क्या इस सच्चाई को झुठलाया जा सकता है कि महिला लेखिकाओं के साहित्य पर शोध कार्य करनेवालों में महिलाओं की संख्या अधिक है। यही बात दलित साहित्य के संदर्भ में भी लागू होती है। वहाँ भी दलित छात्र ही अधिकतर हैं जो दलित साहित्य पर अनुसंधान करते हैं। तो यह आवश्यक है कि अनुभूति और अभिव्यक्ति के स्तर पर स्वतंत्र स्त्रीवादी सौंदर्यशास्त्रीय प्रतिमान महिलाओं के द्वारा स्थापित कर उसी आधार पर स्त्रीवादी लेखन को समझना जरूरी है।
आदिवासी साहित्य का सौंदर्यशास्र
यह एक महत्त्वपूर्ण सवाल है कि समाजशील मनुष्य किसे कहना चाहिए? क्या इमारतों के जगंलों में रहनेवाला आदमी ही समाजशील है? तो फिर सदियों से एक ऐसा तबका जो जंगलों की शरण में रहता है, क्या उसे समाजशील नहीं मानना चाहिए? भारत में झारखण्ड, छत्तीसगढ, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, पूर्वांचल राज्य तथा महाराष्ट्र में भी आदिवासी लोग निवास करते हैं। आदिवासी शब्द का अर्थ है- आदिम युग में रहने वाली जातियाँ। भारतीय संदर्भ में विचार करें, तो जल, जंगल, जमीन और प्रकृति पर हमेशा आदिवासी लोगों का अधिकार रहा है। लेकिन औपनिवेशवादी प्रवृत्ति के कारण उनका शोषण आरंभ हुआ और मजबूरन उन्हें जंगल की शरण में जाना पडा। आदिवासी विमर्श को आंदोलन का रूप देने में दलित आंदोलन की पृष्ठभूमि महत्त्वपूर्ण रही है। आदिवासी विमर्श भी मूलतः अस्मिता की लडाई है। आदिवासी आंदोलन में ही आदिवासी साहित्य की वैचारिकी बनी है। जिसमें दलित साहित्य की भांति वेदना, पीडा, आक्रोश का भाव मौजूद है। एक तरह से उपेक्षा और अन्याय के विरूद्ध प्रतिरोध का स्वर यहाँ प्रखर लगता है। एक समय तीर और कमान को सबकुछ मानने वाले आदिवासी जब शिक्षा की धारा में और सामाजिक गतिविधियों में शामिल हुए तो उन्हें समझने में देर नहीं लगी कि इसी आधार पर अब हमारा शोषण चल रहा है। शिक्षा के द्वारा कलम उनके हाथों में आयी और परिवर्तन की बात वे कलम के द्वारा कहने लगे हैं। आदिवासी विमर्श का यही से आगाज हुआ है। आदिवासियों में स्वत्व बोध की प्रवृत्ति निर्माण होने लगी और उसे साहित्य में भी स्थान मिलना आरंभ हुआ है। अतः इस समुदाय की परंपरा, रूढियाँ, संस्कृति, अन्याय, अत्याचार को आधार बनाकर उनकी लोककलाएँ, संगीत, नृत्य, संस्कृति, भाषा, बोली, लिपि, तीज-त्यौहार आदि तत्त्वों के आधार पर सौंदर्यशास्त्रीय प्रतिमान बनाकर आदिवासी साहित्य का सौंदर्यशास्र बनाने की आवश्यकता है। यहाँ जो बिंब, प्रतीक और मिथकीय अनुभूति को वाणी मिली है वह स्थापित साहित्यधारा से पूर्णतः अलग है।
ग्रामीण एवं आँचलिक साहित्य का सौंदर्यशास्र
ग्रामीण साहित्य एवं आँचलिक साहित्य दोनों भिन्न संकल्पनाएँ हैं। ग्रामीण साहित्य के केंद्र में समग्र ग्रामीण परिवेश होता है। अर्थात पात्रों के जन-जीवन से जुडे अनुभवों के आधार पर ही रचना का ताना-बाना बुना जाता है। रचनाकार ग्रामीण सरोकारों, कृणक संस्कृति, भाषा, बोली, रीति-रिवाज, परंपराएँ, लोकजीवन सभी तत्त्वों को सम्मुख रखकर सृजन करता है। हिंदी में प्रेमचंद युग से ही ग्रामीण सरोकारों से जुडा लेखन प्रारंभ हुआ है, जिसमें गाँव और गाँव के लोगों की समस्याओं को उठाया गया है। किसानों का जीवन विशेष रूप से केंद्र में रहा है। ग्राम्य जीवन की विशेषताओं का चित्रण करने में रचनाकार तभी सफल हो सकता है जब वह स्वयं ग्रामीण सरोकारों से जुडा हो। सन् 1920 के आस-पास गाँधी विचारधारा का प्रभाव बढ गया और स्वयं महात्मा गाँधी ने गाँव की ओर चलने का नारा दिया (Go Back to Village) । समकालीन लेखकों पर इस विचार धारा का गहरा असर हुआ। ग्रामीण जीवन से जुडी विपदाओं को वाणी मिली। यहीं से हिंदी ग्राम्य जीवन से जुडे साहित्य ने अपनी अलग पहचान बनाते हुए दस्तक दी है।
सन् 1954 में फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास मैला आँचल ने भारतीय मानस को सीधे गाँव, प्रदेश, भूखण्ड के स्तर पर रू-ब-रू किया है। उन्होंने आँचलिकता के स्तर पर स्वयं की ग्राम्य चेतना अलग साबित की है। स्पष्ट है कि ग्राम्य जीवन से जुडा साहित्य और आँचलिक साहित्य अनेक समानताओं के बावजूद भी भिन्न है। ग्रामीण जीवन में गाँव का आदमी केंद्र में है, तो आँचलिकता के केंद्र में अँचल या प्रदेश विशेष । अब सौंदर्यशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य में विचार करना है, तो ग्रामीण जीवन से जुडे प्रतीक, बिंब, भाषा, लोकजीवन, रीति-रिवाज, रहन-सहन आदि का स्वतंत्र रूप से सौंदर्यशास्त्रीय धरातल पर विचार करना जरूरी है। साथ ही ग्रामीण जीवन के सरोकार भी निश्चित आयामों में अभिव्यक्त करना आवश्यक है। इसलिए स्वतंत्र रूप से ग्रामीण एवं आँचलिक साहित्य के सौंदर्यशास्त्रीय मानदण्डों को निर्धारित करने के लिए रचनाकार की भाँति ग्रामीण परिवेश और आँचलिक विशेषताओं को गहराई से समझना आवश्यक है।
अतः कह सकते हैं कि साहित्य में जो विचारधाराएँ सक्रिय रही हैं, उनके अनुरूप ही साहित्य चेतना भी परिवर्तित हुई है। इन सभी विमर्शों में भले ही कुछ अलगाव के बिंदु लक्षित होते हैं, किंतु सभी के मूल में मानव ही है। प्रत्येक विमर्श में प्रतीक, बिंब, सौंदर्य, कल्पना, मिथकों का प्रयोग नए रूपों एवं भिन्न संदर्भों में हुआ है। अतः इन्हें समझना है तो स्वतंत्र सौंदर्यशास्र के मानदण्डों को तराशना होगा तभी हर विमर्श में निहित मूल अस्मिता और संवेदना समझी जा सकती है। चूँकि संवेदना और सौंदर्य का गहरा संबंध है।
निष्कर्षतः सौंदर्य एक महत्त्वपूर्ण मूल्य है। आजकल हम कलाओं की निर्मिति प्रक्रिया में पर्याप्त परिवर्तन देख रहे हैं। प्राचीन कलाओं से लेकर वर्तमान डिजिटल फोटोग्राफी तक जितनी भी कलाएँ निर्माण हो रही हैं उनमें समय के अनुरूप परिवर्तन हुआ है। ठीक यही बात सौंदर्यशास्त्रीय आयामों में भी दिखनी चाहिए क्योंकि सौंदर्यबोध व्यक्ति, समाज, समय और परिस्थिति सापेक्ष होता है।
संदर्भ संकेत -
1. मानक हिंदी कोश (पाँचवा खण्ड) - संपा. रामचंद्र वर्मा, पृष्ठ- 462
2. दलित साहित्य का सौंदर्यशास्र-डॉ. शरण कुमार लिंबाले, पृष्ठ- 116
3. दलित साहित्य का सौंदर्यशास्र- डॉ. ओमप्रकाश लिंबाले, पृष्ठ- 49
4. आस्था और सौंदर्य-डॉ. रामविलास शर्मा, पृष्ठ- 20
5. आस्था और सौंदर्य - डॉ. रामविलास शर्मा, पृष्ठ- 20

सम्पर्क- प्रभारी प्राचार्य,
न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एण्ड साइन्स कॉलेज,
शेवगाँव. जि.अहमदनगर
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मो. 9552554284