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निराला काव्य का सांगीतिक सौंदर्य : प्रयोग की संभावनाएँ

प्रीति प्रकाश प्रजापति
आधुनिक हिंदी कवियों में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला उन विरल रचनाकारों में से हैं, जिन्होंने कविता और संगीत के बीच संबंध को नए युग में नए सिरे से पहचानने और परिभाषित करने का प्रयास किया। यद्यपि आर्थिक अभाव के कारण उन्हें शास्त्रीय संगीत का विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर नहीं मिल पाया, परन्तु दीर्घकाल तक बंगाल में रहने के कारण वहाँ के सांस्कृतिक व कलात्मक वातावरण का उन पर गहरा प्रभाव पडा। इसके अतिरिक्त उनके भीतर संगीत प्रेम विकसित करने में उनकी पत्नी मनोहरा की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही और उनके स्वयं के अध्यवसाय ने भी इस दिशा में उनके ज्ञान का परिवर्धन किया।
निराला जहाँ एक ओर रवींद्र संगीत और माइकल मधुसूदन दत्त के नाटकों में प्रयुक्त संगीत में भारतीय शास्त्रीय और पाश्चात्य संगीत का मिश्रित प्रभाव व प्रयोगशीलता देख रहे थे, वहीं वे हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में ख्याल गायकी व ब्रजभाषा के बीच जड हो चुके रूढिवादी संबंध को भी पहचान रहे थे। इसी कारण वे खडी बोली हिंदी के उच्चारण-संगीत के अनुरूप नवीन जीवन बोध को व्यक्त करने वाले नए ढंग के गीत रचना चाहते थे। गीतिका की भूमिका में वे लिखते हैं - मैं खडी बोली में जिस उच्चारण-संगीत के भीतर से जीवन की प्रतिष्ठा का स्वप्न देखता आया हूँ, वह ब्रजभाषा में नहीं है।1 रूढिबद्ध ढंग से ब्रजभाषा में ख्याल गाने वाले शास्त्रीय गायकों की गायन शैली का उपहास करते हुए वे लिखते हैं कि हिंदी-गवैयों का सम पर आना मुझे ऐसा लगता था, जैसे मजदूर लकडी का बोझ मुकाम पर लाकर धम्म से फेंककर निश्चिन्त हुआ।2
चाहे ब्रज भाषा में गाया जाने वाला हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत हो अथवा खडी बोली हिंदी की कविता, निराला रूढिबद्ध भावबोध, भाषा और शिल्प हर स्तर पर युगानुरूप परिवर्तन के पक्षधर रहे हैं। यही कारण है कि उन्होंने कविता में जिस प्रकार के सृजनात्मक प्रयोग करते हुए, भावबोध और शिल्प के स्तर पर जो वैविध्यमय ढाँचा तैयार किया वह उनकी प्रगतिशीलता का प्रमाण है। उनकी कविताओं और गीतों में छंद और लय के जो विभिन्न रूप देखने को मिलते हैं, वे परंपरा और प्रयोग के द्वंद्व से सतत गतिशील उनकी सर्जनात्मक चेतना की उपज है। उनके द्वारा प्रयुक्त मुक्त छंद अपनी जीवन धर्मी लय के कारण जहाँ कई रूपों में गाया जा सकता है वहीं उसमें नाटकीय वाचन की पर्याप्त संभावनाएँ भी मौजूद हैं। उनका कहना है - हिंदी में मुक्त-काव्य कवित्त-छंद की बुनियाद पर सफल हो सकता है। कारण, यह छंद चिरकाल से इस जाति के कण्ठ का हार हो रहा है। दूसरे, इस छन्द में एक विशेष गुण यह भी है कि इसे लोग चौताल आदि बडी तालों में तथा ठुमरी की तीन तालों में भी सफलतापूर्वक गा सकते हैं, और नाटक आदि के समय इसे काफी प्रवाह के साथ पढ भी सकते हैं।3
भारतीय संगीत के विकास क्रम के गहन अध्ययन के आधार पर उन्होंने यह भी बताया कि ऋषियों के मुख से उच्चरित वेदों का उन्मुक्त संगीत राज दरबारों में पहुँचने पर किस प्रकार आध्यात्मिक आनंद से च्युत हो गायक कलाकारों के कण्ठ में आकर लौकिक आनंद का विषय बन गया और धीरे-धीरे रूढियों में बँधता चला गया। कहीं ना कहीं इस यात्रा में उसकी प्राणवत्ता क्षीण हुई है।
वे रूढिबद्ध ढाँचे में जकडे शास्त्रीय संगीत की उपमा शस्त्रों के बोझ से दबे उस असहाय सिपाही से देते हैं जो शत्रु पर वार करना तो दूर आत्मरक्षा में भी असमर्थ हो जाता है। अधिक अस्त्र-शस्त्र बाँधने से शस्त्र-संचालन की असली शक्ति जिस तरह काम नहीं करती-सिपाही बोझ से दब जाता है - दूसरे पर विजय करने की जगह उसी के प्राण संकट में पडते हैं, वैसे ही तानों के भार से संगीत के क्षीण वृन्त पर खिला पुष्प-शरीर झुकता गया।4
निराला ने गीतिका में विभिन्न प्रकार की तालों के आधार पर कई गीतों की रचना की है, जैसे तीन ताल, दादरा, चौताल और झपताल आदि। रचनाओं के राग का निर्णय वे गायकों पर ही छोड देते हैं क्योंकि आर्थिक अभाव में रहते हुए हारमोनियम की अनुपलब्धता के कारण वे स्वयं उनकी धुनें तैयार नहीं कर पाए।
निराला ने अपने गीतों के माध्यम से खडी बोली हिंदी में काव्य और संगीत के मनोरम संयोग से उस समय एक नया प्रतिमान रचा जब परम्परागत हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की ख्याल गायकी में संगीत की तुलना में काव्य को नगण्य स्थान मिल रहा था। शब्दावली का उपयोग केवल ताल के मीटर में फिट करने के लिए यांत्रिक रूप से किया जाता था। गायकों की दृष्टि में केवल संगीत पक्ष की प्रधानता थी जिसके संचरण के लिए शब्दावली एक ढाँचा मात्र थी। निराला का ध्यान हिंदी में गीत रचनासम्बंधी प्रयोगों पर तो था ही, शास्त्रीय संगीत में भी वे काव्यात्मक सौंदर्य के सम्मिलन से युगानुरूप सौंदर्य बोध उत्पन्न कर नवीन प्राणों का संचार करना चाहते थे। वे लिखते हैं, प्राचीन गवैयों की शब्दावली, संगीत की रक्षा के लिए, किसी तरह जोड दी जाती थी; इसलिए उसमें काव्य का एकान्त अभाव रहता था। आज तक उनका यह दोष प्रदर्शित होता है। हृस्व-दीर्घ की घट-बढ के कारण पूर्ववर्ती गवैये शब्दकारों पर जो लाँछन लगता है, उससे भी बचने का प्रयत्न किया है।5
निराला राज दरबारों में प्रचलित चमत्कारिक कलाबाज़ी, उखाड-पछाड से युक्त शास्त्रीय संगीत की तुलना में भक्त कवियों के कण्ठों से निसृत सहज माधुर्य से युक्त संगीतात्मक पदों को उत्कृष्ट और अधिक प्रभावशाली तो मानते थे, परन्तु अपने युग और परिवेश की दृष्टि से वे उनके अनुसरण से भी संतुष्ट नहीं थे। हिंदी-संगीत की शब्दावली और गाने का ढंग, दोनों मुझे खटकते रहे। न तो प्राचीन ऐसो सिय रघुबीर भरोसो शब्दावली अच्छी लगती थी, यद्यपि इसमें भक्ति भाव की कमी न थी, न उस समय की आधुनिक शब्दावली तोप-तीरें सब धरी रह जाएँगी मगरूर सुन, यद्यपि इसमें वैराग्य की मात्रा यथेष्ट थी।6
आधुनिक हिंदी खडी बोली में निराला काव्य सौंदर्य व संगीत के संयोग से जिस नवीन गीत शैली को विकसित करना चाहते थे वह परंपरागत हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की ख्याल गायकी और भक्त कवियों की पद शैली से भिन्न थी। जहाँ तक अपने गीतों के भाव और विषय वस्तु के साथ रागों के सम्बन्ध का प्रश्न है, निराला रूढिमुक्त और खुली सोच से काम लेते हैं। वे अपने गीतों के लिए राग चयन का निर्णय गाने वालों पर ही छोड देते थे, ताकि उनमें लचीलेपन की पर्याप्त गुंजाइश बनी रहे।
निराला काव्य और संगीत के परंपरागत संबंध को युग की माँग के अनुरूप नए सिरे से परिभाषित करना चाहते थे। वे चाहते थे कि परंपरा और आधुनिकता के द्वन्द्व से उपजी रचनात्मक प्रेरणा के आधार पर एक ऐसे नवीन काव्य रूप की सृष्टि हो, जिसमें एक ओर काव्य के स्तर पर आधुनिक भावबोध की अभिव्यक्ति के साथ-साथ रूढिबद्ध छंदानुशासन से मुक्ति तथा दूसरी ओर शास्त्रीय संगीत के स्तर पर रागदारी गायकी में काव्यात्मक शब्दावली के संयोग से नवीन कलात्मक सौंदर्य की सृष्टि संभव हो। इस प्रकार काव्य और संगीत दोनों कलाओं में संवाद के कारण उनकी सम्प्रेषणीयता में वृद्धि होगी और वे अधिक प्रगतिशील, समृद्ध और अर्थवान सिद्ध होंगी।
संगीत और काव्य के अंतर्सम्बन्ध को लेकर निराला द्वारा व्यक्त किए गए विचारों के आलोक में जब हम उनकी कविताओं का आँकलन करना आरम्भ करते हैं तब इन दोनों कलाओं के मनोरम संयोग की व्यापक संभावनाएँ हमें स्पष्ट नजर आने लगती हैं।
निराला बहुमुखी प्रतिभा के धनी, एक सतत प्रयोगधर्मी रचनाकार हैं। उन्होंने छंदबद्ध, मुक्त छंद और छंदमुक्त सभी प्रकार की कविताएँ रची हैं, जिनको संगीतबद्ध करना, मेरे लिए सदैव एक चुनौतीपूर्ण और मूल्यवान रचनात्मक अनुभव रहा है। काव्यात्मक समझ और सांगीतिक ज्ञान दोनों ही दृष्टियों से यह प्रक्रिया मेरे लिए अत्यंत सार्थक तथा समृद्धकारी रही है। मैंने सदैव यह कोशिश की है कि कविताओं में व्यक्त भावानुभूति और अर्थ-छवियों को बिना क्षति पहुँचाए, मैं संगीत के माध्यम से श्रोताओं को एक नवीन कलात्मक अनुभव का आस्वाद करा सकूं। शब्द, वाक्य, यति और गति के समुचित संयोजन से सघन प्रभावान्विति उत्पन्न होने के साथ-साथ कविताएँ अधिकाधिक जनसंप्रेषणीय हो सकें।
कविता चाहे छंदबद्ध हो, मुक्त छंद हो अथवा छंद-मुक्त, उसमें गेयता की सम्भावना सदैव बनी रहती है। आवश्यकता है, तो बस, उसे खोजने की। उसमें विद्यमान नाद सौंदर्य को उद्घाटित करने की। उदाहरण के लिए हम उनके दो प्रगीतों को लेते हैं- स्नेह निर्झर बह गया है और तोडती पत्थर।
इन दोनों प्रगीतों में व्यक्त काव्यानुभूति की स्वरूपगत भिन्नता को विश्लेषित करते हुए सुप्रतिष्ठ आलोचक, डॉक्टर नित्यानंद तिवारी ने स्पष्ट किया है- पहली कविता का विषय स्वयं कवि-व्यक्ति है। दृष्टि भी कवि की है और दृश्य भी उसी के जीवन के हैं। दूसरी कविता में दृष्टि कवि की है, लेकिन दृश्य बाहर का या सामाजिक है। पहली कविता में वैयक्तिक जीवन के विवरण भावना को घनीभूत करते हैं, दूसरी कविता के विवरण वस्तुगत दृश्य का नाटकीय संगठन करते हैं। पहली कविता में भाव का प्रवाह है और कवि की दृष्टि उस भाव की साक्षी भर है। दूसरी कविता में कवि दृष्टि के साथ, बाह्य दृश्य और घटना का तनाव है।7
पहली कविता छंदबद्ध है और दूसरी मुक्त-छंद। मैंने इन दोनों कविताओं का सांगीतिक रूपांतरण करते हुए यह अनुभव किया है कि उनमें निहित सघन भावानुभूति व उसकी मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति इस रूपांतरण से और अधिक उदात्त, प्रगाढ, तीव्र व गहरी हुई है। जिससे उनकी सम्प्रेषणीयता को विस्तार मिला है ।
ऐसी कविताएँ जिनमें एक से अधिक भाव सक्रिय हों, की धुन तैयार करना अपेक्षाकृत अधिक जटिल कार्य है। उदाहरण के लिए स्नेह निर्झर बह गया है कविता को ही लें, जिसके मूल में सार्थकता-निरर्थकता, आस्था-अनास्था तथा हर्ष-विषाद के द्वंद्वात्मक भाव सक्रिय हैं । इस कविता को स्वरबद्ध करते समय मेरे मन में कई रागों जैसे यमन, शिवरंजनी, मारवा और पूरिया धनाश्री की परिकल्पना आई। परंतु अंत में राग तिलक कामोद में धुन तैयार हुई।
इस कविता में कवि के अवसाद युक्त मन की पुकार है। वह इस जगत को अपनी रचनात्मकता का श्रेष्ठ अवदान दे चुका है। अपने यौवन काल में उद्दाम प्रेम के भरपूर क्षणों का आनंद ले चुका है। वह एक आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी रहा है तथा विलक्षण प्रतिभा और रचनात्मक सामर्थ्य से युक्त है। किंतु वर्तमान में बढती उम्र के साथ अपने शिथिल व जर्जर होते शरीर, प्रेम रहित शुष्क एकाकी जीवन व समाज की दृष्टि में अलक्षित व उपेक्षित रह जाने की पीडा से व्यथित है। वह अपने भीतर विद्यमान अदम्य जिजीविषा और आस्था के बावजूद व्यर्थता-बोध से ग्रस्त है। उसकी अवसाद पूर्ण मनःस्थिति को उभारने में राग तिलक कामोद की मार्मिक स्वर संगतियाँ बडी अनुकूल बन पडी हैं। इसे मैंने रूपक ताल, मध्य लय में निबद्ध किया है। यदि आप इस कविता को ध्यान से पढेंगे, तो पाएँगे कि छंदबद्ध होने पर भी प्रथम दो पंक्तियों स्नेह निर्झर बह गया है, रेत ज्यों तन रह गया है की अगली कुछ पंक्तियों का आकार छोटा-बडा है-
आम की यह डाल जो सूखी दिखी,
कह रही है -अब यहाँ पिक या शिखी,
नहीं आते, पंक्ति मैं वह हूँ लिखी,
नहीं जिसका अर्थ -
जीवन दह गया है।
इन्हें लय व ताल के परंपरागत ढाँचे में बाँधना संभव नहीं था। शब्दों को बिना तोडे-मरोडे तथा भाव और अर्थ को क्षति पहुँचाए बिना, यति-गति को ध्यान में रखते हुए, पंक्तियों का विभाजन व उनके अनुकूल स्वरों का उतार-चढाव साधते हुए स्वर-संयोजन को प्रभावोत्पादक बनाना अपने आप में चुनौतीपूर्ण था।
तोडती पत्थर कविता मुक्त-छंद में रचा गया प्रगीत है। इसका भाव बोध और शिल्पगत ढांचा अपनी बनावट और बुनावट में, रचनाशीलता के रूढिवादी साँचे को कई स्तरों पर तोडता है। भरी दोपहरी में इलाहाबाद के पथ पर पत्थर तोडने में तल्लीन, ग्रीष्म की कडी धूप, लू व धूल के थपेडे सहती मजदूरिन की वेदना व संघर्ष-चेतना से संयुक्त कवि की सहानुभूति गहन संवेदना में रूपांतरित हो जाती है। यह रुपांतरण कविता के भाव बोध को उदात्त मनोभूमि पर ले जाता है। मजदूरिन का अनथक श्रम, संघर्ष, उसके भीतर का आक्रोश, दृढता, विरोधी प्राकृतिक वातावरण तथा स्वयं कवि की द्रवित मनोदशा व करुणार्द* दृष्टि कविता में संवेदना को गहराई और विस्तार प्रदान करते हैं। भावों और दृश्यों के बीच का तनाव नाटकीय द्वन्द की सृष्टि करता है। भावों का उतार-चढाव, आरोह-अवरोह के अनुरूप, शब्दों और वाक्यों के बीच की यति-गति तथा लय का बदलता प्रवाह, यह सभी तत्त्व मिलकर इस कविता को एक प्रयोगधर्मी और प्रभावपूर्ण रचना बनाते हैं।
जब इस कविता को संगीतबद्ध करने का विचार आया, तो मेरे सामने कई चुनौतियां थीं जैसे-सूक्ष्म-कोमल भावों के तरल, अंतर्मुखी चित्रण के स्थान पर कठोर व शुष्क जीवन यथार्थ से उद्वेलित कवि की सचेत व सघन भावानुभूति का चित्रण, जिसके मूल में अंतर्मुखता और बहिर्मुखता का द्वन्द्व सक्रिय है। यहाँ श्रमशील स्त्री का अनथक संघर्ष तथा उसके प्रति कवि के मन में उत्पन्न करुणा के उद्रेक का मर्मस्पर्शी अंकन है। यहाँ चित्रित स्त्री, आभूषणों से सुसज्जित, परंपरागत, सुकोमल नायिका नहीं वरन एक फटेहाल, पत्थर तोडने वाली मजदूरिन है। निराला इस कविता में सौंदर्य-बोध का एक नया प्रतिमान रचते हैं। इस कविता की विशेषता है, भावों का सघन, संयत प्रवाह, जहाँ न तो वह मजदूरिन अपनी स्थिति पर विलाप करती है और न ही कवि उसके प्रति करुणा से द्रवित होकर, आँसुओं की धार बहाता है। कविता में जब मजदूरिन और कवि की दृष्टि मिलती है, तब मजदूरिन की प्रतिक्रिया और कवि की संवेदना का एक नया रूप उभर कर सामने आता है कवि को स्वयं यह अनुभव होता है जैसे करुणा के एक नए स्तर से उसका साक्षातकार हुआ हो।
देखते देखा मुझे तो एक बार,
उस भवन की ओर देखा छिन्नतार
देख कर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोई नहीं,
सजा सहज सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो,
थी सुनी झनकार।
कविता की भाषा यथार्थ-चित्रण के अनुकूल है। यहाँ बँधी-बँधायी लययुक्त, कोमलकांत व अलंकृत पदावली के स्थान पर, विरोधी प्राकृतिक वातावरण के बीच, कठोर श्रम करती मजदूर स्त्री की वेदना और आक्रोश भरी मनःस्थिति को दर्शाते हुए कवि ने, अनलंकृत शैली में, क्रियापदों की लडियों में पिरोए शब्दों व छोटे-बडे व्यंजनापूर्ण वाक्यों का प्रयोग किया है। भाषा के प्रवाह के अनुरूप ही लय बदलती है। कथ्य की मार्मिकता और भावों के उतार-चढाव की अभिव्यक्ति के लिए तत्सम-तद्भव तथा कोमल-कठोर शब्दावली का चुनाव किया गया है। समूची कविता में, कवि द्वारा देखे गए दृश्य व उनसे उपजी करुणा का जो गत्यात्मक चित्र उकेरा गया है तथा जिस जीवनधर्मी लय-प्रवाह को साधा गया है, उसके लिए मुक्त छंद का प्रयोग सर्वथा उपयुक्त है।
कविता का आरंभ एक सामान्य से सूचनात्मक कथन से होता है। कवि ने इलाहाबाद के पथ पर पत्थर तोडती स्त्री को देखा। जैसे-जैसे कविता आगे बढती है, ग्रीष्म का प्रकोप भी बढता जाता है। कवि ने विरोधी प्राकृतिक स्थिति की तीव्रता को उभारने में ग्रीष्मकालीन दोपहर के पूरी प्रचण्डता के साथ गहराते जाने का जिस तरह अंकन किया है, वह उस मजदूर स्त्री के कठोर श्रम व संघर्ष को अपनी समूची दारुणता के साथ हमारी चेतना पर अंकित कर देता है। कवि द्वारा दिया गया एक-एक ब्यौरा हमारे भीतर उत्पन्न करुणा को अधिक सघन और तीव्रतर बनाता है। कविता में व्यक्त संवेदना की विशेषता यह है कि मजदूर स्त्री से कवि तथा कवि से पाठक की चेतना के तादात्म्य की प्रक्रिया धीरे-धीरे जब अपने चरम पर पहुँचती है, तब चेतना में व्याप्त करुणा द्रवित होकर बह नहीं जाती, वरन प्रगाढ होकर थम-सी जाती है। वह हमारी चेतना को झकझोरती हुई शोषित व श्रम-जीवी मनुष्य तथा निर्मम व शोषक व्यवस्था के मूल में सक्रिय तनाव व तद्जन्य द्वंद्व को जाग्रत कर हमें सोचने को विवश करती है।
इस कविता में व्याप्त पीडा, वेदना, आक्रोश, करुणा, ओज तथा संघर्ष-चेतना सम्मिलित रूप में संचरित होकर, जिस उदात्त भाव-भूमि का सृजन करती है, उसे व्यक्त करने में कौन-सा राग, कौन-सी स्वर संगतियाँ, ताल तथा लय उपयुक्त होगी, मुझे इन सब पर विचार करना था। कविता में प्रयुक्त शब्दों व वाक्यों को बिना खींचतान किए, उच्चारण व अर्थ को बिना क्षति पहुँचाए, शब्दों के वजन व वाक्यों के बीच यति-गति को ध्यान में रखते हुए, ऐसा स्वर-संयोजन करना था, जो न केवल कविता के भावार्थ व मूल संवेदना को श्रोताओं तक पूरी तीव्रता और गहराई के साथ सम्प्रेषित कर सके वरन पंक्तियों के बीच छिपे निहितार्थ को परत-दर-परत खोल भी सके। किसी भी कविता के सांगीतिक रूपांतरण की सार्थकता तभी है, जब वह पाठक और सहृदय की चेतना की आस्वाद-प्रक्रिया को अधिक समृद्ध कर, उसमें सौंदर्य-अनुभव का एक नया आयाम जोड सके। इस कविता का स्वर-संयोजन करते समय भैरवी, गुर्जरी तोडी, अहीरभैरव, मालकौंस, पुरिया धनाश्री तथा मारवा आदि, कई रागों की परिकल्पना मेरे मन में आई। अलग-अलग रागों में धुन बनाते समय महसूस हुआ कि कहीं करुणा का भाव प्रबल हो रहा है तो कहीं ओज का। अंत में करुणा और ओज दोनों भावों को सम्मिलित अभिव्यक्ति तथा मन में उदात्त भाव व्यापने की सुखद अनुभूति मुझे राग गुर्जरी तोडी में प्राप्त हुई।
यहाँ मैं एक महत्त्वपूर्ण बिंदु की ओर ध्यान दिलाना चाहती हूँ कि कविता का सांगीतिक रुपांतरण करते हुए किसी राग विशेष का आधार ग्रहण करने का तात्पर्य, उसके नियमों का कविता की धुन पर रूढिबद्ध तरीके से लागू करना नहीं, बल्कि कविता का प्रभावशाली संप्रेषण है। इस कारण कविता में चित्रित संवेदना को व्यक्त करने के लिए मूल राग से भिन्न स्वरों का प्रयोग भी अनुचित नहीं होगा। रुपांतरण की इस प्रक्रिया में परंपरा और प्रयोगधर्मिता का रचनात्मक द्वंद्व सर्वथा अनिवार्य है। इसलिए एक स्थान पर मैंने गुर्जरी तोडी के स्वरों से भिन्न कोमल ऋषभ तथा कोमल गांधार के साथ शुद्ध मध्यम स्वर का प्रयोग किया है, जबकि शास्त्रीय दृष्टि से गुर्जरी तोडी में शुद्ध मध्यम का प्रयोग वर्जित है। इसमें तीव्र मध्यम का ही प्रयोग होता है।
जैसे कोई चित्रकार कैनवस पर कुछ दूर से देखे गए दृश्य के बीच केंद्रीय छवि को एक विशेष कोण से उभारते हुए उसे बडी तन्मयता से अंकित करता है, निराला इस कविता में स्वकर्म में लीन, श्रमशील मजदूर स्त्री के सुगठित सौंदर्य का ऐसा ही भावचित्र उकेरते हैं -
श्याम तन भर बँधा यौवन,
नत नयन प्रिय कर्म रत मन,
गुरु हथौडा हाथ करती बार-बार प्रहार
इन पंक्तियों से पूर्व व पश्चात कविता में जहाँ विरोधी प्राकृतिक वातावरण तथा संघर्ष-चेतना का चित्रण है, वहाँ करुणा और ओज की अभिव्यक्ति के लिए मैंने गुर्जरी तोडी के स्वर रखे हैं तथा रेखांकित पंक्ति में व्यक्त सौंदर्य चेतना को उद्घाटित करने के लिए कोमल ऋषभ तथा कोमल गांधार के साथ शुद्ध मध्यम व शुद्ध मध्यम के साथ तीव्र मध्यम और कोमल धैवत के मिश्रण से निर्मित स्वर-समूहों का प्रयोग किया है। कविता के गंभीर कलेवर के बीच कवि ने अपने श्रममूलक सौंदर्य-बोध के संस्पर्श से मजदूर स्त्री के व्यक्तित्व को सुकुमार व विलासी नायिकाओं से भिन्न नई पहचान दी है। इस नए शेड को उभारने में इन भिन्न स्वर-समूहों का प्रयोग अब तक प्राप्त प्रतिक्रियाओं के अनुसार अनुकूल ही रहा है।
भावों के उतार चढाव तथा अन्य स्थितियों के चित्रण के अनुरूप ही स्वरों के आरोह-अवरोह का क्रम रखा गया है। कविता के आरम्भिक अंश का स्वर संयोजन, मंद्र तथा मध्य सप्तक स्वरों में हुआ है। गुरु हथौडा हाथ से रुई ज्यों जलती हुई भू पंक्तियों में प्रकृति की उग्रता के बढने के साथ-साथ ही मजदूरिन के अनथक कठोर श्रम व संघर्ष चेतना में जैसे-जैसे तीव्रता आती जाती है वैसे-वैसे ही स्थितियों तथा भावों की उठान के अनुसार तार सप्तक के स्वर-समूहों का उपयोग किया गया है। दूसरे अंश में देखते देखा मुझे तो एक बार से ढुलक माथे से गिरे सीकर तक इन पंक्तियों में मध्य और तार सप्तक के बीच स्वर-संचरण है। वहीं अंतिम पंक्तियों में उसकी आत्मगौरव से दीप्त करुण पुकार में पुनः तार सप्तक के स्वरों की उठान है।
संपूर्ण कविता में भावों की उठती-गिरती लहरों के अनुरूप ही स्वर लहरियों का आरोहन-अवरोहन, गायक व श्रोता की चेतना को विभिन्न स्तरों पर आंदोलित करता है। संवेदनात्मक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण अंशों पर बल देने के लिए गायन करते समय कुछ पंक्तियों की पुनरावृत्ति की जाती है ताकि भावानुभूति, पूरी मार्मिकता से उभरकर चेतना को देर तक आंदोलित करते हुए, श्रोताओं के मानस पटल पर अंकित हो जाये। गुरु हथौडा हाथ करती बार-बार प्रहार अथवा कविता के अंत में फिर ज्यों कहाँ -मैं तोडती पत्थर इन दो पंक्तियों पर ध्यान दें। इनके अतिरिक्त ऐसी और भी पंक्तियाँ हैं, परन्तु बानगी के लिए यहाँ दो का ही उल्लेख किया गया है। कभी-कभी आवश्यकता होती है कि किसी शब्द पर कुछ देर तक ठहर कर अर्थ को अनुगुँजित किया जाए। उदाहरण के लिए देखकर कोई नहीं में नहीं शब्द पर ठहर कर उसे कुछ क्षणों तक खींचा गया है। इसी प्रकार जो मार खा रोई नहीं में नहीं शब्द को भी खींचा गया है।
जहाँ तक लय और ताल में निबद्ध करने का प्रश्न है, इस कविता को शब्दोच्चारण के वजन, पंक्तियों के छोटे-बडे आकार, वाक्यों के बीच की यति-गति, स्वराघात के उतार-चढाव तथा उपयुक्त बलाघात की सम्मिलित गति को साधने के लिए ताल दीप चंदी मध्य लय में बाँधा गया है। वैसे तो इस कविता के शब्दों की लय, ताल रूपक तथा तीव्रा जैसी सात मात्राओं की ताल में भी बैठायी जा सकती थी, किंतु कविता में चित्रित कथ्य, संवेदनात्मक गहनता व शब्दों के वजन को देखते हुए मुझे ताल दीप चंदी मध्य लय सर्वाधिक उपयुक्त जान पडी।
तोडती पत्थर कविता के सांगीतिक रुपांतरण के स्वानुभव-मूलक विवेचन के पश्चात, मैं एक बात अवश्य कहना चाहूँगी कि किसी भी कविता के सांगीतिक रूपांतरण का कोई अंतिम रूप स्थिर नहीं किया जा सकता, यह क्षेत्र सतत् सृजन का है, जिसमें प्रयोगधर्मिता की अनंत संभावनाएँ सदा निहित रहती हैं।
जहाँ तक मात्राओं, पंक्तियों और छंद की गति व लय का प्रश्न है, निराला की कविताओं में बहुत वैविध्य है। अनेक बार वे एक ही कविता में छोटे-बडे आकार की भिन्न मात्राओं वाली पंक्तियों का उपयोग कर, भावों के उतार-चढाव के अनुरूप, अलग-अलग लयों का प्रयोग करते हैं, जो अभिव्यक्ति में प्रवाह के साथ-साथ पाठक अथवा श्रोता की चेतना पर नाटकीय प्रभाव की सृष्टि करता है। उनकी इस प्रकार की कविताओं में विलक्षण आकर्षण क्षमता विद्यमान है, किंतु उन्हें स्वर-ताल में बाँध पाना अत्यंत कठिन और चुनौतीपूर्ण काम है। उदाहरणार्थ मेघ को संबोधित वर्षा ऋतु संबंधी उनकी कविता झूम-झूम मृदु गरज-गरज घनघोर जो राग मेघ पर आधारित है का ताल सुनिश्चित करने में खासी मशक्कत हुई। अंत में एक ताल और तीन ताल के सम्मिलित प्रयोग से बात बनी।
निराला की अनेक कविताओं में लोक चेतना और शास्त्रीयता का सृजनात्मक द्वंद्व भी लक्षित होता है। बाँधो न नाव इस ठाँव बंधु ऐसी ही रचना है जिसे मैंने ठुमरी अंग पर, राग खमाज व ताल अद्धा तीन ताल में संगीतबद्ध किया है। इस पर श्रोताओं की प्रतिक्रिया भी बहुत उत्साहवर्धक रही। सुप्रसिद्ध कत्थक नृत्यांगना शोभना नारायण ने भी नृत्य की संभावनाओं की दृष्टि से इसकी सराहना की। यह मेरे लिए अत्यंत सुखद और तृप्तिकर अनुभव रहा।
निराला की अन्य कविताओं को स्वरबद्ध करने की दिशा में मैं सतत प्रयासरत हूँ। भिक्षुक, ध्वनि, भारति जय विजय करे, बैठ लें कुछ देर, सखी बसंत आया, दे मैं करूँ वरण इत्यादि छंदबद्ध व मुक्त छंद में रची अनेक रचनाओं के विभिन्न रागों, तालों व शैलियों में सांगीतिक रूपांतरण के अनुभव ने मेरी काव्यानुभूति व संगीत ज्ञान को समृद्ध किया है तथा मेरी रचनात्मक अंतः प्रेरणा को नवीन ऊर्जा और अर्थवत्ता प्रदान की है। आशा है परम्परा और नवीनता के रचनात्मक द्वंद्व से उपजी यह प्रयोगधर्मिता, काव्य व संगीत दोनों ही क्षेत्रों को समृद्ध करती हुई परस्पर आवाजाही व आदान प्रदान का सेतु निर्मित करने की दिशा में एक सार्थक व प्रेरणास्पद कदम सिद्ध होने के साथ-साथ ही सृजन और संप्रेषण की नई संभावनाओं व आयामों को तलाशने में उपादेय होगी। मुझे विश्वास है कि जनमानस में संवेदनशीलता और नवीन सौंदर्य बोध जागृत करने तथा उनकी कलात्मक अभिरुचि के परिष्कार और विकास में मेरा यह प्रयास उत्प्रेरक सिद्ध होगा।
सन्दर्भ :-
1. गीतिका की कवि-लिखित भूमिका, निराला रचनावली, भाग -1, पृष्ठ - 438
2. गीतिका की कवि-लिखित भूमिका, निराला रचनावली, भाग -1, पृष्ठ - 434
3. परिमल की कवि-लिखित भूमिका, निराला रचनावली, भाग -1, पृष्ठ - 429
4. गीतिका की कवि-लिखित भूमिका, निराला रचनावली, भाग -1, पृष्ठ - 432
5. गीतिका की कवि-लिखित भूमिका,निराला रचनावली, भाग -1, पृष्ठ - 432
6. गीतिका की कवि-लिखित भूमिका, निराला रचनावली, भाग -1, पृष्ठ - 434
7. नित्यानंद तिवारी, साहित्य का शास्त्र, पृष्ठ - 32

सम्पर्क - 4, फेकल्टी अपार्टमेन्टस,
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