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मदन कश्यपः जैसे इस हिंस्र समाज में बचे हैं थोडे-से अच्छे लोग!

उमा शंकर चौधरी
इस आलेख की शुरूआत वहाँ से की जा रही है जब एक कवि के रूप में स्थापित होकर मदन कश्यप दिल्ली पहुँचे। इस आलेख में वापस उनके दिल्ली के पहले के प्रवासों पर भी लौटा जाएगा क्योंकि यह आलेख सिर्फ मदन कश्यप की कविताओं पर लिखा जाने वाला आलेख नहीं है। मदन कश्यप की कविताओं के माध्यम से इस समय-समाज को समझने का भी प्रयास है।
एम.ए. करने के बाद यानी 2000 ई. के बाद जब मैंने एम.फिल. करने की शुरुआत की, तब से मुझे याद है कि मैं साहित्य से जुड गया था। साहित्य से जुड गया था, तो कवि के रूप में मदन कश्यप को एकाध साल आगे-पीछे पढ भी लिया था। मदन कश्यप की कविताओं को पढ लिया था, तो उनके बारे में आ रही सारी जानकारियों से वाकिफ भी रहने लगा था। 2003 में जब जेआरएफ निकला तब हाथ थोडा खुला। पत्रिकाओं को खरीदने के मद में इसे देखा जा सकता है। आलोचना पत्रिका तब चालीस या पचास रुपये की आती थी और बहुत मँहगी लगती थी। तब आर्ट्स फैकल्टी में पढने लिखने की थोडी संस्कृति थी और एम. ए. के समय की पत्रिकाओं की दुकान के बंद होने के बाद फिरसे एक बुक कॉर्नर खुला था जो बहुत दिनों तक चल नहीं पाया। 2003 में जब मदनजी दिल्ली आए, तो किसी न किसी रूप में यह खबर आने लगी थी कि वे दिल्ली में हैं। लेकिन जब वे 2005 में राजकमल प्रकाशन के साथ संपादक के रूप में जुडे, तब यह खबर हम लोगों तक आयी। आलोचना पत्रिका में उनका सम्पादक के रूप में जुडाव भी हुआ, लेकिन वह आगे नहीं बढ पाया। राजकमल प्रकाशन के साथ मदनजी का जुडाव बहुत लम्बा नहीं रहा। एक वर्ष का यह साथ, जहाँ तक मुझे लगता है कि बहुत उतार-चढाव वाला रहा। 2006 में उनका तीसरा कविता संग्रह क्रुज प्रकाशित होकर आया। 2006 में ही उन्होंने द पब्लिक एजेंडा ज्वॉइन किया और जहाँ वे 2014 तक बदस्तूर साहित्य संपादक के रूप में कार्यरत रहे।
2003 से लेकर 2014 के बीच उनका दिल्ली आना और दिल्ली में संघर्ष के साथ जीवन बिताने की यह कथा बहुत तथ्यात्मक है। या यूं कहें दूर से देखा गया ऐसा तथ्य है जिसमें सिर्फ वही तथ्य हैं जो हम तक तब आ पाए थे। दूर से देखे गए तथ्य में यह समझ में आया कि एक कवि 50-52 की उम्र में भी अपने हिस्से का संघर्ष कर रहे हैं। इस संघर्ष को हमने स्वीकार भी किया था और इस समय को गालियाँ भी दी थीं। पहले लोकायत पत्रिका से जुडे। यह जुडाव लगभग दो वर्ष का रहा। एक प्रकाशन संस्थान से जुडे, फिर वहीं की पत्रिका से जुडे और बात कहीं बहुत दिनों तक जम नहीं पायी। कुछ ठीक-ठीक स्थिति तब बनी जब द पब्लिक एजेंडा पत्रिका से साहित्य संपादक के रूप में उनका जुडाव हुआ। तथ्यात्मक रूप में यह सही है, परन्तु तथ्य सिर्फ तथ्य होता है विश्लेषण नहीं। तथ्य किसी के मन और मस्तिष्क का गवाह नहीं हो सकता।
1977 में एम.ए. करने, 78 में धनबाद म कुछ दिनों तक एक कॉलेज में नौकरी करने के उपरान्त धनबाद में ही हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड में बतौर अनुवादक नियुक्त होकर मदन कश्यप जब आए होंगे, तो उन्हें अवश्य लगा होगा कि जीवन में नौकरी का आना एक स्थायित्व का आना है। और छहः वर्ष के उपरान्त धनबाद से पटना की यात्रा सिर्फ धनबाद से पटना की यात्रा नहीं थी, बल्कि नौकरी के स्तर पर एक छलाँग भी थी। भारत बेगन एँड इंजीनियरिंग कम्पनी लिमिटेड में राजभाषा अधिकारी के रूप में नियुक्ति जीवन की एक छलाँग ही थी। किन्तु यह छलाँग बहुत लम्बी नहीं हो पायी। 1999 तक आते आते हवा जहरीली लगने लगी और साँस लेना मुश्किल हुआ और 2000 में नौकरी से इस्तीफा देकर मुक्त हुए। सोचने बैठता हूँ तो लगता है कि यह कितना रोमांचक है। लगता है मदन कश्यप अपनी नजरों में कितने बडे नायक हो गए होंगे। आज सोचने में यह बहुत रोमांचक लग सकता है और हिरोइक भी, लेकिन जब वर्ष 2000 में मदन दा ने यह नौकरी छोडी और संघर्ष के रास्ते को अपने जीवन के लिए चुना तब उनकी उम्र महज 46 वर्ष थी और उनके तीनों बच्चे तब बडे हो रहे थे। सामने उनका जीवन था, उनकी पढाई थी। हर लेखक का जीवन भले ही उनकी रचनाओं में जितना हो लेकिन उसे हर बीतने वाले समय को अपने जीवन से टकराना पडता है। मैं समझता हूँ कि आज चूँकि उनके सारे बच्चे सफल हैं, तो यह उनके जीवन का एक रोमांचक हिस्सा लग सकता है। परन्तु सोचा जाना चाहिए कि उन्होंने इस कठिन निर्णय के लिए अपने परिवार को कैसे तैयार किया होगा। खास कर अपनी अर्धांगिनी को।
जो तथ्य हम तक हमारे एम.ए. के दौरान आ रहे थे उससे सिर्फ यह निष्कर्ष निकल रहा था कि हिन्दी के कवियों-लेखकों को संघर्ष करना ही पडता है। और यह कोई इस भाषा, इस देश की बात नहीं है। लेखक और संघर्ष का नाता पुराना है। तुलसी ने संघर्ष के बारे में लिखा। प्रेमचन्द, मुक्तिबोध, वेणुगोपाल आदि के संघर्ष से हम भली-भाँति परिचित हैं। पोलिश कवयित्री शिम्बोसर्का ने अपने नोबेल सम्मान के भाषण में कवियों के संघर्ष की कहानी बयाँ की थी जो हमारे यहाँ के ही नहीं, बल्कि दुनिया के सारे कवियों के संघर्ष से मिलती-जुलती ही थी। मुक्तिबोध और वेणुगोपाल का संघर्ष शिम्बोसर्का के वक्तव्य से निकले संघर्ष की कहानी तक यात्रा कर एकमएक हो जाता है। और इस रूप में मदन कश्यप का संघर्ष स्वीकार भी था हमें। परन्तु संघर्ष के तथ्य के पीछे का सत्य कहाँ याद रहता है। कवियों-लेखकों के संघर्ष की बात को हम शिद्दत से जान लेते हैं या फिर इसे स्वीकार कर लेते हैं। यह बहुत सहज है। यह सोचने के लिए कम ही जाते हैं या फिर इसकी चर्चा भी कम ही हो पाती है कि इस संघर्ष के पीछे लेखकों का कितना बडा त्याग है। एक कवि अपने स्वाभिमान में, अपने सम्मान में अपनी आवाज की आजादी के बरक्स कैसे अपने जीवन के लिए सुकून के बदले संघर्ष को चुनता है, इस पर विचार किया जाना चाहिए।
मदन कश्यप के संदर्भ में देखें, तो यह याद रहने की बात तो बहुत दूर की है कि उन्होंने आखिर संघर्ष के रास्ते को किसलिए चुना, पता भी कितनों को है। आज का समय जब हम अपनी एक-एक महानता को बढा-चढा कर बताने के आदी हो चुके हैं, तब मदन कश्यप ने मेरे साथ भी इसे कब साझा किया हो याद नहीं। 2014 के बाद एक बार फिर से जब साम्प्रदायिक शक्तियों की सरकार बनी और उसके विरोध में लेखकों ने 2015 में प्रतीकात्मक विरोध दर्ज करते हुए अपने अपने सम्मानों को वापस किया तब मदन कश्यप के पास कोई ऐसा सम्मान था नहीं जिसे वे वापस कर सकते थे। लेकिन उस बीच भी मैंने कभी उन्हें अपने इतने बडे त्याग को गाते नहीं देखा।
मदन कश्यप ने जब अपनी नौकरी से इस्तीफा दिया था, तब वे राजभाषा अधिकारी थे, यह आज से बीस साल पहले की बात है। खैर नौकरी में होते तो भी अब तो सेवानिवृत्त हो गए होते। परन्तु अगर उन्होंने नौकरी पूरी की होती, तो नौकरी के आखिरी दिनों में वे और ऊँचे ओहदे पर होते। लेकिन जो मदन कश्यप को जानते हैं वे अपनी आँखें बंद करके उन्हें अपने चैम्बर में एक अधिकारी के रूप में देखने की कोशिश करें। देखिए आपका मन घबराहट से भर जाएगा। मैं तो इस कल्पना मात्र से भागने लगता हूँ। मदन कश्यप कवि हैं और हर वक्त कवि हैं। अपनी कविताओं में तो हैं ही, मेट्रो में हैण्डल पकडे खडे होने में भी कवि हैं। रास्ते पर किनारे किनारे चलने में, पुस्तक मेले में घूमते और घण्टों कहीं भी अटक कर बतियाते भी वे कवि हैं। मदन कश्यप के कुरुज संग्रह में एक कविता है थोडा-सा फाव। फाव एक प्यारा-सा देशज शब्द है। फाव का मतलब है थोडा अतिरिक्त। लेकिन अतिरिक्त में वह बात कहाँ जो फाव में है। फाव फाव है/और उसके होने का मतलब है, उसका होना/जब कुछ हाथ आ जाता है फाव में/तो उसकी छुअन सीधे आत्मा तक पहुँचती है। फाव ऐसा आदमी ही देता है जो खुद उस अन्न को उपजाता है। कोई बिचौलिया नहीं देता कोई फाव। जब किसी वस्तु को बेचने का नहीं/श्रम और पसीने की रचना को विदा करने का भाव होता है/वे डाल देते हैं झोले में थोडा-सा फाव/ जैसे विदा होती बेटी के खोंइछे में/ माँ बाँध देती है थोडा-सा अन्न-द्रव्य/यहाँ थोडा सा/थोडा-सा नहीं होता है। इस भागम-भाग भरी जिन्दगी में जहाँ चारों तरफ अफरा-तफरी मची है, जब चारों तरफ मुनाफे ही होड मची है, जब सारे लोग सिर्फ अपने लिए जी रहे हैं, जब निजी स्वार्थ सारी इंसानियत को निगल चुका है तब वहाँ मदन कश्यप हमारे जीवन में इसी फाव की तरह हैं। मनुष्य जितना होता है उससे थोडा अतिरिक्त। उनकी इस कविता की आखिरी पंक्ति है यह कम सुकून की बात नहीं/कि बेहद हिसाबी होती जा रही इस दुनिया में/अब भी बचा है दही में थोडी-सी चीनी की तरह फाव/जैसे इस हिंस्र समाज में बचे हैं/थोडे-से अच्छे लोग!
अगर क्रम से देखा जाए तो मदन कश्यप के पहले संग्रह लेकिन उदास है पृथ्वी की पहली कविता शिशिर आ रहा है, जो 1987 की कविता है, में ही उन्होंने सरकार की पूँजीवादी मानसिकता, निरंकुश तेवर को पहचान लिया था और उसके खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर ली थी। इस कविता के शुरुआत और अंत को यहाँ पढा जाना चाहिए। धीरे-धीरे ठण्डा हो रहा है मौसम/कमजोर पड रही हैं/पृथ्वी को गर्म रखने की/सूरज की कोशिशें। और आगे इससे पहले/कि बर्फ और कुहरों से ढंक जाएँ दिशाएँ/ सुलगा लो अपने अलाव/शिशिर आ रहा है। तो अपनी शुरुआती कविता से ही मदन कश्यप ने अपना मंतव्य, अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता स्पष्ट कर दी थी। इस कविता का एक राजनीतिक और वैचारिक संदर्भ है, जिसे समझा जाना चाहिए। मदनजी ने इस कविता में ही यह बतला दिया था कि उन्होंने अपना अलाव जला लिया है। और यह अलाव एक बार क्या जला आज तक जला हुआ है। शिशिर आता रहा, लेकिन उनकी कविता अलाव की इस गर्मजोशी को लिए सामने मजबूत प्रतिपक्ष की तरह हमेशा खडी रही।
इस संग्रह में बाद में शामिल, परन्तु इस कविता शिशिर आ रहा है से पहले लिखित कविता अमेरिका प्रतिरोध की एक अद्भुत कविता है। यह कविता 1985 की लिखी हुई है। यहाँ अमेरिका कोई एक देश नहीं है। एक सोच है। एक साम्राज्यवादी सोच। सत्ता का एक निरंकुश चेहरा। इसलिए कविता में जब एक छोटा बच्चा पूछता है कि कहाँ है अमेरिका तब उसे नक्शा में दिखाना संभव नहीं लगता। क्यों कि किसी नक्शे में समा पाना अमेरिका के लिए कहाँ संभव है। काँपती अंगुलियों से उसे दिखाता हूँ/कि बेचैन हो जाता है-प्रश्नाकुल मन/क्या सिर्फ यहीं है अमेरिका/नक्शे में खिंची सीमाओं में ही। नहीं, बिल्कुल नहीं। अमेरिका जब एक सोच है तो वह कहीं भी हो सकता है। अमेरिका, अमेरिका में भी हो सकता है और भारत के सुदूर एक गाँव में भी। जहाँ-जहाँ अत्याचार है, जहाँ-जहाँ निरंकुशता है वहाँ-वहाँ है अमेरिका। उसे किसी भी नक्शे में ढूँढना फिजूल है। अपने मस्तिष्क को खोलकर अपनी आँखों को उठाकर देखा जाए, तो अमेरिका दिख जाएगा अपने आप। नक्शे में आँखें मत धँसाओ/सिर ऊपर उठाकर दुनिया को देखो/जहाँ-जहाँ गूँजती है उत्पीडितों की चीख/जहाँ-जहाँ हँसता है तानाशाह/जहाँ-जहाँ लोग हैं बेहाल/जहाँ-जहाँ है भोपाल/वहाँ-वहाँ है अमेरिका। इस कविता में आए प्रसंग के बारे में याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि यह कविता 1985 की लिखी हुई है और भोपाल गैस त्रासदी जैसी वीभत्स घटना, जो 2-3 दिसम्बर 1984 को घटित हुई थी, उसके ज्यादा दिन नहीं बीते थे। और उल्लेखनीय यह है कि उस भोपाल गैस त्रासदी में सरकार का जो रवैया था वह भी जगजाहिर है, तब यह कविता किस तरह अपने समय की राजसत्ता के प्रतिरोध में जाती है इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। अमेरिका कविता में जिस मानसिकता और उसमें आया प्रसंग किस सरकार से संबंधित हैं और किस कदर उस सरकार के प्रतिरोध में है इसे अलग से बतलाने की जरूरत नहीं है।
मदन कश्यप का दूसरा कविता संग्रह नीम रोशनी में, जो वर्ष 2000 में प्रकाशित होकर आया, उसमें ज्यादातर वे कविताएँ हैं जो 1999 तक लिखी गईं। उस संग्रह को पढें, तो उसमें तत्कालीन सरकार, सत्ता और साम्राज्यवादी, पूँजीवादी मानसिकता के खिलाफ उनकी कविता पूरी मुस्तैदी से खडी मिलती है। शीर्षक कविता नीम रोशनी में जो 1993 की लिखी हुई है, की आखिरी पंक्ति है सबसे पहले रोशनी धुँधली की/फिरपसीने की तरह इत्मीनान से पोंछ डाले/अपने चेहरे से खून के छींटे/और रक्त के फव्वारों को इतिहास की ओर मोड दिया/वे सदी के सबसे चालाक हत्यारे हैं/उनका दावा है/उन्होंने दुनिया भर की बेहतरी के लिए की हैं/दुनिया भर की हत्याएँ! 1993 में ही लिखी हुई एक कविता है विजेता की हँसी। उसकी पंक्तियाँ हैं ऐसा पहली बार तो हुआ नहीं/कि असभ्य निर्दयी लुटेरे/महान विजेता कहला रहे हैं/पहली बार तो नहीं/बेचैन हुई है सभ्यता/आहत हुई है संस्कृति/पहली बार तो नहीं/इतिहास से खेल रहे हैं/हथियारों से खेलने वाले!
1991 के बाद की बदली हुई परिस्थिति को ध्यान में रखकर, तत्कालीन सरकार की साम्राज्यवादी, पूंजीवादी और क्रूर मानसिकता को ध्यान में रखकर इस संग्रह को पढा जाएगा, तब यह साफ समझ में आएगा कि मदन कश्यप अपनी कविताओं में किस कदर सत्ता विरोधी रहे हैं। उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता किस कदर एकदम शुरुआत से ही बहुत स्पष्ट और तीक्ष्ण थी। इस संग्रह में कई ऐसी कविताएँ हैं जो तत्कालीन सत्ता से सीधे-सीधे मुठभेड करती हैं। बुरे वक्त में कविता (1994) जिसमें वे लिखते हैं ऐसे बुरे वक्त/कैसे लिखी जाए कोई कविता/जब फूलों को देख कर कहना मुश्किल हो/वह फूल ही है। इसी संग्रह में भेडिया (1993) जैसी कविता है जो इस पूरी मानसिकता पर चोट करती है सपनों में भी बेचैन हो जाता हूँ मैं/मशाल भी जलाऊँगा और गोली भी चलाऊँगा/पर कहीं दिखे तो भेडिया! वहीं जोकर (1995) जैसी कविता है जिसे समझने के लिए उस वर्ष की राजनीतिक उठापटक को समझना होगा। एक दिन अचानक ताश की गड्डी से उछल कर/सिंहासन पर जा बैठा जोकर/देखते रह गए बादशाह-बेगम/गुलाम तो खैर गुलाम थे/दहले नहले भी अवाक। ऐसी और कविताएँ हैं इस संग्रह में जो यह साबित करती है एक अच्छी कविता हमेशा अपने समय की सत्ता से मुठभेड करती है। और मदन कश्यप ने अपनी कविता में अपनी आवाज को कभी दबने नहीं दिया।
परन्तु इन कविताओं के समानान्तर जब मदन कश्यप के जीवन को देखें, तो जिन वर्षों में वे ऐसी विस्फोटक कविताएँ लिख रहे थे, ठीक उसी समय वे सामानान्तर रूप से केन्द्र सरकार की एक सम्मानजनक नौकरी भी कर रहे थे। 1981 में मदनजी ने जब हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड में नौकरी की शुरुआत की तब से लेकर 1987 में भारत बेगन एँड इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड तक में वे बराबर नौकरी करते रहे। इन नौकरियों के समानान्तर इन कविताओं को रखकर देखें, तब दो बातें बहुत स्पष्ट हो जाती हैं। एक तो यह कि मदन कश्यप अपने निजी जीवन में, अपनी कविताओं के माध्यम से कितने प्रतिबद्ध और हिम्मती थे और दूसरी यह कि तब की सरकार की सारी नीतियों के खिलाफ यूं खडे होने के बावजूद उन्हें निजी जीवन में, नौकरी में कभी कोई दिक्कत नहीं आयी। परन्तु ज्योंही 1999 में सरकार बदली, मदन दा की जिंदगी एक सामान्य जिंदगी नहीं रह पायी।
मदन कश्यप का तीसरा संग्रह कुरुज 2006 में प्रकाशित होकर आया। इस संग्रह को अगर ध्यान से पढा जाए, और इसे बहुत ही बारीकी से अपने समय के समानान्तर रखा जाए तो चीजें बहुत साफ हो जाती हैं। इस संग्रह में 1999 की लिखित एक कविता है इन चुप्पियों का क्या करें। यह एक छोटी-सी कविता है। परन्तु कविता को पढकर कवि की मनोदशा को समझा जा सकता है। 1999 तक आते-आते लोगों की चुप्पियों को समझा जाने लगा है। और अपने ऊपर भी चुप्पी के लिए अप्रत्यक्ष रूप से पड रहे दवाब के लिए उनकी छटपटाहट को भी इस कविता से समझा जा सकता है। अर्थ निचुडे शब्दों के इस युग में यह बहुत आसान है/कि हम इन चुप्पियों पर एकदम चुप्पी साध लें/खूब चीखें चिल्लायें कविताएँ लिखें इनसे मुँह मोडकर/हजारों विषय पडे हैं कविता के लिए/फिर इन चुप्पियों पर क्योँ की जाए इतनी मगजमारी/महज कविता लिखने के लिए कोई क्यों झेले इतना तनाव। कविता की यह पंक्ति ध्यान देने लायक है कि महज कविता लिखने के लिए कोई क्यों झेले इतना तनाव। कविता लिखने के लिए यह तनाव 1999 से पहले नहीं था। और इसका प्रमाण मदन कश्यप के इससे पहले के दोनों संग्रह हैं लेकिन उदास है पृथ्वी और नीम रोशनी में। यह बहुत ही दिलचस्प है और बहुत ही मानीखेज भी कि इस संग्रह का नाम है कुरुज और यह शीर्षक कविता 1999 की ही लिखी हुई है। कुरुज का मतलब मदन कश्यप नीचे लिखते हैं वह जगह, जहाँ एक खास मौसम में इकट्ठे होकर परिंदे अपने पुराने पंख झाडते हैं और गर्भाधान करते हैं। यह बहेलियों की भाषा का शब्द है। यह कुरुज शब्द एक तरह का प्रतीक है जिसे मदन कश्यप के जीवन और उनकी कविताओं से भी जोड कर देखा जाना चाहिए। यह वर्ष उनके लिए भी पुराने पंख झाडकर एक नई सोच और नई ऊर्जा और नई हिम्मत ग्रहण करने का वक्त है। वर्ष 2000 में मदन कश्यप अपनी नौकरी से इस्तीफा देते हैं।
वर्ष 2000 में जब मदन कश्यप ने अपनी नौकरी से इस्तीफा दिया, तब वे महज 46 वर्ष के थे और इस उम्र में निस्संदेह अपने कॅरियर की दहलीज पर रहे होंगे। तब इस बात से यह समझा जा सकता है कि उनकी मानसिक स्थिति कैसी रही होगी। किस तरह की परिस्थिति से उन्हने परिवार और समाज में संघर्ष किया होगा। और अपनी स्वतंत्र आवाज को स्वतंत्र रखने के लिए कितने प्रतिबद्ध रहे होंगे। कितने मजबूर रहे होंगे।
2001 में मदन कश्यप जब लिखते हैं जरूरी नहीं कि हमें ऐसी चीजें ही मारें/जो केवल मारने के लिए बनी हैं/जैसे कि बंदूकें/अथवा बारूदी सुरंगें या सरकारें। तब लगता है कि मदन कश्यप उसी रौ में कविताएँ लिख रहे हैं जो उनकी एकदम पहली कविता से बनी हुई थी। जब ऐसी नौबत आयी होगी कि उन्हें अपनी स्वतंत्रता और नौकरी में से एक को चुनना पडा होगा, तब कविता की ऐसी पंक्ति को पढकर लगता है कि मदन कश्यप ने स्वतंत्र आवाज को चुनकर कितना सुकून महसूस किया होगा। अपने पहले दोनों संग्रहों में जिस तरह मदन कश्यप अपनी प्रतिबद्धता इस बदलती दुनिया में पीछे छूट चुके आम आदमी के पक्ष में बना कर रखते हैं उसी तरह इस तीसरे संग्रह में समानान्तर रूप से तत्कालीन सरकार के विरोध में अपनी कविताओं के तेवर को बचाए रखने के लिए चाहे जो कुर्बानी देनी पडी हो, लेकिन इसमें उन्होंने कोई समझौता नहीं किया। वर्ष 2002 में मदन कश्यप ने गुजरात दंगे पर कविता लिखी क्रुशंसता। इस कविता की पंक्ति है देखो वह बच्चा न तो रो रहा न चीख रहा है/ना ही हाथ-पैर पटक रहा है/उसकी आँखों में झाँको/पृथ्वी की समूची दहशत घनीभूत है वहाँ/इस बच्चे के जलने के बाद भी/वहाँ बची रहेगी मुजमिद दहशत/धीरे-धीरे पिघलती सैलाब बनती। वर्ष 2003 में मदन कश्यप हत्यारे का पोट्रेट जैसी कविता लिखते हैं। लोकतंत्र के सबसे पवित्र मंदिर में/हत्यारे का पोट्रेट लगाया गया/कुछ लोग विरोध में चीखे/मगर उनकी आवाज/तस्वीर लगाने के लिए सीढी पर चढे/चहेते के घुटनों तक भी नहीं पहुँच पायी। इस कविता को पढते हुए हमें ऐसा लगता है कि इसे लिखने के लिए एक कवि के पास बहुत हिम्मत होनी चाहिए। परन्तु इस कविता को पढकर ऐसा इसलिए लगता है क्यों कि उस सरकार के सापेक्ष जब हम अभिव्यक्ति का अधिकार की संकल्पना को रख कर देखते हैं, तब यह हिम्मत का सवाल बन जाता है। परन्तु सवाल यह है कि मदन कश्यप ने अपनी किस कविता में, किस सरकार/सत्ता के खिलाफ अपनी आवाज नहीं उठायी। हाँ, यह अंतर हो सकता है कि एक सरकार में चूँकि आवाज को इतना दबाने का प्रयास नहीं हुआ था इसलिए वह इतना बडा मुद्दा नहीं बन पाया। नहीं तो मदन कश्यप की पहली कविता से ही पढते हुए कभी लगा नहीं कि उन्होंने अपनी कविताओं के सामने कहीं समझौता किया है।
कुरुज संग्रह में इस सत्ता, मानसिकता, साम्प्रदायिकता के खिलाफ एक अद्भुत कविता है भारत उदय। 2004 में लिखित यह कविता याद दिलाती है कि यह उस लोकसभा का एकमात्र नारा था। हम सब जिसने भी उस समय को जाना है इस शब्द से परिचित हैं। इस भारत उदय यानी शाइनिंग इंडिया ने अपने समय का एक खास तरह का पाठ आम लोगों के बीच प्रस्तुत करने का प्रयास किया था। परन्तु अपने समय के एक जरूरी कवि होने का फर्ज अदा करते हुए मदन कश्यप ने इस भारत उदय का एक भयावह, किन्तु यथार्थ पाठ प्रस्तुत किया। एक नये भारत का उदय हो रहा है/भ्रष्टाचार की तेज रोशनी में/बेशर्म चेहरे चमक रहे हैं/कोई कैमरे के सामने नोटों का बण्डल लहरा रहा है/तो कोई नन्हे बच्चे को बरछे पर उछाल कर/जय श्रीराम के नारे लगा रहा है। इस कविता में इतिहास के वे सारे प्रसंग हैं जो इतिहास में बहुत ही चर्चित रहे हैं। और जो इतिहास से निकल कर कविता के माध्यम से मनुष्यता के खत्म होने का मर्सिया गा रहे हैं। इस कविता को वैसे पूरा पढा जाना चाहिए क्योंकि इस कविता में जितने भी प्रसंग हैं उनका एक खास संदर्भ है। कविता का अंत है आने वाली संततियो हम शर्मिंदा हैं/कि हमारे ही समय में हुआ/दुनिया की सबसे घिनौनी कविता का निर्लज्ज पाठ! कविता की इस आखिरी पंक्ति में एक कवि के रूप में मदन कश्यप का उत्कर्ष देखा जा सकता है। यह पंक्ति भले ही एक खास संदर्भ से जुडती हुई प्रतीत हो रही हो, परन्तु, इसका अंतर्पाठ एक खास मानसिकता की तरफ इशारा कर रहा है। राजनीति का एक ऐसा रूप जहाँ लोकतंत्र के होने पर सवाल उठ रहा हो। जहाँ आजादी के होने पर प्रश्नचिह्न लग रहा हो। मदन कश्यप ने1999 से 2004 की कविताओं में तत्कालीन समय की सबसे बडी और घिनौनी समस्या-साम्प्रदायिकता पर अनवरत और करारा प्रहार किया। मुझे लगता है कि नागार्जुन के बाद मदन कश्यप ही शायद एक ऐसे महत्त्वपूर्ण कवि हैं जिन्होंने अपने यहाँ राजनीतिक-सामाजिक घटनाओं पर सीधे-सीधे प्रहार किया है। हाँ, राजनीतिक-सामाजिक पतन पर आक्रोश की इन कविताओं में भी जितना शऊर चाहिए था, मदन कश्यप ने अपनी कविताओं में उसका पूरा ख्याल रखा है।
मदन कश्यप की कविताओं को यदि दो चीजों के समानान्तर रखा जाए तो उनकी कविताओं की एक प्रक्रिया को समझा जा सकता है। यह प्रक्रिया एक समानान्तर इतिहास रचती हुई दिखेगी। एक तो उनका अपना जीवन और दूसरा राजनीतिक बदलाव। मदन कश्यप के जीवन को करीब से जानना और उनकी कविताओं को उस नजरिये से देखना बहुत ही दिलचस्प है। उनका अपना व्यक्तिगत जीवन और उनकी कविता के ये दो पक्ष हैं।
मदन कश्यप की कविताओं में राजनीति के बाद अगर किसी विषय ने सबसे अधिक जगह पायी है, तो वह हैं स्त्रियाँ। स्त्रियों का जीवन, उनका दुख। लेकिन जब मदन कश्यप के पहले संग्रह लेकिन उदास है पृथ्वी को देखा जाए, तो वहाँ यह नदारद है। और उसके बाद का कोई ऐसा संग्रह नहीं है जहाँ इसकी चिंता नहीं हो। पहले संग्रह में पटना में नौकरी करने और वहाँ की विसंगतियों का संदर्भ है। कविता आज का दिन की पंक्ति है बिहार के सचिवालय में/सबसे ज्यादा घूस ली गयी/आज के दिन/अफसरों ने बहुत अधिक शराब पी/आज के दिन/ जीवन और कविता के खिलाफ/सबसे बडा षड्यंत्र रचा गया/आज के दिन। स्त्रियों के जीवन का प्रवेश मदन दा की कविताओं में उनके दूसरे संग्रह से होता है। यानी तब जब खुद उनके जीवन में बेटी का प्रवेश हुआ और बेटी बडी होने लगी। बडी होती बेटी के समानान्तर स्त्री के जीवन को देखने-समझने की उनकी यह ईमानदार कोशिश ही मदन दा को एक ईमानदार कवि बनाती है। जब एक कवि की कविता की पूरी प्रक्रिया समझ में आ जाती है तब यह साफ हो जाता है कि उनका इस जीवन से किस कदर जुडाव है। अपने गृहस्थ जीवन से कितना जुडाव है। और जो कवि अपने जीवन, अपने परिवार, अपने परिवेश से बहुत अधिक सम्पृक्त रहेगा वही उसकी कमियों के खिलाफ प्रतिरोध भी रचेगा।
स्त्री जीवन पर क्रम में उनकी सबसे पहली कविता है लडकी का घर जो 1992 में लिखी गई है। 1992 में मदन दा 38 वर्ष के थे। यह वह समय है जब उनके जीवन में बेटी बडी हो रही थी। बेटी बडी हो रही थी तब बेटी एक स्त्री में धीरे-धीरे रूपांतरित हो रही थी। यह कोई उनका अपना सच नहीं है, लेकिन उनका यह प्रयास बहुत सहज है। बडी होती बेटी का एक स्त्री में रूपांतरित होना और फिर ताउम्र स्त्रियों के जीवन पर कविताएँ लिखना यह दिखलाता है और बहुत मानीखेज रूप में दिखलाता है कि मदन कश्यप के यहाँ कोई कविता बनाई हुई नहीं है या फिर यूं कहें कि जोर जबरदस्ती की कविता नहीं है। उनकी कविता अपने व्यक्तित्व, अपने जीवन से कविता तक की यात्रा है। परन्तु यहाँ यह दिलचस्प है कि इन कविताओं की यात्रा में उनका अपना निजी जीवन बस उतना ही है जितना उन्होंने उससे कविता तक की यात्रा की। निजी जीवन से शुरू होने वाली कविता में भी निजी कुछ नहीं है, वह कविता में रूपांतरित होकर एक बडे यथार्थ में विस्तारित हो जाती है। जितना बडा होता है घर/उतना ही छोटा होता है स्त्री का कोना। उनकी इस कविता की यह पंक्ति मदन दा से मिलने-बतियाने पर यह वाक्य किसी न किसी रूप में कई बार सुनने को मिल सकता है। 1995 में उन्होंने आंझुलिया जैसी कविता लिखी जो स्त्री जीवन के दुख को बयाँ करने वाली एक अद्भुत कविता है। एक ऐसी कविता जिसे पढने से आँखें डबडबा जाएँ और अपने समाज, अपनी मानसिकता पर शर्म आए। बडे-बुजुर्ग कहते हैं/आज भी आधी रात को/गन्ने के खेतों में भागती रहती है आँझुलिया/फँस जाती है ऐसी भूल-भुलैया में/कि कभी निकल नहीं पाती है बाहर। आज भी रात-बिरात भागती रहने वाली आँझुलिया मदन दा की कविताओं में बार बार आती है। आँझुलिया का जीवन, उसका दुख, उसका संघर्ष मदन कश्यप की कविताओं का एक अहम हिस्सा हो जाता है। कविता ही नहीं निजी जीवन की बातचीत में, अपने लेख, टिप्पणी या फिर अपने वक्तव्य में भी मदन कश्यप हमेशा से इस बेदखल हो चुकी, भागती हुई स्त्री के दुख को अपने यहाँ दर्ज करते रहे हैं। 2014 में प्रकाशित दूर तक चुप्पी संग्रह में संकलित 2011 में दुख कविता लिखी जहाँ स्त्री और स्त्री का दुख एक-दूसरे का पर्याय बन गया है। उसे चूमना चाहा/दुख होठों पर पपडियों की तरह जमा था। 2015 में प्रकाशित कविता संग्रह अपना ही देश में स्त्रियों के दुख, उसके संघर्ष पर लिखी गई दो कविताएँ स्त्री विमर्श के इतिहास में याद की जाने वाली कविताएँ हैं। कविता निठारी की बच्ची की यह पंक्ति चीखें बर्फ की तरह जम गयी थीं उनके चेहरों पर या फिर बडी होती बेटी की यह पंक्ति बडी हो रही है बेटी/बडे हो रहे हैं भेडिये/बडे हो रहे हैं सियार स्त्री जीवन के दुख को जैसे फ्रीज कर देता है। मदन कश्यप की इन कविताओं को पढकर ऐसा लगता है जैसे अब यह चीख हमारे कानों से कभी खत्म नहीं होने वाली।
1992 में जो स्त्रियों के जीवन पर कविता लिखने की शुरुआत मदन कश्यप ने की वह उनके आखिरी संग्रह 2019 में प्रकाशित पनसोखा है इन्द्रधनुष तक अनवरत है। यहाँ स्त्री एक ही है, उसकी छवियाँ अलग-अलग हैं। स्त्री के दुख को लेकर जो कविताएँ मदन कश्यप लिखते हैं उनमें एक अजीब-सी बेचैनी दिखती है। जो मदन कश्यप को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं उनको पता होगा कि वे किस तरह किसी भी अस्मिता के कारण किसी भी अस्मिता से विभेद किए जाने के किस तरह खिलाफ हैं। चूँकि अपनी वैचारिकता में ही मदन कश्यप स्त्रियों के दुख को लेकर, उनके जीवन को लेकर, उनके सम्मान को लेकर बहुत प्रतिबद्ध हैं, इसलिए वे प्रेम में हत्या जैसी कविता लिख पाते हैं। कब कितनी मारी गयीं/लडकियों का तो कुछ पता ही नहीं चला/इतने तरीके हैं उनको मारने के/कि जानना मुश्किल/जिनके जीने की पहचान न हो/उनके मारे जाने की क्या पहचान। यह बहुत ही दुख से उपजी हुई कविता है। यह कविता इस तरह से तब तक नहीं आ सकती है जब तक कि कवि खुद इसे दिल से महसूस नहीं करता हो। इसी कविता में आगे एक पंक्ति है जो हमारे समाज की पूरी मानसिकता को खोल कर रख देती है प्रेम में मारे जाने की क्रूरताएँ सामने तब आयीं/जब लडके मारे गये।
मदन कश्यप से जब भी विचार-विमर्श होता है वे अपने समय से इतना अधिक जुडे होते हैं कि उनकी बातें कभी खत्म नहीं होतीं। उनके पूरे व्यक्तित्व में एक बेचैन मन के अतिरिक्त एक कोमल मन भी है। बातें शुरू कोमल मन से होती हैं, लेकिन समय-समाज की बेचैनी उन पर हावी हो जाती है। पता नहीं वे कब इतनी चीजें पढते हैं, सुनते हैं, विचार करते हैं कि उनसे बात करने का मतलब होता है एकदम अद्यतन होकर ही निकलना।
1991 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में जो परिवर्तन हुए, मदन कश्यप लगातार उस परिवर्तन को और उस परिवर्तन से भारतीय सामाजिक व्यवस्था के जो हालात बने उसे अपनी कविताओं में बहुत शिद्दत से और बहुत ही तल्ख रूप में उठाते रहे हैं। दूसरे कविता संग्रह नीम रोशनी में जो 2000 में प्रकाशित होकर आया उसमें आँकडो का बाजीगर, जोकर, निर्मल पाखण्डी आदि कविताएँ लिखीं। 1999 में जब सरकार बदली साम्प्रदायिकता इस समाज के लिए एक बडा प्रश्न बनकर उभरी तब मदन कश्यप ने लगातार उस साम्प्रदायिकता के खिलाफ अपनी आवाज बुलन्द की। 2006 में जब तीसरा कविता संग्रह कुरुज प्रकाशित होकर आया, तो उसमें उन्होंने साम्प्रदायिकता के विरोध में अपनी कविताओं को मजबूत रूप में सामने रखा और हत्यारे का पोट्रेट, थोडा-थोडा, भारत उदय जैसी कविताएँ लिखीं। 2001 में उडीसा और गुजरात में आए भूकम्प पर उन्होंने तूफान......भूकम्प......जिदगी जैसी अद्भुत कविता लिखी। मनुष्य ने अपने विकास की इस चकाचौंध में जिस तरह प्रकृति से लोहा लिया है और उस प्रकृति ने मनुष्य के साथ जो प्रतिकार लिया है उसने किस तरह मनुष्य को अपने सामने बौना साबित कर दिया। कविता की आखिरी पंक्तियाँ हैं आदमी का सबसे बडा सपना होता है/उसका अपना सुंदर-सा घर/और जब ठंड में ठिठुरता आदमी/अपने ही घर लौटने से डरने लगे/तो समझिए उसके सारे सपनों का अंत हो चुका है। 2002 में गुजरात दंगे के विरोध में क्रूशंसता जैसी कविता लिखी। पलामू के अकाल पर लिखना कविता। बिहार की बाढ पर राहत पैकेट, सर्प-संवाद, और नदी संवाद जैसी कविताएँ लिखीं।
2014 में प्रकाशित होकर आया चौथा संग्रह दूर तक चुप्पी उनकी चुनिंदा छोटी कविताओं का एक खास तरह का संग्रह है। और 2015 में प्रकाशित होकर आया उनका पा*चवा संग्रह अपना ही देश अपने पहले के उसी क्रम में है। तो इन दोनों संग्रहों को मिला कर ही देखना पडेगा। 2006 से 2015 तक का भारतीय समाज का यथार्थ यहाँ व्याख्यायित है। यह समय बाजार के बहुत ही विकराल होने का, आवारा पूँजी के बहुत ही आवारा हो जाने का और एक अजीब-सी बेढब, अव्यवस्थित सी दुनिया बनने का था। यह समय किसानों की आत्महत्या के दुखद प्रकरण का था, भ्रष्टाचार का था, लोकतंत्र के कमजोर होने का था और हाशिये पर पडे हुए दलित, स्त्री, आदिवासी के अधिकार को बाजार और चमक के नाम पर छीनने का था। मदन कश्यप ने इन दोनों संग्रहों में बाजारवाद और मनुष्यता के बीच के संघर्ष में हमेशा मनुष्यता के साथ खडे होकर लगातार इस बाजारवादी मानसिकता के विरुद्ध और मनुष्यता के पक्ष में कविताएँ लिखीं। बाजार, लोकतंत्रः कुछ त्रिपदियाँ, सरकार, छिपना जैसी कई कविताएँ लिखीं जो दूर तक चुप्पी संग्रह में संग्रहित हैं।
संग्रह अपना ही देश पढकर तत्कालीन समाज, राजनीति की बदहाली, मूल्यों का क्षरण और समाज में फैल गयी एक अजीब-सी क्रूरता को अपने यहाँ जगह देते हैं। तत्कालीन राजनीति ने किस तरह से मूल्यों का क्षरण किया, इस पर मदन कश्यप ने खूब खुल कर लिखा है। रंग कविता की आखिरी पंक्तियाँ हैं हमारे समय के शब्दों ने कुछ इस तरह बदले हैं रंग/कि खुशी का अर्थ है दुख का रंगीन हो जाना/विचार का मतलब है मूर्खता में चमक आ जाना। वहाँ मेटाफर, बहुरुपिया, तानाशाह और जूता, मध्यवर्ग का कोरस, उदासी का कोरस जैसी कविताएँ हैं जहाँ सत्ता की निरंकुशता और आम आदमी की कठिन जिंदगी की कशमकश है। इस संदर्भ में इस संग्रह में दो कविताओं को देखना बहुत दिलचस्प भी और सुकूनदायक भी है। एक है धर्मनिरपेक्ष हत्यारा। साम्प्रदायिकता बुरी है, परन्तु इस समाज ने साम्प्रदायिकता के इतर सारे अपराधों को उससे नीचे की श्रेणी में रखा है। यह एक एकांगी पाठ है। तब कवि के रूप में मदन कश्यप का व्यंग्य बहुत दिलचस्प है। हत्यारा धर्मनिरपेक्ष है/यह बहुत लोगों के लिए सुकून की बात है/भले ही वह हत्यारा है/साम्प्रदायिक नहीं है। लेकिन कवि का पक्ष है दुखी है केवल कवि/क्योंकि हत्यारा हत्यारा है। मदन कश्यप ने इस संदर्भ में एक कविता और लिखी हत्यारा रो रहा था। उन्होंने साम्प्रदायिकता और आर्थिक विषमता को इस कदर पैदा करने वालों में, मूल्यों का इस कदर क्षरण करने वालों में, लोकतंत्र को यूं कमजोर करने वालों में कोई अंतर नहीं देखा। मदन कश्यप ने दोनों को हत्यारा माना है और दोनों के विरोध में अपनी कविता लिखी है। दूसरी कविता है लोकतंत्र का राजकुमार जिसमे किसी का नाम नहीं लेने के बावजूद 2010 में लिखी गई इस कविता के संदर्भ को समझा जा सकता है। इन दोनों कविताओं के संदर्भ में दिलचस्प और सुकूनदायक शब्दों का इस्तेमाल मैंने किया है। दिलचस्प इसलिए कि यहाँ सामान्यतया सोचा नहीं जाकर थोडा अलग तरीके से या कहें थोडा असामान्य तरीके से सोचने का प्रयास किया गया है। और सुकूनदायक इसलिए कि मदन दा ने अपनी कविताओं में सत्ता के किसी चरित्र को कभी नहीं बख्शा। उन्होंने बिना किसी भेदभाव के एक ही चाबुक से सारी बुराइयों, नृशंसताओं को अपनी कविताओं में हाँका है।
मदन कश्यप ऐसे गोताखोर हैं जो अपनी कविताओं में अपने समय के यथार्थ के भीतर के यथार्थ को ढूँढ लाते हैं। कविता लोकतंत्र का राजकुमार की आखिरी पंक्ति में वे लिख चुके हैं हम सब कैदी थे/पर उतने भर से उन्हें संतोष नहीं था/वे तो हमारे सपनों को कैद करना चाहते थे/हमने पूरी दिल्ली उन्हें दे दी थी/लेकिन उनकी नजर तो दंतेवाडा पर थी। मदन कश्यप सत्ता की इसी नजर को पकड लेने वाले कवि हैं। वे जानते हैं कि ये नये युग के सौदागर हैं/हम खेत काटते रहे/इन्होंने पूरा जंगल काट डाला/हम बृंगा जलाते रहे/इन्होंने समूचा गाँव जला दिया।
मदन कश्यप के यहाँ आदिवासी का विषय एक ऐसा विषय है जहाँ उनका गुस्सा बहुत ज्यादा है। और सिर्फ यही एक विषय है जहाँ वे अपने गुस्से को नियंत्रित नहीं कर पाए हैं और यही कारण है कि इसका असर उनकी कविताओं पर पडा है। कई कविताएँ कहीं कहीं पर बहुत गद्यात्मक हो गयी हैं। उनकी उस सपाट भाषा में उनका गुस्सा दिखता है उनकी चिंता दिखती है। परन्तु कविता तो अंततः कविता है इसलिए उसे सबसे पहले कविता होना होगा। चूँकि सत्ता की पूरी चाल इन आदिवासियों के खिलाफ है और चूँकि मदन कश्यप सत्ता की इन सारी चालों को जानते हैं इसलिए उनका गुस्सा जायज है। वे इस गुस्से से अपने आप को निर्वैयक्तिक नहीं रख पाते, यानी अलगा नहीं पाते, इसलिए ये कविताएँ कई बार सपाट हुई हैं। महोदय!लूट और हिंसा के अलावा/और क्या बचा है आफ लोकतंत्र में/आपने पहाड बेच डाले/नदियाँ बेच डालीं/जंगल बेच दिया/आपको जिसने भी वोट दिया/देश चलाने के लिए दिया होगा/देश बेचने के लिए तो नहीं/महोदय! इस तरह तो कोई/अपने बाप की जायदाद भी नहीं बेचता। मुझसे पूछा जाए तो मैं इसे अपनी पसंद की कविताओं में नहीं रखूँगा। लेकिन जैसा कि लोंजाइनस कहते हैं ना कि थोडी त्रुटि के साथ भी महान विचार वाला साहित्य भी उस त्रुटिहीन साहित्य से तो बेहतर ही है जिसमें कोई महान विचार नहीं है। तो मदन कश्यप की इस कविता से हम इस बात के लिए तो असहमत हो सकते हैं कि उसमें कवितापन की थोडी कमी रह गयी है, लेकिन उनके विचार से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकते।
2005-2006 में घटित एक दुर्दान्त घटना जिसे निठारी कांड के नाम से जाना जाता है, जो एक कवि के रूप में मदन कश्यप के लिए ही नहीं सभी मनुष्यों के लिए विचलित करने वाली घटना थी। मदन कश्यप ने इस पर 2007 में निठारी की बच्ची और निठारीः एक अधूरी कविता, निठारी में जरथुष्ट्र शीर्षक से कविताएँ लिखीं। कविता निठारी की बच्ची में कवि मदन कश्यप के द्वारा पूछा गया यह सवाल मनुष्यता के सामने एक ऐसा सवाल बन कर टँग गया जिसका जवाब किसी के पास नहीं है। क्या इसी परिणति के लिए पैदा हुई थीं/ये लडकियाँ इस सुंदर धरती पर। स्त्रियोँ के साथ हो रहे शोषण पर लगातार लिखे जाने के बावजूद निठारी काण्ड एक ऐसी घटना थी जिस पर अलग से बात करने की जरूरत थी और एक जिम्मेदार कवि के रूप में मदन कश्यप ने ऐसा किया भी। यह सवाल जो मदन कश्यप अपनी कविता के माध्यम से पूछ रहे हैं उसका जवाब इस समाज के पास भले ही ना हो परन्तु अपनी एक दूसरी कविता निठारी में जरथुष्ट्र में वे खुद जो लिखते हैं वही जवाब बन जाता है। इस कविता में इंसान की मृत्यु की घोषणा चाहे जितनी भी अतिवादी लगे परन्तु निठारी कांड के सामने यह सच ही लगता है। इसलिए हे प्रिय जानवरों आज तुम्हारे बीच/मैं शपथपूर्वक घोषणा करता हूँ कि इस धरती पर/ईश्वर का ईश्वर जाने/इनसान अंतिम रूप से मर चुका है।
2019 में प्रकाशित उनका छठा संग्रह पनसोखा है इन्द्रधनुष इस कठिन समय में प्रेम को बचाने की कवायद के लिए जितना याद किया जाएगा, उतना ही इस सत्ता के प्रतिरोध के लिए भी। यह संग्रह इस साम्प्रदायिक ताकत के विजय रथ के साथ साथ कमजोर पडते लोकतंत्र का दस्तावेज है। 16 मई 2014 को चुनाव परिणाम आया और 29 मई 2014 को मदन कश्यप ने अपने साठ वर्ष पूरा करने पर अपनी कविता साठ का होना में लिखा कछुआ बनकर ही तो जिया/सिमटा रहा कल्पनाओं और विभ्रमों की खोल में/बेहतर दुनिया के लिए रचने और लडने के नाम पर/बदतर दुनिया को टुकुर-टुकुर देखता रहा चुपचाप। यह, बदतर स्थिति को देखकर कवि की निराशा है जबकि एक कवि के रूप में मदन कश्यप ने चुप्पी के रास्ते को कभी नहीं चुना। लेकिन इस चुप्पी का इस्तेमाल यहाँ इस कवि के लिए नहीं है, बल्कि इस समाज के है जो अपने क्षुद्र स्वार्थ के लिए इस देश के बदतर हालात के लिए जिम्मेदार हो गए। और एक कवि की निराशा इससे भी हो सकती है कि उसके या उस जैसे तमाम विचारकों के लााख नहीं चाहने के बावजूद यह दुनिया ऐसी बन गयी। कविता की आखिरी पंक्तियाँ हैं खुद को बचाने के लिए/देखता रहा चुपचाप देश को मरते हुए/और खुद को भी कहाँ बचा पाया। एक कवि का इस निराशा में घिरना कुछ भी अजीब नहीं है। एक बेहतर समाज को बनाने का सारा प्रयास व्यर्थ गया और अंततः आज स्थिति ऐसी है कि इस पर सिर्फ दुख व्यक्त किया जा सकता है।
इस संग्रह में डपोरशंख उपशीर्षक से एक खण्ड है जो 2014 के बाद के भारत के बदले हालात के प्रतिरोध में लिखा गया है। इन कविताओं को क्रम में रख कर पढा जाए, तो इतिहास के समानान्तर ये कविताएँ इतिहास की व्याख्या प्रस्तुत करती चलती हैं। 2015-16 के आसपास की लिखी कविताएँ डपोरशंख, अच्छे दिन की न*म, हाशिमपुरा, काला धन का कोरस, भारतमाता की जै, पिता का हत्यारा अपने आप में अपने समय की गवाह हैं। पिता का हत्यारा कविता जज लोया की बहुचर्चित हत्या के संदर्भ से जुडती हुई कविता है। यह हिन्दी कविता और मदन कश्यप की वैचारिक प्रतिबद्धता का ही सवाल है कि ऐसी कविताएँ सामने आ पायीं। ऐसी कविताएँ सिर्फ प्रतिबद्धता से ही पैदा हो सकती हैं। 2017 में लिखी गई कविता क्यों कि वह जुनैद था इस समय का एक दस्तावेज है। यह साम्प्रदायिकता के पीछे के सच को सामने लाने वाली कविता है। मदन कश्यप की कविताओं को पढते हुए यह बार-बार दिखता है कि वे समानान्तर इतिहास रच रहे हैं। इन कविताओं को पढकर साहित्य और इतिहास का फर्क समझ आता है। और यह भी पता चलता है कि आखिर साहित्य इतिहास से इतना आगे की चीज कैसे है। इतिहास तथ्यों को प्रस्तुत कर सकता है परन्तु तथ्य तो सत्ता के द्वारा निर्मित होते हैं। पिता का हत्यारा जैसी कविता इतिहास के उन्हीं तथ्यों की व्याख्या है। साहित्य इतिहास के तथ्यों के पीछे के सत्य और षडयंत्र को समझने का साधन है। मदन कश्यप चूंकि अपने समय के सत्य से इतनी वैचारिकता से जुडे हुए हैं, अपने समय में निर्मित हो रहे इतिहास से इस कदर जुडे हुए हैं कि वे उसकी तह में उतर कर मोती ढूँढ लाते हैं। और इस तरह यह साहित्य इतिहास का पूरक बन जाता है। सत्य को जान लेने का साधन।
मैंने इस बात का उल्लेख ऊपर भी किया है कि राजनीतिक पक्षधरता को स्पष्ट करती हुई कविताएँ हिन्दी साहित्य में और भी लिखी गयी हैं, परन्तु इस तरह घटनाओं, नामों, राजनीतिक पार्टियों को सीधे सीधे इंगित करके लिखी गईं कविताएँ नागार्जुन के बाद कम मिलती हैं। मदन कश्यप ने अपने 40-45 साल के कविता के लम्बे सफर में चाहे सरकार किसी भी विचारधारा की हो, अपने फर्ज को निभाने में कभी कोताही नहीं बरती। अपनी इस प्रतिबद्धता को, अपनी खरी खरी कहने की आदत को और सत्य के भीतर प्रवेश कर जाने की जिद को कभी नहीं छोडा। फिर लोकतंत्र जैसी कविता इसका ज्वलंत उदाहरण है, जहाँ वह लोकतंत्र के भीतर के सच को सामने रखते हैं बिकता सबकुछ है/बस खरीदने का सलीका आना चाहिए/इसी उदण्ड विश्वास के साथ/लोकतंत्र लोकतंत्र चिल्लाता है अभद्र सौदागर। और कविता का अंत इस कमजोर पडते लोकतंत्र के पीछे एक औजार की तरह छिपी इस साम्प्रदायिकता को उजागर करता है। सबसे सस्ता बिकता है धर्म/लेकिन उससे मिलती है इतनी प्रचुर राशि/कि कुछ भी खरीदा जा सकता है/यानी लोकतंत्र भी।
मदन कश्यप के कविता के सफर से गुजरते हुए, यानि उनके सम्पूर्ण छह संग्रहों से गुजरते हुए तीन बातें बहुत ही स्पष्ट हैं -
1. मदन कश्यप ने जीवन में कविता सिर्फ लिखी नहीं है, बल्कि उसे जिया है। वे आदि से लेकर अंत तक, सोच से लेकर व्यवहार तक, हँसने से लेकर बतियाने तक, चलने से लेकर रुकने तक हर साँस में कवि हैं। उनकी पहली और आखिरी प्राथमिकता कवि होना है। यह कविता उनके यहाँ शौक की तरह नहीं है और न ही यह कविता सिर्फ कला के लिए आई है। उनके यहाँ कविता का मतलब जिम्मेदारी, गंभीरता और वैचारिकता है। वैचारिक प्रतिबद्धता है।
2. एक कवि के रूप में मदन कश्यप की पहली और आखिरी प्राथमिकता उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता है। उन्होंने अपने कवि-जीवन में यह स्वीकार किया है कि कविता का काम प्रतिपक्ष में होना है, चाहे सत्ता किसी की भी हो। इसलिए उनके छहों संग्रहों में संकलित कविता में पहली कविता शिशिर आ रहा है से लेकर उनके अब तक के आखिरी कविता संग्रह की आखिरी कविता क्योंकि वह जुनैद था तक के सफर में उन्होंने इस बात की कभी फिक्र नहीं की कि उस समय किस विचारधारा की सरकार है या वह कितनी आक्रामक सरकार है। एक कवि के रूप में उनकी प्रतिबद्धता ने जो उचित बतलाया उसे उन्होंने अपनाया। और अपनी वैचारिकता के रास्तें में जो भी अडचनें आयीं उसे उन्होंने बहुत हिम्मत से पार किया।
अपनी कविताओं में मदन कश्यप ने हमेशा उन लोगों के साथ पक्षधरता दिखलायी जो इतिहास में छूट गए हैं। या फिर लोकतंत्र की उस मजबूती में अपना विश्वास दिखलाया जो धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। एक कवि के रूप में ताउम्र कविताओं में विश्वास दिखलाया। उन्होंने इसे स्वीकार किया कि यह दुनिया चाहे जितनी भी बुरी हो जाए, चाहे जितनी जहरीली हो जाए या फिर चाहे जितनी नृशंस हो जाए कला-संस्कृति का दामन कभी नहीं छोडना चाहिए। कला संस्कृति ही एक ऐसा माध्यम है जिसके सहारे इस दुनिया को बर्बर होने से थोडा-बहुत बचाया जा सकता है या फिर इस दुनिया में साँस लेने की जगह मुहैया करवायी जा सकती है। और ऐसा मानते हुए एक बेहतर लोकतंत्र बनाने के रास्ते में उन्होंने कविता को हथियार की तरह इस्तेमाल किया।
3. मदन कश्यप की कविताओं को उनके निजी जीवन, तत्कालीन समय, तत्कालीन समय की राजनीति, तत्कालीन समय की संस्कृति, तत्कालीन समय की विषमताओं और तत्कालीन समय के अंर्तद्वंद्वों के समानान्तर रख कर पढा जाना चाहिए। जब निजी जीवन और तत्कालीन समय के बरक्स उनकी कविताओं को रखकर पढा जाता है, तब उनकी कविताएँ एक समानान्तर इतिहास का पाठ प्रस्तुत करती हैं।
दलित, आदिवासी और स्त्री कविता से उनके इस विशेष लगाव को उनके अनक वक्तव्यों, उनके आलेखों, और उनके साक्षात्कारों में देखा जा सकता है। निर्णायक रहते हुए उन्होंने हमेशा इस बात का ध्यान रखा है कि सम्मान उन्हें मिले जिनकी कविताएँ बहुत महत्त्वपूर्ण हैं और हिन्दी साहित्य की इस तिगडमी जंजाल से उनकी दूरी हो और इस कारण उनकी चर्चा बनिस्पत कम हो पायी हो।
लेकिन लेखकों की इस सहजता की हिन्दी समाज को शायद आदत नहीं है। यही कारण है कि मदन कश्यप की कविताएँ अपने समय के मददे्नजर जितनी आवश्यक हैं हिन्दी समाज ने अभी उसका उस तरह से पाठ नहीं किया है। मदन कश्यप की कविताओं का जब मुकम्मल रूप से अंतर्पाठ होगा, तो निस्संदेह वह इस कठिन समय का सबसे बडा साथी साबित होगा।
आलेख का अंत मदन कश्यप द्वारा 1992 में लिखित एक कविता -फूल पर कविता से। यह छोटी सी कविता से इस आलेख का अंत इसलिए कि मदन कश्यप के पूरे लेखन से गुजरने के उपरान्त यह कविता ठीक उन पर सबसे सटीक बैठती है। इस कविता में वे लिखते हैं फूलों पर कविता नहीं लिखी/कुछ पौधे लगाए क्यारियों में/मिट्टी को गोंड-गोंड कर बनाया कोमल/कि जडे आसानी से फैल सकें/ उन्हें सींचा अपनी आत्मा के जल से/पाले और धुएँ से बचाया। तो यह कविता मदन कश्यप के जीवन का असली फलसफा है। मदन कश्यप ने अपने जीवन में क्यारियाँ बनायीं, पौधे लगाए और कोशिश की है कि फूलों की खुशबू से यह दुनिया मनमोहक हो जाए। तो कविता लिखना इसी ख्वाब को पालना है। यह फूल रौंदे भी गए या जाएँगे, परन्तु फूलों को मसलने वाले खूनी पाँवों को/शायद यह पता नहीं था/फूल जितने रौंदे जाएँगे/खुशबू उतनी तेज होगी। तो मदन कश्यप का पूरा लेखन इसी तेज खुशबू के ख्वाब का लेखन है। ये कविताएँ इस मुश्किल वक्त में हमारा सबसे बडा सम्बल है। मदन कश्यप लगातार लिखते रहें ताकि मुश्किल से मुश्किल एवं जटिल समय में भी हमारी कविता प्रतिपक्ष में खडी मिले।
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सम्पर्क - उमा शंकर चौधरी,
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मो.-810229111,
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