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प्रियंवद : रंग-रंग बहुरंग

दया दीक्षित
हिन्दी साहित्य के इतिहास में बीसवीं शती के उत्तरार्द्ध में जिन साहित्यकारों का नाम अग्रपंक्ति में अंकित है- उनमें से एक महत्त्वपूर्ण नाम है इतिहासविद्-कथाकार उपन्यासकार प्रियंवद का। कथाकार प्रियंवद का जन्म उत्तर प्रदेश की औद्योगिक नगरी कानपुर में 22 दिसम्बर 1952 में हुआ। बहुत अल्पवय में लेखन करने लगे। शुरुआत काव्यमय रही, किन्तु लेखन का उत्कर्ष गद्य में गतिमान हुआ।
कानपुर की समृद्ध साहित्यिक बिरादरी की विरासत में अनेक स्वनामधन्य गद्यकार हो गए हैं। (भारतेन्दु के अनुयायी पं. प्रताप नारायण मिश्र (1885) से लेकर यशशेष पद्म श्री गिरिराज किशोर (2019) तक) इस भरी पूरी विरासत की अगली श्ाृंखला में प्रियंवद अपने धीर-गम्भीर सरोकारों के साथ खडे दिखाई देते हैं। हिन्दी कथा साहित्य में प्रियंवद अपने विशिष्ट सरोकारों और अनूठे शिल्प के लिए सुपरिचित हैं। वे व्यतीत व वर्तमान की सरल-वक्र रेखाओं, भास्वर-धूसर रंगों, दृष्टिगत दुर्लभ वास्तविकताओं तथा स्वीकृत विवादित निष्पत्तियों के रचनात्मक कायाकल्प से जिन कथाबिम्बों को मूर्तिमान करते हैं वे पाठक को अवान्तर/समान्तर दुनिया में ले जाते हैं।1 (सुशील सिद्धार्थ की ब्लर्ब टिप्पणी उपन्यास छुट्टी के दिन का कोरस उपन्यासकार प्रियंवद, प्रथम संस्करण 2009 भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, नई दिल्ली)।
प्रियंवद का भाषाशिल्प अपने समकालीन कथाकारों से भिन्न व अद्भुत है। जादुई या करिश्माई कोमल रेशमी एहसास उनकी भाषा का प्राण है। कईं समीक्षक उनके शिल्प में निर्मल वर्मा का प्रभाव अनुभव करते हैं, तो कुछेक का कहना है- प्रियंवद की कहानियाँ हमारे समय का आलोचनात्मक पाठ सृजित करती हैं। उनकी रचनाओं में काफ्काई रंग है। वे भाषा के जादूगर हैं। प्रियंवद, प्रियंवद ही हो सकते हैं। न वे किसी परम्परा से आए हैं और न ही किसी सर्जक विशेष की अनुगूँज उनके कृतित्व में मिलती है।2 (शैलेन्द्र सागर, फरवरी मार्च 2008 पृष्ठ 88 रपट कथाक्रम उत्सव 2007, आजादी, साहित्य की आजादी)
हिन्दी कथा साहित्य में प्रियंवद का अर्थ खूबसूरत भाषा, अपरिचित मगर रोचक वातावरण रहस्यमयी असामान्य और हाशिये के पात्र, इतिहासदर्शन के जंगलों से गुजरना है, जहाँ प्रेम, औरत और देह के पडाव भी आते हैं। पहली कहानी बोसीदनी (1980) से लेकर.... दास्तानगो तक उनकी कथायात्रा में कईं आयाम देखे जा सकते हैं। उनका लेखन व कविताओं ने जैसा लीक से हटकर है, वैसा ही जीवन भी है, जहाँ तेजाबी खुलासे हैं। लेखकीय जिन्दगी को अपने खास ढंग से जीने वाले प्रियंवद बातचीत के दौरान न तो सवालों से बचे, न हमें भटकाया।3 (साहित्यिक मासिक पत्रिका पाखी-सम्पादक प्रेम भारद्वाज अप्रैल 2012, पृष्ठ 21, साक्षात्कार- प्रेम भारद्वाज, अशोक गुप्ता व रोहित प्रकाश)
उक्त पत्रिका को दिए गए साक्षात्कार में भले ही प्रियंवद की साहित्यिक यात्रा की शुरूआत उनकी प्रथम कहानी और 1980 से बताई गयी है, किन्तु सच यह भी है कि 1980 से पूर्व प्रियंवद का लेखन चर्चा में आ चुका था। अपने सारगर्भित इतिहास विषयक लेखों व अन्यान्य आलेखों से कम से कम कानपुर महानगर के साहित्यिक वर्ग में प्रियंवद पर्याप्त चर्चित हो चुके थे। समाचार पत्रों- विश्वामित्र, नवजीवन, स्वतंत्र भारत आदि में आए हुए विचारणीय लेखन ने प्रियंवद की लेखकीय गंभीरता चिंतनशीलता, पारदर्शिता, बेलाग स्पष्टता सरोकारों व दायित्वबोध के जो संकेत दिये वे अद्यतन उनके लेखन में विद्यमान हैं।
किशोरवय से ही लेखन के प्रति जो आकर्षण उनके हृदय में जाग्रत हुआ उसकी परिणति स्वरूप एक लघु काव्यसंग्रह लाल कनेर के फूल 4 (कथासंग्रह के ब्लब में उल्लिखित, कथासंग्रह मोसीदनी, कथाकार प्रियंवद, प्रथम संस्करण 1983, पराग प्रकाशन, दिल्ली) प्रकाश में आया यह अलग बात है कि बाद के दिनों में गद्य ने उन्हें ऐसा सम्मोहित किया कि फिर कविता लेखन ने विराम ले लिया और शायद गद्य का ही प्रबल प्रेम था, कि स्वयं प्रियंवद में अपने काव्य संग्रह के प्रति एक निर्वेद-सा उत्पन्न हो गया। फिर जो उन्होंने उसकी चर्चा भी नहीं की। यहाँ प्रसंगवश फैजाबाद कैन्ट के बंगला नम्बर उन्नीस की महीयसी विदुषी का एकवचन याद हो आया, जो उन्होंने एक महाविभूति के विषय में कहा था जिसका आशय यह था कि - अपने प्रति त्याग व दूसरों के प्रति उदारता यह बडे लोगों का लक्षण होता है।
प्रियंवद को जानने वाले यह भलीभाँति जानते हैं कि उनकी दिनचर्या बेहद अनुशासित व नियमित है, और यह तो सर्वविदित है कि अनुशासन व नियमितता बिना कठोर त्याग के संभव नहीं होती। सादा जीवन उच्च विचार वाला सूक्तिवाक्य उनके जीवन को परिभाषित करता है। आत्मश्लाघा के इस युग में उनका व्यवहार कबीर के इस दोहे का स्मरण कराता है-
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न होय।
पाखी को दिये गए साक्षात्कार में उनका यह कथन में दृष्टव्य है- मैंने अपनी उम्र के 25 साल बहुत आवारागर्दी में बिताए हैं। मैं अगर लेखक नहीं बनता, तो निश्चित तौर पर एक छोटा-मोटा गुण्डा होता।5 (संदर्भ वही, पृष्ठ 23)। आज कितने साहित्यकार ऐसे हैं, जो इस तरह से अपने बारे में सार्वजनिक रूप से बात कर सकें। इतनी बेलाग स्पष्टता के साथ अपने दोषों को गिना सकना इस आत्ममुग्धता के समय में निश्चित रूप से बहुत बडी बात है। अस्तु, यह आत्मानुशासन से सधी दिनचर्या संयमशीलता, नियमितता, निरंन्तरता, कर्मठता, साहित्यक सरोकारों के प्रति गहन समर्पण का ही परिणाम है कि प्रियंवद की रचनाधर्मिता ने प्रभूत कार्य किया है। विश्वेतिहास हो या भारत विभाजन की अंतःकथा या दाराशिकोह, सुकरात जैसी विभूतियों को लेकर पाँच महान हस्तियों की जीवनियाँ (पाँच जीवनियाँ 6, जीवनी-कार प्रियंवद,संवाद प्रकाशन मेरठ, प्रथम संस्करण 2015) हों या बाल साहित्य या कथाएँ या उपन्यास हों या अकार जैसी गुरुगंभीर पत्रिका का संपादन हो या संगमन के अतिविशिष्ट आयोजनों का आयोजन संयोजन हो, सभी में उनके दाक्षिण्य कौशल की अमिट छाप दिखाई पडती है।
इतिहासविषयक पुस्तकों के लेखन में उनके अथक परिश्रम का ही परिणाम था कि हिन्दी पाठकों को देशीय इतिहास के साथ विश्वइतिहास की तथ्यात्मक जानकारी प्राप्त हो सकी। यह बात उन्होंने पाखी को दिए गए साक्षात्कार में भी स्वीकार की-पहली बात तो ये कि ये इतिहास की किताब मैनें क्यों लिखी? लिखने का क्या उद्देश्य रहा? मैं इरफान हकीब का इंटरव्यू लेकर लौटा, इसका ये मतलब तो नहीं कि मैं इतिहास लिखने लग जाऊँगा। मैंने सब इतिहास इंग्लिश में पढा। कोई किताब नहीं देखी जो हिन्दी में हो। देश का विभाजन दुनिया की 8-10 बडी ट्रेजिक घटनाओं में एक था। उसके बहुत बडे ऐतिहासिक परिणाम भी हुए- उस पर हिन्दी में कोई किताब दिखती नहीं थी। आपको थोडा अजीब लग सकता है, लेकिन मेरे लिखने का जो प्राथमिक उद्देश्य था वो किसी इतिहासकार की तरह इतिहास में अन्वेषन दृष्टि रखकर नयी चीज करना नहीं था। सबसे बडा उद्देश्य था हिन्दी में ऐसी चीजों को एक जगह लाकर ऐसी जानकारी देना, हिन्दी के पाठक के पास एक ऐसी किताब पहुँचा देना जिसको वो हिन्दी में पढकर इस पूरी बात को समझ सकें।7 (संदर्भ वही, पृष्ठ 31)
उक्त वक्तव्य से रचनाकार के रचनापाथेय व सृजनोद्देश्य को भलीभांति जाना समझा जा सकता है।
प्रियंवद की फ्लडलाइट कस्तूरीमृग व दिलरस जैसी श्रेष्ठ कथाओं में व्यक्ति, समाज व जीवन के बहुआयामी पक्ष अपने सूक्ष्म रंगरेशों के साथ वस्तुपरक ढंग से बिखरे निखरे दिखलाई पडते हैं। एक ओर प्रेम के स्थूल व सूक्ष्म रूपों की सुन्दर अभिव्यंजना इन कथाओं में है, तो दूसरी ओर यांत्रिक व वैज्ञानिक- विकास से उत्पन्न लघु उद्योगों के विनष्ट होते जाने से उपजी बेबसी लाचारी निर्धनता का भी हृदयस्पर्शी कटु यथार्थ है।
हमारे समय का यही कटुयथार्थ बेहद वस्तुपरक ढंग से अभिव्यक्त हुआ है उपन्यास-छुट्टी के दिन का कोरस में। देश के इतिहास व वर्तमान को अपने कलेवर में समाहित करने वाला प्रियंवद का यह उपन्यास एक समय कोमल और कठोर, सरल और क्लिष्ट तथा नकार और सकार का मिश्रित क्लासिक है। अगर गद्य में गजल की बानगी देखनी हो, तो इस कृति में यह खासियत देखी जा सकती है।
कथानायक विवान की स्मृति में माँ, परित्यक्त, ईश्वर और गालिब उसके साथ जीवन का सफर तय करते हैं। उपन्यास की शुरूआत में ही जबकि वह वृद्धावस्था में है उसे माँ की परित्यक्त इतिहास और ऐतिहासिक घटनाएँ कथाकार प्रियंवद की कहानियों व उपन्यासों में भी प्रभूत मात्रा में विद्यमान है। इतिहास के साथ ही अपने समय, समाज व देश को चलाने वाली तीनों पालिकाओं (कार्यपालिका, न्यायपालिका व व्यवस्थापिका) और उनकी रीति-नीति पर तीक्ष्ण निरीक्षण दृष्टि है। प्रतिगामिताओं का मुखर विरोध प्रियंवद के लेखन का मूल बीज है। अपने उपन्यास धर्मस्थल में उन्होंने न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार को अत्यंत बेबाकी से अभिव्यक्त किया है। इस भ्रष्टाचार की गिरफ्त में फँसे आम आदमी की पीडा, छटपटाहट और वंचनाओं को उन्होंने मार्मिक ढंग से उकेरा है। वे हर हमेशा व्यक्ति मात्र की प्रगति व मुक्ति के लिए प्रतिबद्ध दिखाई पडते हैं। 2007 में कथाक्रम का आनन्दसागर स्मृति सम्मान व पुरस्कार मिलने पर उन्होंने जो वक्तव्य दिया था उसका एक अंश दृष्टव्य है- यह पुरस्कार मुझे आत्मचिंतन एवं निरीक्षण करने पर विवश करता है। यह मुझे अपने भीतर के पुरातात्विक शहर में घूमने तथा अपनी पथरीली जमीन पर उतरने का अवसर देता है। मेरे अंतर्जगत में महत्त्वाकांक्षाएँ नहीं, बल्कि चील की तरह फडफडाती हुई छोटी-छोटी प्रार्थनाएँ हैं कि मैं मनुष्य की सम्पूर्ण स्वतंत्रता के पक्ष में खडा रह सकूँ। अपने समय को उसकी सारी दुरभि संधियों को सारी बारीकियों के साथ पहचान कर उनके विरोध में रह सकूँ। मनुष्य की समस्त भावनाओं को शब्द दे सकूँ। जीवन की विराटता को रहस्यमयता को अनुभव करता रहूँ। हमेशा असंतुष्ट रहूँ, असफल रहूँ, प्रेम में रहूँ। यदि यह सब मेरे जीवन में होगा, तो स्वतः शब्द भी होंगे, अभिव्यक्ति और रचनात्मकता भी होगी।8 (कथाक्रम त्रैमासिक सम्पादक शैलेन्द्र सागर जनवरी-मार्च 2008 पृष्ठ 88)
परित्यक्त ईश्वर की, फिर गालिब की याद आई।9 (पृष्ठ 11 उपन्यास छुट्टी के दिन का कोरस उपन्यासकार प्रियंवद, प्रथम संस्करण 2009, भारतीय ज्ञानपीठ दिल्ली)
प्रकारान्तर से यह यादें विवान के व्यक्तित्व की गहरी संवेदना, आस्था और जीवन की लय के काव्योद्रेक की इंगिति हैं। इस इंगिति में उसकी जिन्दगी के दर्द, दुख, पीडा, करुणा के आवेगों के साथ उसके गहनतम उदात्त रागात्मक उद्देश्यों की सरस अभिव्यक्ति है।
एक ओर जिस तरह से भारतीय माँ से उत्पन्न कथानायक विवान अपने आंग्ल पुरखों की भारत को दी हुई प्रतिबद्ध सेवाओं, उनके व अपने शानदार गौरवशाली अतीत को याद करता है, दूसरी ओर मैय्यत कमेटी के सदस्य के रूप में अपनी वर्तमान दुःखद जर्जरावस्था को समेकित करता है, उस तरह से दरअसल वह समष्टिगत रूप में कानपुर महानगर के विगत का ऐतिहासिक सांस्कृतिक वैभवशाली व्यक्तित्व का चित्र उपस्थित करता है। कभी जिस महानगर की पहचान नानाराव पेशवा, लक्ष्मीबाई, चन्द्रशेखर आजाद के नगर के रूप में होती थी, कभी जो महानगर औद्योगिक नगरी के रूप में जाना जाता था, आज वही बंद होती मिलों, उद्योगों के पलायन के लिए जाना जा रहा है। ठीक, कथानायक के वंचित वर्तमान की भाँति।
छुट्टी के दिन का कोरस उत्कृष्ट क्लासिक उपन्यास है। इसके एकाधिक पाठ हो सकते हैं। जीवन जगत के नाना व्यापारों के बीच मनुष्य का काम्य क्या है? क्या हो सकता है चाहिएवाद से अलग हटकर? इन प्रश्नों का दार्शनिक पृष्ठभूमि में हल तलाशता दिखाई देता है यह उपन्यास। दार्शनिक दृष्टिकोण से इसे पढा जा सकता है। इसका एक पाठ माक्र्सवाद या वामपंथ या माओवाद या नक्सली विचारधारा का हो सकता है। मनोवैज्ञानिक पाठ हो सकता है। शिल्पगत पाठों में भाषा पर ही एक पूरा पाठ हो सकता है। कथ्यशिल्प संयोजन की दृष्टि से, दिलचस्प अवांतर कथाओं की दृष्टि से, वातावरण या परिवेश की दृष्टि से, चित्रात्मकता की दृष्टि से, तमाम कई तरह की ऐसी गुंजाइशें हैं, जिन पर कई एक पाठ हो सकते हैं। ऐतिहासिक पाठ इसकी एक अन्यतम विशिष्टता है।
उपन्यास तीन पीढियों के इतिहास का घटनाक्रम है। इस घटनाक्रम का समय भारत एवं विश्वेतिहास में परिवर्तनकारक एवं निर्णायक है। 1857 से लेकर अंग्रेजों के जाने और देश की आजादी के बाद तक के द्वन्दों, दुरभि संधियों, बदलावों, नई शुरुआतों के इतिहास का प्रमाणिक दस्तावेज है यह उपन्यास। यह ऐतिहासिक स्रोत कमेटी के रोजनामचों तथा विलमौट डगलस की डायरी से प्राप्त होते हैं।
रंगून में बहादुर शाह जफर की मौत, देश में जनगणना की शुरुआत, पोस्टकार्डों की शुरुआत, गंगापुल का निर्माण, दयानन्द सरस्वती का साक्षात्कार, भारत की राजधानी दिल्ली बनना, पैसा, नया पैसा बनना, एवरेस्ट फतेह, मोर का राष्ट्रीय पक्षी घोषित होना, शरतचन्द, के.एल. सहगल की मृत्यु, गाँधी का सौवाँ जन्मदिन......... रेल, मूक सिनेमा, गायक, गायकी, बोलती तस्वीरों की शुरुआत, विभाजन की त्रासदी- तारीख की ऐसी और इस तरह की अन्यान्य तफसीलों का कारवाँ जगह-जगह मिल जाएगा। किस तरह बिलमौट डगलस (विवान के दादाजी) भारत आकर अपनी नाइंटी थर्ड रेजीमेंट के तहत कानपुर और लखनऊ में रहता है। किस तरह भारत की आबोहवा और पानी से परिचित होता है। किस तरह दो तीन साल यहाँ रहकर युद्ध में लडाइयाँ लडता है। किस तरह नेक माहरुख की अँगूठी उसे मिलती/महफूज रखती है? यह सारा इतिहास वृतांत सिलसिलेवार उपन्यास में सत्य ऐतिहासिक तारीखों, घटनाओं के रूप में उपन्यस्त है। बिलमौट ने जिस तरह हिन्दुस्तान का प्रथम परिचय सुना/आत्मसात किया था, प्रायः यही धारणा भारत के प्रति फिरंगियों की रही है- मैंने हिन्दुस्तान का नाम सिर्फ काली मिर्च और दूसरे मसालों के सिलसिले में सुना था जिनका जिक्र, हमारे घर के कुछ खास पकवानों के बनने पर होता था। मैंने हिन्दुस्तान को पहली बार एक काली असभ्य औरत के रूप में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के ईस्ट इण्डिया हाउस में लगी दस फुट चौडी और आठ फुट ऊँची पेंटिंग में देखा था, जिसमें पूरब अपनी सारी दौलत- वैभव हमारी महारानी के कदमों पर बिछा रहा था। इस पेंटिंग में किसी एशियाई समुद्री-तट की पृष्ठभूमि में तीन औरतें थी। एक औरत अंग्रेज थी जिसके आगे घुटनों तक झुकी हुई एक काली औरत थी जिसके हाथों में मुकुट, मोतियों की माला और जवाहरात थे। दूसरी औरत चीनी थी जिसके हाथ में पोर्सलीन का बर्तन और चाय थी। उसके पीछे गुलामों की कतार थी जिनके हाथों में सूती कपडों के थान थे। उनके पास हाथी थे, ऊँट थे। अंग्रेज औरत की भव्य मुद्रा में उसके पाँवों के पास हमारा अंग्रेजी सिंह बैठा था। यह पूरब है, पिता ने तस्वीर की ओर इशारा करके बताया था और ‘यह काली औरत इंडिया है। यह हिन्दुस्तान से 1835 में मेरी पहचान थी।10 (वही, पृष्ठ 195-96)।
एक बात कहे बिना नहीं रहा जा सकता कि दर्शन, इतिहास और राजनीतिक विचारधाराओं जैसे गम्भीर अतिरिक्त परिपक्वता की माँग करने वाले विषयों को बेहद सरस और स्वाभाविक तरीके से पाठकों से साधरणीकृत कराने में प्रियंवद को सफलता मिली है, शायद इसके मूल में उपन्यास की वे अवांतर कथाएँ/उपकथाएँ रही हैं, जिनकी रोचकता में रचता बसता पाठक इन गुरु गंभीर विमर्शों से श्लघ नहीं होता। एक बात और, हास्य की पर्याप्त गुंजाइश भी पाठक को बाँधने में तल्लीन करने में कामयाब हुई है। ये अवांतर कथाएँ, अवांतर होते हुए भी औपन्यासिक पात्रों से, परिवेश से जुडी हुई हैं।
गंगादीन की कथा, उसका लंगूर प्रसंग, बंदर की एक-एक एक्टीविटी का, विवान की विस्मृति और भोले अज्ञान का -बेहद जानदार मजेदार अंकन है। देवकी गुरु की विशिष्ट सज-धज उनकी पक्वान्न विशेषज्ञता (भट्ठी गुरु) तीसरी आवाज में अपराधी हलवाई को दिया जाने वाला शालीन प्रबोध और फिर गालियों का अनिर्वचनीय शब्द कोष....। सदर के पिता द्वारा शानो शौकत के वर्णन जिसे वे स्वयं से तैमूर के वंशज होने से जोडते सुनाते सुनाते बेख्याली में नादिरशाह से जोड बैठते...... देवकी गुरु भी किसी न किसी रूप में स्वयं को राजा बनारस से जोडकर देखते थे.... मुकुन्दी प्रसंग, मुंशी और चौर्यशास्त्र के साथ नाव की कील का प्रसंग, मंत्री का ताली प्रसंग, हकीम नुरुलहसन और उनकी पर्दानशीन बेगमों का प्रसंग, बिल्ली का मुँह फँसने और निकालने का प्रसंग.... ये ऐसे अवसर हैं जब गंभीर से गंभीर पाठक भी हँसे मुसकराए बिना नहीं रह पाता....।
इन हास्य प्रसंगों के अतिरिक्त सशक्त चित्रात्मक, काव्यमई भाषा उपन्यास में निर्बाध पठनीयता उत्पन्न कर देती है। वाकई प्रियंवद भाषा के जादूगर हैं। शब्दों की लयात्मक भंगिमाओं के कुशल साधक हैं। परिवेश और परिस्थितियों, प्रकृति के कार्यव्यापारों की गहराई और सूक्ष्मता से उसके एक-एक रेशे को शब्दचित्रों में ढालने वाले शब्दशिल्पी हैं। उनकी भाषा कोमल खूबसूरत और कलात्मक भाषा है। ईश्वर, माँ और गालिब को याद करने वाले इतिहास प्रेमी विवान को रचने वाले रचनाकार की भाषिक सामर्थ्य कइयों में अगर रश्क पैदा कर दे, तो आश्चर्य नहीं। यह कथाकार की भाषा की संप्रेषणीयता ही तो है कि जीवन क्या, कैसे और किस तरह जिया जाये? जैसे षडदर्शनों तथा आदिम वैदिक साहित्य तक वरन् यद्यापि विस्तृत गुरुतर कथ्य को इस तरह से भाषिक वस्त्र दिए हैं, कि सहज ही उनसे लक्ष्यार्थ की प्राप्ति सध जाती है। यह भाषा अपने चतुर्दिक परिवेश को इस तरह प्रस्तुत करती है कि पाठक के मस्तिष्क में वस्तु स्थिति का पात्रों की भंगिमाओं का, उनके सुख दुखादि का शब्दचित्र उपस्थित हो जाता है। एक दूसरा वैशिष्ट्य परिवेशगत मौलिक भावाभिव्यंजनागत है। कलात्मक नई लक्षणा और व्यंजना से यह भाषाभिव्यक्ति सजी सँवरी दृष्टिगत तो होती है, मगर बेहद स्वाभाविक तरीके से- उस अँधेरे में डूबता शहर था जो हथेलियों से पसीना छूटने की तरह-धीरे-धीरे दिन की रोशनी, जागृति और जीवन के हाथों से फिसल गया था।11 (वही, पृष्ठ 102)
कथाकार की भाषागत प्रतीकात्मकता तथा ध्वन्यात्मकता सरल, सधी और बेजोड है, खूबसूरत और अनोखी तथा विलक्षण है। यूँ तो कभी भी मगर वृद्धावस्था की कई देनों में एक देन यह भी कि घुटनों के जोडों में जावेजा चट् चट् की आवाज पैदा हो जाती है, प्रियंवद इसे घुटनों की चिडिया का चहकना या कलरव कहते हैं। हैं न खूबसूरत प्रतीक। यही नहीं प्रकृतिवश शारीरिक गुण धर्म के कारण जब तब घुटनों की चिडिया की बदलती आवाज पर भी कथाकार की नजर है। घुटनों ने सीधा होते समय एक महीन आवाज की। यह बहुत धीमी आवाज थी, वैसी ही, जैसे पेड पर बैठी नन्हीं चिडियाँ करती थीं। घुटनों से निकलती चिडियों की इस आवाज को विवान ने जब पहली बार सुना था तब वह बुरी तरह चौंका था। उसे लगा था कि उसके बिस्तर में ही कोई चिडिया रात भर दुबकी बैठी रही है। विवान ने उसे ढूँढा, तो वह बिस्तर से नहीं, घुटनों में मिली थी। कई बार विवान को लगता था कि उसके घुटनों की यह आवाज बदलती रहती है, उसी तरह जैसे विवान के स्वप्न बदलते हैं, साँस नली की सूजन का क्षेत्र बदलता है, मुंशी के कोयला तोडने की गति बदलती है। विवान तब इस बदली हुई आवाज को, पेड पर बैठी चिडिया के अलावा, किसी दूसरी चिडिया के आवाज से पहचानने की कोशिश करता। शायद खिडकी पर आने वाली गौरैया, या नीले पंखवाली चिडिया या फिर लाल गले की बुलबुल से। जब घुटनों की यह आवाज बदलती, तो फिर इस नई चिडिया की आवाज ही कई दिनों तक आती। विवान तब समझ लेता कि उसके घुटने अब और खराब हो गए हैं, क्योंकि तब आवाज के साथ घुटनों का दर्द भी बदल जाता था।12 (वही, पृष्ठ 12)
वास्तव में यह उपन्यास मानव जीवन का ही नहीं,सभ्यताओं के उत्थान पतन व निर्माण का भी महाख्यान रचता है।
सारतः कहा जा सकता है कि प्रियंवद के कृतित्व में इतिहास, वर्तमान व कल्पना के बहुरंगी, बहुआयामी ऐसे चित्र उपस्थित हैं, जो मनुष्यमात्र को सुख, तोष के साथ प्रगति के पथ की ओर उन्मुख होने की प्रेरणा प्रदान करते हैं।
संदर्भ
1. सुशील सिद्धार्थ की ब्लर्ब टिप्पणी उपन्यास छुट्टी के
दिन का कोरस उपन्यासकार प्रियंवद, प्रथम संस्करण
2009 भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, नई दिल्ली।
2. शैलेन्द्र सागर, फरवरी मार्च 2008 पृष्ठ 88 रपट
कथाक्रम उत्सव 2007, आजादी, साहित्य की आजादी)
3. साहित्यिक मासिक पत्रिका पाखी-सम्पादक प्रेम
भारद्वाज अप्रैल 2012, पृष्ठ 21, साक्षात्कार- प्रेम
भारद्वाज, अशोक गुप्ता व रोहित प्रकाश
4. कथासंग्रह के ब्लब में उल्लिखित, कथासंग्रह मोसीदनी,
कथाकार प्रियंवद, प्रथम संस्करण 1983, पराग
प्रकाशन,दिल्ली
5. वही, पृष्ठ 23
6. पाँच जीवनियाँ, जीवनीकार प्रियंवंद,संवाद प्रकाशन
मेरठ, प्रथम संस्करण 2015
7. संदर्भ वही, पृष्ठ 31
8. कथाक्रम त्रैमासिक सम्पादक शैलेन्द्र सागर जनवरी-
मार्च 2008 पृष्ठ 88
9. उपन्यास छुट्टी के दिन का कोरस उपन्यासकार प्रियंवद,
प्रथम संस्करण 2009, भारतीय ज्ञानपीठ दिल्ली,पृ.11
10. वही, पृष्ठ 195-96
11. वही, पृष्ठ 102
12. वही, पृष्ठ 12

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