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हिंदुस्तानी संगीत और महात्मा गांधी

पंकज पराशर
(मधुमती गाँधी की सही वर्तनी गाँधी का ही इस्तेमाल करती रही है। केवल इसी आलेख में गाँधी की सही वर्तनी के स्थान पर लेखकीय आग्रह पर गांधी जा रहा है। क्योंकि स्वयं गांधी अपनी वर्तनी में गांधी लिखा करते थे।) - संपादक
अगर मेरे भीतर संगीत और हँसी नहीं होती, तो मैं अपने काम के बोझ तले दब कर मर जाता।
-महात्मा गांधी
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की बहुत गहरी समझ न रखने के बावजूद महात्मा गांधी में पारंपरिक संगीत की संप्रेषण शक्ति की विलक्षण परख और उसकी राजनीतिक मंच पर लोगों को इकट्ठा करने की क्षमता की गहरी समझ थी। उन्होंने बहुत आसानी से इस असलियत को समझ लिया था कि भक्ति-संगीत से घिरे बडे हिंदुस्तानी समाज से लेकर प्रार्थना सभाओं तक किसी भी विशाल जनसमूह को संगीत की ध्वनियों के आलोक में खडा करके आजादी के आंदोलन को अखिल भारतीय एकसूत्रता में पिरोया जा सकता है। गांधी संगीत के कोई विशेषज्ञ या पारखी नहीं थे, लेकिन उन्होंने कुछ मधुर आवाजों की बहुत सराहना की। मसलन दिलीप रॉय और एम.एस.सुब्बुलक्ष्मी के कर्णप्रिय आवाजों की। भजनों में जो बात गांधी को सबसे अधिक प्रेरित करती थी, वह आमतौर पर गीत और उसकी सामग्री होती थी, जिसके बारे में वे अक्सर बैठकों में विस्तार से चर्चा किया करते थे। भजनों की भाषा को लेकर अपने आसपास के लोगों से वे अक्सर बहस करते। मध्यकालीन भजनों को गांधीजी इसलिए भी पसंद करते थे, क्योंकि उनकी सबसे बडी खूबी थी उनके भीतर मौज़ूद सादगी और भाषा की सरलता। जिसके कारण वे भजन सुनने वालों के सीधे लोगों के दिल में उतर जाते। मसलन गांधी ने तुकाराम के मराठी भजनों की प्रशंसा की, जिन्होंने सच्चे भक्त को परिभाषित करने वाली शुद्ध और अडिग भक्ति की प्रशंसा की थी। मराठी संत तुकाराम के गाये जाने वाले भजनों में गांधी को कुछ भी सांप्रदायिक नहीं लगा, क्योंकि उनके विचार में, प्रार्थना को कभी भी किसी एक समुदाय से संबंधित नहीं माना जा सकता।
गांधी से संगीत के जुडाव का इतिहास आज हमको अक्सर दंतकथाओं की तरह टुकडे-टुकडे में मिलता है, लेकिन सन् 1926 में ही उन्होंने ने इस सिलसिले में एक बात कही थी। उन्होंने कहा था कि संगीत के बगैर आजादी नामुमकिन है। जहाँ स्वरों का सामंजस्य नहीं होगा, वहाँ संगीत नहीं हो सकता। यानी सांगीतिक सामंजस्य ही असली आज़ादी है। यह कैसा अद्भुत विचार है कि मस्ती से रघुपति राघव राजा राम गाती स्वराजियों की मण्डली ही दाँडी-जैसी यात्रा करे और अँगरेज़ों द्वारा की जाने वाले दमन को निहत्थी चुनौती भी पेश करे! सन् 1925 में चरखा कातते समय गांधी के लिए कुछ संगीतकारों ने सितार बजाने का प्रस्ताव रखा। उस दिन गांधी का मौन व्रत था, लेकिन अपनी डायरी में उन्होंने लिखा कि उस दिन उनका सूत बेहतर काता गया। वे यह कुबूल करते हैं कि औरतों की जिस भौतिक, मानसिक रचनात्मकता की ताकत उन्होंने बचपन में घर की महिलाओं के बीच देखी थी, वह कहीं अवचेतन में उनकी माता के गाये भजनों के स्वरों से भी आत्मसात हुई थी।
सन् 1893 में मद्रास प्रेसिडेंसी के गवर्नर को वहाँ के शरीफलोगों की तरफ से एक अर्जी दी गई कि नाच-गाने का गंदा धंधा बंद करवाया जाए। उस वक्त के कुछ शुचितावादियों को मद्रास में तवाइफों की मौजूदगी से बाल-बच्चों के बिगड जाने का खतरा महसूस होने लगा था। सन् 1909 में रियासत मैसूर के राजा ने अपनी रियासत में देवदासी परंपरा को अवैध घोषित कर दिया। जबकि इधर उत्तर भारत में पंजाब की प्योरिटी एसोसिएशन और बंबई की सोशल सर्विस लीग जैसी संस्थाओं ने भी इसको लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई। जिस वज़ह से कोठे पर होने वाले मुजरों के खलिाफ धीरे-धीरे एक तरह का माहौल बनने लगा था। यह वही वक्त है जब कलकत्ता की मशहूर तवाइफ गौहर जान सन् 1902 से द ग्रामोफोन कंपनी लिमिटेड के लिए अपने गाने की रिकॉर्डिंग करवाने लगी थीं और इसके एवज में म्यूजिक कंपनी से अच्छी-खासी रकम वसूल करने लगी थीं। छह भाषाओं की जानकार बेहद तेज़-तर्रार और बेपहनाह खूबसूरत तवाइफ गौहर जान ने हिंदुस्तान में तवाइफों के खलिाफ बदलती हुई हवा का रुख भाँप लिया था। सो, गौहर ने शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत को तवाइफों के कोठे से निकालकर ग्रामोफोन रिकॉर्ड से जोडने में जुट गई थीं। तवाइफों और मुजरे को लेकर बदलते हुए माहौल को बनारस की गायिकाओं ने भी भाँप लिया था। उथली मानसिकता वाले लोग जहाँ पतिता का ठप्पा लगाकर उन्हें कोठों में कैद कर देना चाहते थे, वहीं अँगरेजी पढे-लिखे आधुनिक वर्ग के लोग भी उन्हें सामान्य नज़रों से नहीं देखते थे। बनारस की अपनी पाँचवीं यात्रा में जब 9 फरवरी, 1921 को महात्मा गांधी आए, तो उनसे मिलकर शहर बनारस की तवाइफों ने अपनी समस्याएँ रखीं। गांधीजी ने उन्हें अपनी साथिनों के साथ के एक संघ बनाने का सुझाव दिया और उसी साल सन् 1921 में वज़ूद में आया तवाइफ संघ, जिसके पहले सम्मेलन की अध्यक्षता बनारस की मशहूर तवाइफ हुस्ना जान उर्फ हुस्ना बाई ने की थी। उस सम्मेलन में गांधी ने एक यादगार भाषण दिया था। गांधी ने तवाइफों की हौसला अफजाई करते हुए कहा था कि यह देश जितना मोहनदास करमचंद गांधी का है, उतना ही हुस्ना बाई और विद्याधरी बाई जैसी नृत्य और गायन के पेशे से जुडी इन तवाइफों का भी है। उस भाषण में गांधी ने तवाइफों को आत्मवादी सुधारकर आजादी की लडाई में भाग लेने की राय दी।
बाई विद्याधरी से गांधी ने आग्रह किया कि आप देश के किसी हिस्से में अपना संगीत कार्यक्रम करें, तो साथ-साथ वहाँ अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ राष्ट्रीय गीत गाकर आजादी के लिए जन-समर्थन भी जुटाएँ। क्योंकि गुलामी की बेडियों से हिंदुस्तान को आजाद कराने की ज़म्मेदारी आपकी भी उतनी ही है, जितनी किसी दूसरे नागरिक और नेता की। गांधी की इस बात का बनारस की तवाइफों पर गहरा असर हुआ। बस फिर क्या था, उस सम्मेलन में मौजूद सरस्वती बाई, विद्याधरी, हुस्ना बाई, बडी मैना, छोटी मैना, मोतीबाई, राजेश्वेरीबाई, तोखी बाई, छोटी मोती, टामी बाई वगैरह ने अपने पेशे के नफे-नुकसान और बरतानवी हुकूमत की नाराजगी की परवाह किए बिना गांधीजी की बातों पर अमल करना शुरू कर दिया। मुजरा शुरू होने से पहले दो घंटे तक जितना भी धन इकट्ठा होता था, वह तवाइफ संघ के मार्फत गांधी के आजादी के आंदोलन को जाने लगा। इस काम में सबसे क्रांतिकारी भूमिका विद्याधरी बाई ने निभानी शुरू कर दी थी। सन् 1929 में विद्याधरी बाई ने गीत लिखा और खुद की ही बनायी धुन पर एक गाना लिखा और खुद की उसकी धुन बनाकर गाने लगीं। विद्याधरी का वह गीत आप भी देखें,
चुन चुन के फूल ले लो अरमान रह न जाए
ये हिन्द का बगीचा गुलजार रह न जाए
ये वो चमन नहीं है लेने से वो उजाड
उल्फत का जिसमें कुछ भी एहसान रह ना जाए
भर दो जवान बन्दों जेलों में चाहे भर दो
माता पे कोई होता कुर्बान रह न जाए
छल को फरेब से तुम भारत का माल लूटो
इसके लिए यहाँ कोई सामान रह न जाए
चुन चुन के फूल ले लो अरमान रह न जाए
ये हिन्द का बगीचा गुलजार रह न जाए
भारत न रह सकेगा हरगिज गुलामखाना
आजाद होगा होगा आया है वो जमाना
खून खौलने लगा है अब हिंदुस्तानियों का
कर देंगे जालिमों का बंद बस जुर्म ढाना
कौमी तिरंगे झंडे पे जान निसार उनकी
हिन्दू मसीह मुस्लिम गाते हैं ये तराना
परवाह अब किसे है इस जेल को दमन की
इक खेल हो रहा है फाँसी पे झूल जाना
भारत वतन हमारा भारत के हम है बच्चे
माता के वास्ते है मंजूर सिर कटाना
चुन-चुन के फूल ले लो अरमान रह न जाए
ये हिन्द का बगीचा गुलजार रह न जाए
तत्कालीन समाज के पढे-लिखे लोगों के ऐसे दृष्टिकोण को देखते हुए विचार करें, तो गांधी वाकई उदार और सबको साथ लेकर चलने वाले थे। वे मानते थे कि किसी का कर्म चाहे जो भी हो, वे सबकी सब भारत की जनता हैं और वे भी उतनी ही भारतीय और आदरणीय हैं, जितना की कोई और। गांधी चूँकि संगीत के इस महत्त्व से परिचित थे कि संगीत के सहारे जनसभाओं में आम जनता को बाँधकर रखा जा सकता है, बल्कि उन्हें यह भी पता था कि कलाकारों को शामिल करने से स्वतंत्रता आंदोलन के लिए धन भी जुटाया जा सकता है। प्रसंगवश यह बताते चलें कि सन् 1920 में गांधी जब कलकत्ता में आजादी के आंदोलन के लिए चंदा जुटा रहे थे, तो उन्होंने कलकत्ता की नामी तवाइफ गौहर जान से मुलाकात की और उनसे अपील की कि अपने हुनर का इस्तेमाल करके चंदा जुटाने में सहायक बनें। इसके लिए गाँधी ने गौहर से मुलाकात की। गांधी से मुलाकात के बाद तवाइफों को लेकर उनकी सोच और आत्मीयता को देखकर पहले तो गौहर हैरान हुईं, फिर उन्हें गांधी की भावना देखकर बेइंतहा खुशी हुई। सन् 1872 में पैदा हुई गौहर जान की उम्र उस वकत 48 साल थी और वे बहुत दुनिया देख चुकी थीं। गौहर इस बात को अच्छी तरह जानती थीं कि हिंदुस्तान में पेशेवर गायिकाओं के बारे में आम लोगों की क्या राय है!
बहरहाल, गौहर जान को गांधी का प्रस्ताव अच्छा लगा और उनके दिल में भी हिंदुस्तान की आजादी के लिए कुछ करने का जज्बा पैदा हुआ। लेकिन अदा, नखरे और अपने कद्रदानों की जानिब से इज्जतअफजाई की आदी हो चुकीं गौहर जान ने गांधी से एक शर्त के साथ चंदा जुटाने के लिए गाने का वायदा लिया। गौहर ने कहा कि उस मुजरे को सुनने के लिए गांधी को खुद आकर महफिल में बैठना पडेगा। गांधी को गौहर जान की इस शर्त से भला क्या आपत्ति हो सकती थी! उन्होंने बात मान ली, लेकिन जिस दिन मुजरा होना था, उस दिन ऐन वक्त पर एक जरूरी काम आ जाने की वजह से गांधी अपने वायदे के मुताबिक मुजरा सुनने नहीं जा सके। पहले तो काफी देर तक गौहर उनकी राह देखती रही, फिर गांधी की गैर-मौजूदगी में ही मुजरा शुरू कर दिया। चूँकि वायदा करके भी गांधी नहीं आए थे, इसलिए गौहर को यह बात अखर गई। खैर, मुजरा हुआ और तकरीबन 24 हजार रुपये कमाई हुई। यह उस वक्त के हिसाब से ही नहीं, आज के हिसाब से भी बहुत बडी रकम है। जो सोना आज सैंतालिस-अडतालिस हजार रुपये प्रति दस ग्राम है, वह सन् 1920 में महज बीस रुपये अडसठ पैसे का एक तोला मिलता था। मुजरे के अगले दिन महात्मा गांधी ने अपने एक खास आदमी मौलाना शौकत अली को चंदे के लिए इकट्ठा हुई रकम लाने के लिए गौहर जान के घर भेजा। इधर गौहर, गाँधी के न आने की वजह से नाराज थीं। मुजरे में हुई कुल कमाई 24 हजार में से महज आधा रकम 12 हजार रूपये देते हुए बेहद तंज भरे लहजे में गौहर ने मौलाना से कहा, आफ बापूजी ईमान और एहतराम की बातें तो काफी किया करते हैं, पर एक अदना तवाइफ को किया वादा नहीं निभा सके। चूँकि वायदे के मुताबिक वे खुद नहीं आए, लिहाजा सुराजी फंड आधी रकम का ही हकदार बनता है। मौलाना शौकत अली के मुँह से गौहर का यह संदेश सुनकर गांधी ने मुस्कुराकर शायद गौहर के दलीलों की ताईद की थी।
1946 और 1947 गांधी के लिए बहुत क्लेश के वर्ष थे, क्योंकि उन्होंने सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ लडाई लडी और पंजाब और बंगाल में विभाजन की आग को बुझाने का प्रयास किया। यह आश्चर्य की बात नहीं थी कि इन वर्षों में गांधी ने संगीत का इस्तेमाल जहाँ एक ओर जनता के बीच शुद्ध भक्ति के संचार के एक प्रभावी माध्यम के तौर पर किया, वहीं अपने लिए व्यक्तिगत सांत्वना के स्रोत के रूप में किया। रामधुन का उन्होंने हमेशा अपने भाषणों के लिए मंच पर एक बेहतर माहौल बनाने के लिए किया- अँधेरे से प्रकाश और अज्ञान से सत्य की ओर जाने की उज्ज्वल भावना को व्यक्त करने में इससे उन्हें बहुत मदद मिली। यह रामधुन हिंदुस्तान के लोगों की सामूहिक इच्छा के साथ एक आदर्श राष्ट्र और उनके सपनों के रामराज्य की आकांक्षा के साथ प्रतिध्वनित हुआ। गांधी चाहते थे कि उनके सभी अनुयायी प्रार्थना में शामिल हों, क्योंकि इसी से उनके हृदय में वैमनस्य और पूर्वाग्रह साफ हो सकता था। हालाँकि इसमें कोई संदेह नहीं है कि इन व्यक्तिगत प्रयासों ने बंगाल के नोआखली में सांप्रदायिक आग को शांत किया। हालाँकि यह इतना आसान नहीं था।
जब नोआखाली घटित हो रहा था और बाकी हिंदुस्तान में भी सांप्रदायिकता की आग फैलती जा रही थी, उससे गांधी बेहद परेशान थे। जो बात उनके लिए बहुत असहनीय थी, वह यह थी कि जिन चीजों से वे जीवन भर लडते रहे, उन चीजों से एक बार फिर उनका साबका पड रहा था। हिंसा और सांप्रदायिक घृणा, बहुसंख्यकवादी प्रवृत्तियों और छोटे-छोटे मुद्दे फिर से उभर आए थे, जिसने पूरे देश में सार्वजनिक अशांति पैदा करने के लिए धर्म को हथियार बना लिया था। सन् 1947 में जब देश में हिंसा और कलह के विनाशकारी दृश्य आम होते चले गए, तो गांधी खुलेतौर पर हिंदू बहुसंख्यकवादी प्रवृत्तियों के आलोचक हो गए। 19 अगस्त, 1947 को उन्होंने इस दुःख दुख व्यक्त किया था। यह देखते हुए कि कैसे उनके एक मुस्लिम मित्र ने कहा था कि मुसलमानों के पास बहुसंख्यक हिंदुओं के अधीन रहने के अलावा अब कोई और चारा नहीं बचा है। अपने मुस्लिम मित्र की आँखों से गांधी देख रहे थे कि जब वे नमाज़ अदा कर रहे थे, तो उन्हें मस्जिदों के सामने बजने वाले संगीत को चुपचाप सहना पड सकता था। जबकि गांधी को उम्मीद यह थी कि पाकिस्तान और हिंदुस्तान में जहाँ जो समुदाय बहुसंख्यक है, वह पूरी विनम्रता से अपने अल्पसंख्यकों की धार्मिक भावनाओं की कद्र करेगा। 31 अक्टूबर, 1947 को दिये अपने ऐतिहासिक भाषण में गांधी ने कहा था, उन्हें उन लोगों से नाराज न होने दें जो विरोध कर रहे हैं या उनसे यहाँ या बाहर कुछ भी नहीं कहते हैं। यदि आप इसके लिए सहमत हैं, तो मैं कुरान से प्रार्थना और पाठ जारी रखूँगा। क्योंकि आप बहुमत में हैं, आपको यह नहीं सोचना चाहिए कि आप विरोध करने वाले लोगों की उपेक्षा कर सकते हैं। अगर आपको लगता है कि आप उनकी उपेक्षा कर सकते हैं, तो आप हिंसा के रास्ते पर चल रहे होंगे। हमें उन लोगों के बारे में अधिक चिंतित होना चाहिए, जो अल्पमत में हैं।
गांधी के विचार में उन्हें सुनने और उनके साथ प्रार्थना करने के लिए एकत्र हुए तीन सौ लोगों को निराश करना भी हिंसा का एक रूप था। यह एक ऐसी स्वीकारोक्ति थी, जिसे आगे चलकर बहुसंख्यकवाद के प्रकट होने वाले हिंसक रूप के बीज रूप के तौर पर देखा जा सकता है। जहाँ अंतर-अहिंसा और सहनशीलता की आदत को विकसित करने का वह आंतरिक अभ्यास था, जो पूर्ण अहिंसा के साथ सही कार्रवाई के मार्ग पर बने रहने के लिए कुछ लोगों के आह्वान का विरोध करता था। सुबह की प्रार्थना सभा में सुलह और शांति का आह्वान करने के लिए गाये गए दिलीप रॉय के गाये भजनों को सुनकर गांधी ने कहा था, मैं उनकी सुरीली आवाज और उनकी गायन की कला से प्रसन्न हुआ। उनके गाये भजनों में व्यक्त भावना में कुछ भी असामान्य नहीं है, लेकिन जिस तरह से इसे प्रस्तुत किया गया उसे हम कला कहते हैं। गांधी के लिए कला उच्च जीवन के बारे में थी और अगर यह अहिंसा और समायोजन के सिद्धांतों को सिखाती है, तो यह गहरी रचनात्मकता से कतई कम नहीं थी। प्रार्थना सभाओं में कुरआन-जैसे ग्रंथों के महत्त्व को गहराई से समझने और उसके समावेशी पठन को तल्लीनता से सुनने के लाभों को संप्रेषित करने के लिए एक आदर्श अवसर थीं। 2 नवंबर, 1947 को उन्होंने कहा कि कुरान पढने से वह हिंदू धर्म के और भी करीब थे और अगर लोग उनकी बात नहीं सुनना चाहते थे, तो वे अपने घर जाने के लिए स्वतंत्र थे। उन्हें इसे नहीं मानने देना चाहिए क्योंकि मैं महात्मा हूँ या क्योंकि मैंने देश की सेवा की है और वे मुझे देखना चाहते हैं। इसलिए मैं पूछ रहा हूँ कि क्या आप वास्तव में प्रार्थना करने के इच्छुक हैं?
सन् 1947 में आजादी के कुछ महीनों के बाद एम.एस.सुब्बुलक्ष्मी को संदेश मिला कि महात्मा गाँधी चाहते हैं कि आप अपना पसंदीदा भजन हरि तुम हरो जन की पीर रिकॉर्ड करें और उसे दिल्ली भेज दें। सो रातों-रात एम.एस.सुब्बुलक्ष्मी ने यह भजन रिकॉर्ड करवाकर उन्हें दिल्ली भिजवा दिया। कुछ महीने के बाद ही नये साल में ऑल इंडिया रेडियो पर समाचार सुनते हुए सुब्बुलक्ष्मी ने सुना कि दिल्ली में गांधी की हत्या हो गई! इस समाचार के प्रसारण के फौरन बाद उनकी आवाज में रिकॉर्डेड भजन हरि तुम हरो जन की पीर रेडियो पर बजने लगा। यह सुनते ही एम.एस. सुब्बुलक्ष्मी व्याकुल होकर वहीं गिर पडीं और बेहोश हो गईं। एक बार किसी ने गांधी से पूछा कि क्या उन्हें संगीत पसंद नहीं है? जवाब में गांधी ने कहा, अगर मुझमें संगीत और हँसी नहीं होती, तो मैं अपने काम के बोझ तले दबकर मर जाता। गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर को लिखे एक पत्र में गांधी ने उनको सुझाव दिया था कि शांति-निकेतन स्थित विश्व भारती में बांग्ला संगीत के साथ-साथ हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और और पश्चिमी शास्त्रीय संगीत दोनों को उचित स्थान दिया जाना चाहिए। उनके इस सुझाव से यह पता चलता है कि उन्हें संगीत की विभिन्न धाराओं, शैलियों और उसकी प्रकृति का अच्छा-खासा ज्ञान था।
20 अक्तूबर, 1917 को गुजरात के भरूच में एक शैक्षिक सम्मेलन में भाषण देते हुए गांधी ने कहा था, कभी-कभी बडी सभाओं में हम बैठे हुए लोगों के बीच एक प्रकार की बेचैनी पाते हैं। यदि हम राष्ट्रीय गीत गाएँ, तो लोगों की इस बेचैनी को रोका और शांत किया जा सकता है। हमारे पास संगीत की ताकत है, जो इस बात की मिसाल है कि नाव खेनेवाले नाविक और मेहनत-मशककत का काम करने वाले मजदूर एक साथ कोई तान छेडते हैं, तो इससे उन्हें अपने काम में मदद मिलती है। लोगों को जाग्रत करने के हमारे प्रयासों में संगीत को अहम जगह मिलनी चाहिए। उन्होंने आगे कहा, संगीत का अर्थ होता है लय और तान का बेहतरीन संगम। जिसका असर चुंबकीय और सुकून भरा होता है। मगर यह देखना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमने संगीत की उपेक्षा की है। अगर स्काउट्स और सेवा समिति संगठनों के स्वयंसेवकों के बीच मेरा कोई प्रभाव होता, तो मैं राष्ट्रीय गीतों के साथ ही सब लोगों के लिए गाने को अनिवार्य कर देता। इसके लिए मेरे पास कांग्रेस के हर सम्मेलन में भाग लेने और जनगीत सिखाने वाले अच्छे कलाकार होने चाहिए।
गांधी जब दक्षिण अफ्रीका में रह रहे थे, तो उन्होंने अपने आश्रम में शाम को प्रार्थना करने की शुरुआत की थी। उनके भजनों का वह संग्रह नीतिवं काव्यो नाम से प्रकाशित हुआ था। संगीत के बारे में उनके विचार अध्यात्म से भी जुडे हुए थे। इस संदर्भ में उन्होंने पं। नारायण मोरेश्वर खरे (सत्याग्रह आश्रम, साबरमती में संगीत शिक्षक) को 7 अक्टूबर, 1924 को लिखा, मैं धीरे-धीरे संगीत को आध्यात्मिक विकास के साधन के रूप में देखने लगा हूं। कृपया यह देखने की पूरी कोशिश करें कि हम सभी अपने भजनों को भाव की सही समझ के साथ गाएँ। मैं उस आनंद का वर्णन नहीं कर सकता, जिसमें मुझे लगता है कि संगीत एक ऐसी रचनात्मक चीज है, जो आत्मा को ऊपर उठाती है। यही नहीं, 15 अप्रैल, 1926 को यंग इंडिया में अपने पाठकों को संबोधित करते हुए उन्होंने लिखा, यदि हम संगीत पर बात करने के लिए एक व्यापक व्याख्या का उपयोग करते हैं और अगर हमारा मतलब संघ, सहमति और आपसी मदद से है, तो यह कहा जा सकता है कि यह जीवन का ऐसा हिस्सा है, जिससे हम दूर नहीं हो सकते। अगर बहुत से लोग अपने बच्चों को संगीत की कक्षा में भेजते हैं, तो यह राष्ट्रीय उत्थान में उनके योगदान का हिस्सा होगा। गांधी के मुताबिक सच्चे संगीत में सांप्रदायिक मतभेद और दुश्मनी के लिए किसी तरह की कोई जगह नहीं हो सकती। संगीत राष्ट्रीय एकता का एक महान उदाहरण है, क्योंकि वहाँ हम हिंदू और मुस्लिम संगीतकारों को एक साथ बैठकर गाते हुए देखते हैं।
हम संगीत को एक संकीर्ण अर्थ में एक वाद्ययंत्र को अच्छी तरह से गाने और बजाने की क्षमता के रूप में मानेंगे, लेकिन इसके व्यापक अर्थों में सच्चा संगीत तभी बनता है, जब जीवन एक ही धुन और एक बार की धडकन से जुडा हो। संगीत का जन्म वहीं होता है, जहाँ दिल के तार धुन से बाहर नहीं होते। गाँधी ने महसूस किया कि खादी और चरखा में सच्चा संगीत निहित है। संगीत के साथ प्रयोग तब सफल माना जाएगा, जब पूरे देश में करोडों लोग एक ही आवाज में बोलना शुरू करेंगे। उनके संगीत की ध्वनि से मरी हुई मिट्टी से स्वतंत्रता के गीत फूट पडेंगे। गांधी के पसंदीदा राग थे सत्य और अहिंसा। उन्होंने जिन थाटों का इस्तेमाल किया वे स्वदेशी और खादी थे और उनके वादी और संवादी स्वर थे ब्रह्मचर्य और निस्वार्थ सेवा भावना। असत्य और हिंसा वर्जित स्वर थे। कहना न होगा कि उन्होंने चरखा के साथ अपने रियाज़ को कभी नहीं बिसराया! महात्मा गांधी के पास अच्छे घरेलू संगीत की पहचान करने वाले प्रशिक्षित कान थे। गौरतलब है कि उनके जीवन पर संगीत का बहुत गहरा प्रभाव था। गीता, रामायण आदि के भजनों के सुमधुर पाठ, जो उन्होंने अपनी माँ पुतलीबाई के मुँह से बचपन में सुने थे, उसका असर उनके ऊपर ऐसा पडा, जो वर्षों तक नष्ट नहीं हुआ।
हिंदुस्तान के युवाओं को संबोधित करते हुए एक बार गांधी ने कहा था कि हमारा पूरा जीवन एक गीत की तरह मधुर और संगीतमय होना चाहिए। यह बिना कहे चला जाता है कि सत्य, ईमानदारी आदि जैसे गुणों के अभ्यास के बिना जीवन को ऐसा नहीं बनाया जा सकता। जीवन को संगीतमय बनाने का अर्थ है, उसे ईश्वर के साथ एक बनाना। उसमें अपने को विलय कर देना। जिसने राग-द्वेष अर्थात् पसंद-नापसंद से खुद को मुक्त नहीं किया है, जिसने सेवा के आनंद का स्वाद नहीं चखा, उसे आकाशीय संगीत की कोई समझ नहीं हो सकती। संगीत का अध्ययन यदि इस दिव्य कला के गहरे पहलू का ध्यान नहीं रखता, तो इसका मेरे लिए कोई मूल्य नहीं। सन् 1921 में यूरोप यात्रा के दौरान गाँधी स्विट्जरलैंड में पश्चिमी शास्त्रीय संगीत सुनने के लिए गए। उस शांत अल्पाइन देश में वे पश्चिमी आर्केस्ट्रा सुनने के लिए बैठे। इस अवसर पर फ्रांसीसी लेखक-इतिहासकार रोम्याँ रोलाँ भी मौजूद थे, जिन्होंने उस वक्त गांधी के जो हाव-भाव थे, उसको अपने एक अमेरिकी दोस्त को लिखे खत में बेहद दिलचस्प तरीके से बयान किया है।
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के समानांतर गांधी अलग-अलग लोकभाषाओं में रचे गए लोकगीतों को लेकर भी उतने गंभीर थे। उनका यह कथन बेहद लोकप्रिय है कि लोकगीतों में पर्वत, नदियाँ और पशु-पक्षी से लेकर पूरी सृष्टि गाती है। कहना न होगा कि उस्ताद अल्लाउद्दीन खां जैसे महान् वादकों ने गांधी को केंद्र में रखकर कई रागों की रचना की और भोजपुरी के गायक रसूल मियां, मैथिली में स्नेहलता वगैरह ने उनको केंद्र में अनेक गीतों की रचना की। बिहार के जिला गोपालगंज के थे रसूल मियाँ। गांधी से बेहद प्रभावित। भोजपुरी में रसूल मियाँ के गीत बहुत लोकप्रिय हुए। रसूल मियाँ के एक गीत की लोकप्रियता और उसके असर का एक किस्सा सुन लीजिए। रसूल मियाँ को कलकत्ता शहर एक के थाने में गाने के लिए बुलाया गया था। रसूल मियाँ कलकत्ता पहुँचे, तो देखा कि वहाँ बिहार के रहने वाले सिपाहियों की हालत अच्छी नहीं है। उन सिपाहियों की हालत देखकर रसूल मियाँ इतने व्यथित हुए हुए कि वहीं उन्होंने एक गीत रचा और उसे गाया,
छोडी द गोरकी के करबअ गुलामी बालमा
एकर कहिया ले करबअ खुशामी बालमा
रोपेया हमार बनल ई आ के रानी
करेले हमनी पर ई हुकुमरानी
छोडी द एकर तू अब दिहल सलामी बालमा
एकर कहिया ले करबअ गुलामी बालमा।
इस गीत की समाप्ति के बाद कलकत्ता के थानों में तैनात बिहार के अनेक सिपाहियों ने पुलिस की नौकरी तुरंत छोडने का फैसला कर लिया। सिपाहियों ने अचानक पुलिस की नौकरी छोडने का फैसला क्यों किया, इसकी वजह जानने के बाद अँगरेज अफसरों के कान खडे हो गए। उन्होंने रसूल मियाँ को फौरन गिरफ्तार करने का हुक्म दिया। भोजपुरी, मैथिली, मगही, नागपुरी और अवधी पर गांधी की उपस्थिति का इतना गहरा असर पडा कि अनेक रचनाकारों और गायकों ने गांधी के समय में ही में अपने संगीत को गांधी के रंग में ढाल दिया। भोजपुरी के उस्ताद जिन महेंदर मिसिर को अधिकांश लोग मूलतः प्रेम और श्ाृंगार के कवि मानते हैं, उन महेंदर मिसिर का स्वर भी सन् 1921 में बनारस में हुए तवाइफ संघ के जलसे के बाद बदल गया। जैसे उनकी मुरीद तवाइफों का स्वर गांधी से मिलने के बाद बदल गया। अँगरेजों से देश को आजाद कराने के लिए लोगों से गोलबंद होने का आह्वान करते हुए महेंदर मिसिर ने लिखा, हमरा निको नाही लागेला गोरन के करनी/रोपेया ले गइले, पइसा ले गइले/ढाल के दे गइले हमनी के दुअन्नी।
गांधी संगीत की ताकत से किस कदर वाकिफ थे इसकी एक मिसाल देख लीजिए। एक बार जब गांधी यरवदा जेल में बंद थे। आंदोलन के लिए उन्हें लोगों एकजुट करना था। अब यह काम जेल में कैसे हो? गांधी ने संगीत का सहारा लिया और जेल में ही गाना शुरू कर दिया, उठ जाग मुसाफिर भोर भयी, अब रैन कहाँ जो सोवत है। जब प्रभाती जब गांधी ने गाना शुरू किया, तो सरदार वल्लभभाई पटेल, महादेव भाई देसाई सब साथ आ गए। धीरे-धीरे सारे कैदी गांधी के साथ गाने लगे। समूह गान की इस आवाज से ही आंदोलन का माहौल बन गया। तो, इस तरह गांधी संगीत का इस्तेमाल करते थे। आजादी के आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी को लेकर गांधी बेहद संवेदनशील थे। आजादी के आंदोलन में कलकत्ता, बनारस, दिल्ली, बंबई, लखनऊ और लाहौर की नगरवधूओं से सहभागिता करने की अपील करने के बाद उन्होंने सूबा बिहार की कुलवधूओं से भी सहयोग करने की अपील की। गांधी के एक आह्वान पर बिहार की महिलाओं ने अपना गहना-जेवर सब दान करना शुरू कर दिया। मुजफ्फरपुर-सीतामढी-शिवहर और हाजीपुर के इलाके की महिलाओं ने अपने इस संकल्प को इस तरह गाया,
सइयां बुलकी देबई, नथिया देबई, हार देबई ना
अपना देश के संकट से उबार देबई ना....
गांधी का लोकसंगीत पर और महिलाओं पर इस तरह से ही असर पडता है।
हिंदुस्तान में गांधी बडे पैमाने पर भजन सुनते थे। उन्हें कुछ भजनों से विशेष लगाव था, खास तौर पर वे भजन जिनका जुडाव गांधी से रहा। वे भजन आज भी बहुत लोकप्रिय हैं। मसलन हरि तुम हरो जन की पीर एक प्रेरक भजन था, जिसे वे खास तौर पर सुनना पसंद करते थे। यह कुछ अजीब इत्तफाक रहा कि एम.एस सुब्बुलक्ष्मी ने अपनी आवाज में जब यह भजन रिकॉर्ड करके भेजा, तो उसके महज चार महीने के भीतर ही 30 जनवरी, 1948 को गांधी की हत्या हो गई! उस वक्त ऑल इंडिया रेडियो ने इस भजन को बार-बार बजाया। कर्नाटक शास्त्रीय संगीत की महान् गायिका सुब्बुलक्ष्मी ने दरबारी कणाद छंद में यह भजन गाया था, जो मुख्य रूप से एक हिंदुस्तानी राग है। यह राग राजदरबार में राजा को प्रसन्न करने के लोकाचार से जुडा हुआ है। वैष्णव भक्त नरसी मेहता (1414-81) का सुप्रसिद्ध भजन वैष्णव जन तो तेणे कहिये एक वैष्णव की दिनचर्या और मानसिकता को प्रकट करता है। जहाँ तक इस भजन को गाने की धुन का सवाल है, तो इसकी धुन दरअसल राग खमाज पर आधारित है। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के इस राग को कर्नाटक संगीत में कमास कहा जाता है। वहाँ यह एक लघु राग है, जिसे आमतौर पर हरि कांबोजी के साथ गाया जाता है।
यदि किसी को एक प्रकार का सर्वेक्षण करना हो, तो वह बापू के साथ व्यापक रूप से जुडा एक भजन रघुपति राघव राजा राम को ले सकता है। इस भजन की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं, ईश्वर अल्ला तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान, जो अपने आधुनिक अर्थों में धर्मनिरपेक्षता की दृष्टि को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है। सभी धर्मों के देवता एक ही हैं, हालाँकि उन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता है। रघुपति राघव को भी कुछ अलग धुनों में सुना जाता है। कभी-कभी द्विजवंती (या उत्तर भारत की राग जय-जयवंती) के करीब। गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर और गाँधी जब पहली बार 1915 में बंगाल के बीरभूम जिले के बोलपुर में मिले थे, तो गुरुदेव ने उन्हें महात्मा नाम दिया था! अपनी आत्मकथा में गांधी ने लिखा है कि जब वे लंदन में कानून के छात्र थे, तो उस दौरान संगीत सीखने की उन्होंने बारहा कोशिशें की। एक वायलिन खरीदा और सीखने लगे। सन् 1984 में प्रकाशित अपनी किताब महात्मा गांधीः द मैन एंड हिज मैसेज में डॉन बायर्न ने में लिखा है कि गांधी ने इंग्लैंड प्रवास के दौरान नृत्य सीखने की भी कोशिश की थी, लेकिन उन्हें लय की कोई समझ नहीं थी। उन्हें जब इस बात का एहसास हुआ, तो उन्होंने यह सब करना छोड दिया। पिछले साल 2020 में रोली बुक्स से प्रकाशित लक्ष्मी सुब्रमण्यम की पुस्तक सिंगिंग गांधीज इंडिया : म्यूजिक एंड सोनिक नेशनलिज्म में संगीत और राष्ट्रवाद के साथ गांधी के संबंधों का पता चलता है। संगीत, आश्रम में किए जाने वाले भजन और वंदे मातरम पर बहस करते हुए लक्ष्मी सुब्रमण्यम बीसवीं सदी के भारत में साउंड पॉलिटिक्स का खाका बनाने के लिए गांधी के काम की बारीकी से जाँच करने की बात करती हैं।
प्रार्थना सभाओं में गाये जाने वाले भजन और संगीत एक प्रमुख गांधीवादी गतिविधि बन गए, विशेष रूप से उन वर्षों में जिसकी परिणति आजादी के फौरन बाद हुए नरसंहार और दंगों के रूप में हुई। ये प्रार्थना सभाएँ सार्वजनिक बहस के एक महत्त्वपूर्ण केंद्र के रूप में भी उभरीं, जहाँ गांधी ने सच्चे धर्म के महत्त्व और राजनीतिक भागीदारी के आध्यात्मिक तरीके पर चर्चा की। प्रार्थना सभाओं के लिए खासतौर पर कबीर, मीरांबाई, तुकाराम और सूरदास के पदों को चुना गया। इसमें ईसाई भजन और अवेस्ता के छंद और गांधी के शिष्य रैहाना तैयबजी द्वारा पेश कुरआन को जोडा गया था। गांधी ने विवादों और आलोचनाओं के बीच अपने चयन को सही ठहराया। यह काफी हद तक आश्रम भजनावली से प्रेरित था और आंशिक रूप से उन गीतों से जो सीधे विश्वास और आवास का संदेश देते थे। भारत की बहु-धार्मिक प्रकृति के लिए तर्क देते हुए उन्होंने एक मित्र को लिखे पत्र में कहा कि राम का नाम सभी धर्मों की एकता के लिए एक रूपक था। यह एक बेकार, गैर-जिम्मेदार मंत्र नहीं, बल्कि संबोधित करने का एक तरीका था। सर्वव्यापी ईश्वर लाखों लोगों के लिए जाना जाता है और सबसे गहरी भावनाओं को जगाता है। उन्हें अन्य धार्मिक समूहों पर रामराज्य या पृथ्वी पर ईश्वर के राज्य की अपनी धारणा को थोपने में कोई दिलचस्पी नहीं थी।
एक राजनेता के रूप में गांधी क्षेत्रीय संरचनाओं को लेकर बेहद संवेदनशील थे। निजी स्वार्थों के मुआमले में कट्टरता से परे जाने पर जोर दे रहे थे। 14 जनवरी 1946 को मद्रास की प्रार्थना सभा में दिये गए एक भाषण में उन्होंने संत-संगीतकार त्यागराज की तेलुगु रचनाओं की भक्ति और संगीतमयता की प्रशंसा की। उनके गीतों की मधुरता पर टिप्पणी की, जो गायक के दिल से निकलती हुई-सी प्रतीत होती थी। यहाँ त्यागराज का संदर्भ रणनीतिक था। इसलिए तमिलभाषी क्षेत्र मद्रास में गांधी ने संगीतकारों के बीच कर्नाटक संगीत में तेलुगु गीतों के उपयोग पर चल रहे विवाद पर बात की। कर्नाटक शास्त्रीय संगीत के संदर्भ में मद्रास संगीत अकादमी की अगुवाई में लोग तेलुगु गीतों को बंद करने पर जोर दे रहे थे। सो, गांधी ने इस अवसर का उपयोग यह कहने के लिए किया कि प्रांतीय और द्वीपीय विरोध से बाहर निकलने का रास्ता भगवान का नाम जपना है। इसलिए इस बात से कोई फर्क नहीं पडता कि भगवान का नाम जपने के लिए किए जाने वाले भजन हिंदी में हैं कि बंगाली में। तमिल में हैं कि तेलुगु में।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर की तरह गांधी ने भी चरम राष्ट्रवाद के दावों को बेहद परेशान करने वाला और कर्कश पाया था। राष्ट्र की सुंदरता और उसकी भावपूर्ण छवियों की प्रशंसा करने वाले राष्ट्रवादी गीत दरअसल खोखले थे। क्योंकि वे राष्ट्रीय चरित्र के खोखलेपन की पहचान करने में विफल रहे, जो वास्तविक स्वतंत्रता-भय, गरीबी और पूर्वाग्रह से मुक्ति प्राप्त करने के बीच राह में अटका हुआ था। नतीजतन गांधी अक्सर इन दावों के लिए किए जाने वाले जुबानी जमा-खर्च के प्रति आलोचनात्मक रवैया रखते थे। क्योंकि गांधी के लिए संगीत राजनीतिक जन-संचार का एक माध्यम भी था। जनता धर्म को समझती थी, भले ही गांधी द्वारा समर्थित समावेशी शब्दों में नहीं। बहरहाल, इसने एक ऐसी भाषा का निर्माण किया, जिसका उपयोग गांधी बोलने की स्वतंत्रता और स्वराज के अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए करते थे। ऐसा नहीं था कि गाँधी हिंदुस्तानी संगीत और आधुनिकता के जटिल सामाजिक इतिहास को नहीं समझते थे। उनके पास उस साझा स्थान पर टिप्पणी करने का अवसर था, जो संगीत ने हिंदुओं और मुसलमानों को दिया था। गांधी साफ-साफ कहते थे कि जहाँ संगीत नहीं, वहा सामूहिकता नहीं और जहाँ सामूहिकता नहीं, वहाँ सत्याग्रह नहीं और जहाँ सत्याग्रह नहीं, वहाँ स्वराज्य नहीं!
गांधी ने कहा था कि हिंदू और मुस्लिम संगीतकार कंधे से कंधा मिलाकर संगीत समारोहों में भाग लेते हैं। हम अपने जीवन के अन्य मामलों में उसी भाईचारे के मिलन को कब देखेंगे? हमारे होठों पर एक साथ राम और रहीम का नाम कब होगा? वर्षों से ध्वनि और गीत दोनों भारत में सार्वजनिक जीवन के श्रव्य भाव बने हुए हैं। प्रसार और सार्वजनिक प्रसारण तक आसान पहुँच का मतलब है कि हर अवसर के लिए उपयुक्त विभिन्न प्रकार के गीत-रक्तदान शिविर, चंदा अभियान, राजनीतिक प्रचार, उत्सव के अवसर, स्वतंत्रता और गणतंत्र दिवस समारोह में हम संगीत का उपयोग तो करते ही हैं। यह दरअसल उस वक्त महज शोर भर पैदा करता है। भले ही गांधी की प्रार्थना सभाओं से सांप्रदायिक तनाव को खत्म करने का हल नहीं निकला, लेकिन उनके पसंदीदा भजनों ने स्वतंत्र भारत में एक जीवंत माहौल का आनंद लिया। उनकी जयंती और पुण्यतिथि के अवसर पर अनुष्ठानिक रूप से गाए गए भजन आज गांधीवादी अनुष्ठान का हिस्सा बन चुके हैं। इन समारोहों ने गाँधी के संदेश के साथ संबंधों को न तो छिपाया और न ही दबाया। दंगों और सांप्रदायिक असंतोष से आज भी भारत का समाज अछूता नहीं है, जबकि हाल के वर्षों में जय श्रीराम मार्का राजनीति का बहुत विस्तार हुआ है। आलम यह है कि तुलसीदास के सियाराममय सब जग जानी की छवि को रघुपति राजाराम के रूप में भजने वाले गांधी ने राजनीतिक नारेबाजी के लिए अपने राम को सीतारहित जय श्रीराम में रिड्यूस करने की बात सोच भी नहीं सकते थे। क्योंकि गांधी का जीवन-संगीत एक महाकाव्य है, जिसे हिंदुस्तानी संगीत की समृद्ध संस्कृति ने रचा था!
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-हिंदी विभाग, ए.एम.यू., अलीगढ-202002 (उ.प्र.), फोन-9634282886।