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टूटे हुए सन्नाटे

गोपाल माथुर
उसे सबसे पहले मैंने लाइब्रेरी की खिडकी से देखा था। रीडिंग हॉल पहली मंजिल पर था। मैं एक कोने वाली सीट पर बैठ कर पढा करता था। वह एक ऐसी जगह थी, जहाँ से लाइब्रेरी के सामने वाला बगीचा साफ दिखाई दिया करता था। हमेशा की तरह वह अकेली ही थी और आते ही एक छायादार पेड के नीचे लगी बैंच पर बैठ गई थी। उसने यूनिवर्सिटी आने वाली अधिकतर लडकियों की तरह जीन और टॉप पहन रखा था, हाला*कि वह यूनिवर्सिटी में पढती नहीं थी। उसने आँखों पर गहरे काले रंग का चश्मा लगा रखा था। वह गर्मियों की एक दोपहर थी। सारा दिन तेज हवाएँ चला करती थीं। धूल मिट्टी के साथ बहुत से सूखे पत्ते भी हवा में उडते रहते थे। बैठने से पहले उसने उस जगह को साफ किया, अपना बैग साइड में रखा और कुछ ऐसे बैठ गई, जैसे उसे बहुत देर तक वहीं बैठना हो।
मुझे कुछ अजीब-सा लगा कि वह सीधी ऊपर मेरे पास क्यों नहीं आ गई ! दोपहर की इतनी गर्मी में भला कौन यूँ खुले में बैठता है ! कहीं वह किसी और की प्रतीक्षा तो नहीं कर रही ? कौन हो सकता है ! जहाँ तक मुझे पता था, वह इस शहर में मेरे अतिरिक्त शायद ही किसी दूसरे व्यक्ति को जानती हो ! मैं तुरन्त उठ कर उसके पास जाना चाहता था, पर जिस कहानी को मैं पढ रहा था, वह अपने अंतिम क्षणों में थी। मैंने सोचा इसे पूरी पढ कर ही नीचे उसके पास जाऊँगा। वह एक लम्बी कहानी थी, जिसका नायक अपनी प्रेमिका से मिले तिरस्कार के कारण अपने ही एक मित्र को उसे पाने के तरीके बताता है, यह जानते हुए भी कि यदि मित्र ने उसकी प्रेमिका को पा लिया, तो इस प्रकरण से उसे अतिरिक्त पीडा ही मिलने वाली है। कहानी इतनी मार्मिक थी कि मैं उसमें पूरी तरह डूब गया था।
कहानी समाप्त करने के बाद मेरी निगाहें स्वतः ही बगीचे में चली गई। वह लडकी अब भी वहीं बैठी हुई थी, जो मुझसे मिलने आई थी और जिसका नाम अक्षरा था। अब उसके हाथ में टिफिन था, जिसे सम्भवतः वह अपने घर से लाई होगी। वह कुछ खा रही थी, धीरे-धीरे, मानो उसे भूख न हो, पर समय व्यतीत करने के लिए कुछ करना आवश्यक हो। हवा अपने साथ कुछ और सूखे पत्ते उडा लाई थी, जो उसके पाँवों के आस पास लापरवाही से बिखरे हुए थे। पर उसका ध्यान उन पत्तों की ओर नहीं था।
उसे आए हुए लगभग आधे घन्टे का समय गुजर चुका था। शाम अभी बहुत दूर थी। आकाश में बादल के दो एक टुकडे तिर रहे थे। धूल भरी हवा रुकने का नाम नहीं ले रही थी। जब जोर का झौंका आता, बिजली के तार सनसनाने लगते, जैसे कोई ट्रेन सीटी बजाती हुई जा रही हो। शायद इन सब से डर कर ही परिन्दे कहीं जा छिपे थे। अक्षरा इन सबके उपरांत भी अपनी जगह से हिली भी नहीं थी। उसकी मनःस्थिति अवश्य कुछ ऐसी रही होगी, जिसके कारण उसे तात्कालिक तकलीफें सह पाना संभव लगा होगा।
मेरी परीक्षाएँ समाप्त हो चुकी थीं। कैम्पस में सारा दिन सन्नाटा पसरा रहता। केवल वे ही लडके दिखाई दिया करते, जिन्हें अपनी प्रेमिकाओं से मिलना होता था। वे एकांत कोनों में दुबके रहते। सडक के दोनों ओर लगे अशोक के पेड हवा में डोलते रहते। जब कोई वाहन गुजरता, उसकी आवाज कुछ देर गूँज कर खो जाती। कई बार धूल का बडा-सा गुबार उठता और थोडी देर के लिए कुछ भी दिखाई देना बंद हो जाता।
तो फिर तपती दोपहर में यह मुझसे मिलने क्यों आई थी? देखा जाए तो उसका मुझसे कोई खास सम्बन्ध था भी नहीं। एक धुँधला-सा परिचिय भर था, जो अंतरंगता की छाया को दूर से भी स्पर्श नहीं कर पाया था। आज से पहले हम केवल तीन बार ही मिले थे, केज्युअली, जैसे बस स्टेण्ड पर नियमित आने जाने वालों से लोगों मिला करते हैं। हम उन्हें चेहरों से पहचानते अवश्य हैं, लेकिन आत्मीयता का कोई तार उनसे जुडा नहीं होता।
मैंने जल्दी से किताब काउन्टर पर वापिस की और बाहर चला आया। लाइब्रेरी के मेन गेट से उस ओर देखा, जहाँ वह बैठी हुई थी। वह मुझे वहाँ दिखाई नहीं दी। बैंच पर उसके बैठे होने का एक भी चिह्न नजर नहीं आ रहा था, केवल सूखे पत्तों को छोड कर, जो पता नहीं पहले से थे कि उसके जाने के बाद उड कर आ गए थे। मुझे वह बैंच अजीब तरह से सूनी लगी, मानो उसका वहाँ होना उसी प्रकार अवश्यम्भावी हो, जैसे चौराहे पर लगी किसी मूर्ति का।
अपना विस्मय मुझे बेतुका लगा। न तो वह मुझसे जुडी हुई थी और न ही मैं उससे। हम उस दायरे के बाहर थे, जहाँ से आत्मीयता का घेरा शुरू होता है। पर कई बार कुछ लोग, कुछ घटनाएँ, कुछ स्मृतियाँ इस प्रकार हमसे चिपक जाती हैं, मानो उनके घटने के पार्श्व में हमारा हाथ रहा हो, जबकि होता नहीं !
एक बार मन हुआ कि उस बैंच पर जाकर देखूँ, जहाँ वह बैठी हुई थी। शायद मेरे लिए कोई संदेश छोड गई हो ! हालाँकि इसकी कोई संभावना नहीं थी, पर फिर भी मैं स्वयं को वहाँ जाने से रोक नहीं पाया। बैंच वैसी ही सूनी पडी हुई थी। उसके होने का एक भी संकेत वहाँ नहीं था। हवा उन पत्तों को उडा कर ले गई थी, जिन्हें मैंने ऊपर लाइब्ररी से कहानी पढते हुए देखा था। उस पत्तों की जगह कुछ नए सूखे हुए पत्ते आ गए थे। जब हवा चलती, वे फडफडाने लगते। मैं थोडी देर तक वहाँ यूँ ही खडा रहा। सूरज सिर पर था और कुछ देर भी खडे रह पाना कठिन हो रहा था।
क्या वह चली गई थी? मुझसे बिना मिले ही चली गई थी ! जबकि मिलने का आग्रह उसी का था ! कई बार होता है ऐसा। हम किसी से मिलना चाहते हैं या कोई काम करना चाहते हैं, लेकिन अंतिम समय में उसे नहीं करने का निर्णय ले लेते हैं या स्थिगित कर देते हैं। शायद उसके साथ भी ऐसा ही हुआ हो ! मुझसे मिलना चाहा हो, पर यहाँ पहुँचते ही मन उचट गया हो !
अब मैं खाली था। वह समय मेरी जेब में बचा रह गया था, जो उसके साथ व्यतीत करना था। इस खाली समय को कैसे भी भरा जा सकता था या खाली छोडा जा सकता था। ऐसे अवसर कम ही आते हैं, जब खाली समय अनायास आपकी झोली में आ गिरे और आपसे मिल कर और भी अधिक खाली हो जाए !

मैं बैंच को वहीं छोड कर बगीचे से बाहर आ गया। कहानी के जो पात्र लाइब्रेरी की सीढियाँ उतर कर मेरे साथ आए थे, वे भी अक्षरा के जाते ही कहीं चले गए थे। एक सूनापन घिर आया था, जो दोपहर की उन घडियों में सूखी हवा सा चिपक गया था। मुझे यकायक समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ ! शायद मुझे एक कप चाय पीनी चाहिए !
हालाँकि इतनी गर्मी में कौन चाय पीता है, पर मुझे लगा कि जिस मनःस्थिति से मैं गुजर रहा था, उसके बाद एक कप चाय तो पी ही जा सकती थी। मेरे कदम स्वतः ही कैन्टीन की ओर बढ गए।
कैन्टीन खाली पडी थी। छुट्टियों में कोई नहीं आता, केवल उन विद्यार्थियों को छोड कर, जो रिसर्च कर रहे होते हैं। जहाँ लडके लडकियों के हँसी-ठहाके गूँजा करते थे, वहाँ इस समय सन्नाटा पसरा हुआ था। कैन्टीन में काम करने वाले लडके एक कोने में ऊँघ रहे थे।
चाय का ऑर्डर देकर मैं खिडकी के पास वाली टेबिल पर बैठ गया। बाहर हवा की साँय-साँय कर रही थी। कई बार उसके साथ बवन्डर-सा गोल घूमता हुआ धूल का गुबार भी चला आता। मैं अपनी आँख बंद कर लेता।
आप सो रहे हैं ?
मैंने चौंक कर अपनी आँखें खोलीं। मेरे ठीक पीछे अक्षरा खडी हुई थी, आप? मैं आपको लाइब्रेरी के सामने ढूँढ रहा था.... बैठिए।
उसने अपना बैग मेज पर रखा और वह मेरे सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई। तेज हवा ने उसके बाल बिगाड दिए थे और उसका चेहरा तेज धूप के कारण लाल हो गया था, पर काले चश्मे ने उसकी आँखों को बचा लिया था। वह कुछ बदल-सी गई थी। वह मुझे कोई दूसरी ही अक्षरा लग रही थी।
मैं वहाँ ज्यादा देर नहीं बैठ सकी। धूप तेज थी और गर्म हवा भी चल रही थी। छतरी भी मेरी कोई मदद नहीं कर सकी। उसने अपना चश्मा उतारा और मेज पर रख दिया।
आप लाइब्रेरी में आ सकती थीं।
मैं अन्दर गई थी... आप नीचे उतर रहे थे। तब मैं दूसरी तरफ से ऊपर चढ रही थी... मैंने आपको देख लिया था।
ओह ! सॉरी, मैं आपको नहीं देख पाया था।
सॉरी की कोई बात नहीं।.....यह महज एक इत्तफाक था। वह ठहरी, मैं तुरन्त वापिस नहीं आ सकी... कूलर के सामने देर तक खडी रही ताकि अपनी देह में जमी गर्मी को बहा सकूँ।
मैंने भी आपको बैंच पर बैठे देख लिया था....मुझे आश्चर्य हुआ कि आप सीधे अन्दर क्यों नहीं आईं?
तभी वेटर दो कप चाय ले आया। उसने अनुमान लगा लिया था कि अब मुझे एक नहीं, दो कप चाय की आवश्यकता होगी। अक्षरा का उत्तर कहीं खो चुका था। मुझे फिर पूछना घटियापन लगा।
मुझे लगा था, जैसे आपने मुझसे मिलना स्थिगित कर दिया हो।
वह चौंक गई, मानो मैंने उसके मन का चोर पकड लिया हो, हाँ, एक बार मेरा मन हुआ कि मैं लौट जाऊँ... पर मेरे पाँव वहीं जमे रहे। मुझे लगा कि मेरा आपसे मिलना जरूरी है।
दुविधा से बचने के लिए उसने चाय का कप उठाया और पीने लगी। तभी हवा का एक तेज झौंका आया और उसके बाल उडने लगे। इसके पहले कि वह कुछ कहती, मैं उठा और मैंने खिडकी के दोनों पल्ले बन्द कर दिए। बाहर की हवा वहीं रह गई थी। अब वह हमें परेशान नहीं करेगी, मैंने सोचा था।
कुछ देर खामोशी छाई रही। संवाद सहसा चुक गए थे, हालाँकि जो कहा जाना था, वह अभी तक कहा नहीं गया था। वह अपने कहे जाने का रास्ता तलाश कर रहा था। मैं जानना चाहता था कि उसने मुझे क्यों बुलाया था, लेकिन मैंने अपनी उत्सुकता को दबाए रखना ही ठीक समझा। मैं उसे सहज होने के लिए समय देना चाहता था। शायद इसी कारण वह लाइब्रेरी में मेरे पास आने से पहले बैंच पर बैठ गई थी। हम चुपचाप चाय पीते रहे।
आप यहाँ अक्सर आते हैं? उसने पूछा। यह एक ऐसा प्रश्न था, जो महज पूछने के लिए पूछा गया था। इसका उस बात से कोई सम्बन्ध नहीं था, जिसे कहने के लिए उसने मुझे बुलाया था।
छुट्टियों से पहले रोज आया करता था... अपनी क्लासेज अटेन्ड करने। मैंने कहा। सहसा मुझे याद आया कि मैं उससे लगभग एक महीने पहले गर्मी की छुट्टियाँ शुरू होने के बाद मिला था। रात के ग्यारह बजे थे और मैं अपने एक दोस्त के घर से लौट रहा था। वह शहर के बाहर उसी सुनसान बस स्टेन्ड पर बस की प्रतीक्षा कर रही थी। वहीं से मुझे भी बस पकडनी थी। जब मैं वहाँ पहुँचा, कुछ आवारा किस्म के लडके सीटियाँ बजाते हुए मोटरसाइकिल पर जा रहे थे। वह सहमी हुई-सी बस स्टेन्ड के कोने में दुबकी हुई थी। उसके चेहरे पर डर की छाया कोई भी पढ सकता था। शायद वह मुझसे भी डर गई थी। मैंने यथासंभव उससे दूरी बनाने की कोशिश की, ताकि वह अपने डर से निजात पा सके। मैं उसकी ओर देख भी नहीं रहा था, पर महसूस कर पा रहा था कि उसकी आँखें मुझ पर ही लगी हुई थीं। जब भी मेरी उचटती-सी निगाह उस पर पडती, उसे मैं अपनी ओर देखते हुए ही पाता। मुझे कुछ अजीब-सा अहसास हुआ, क्योंकि उन निगाहों में एक विचित्र सा विस्मय था।
रात को बसों की संख्या कम हो जाती है। बस आने में देर लगी। सडक पर लगे लेम्प पोस्ट की कटी फटी सी रोशनी में उसकी निगाहें मुझ तक बार बार चली आती थीं। मुझे लगा, शायद वह अपने अकेले होने के कारण डर रही है, जैसे अभी कुछ देर पहले उन आवारा लडकों से डर रही थी। मैं चाहता था कि वह किसी प्रकार आश्वस्त हो जाए.... कि मुझसे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में मैं उसकी मदद ही करने वाला था। पर यह आश्वासन देने का कोई तरीका मेरे पास नहीं था।
बस चूँकि बहुत देर बाद आई थी, इस कारण लगभग भरी हुई थी। पर हम दोनों को जगह मिल गई थी। पास पास नहीं बैठ कर भी हम पास थे। बीच की गैलरी के एक ओर मैं और दूसरी ओर वह। वह अब भी मुझे कनखियों से देख रही थी। मैं स्वयं को उससे बचाए हुए था, मानो रात के अँधेरे में उसके साथ अकेले खडे रहने का अपराध कर बस में चढा हूँ। हम दोनों के बीच बस की गैलरी ही नहीं, अपरिचय का गलियार भी पसरा हुआ था।
हमारे बीच संवाद तब हुआ, जब टिकिट कन्डेक्टर ने उससे टिकिट के पैसे माँगे और उसने पाँच सौ का नोट दिया। कन्डेक्टर चिढ गया था। उसके पास पाँच सौ के खुले नहीं थे।
नाराज मत हो भाई, मैं दे देता हूँ।.... लीजिए। मैंने कहा।
नहीं.... आप क्यों देंगे ? सारा दिन बस चलाई है, पाँच सौ के खुले भी नहीं होंगे क्या? उसने पहली बार सीधे मुझे देखते हुए कहा था। अपरिचय अब चला गया था, उसकी जगह खीज आ बैठी थी।
कोई बात नहीं मैडम... आप मुझे देने दीजिए।
इसके पहले कि वह कुछ कहती, कन्डेक्टर ने मेरे हाथ से पैसे ले लिए थे। साफ लग रहा था कि उसे बुरा लगा था। शहर पीछे भाग रहा था, जो अभी पूरी तरह सोया नहीं था। सडक पर लगे लेम्प पोस्ट्स आते और पीछे छूट जाते। अधिकतर दुकानें बंद हो चुकी थीं। उनके ऊपर लगे नियोन साइन अँधेरे में लाल, नीले और हरे रंगों में चमक रहे थे। गर्मियों की रात अपने पूरे वैभव के साथ चारों ओर पसरी हुई थी। मुझे आश्चर्य हुआ कि इतनी रात गए यह लडकी कहाँ जा सकती है ? कहीं वह अपने घर लौट तो नहीं रही, जैसे मैं लौट रहा था !
उसका स्टैण्ड मुझसे पहले आने वाला था।
मैडम, मुझे यह कहने का हक तो नहीं, पर यदि आप चाहें, तो मैं आपको जहाँ आप जाना चाहें, वहाँ छोड सकता हूँ। मैंने झिझकते हुए कहा, रात काफी हो चुकी है।
नहीं, मैं चली जाऊँगी.... मेरा घर बस स्टैन्ड के पास ही है। उसने कहा। उसकी आवाज में मेरे प्रति हल्की-सी तटस्थता झलक रही थी, एक झिझकती हुई सी तटस्थता, जिसमें परिचय का अणु जितना सूक्ष्म अंश छिपा रहता है। यह तटस्थता अस्वाभाविक नहीं था। कोई लडकी किसी अपरिचित लडके पर भला क्यों विश्वास करेगी ! पर मुझे बुरा लगा, मानो उसने मेरे मुँह पर तमाचा जड दिया हो। लेकिन मैं कर ही क्या सकता था !
वह अपने स्टैन्ड पर उतर गई। मैं उसे अँधेरे में जाते हुए देखता रहा। उसने एक बार भी पीछे मुड कर नहीं देखा। लेम्प पोस्ट्स की रोशनियों में उसका पार्श्व पास के मोड तक दिखता रहा। लम्बे-लम्बे डग भरते हुए वह शीघ्र ही निगाहों से ओझल हो गई थी। कुछ और लोग अन्दर आ गए थे, पर मैं उस जाने वाली के बारे में सोच रहा था। उसकी आँखों का विस्मय मेरे पास छूट गया था।
***
वह एक सामान्य-सी घटना थी और उस रात के बाद मैं उसे लगभग भूल ही गया था कि तभी वह कुछ दिनों बाद ही मुझे एक मॉल में दिखाई दी। मॉल उसके और मेरे घर के बस स्टैन्ड्स के बीच पडता था। वह एक इतवार का दिन था और मैं कुछ सामान खरीदने उस मॉल में गया हुआ था। मैंने तो उसे पहचाना भी नहीं था, क्योंकि वह सलवार शर्ट में थी। वह मेरे बिल्कुल पास खडी हुई थी और मुझे पता भी नहीं चला था।
सुनिए...
मैंने अपनी बाँई ओर देखा। वही थी। अपनी उन्हीं आँखों से मुझे देखती हुई, जिन्हें मैंने उस रात बस स्टैन्ड पर देखा था। भूली हुई वह रात क्षण भर में स्मरण हो आई थी।
पहचाना? उसने पूछा। उसकी आँखें मुझ पर लगी हुई थीं, उत्सुक निगाहें, जिनसे पुरानी मुलाकात बाहर झाँक रही थी। उसने अपना काला चश्मा बालों पर चढा रखा था। एक छोटी-सी मुस्कान भी वहाँ टँगी हुई थी।
मैं मुस्कुरा दिया। यह मेरी स्वीकारोक्ति थी।
मुझे आफ पैसे वापिस करने थे। उसने कहा।
पैसे ? कौन-से पैसे ?
वही, जो आपने उस रात बस कन्डेक्टर को दिए थे।
मैं हँस पडा, आपको अब तक याद है !
याद क्यों नहीं होगा....आपने मुझे मुसीबत से बचा लिया था।
मेरी जगह कोई भी होता, यही करता।
नहीं.... हर कोई नहीं करता। सब फायदा उठाने की कोशिश करते हैं....पर आप वैसे नहीं हैं।
मैं फिर हँस पडा, मैडम, मैं वैसा ही हूँ.... अब देखिए न, आपसे पैसे लेने वाला तो मैं हूँ नहीं, पर आपका समय लेने वाला हूँ।
इस बार उसकी प्रश्नवाचक निगाहें मुझ पर लग गई थीं।
मैं चाय पीने की सोच रहा था।
वह पहली बार खुल कर मुस्कुराई, बस, इतना ही....मैं तो डर ही गई थी...पर मेरी भी एक शर्त है।
कि पैसे मैं दूँगी....यही न ! मैंने उसकी बात पूरी की।
इस बार वह हल्के-से हँसी, यह आपको कैसे पता?
थोडी बहुत साइकोलॉजी हमें भी पढनी आती है मैडम।
मैंडम नहीं, अक्षरा... अक्षरा नाम है मेरा।
और मैं आलोक....आलोक गोस्वामी।
यह मेरा उससे दूसरी बार का मिलना था। उस रात का अपरिचय अब नहीं था और परिचय ने अपने घर का दरवाजा खोल दिया था। हमने साथ साथ उस घर की दीवारों पर अपना नाम लिखा। हम फूड कोर्ट में बैठे थे और पहली बार थोडा बहुत खुले भी थे। पर ज्यादा नहीं, एक सीमा तक ही, जिसके बाद निजता की सीमा शुरू हो जाती है।
आप क्या करते हैं? उसने पूछा था।
कुछ नहीं....पढ रहा हूँ। अंतिम वर्ष है। और आप ?
मैंने फैशन डिजाइनिंग का कार्स किया हुआ है और हाल ही में यहाँ एक गारमेन्ट एक्सपोर्ट हाउस में जॉब शुरू की है।
यह आपकी पहली जॉब है ?
नहीं....इससे पहले अपने शहर में तीन साल काम कर चुकी हूँ। यह इस बात का संकेत था कि उसकी उम्र मुझसे अधिक थीं।
कुछ देर हम चुपचाप कॉफी पीते रहे। फूड कोर्ट में काफी भीड थी और शोर भी, पर इतना नहीं कि हमें बात करने से रोक सके। मैंने महसूस किया कि वह बार बार मेरी और कुतूहल से देखती, फिर अपनी आँखें चुरा लेती। थोडी देर बाद उसने अपना चश्मा लगा लिया था। अब मैं उसकी आँखें नहीं देख सकता था, लेकिन उन्हें अपने चेहरे पर महसूस अवश्य कर सकता था।
आप इसी शहर के हैं? ठिठके हुए संवादों को उसी ने गति दी थी।
जी हाँ, थोडी ही दूर हमारा घर है....और आप कहाँ रहती हैं ?
उस रात जहाँ मैं उतरी थी, वहीं एक फैमिली के साथ पेइंग गेस्ट की तरह रह रही हूँ।
अकेली?
अकेली हूँ, तो अकेली ही रहूँगी ! उसने हैरानी से कहा था।
पल भर मैं चुप रहा। फिर उसे निमन्त्रण देते हुए बोला, आप जब भी अकेला महसूस करें, मेरे घर आ सकती हैं। मेरे पेरेन्ट्स और सिस्टर को आपसे मिल कर खुशी होगी।
कभी आऊँगी....
जब हम विदा हुए, हमारे पास एक दूसरे के मोबाइल नम्बर आ चुके थे। इस बार वह विदा होकर भी विदा नहीं हुई थी। उसका कुछ हिस्सा मेरे पास रह गया था, उस हिस्से की डोर थाम कर उस तक पहुँचा जा सकता था। उसमें कुछ ऐसा था, जो मुझे बार बार हॉन्ट कर रहा था। विशेषकर उसकी निगाहें, जो बार-बार मेरे चेहरे पर ठिठक जाया करती थीं।
परिचय की दीवार पर लिखा मेरा नाम उसके नाम को ताकता रहता। एक भटका-सा ख्याल आया करता, उसके मेरे घर आने का। पर वह कभी आई नहीं। उसका आना एक संभावना भर था। वह मुझे ठीक वैसे ही मिली थी, जैसे ट्रेन में यात्री मिलते हैं। जब तक यात्रा चलती है, आत्मीयता बनी रहती है, पर गन्तव्य पर पहुँचने के बाद हम उन्हें भूल जाते हैं।
गर्मियों के लम्बे और सूने दिन किसी बूढे व्यक्ति की थकान से फैले हुए थे। सूखे पत्ते हवा के संग संग सडकों पर आवारा उडा करते। जब हवा तेज हो जाती, एक शोर गूँजने लगता जो हवा के ठहरते ही सन्नाटे में बदल जाता। नंगे पेड अपनी सूनी निगाहों से यह सब देखा करते। दोपहर होने से पहले ही सडकें सुनसान हो जातीं। दुकानदार ऊँघने लगते। बस स्टैण्ड पर इक्के-दुक्के लोग ही दिखाई देते। केवल सिटी बसें यहाँ से वहाँ चक्कर लगाती रहतीं।
मेरे पास भी कोई काम नहीं था, सिवाय अपने रिजल्ट की प्रतीक्षा करने के। उसके बाद ही मेरे भविष्य की दिशा तय होनी थी। घर वाले चाहते थे कि मैं रिसर्च ज्वाइन कर लूँ, पर मैं कोई जॉब करना चाहता था। उन खाली दिनों छाया असमंजस अनिर्णय का प्रमुख कारण था। इसी ऊहापोह से बचने के लिए मैं प्रायः यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी चला आता था। अर्थशास्त्र की नीरस किताबों के बजाय मुझे साहित्य पढना अधिक रुचिकर जान पडता था। कब शाम हो जाती थी, कुछ पता ही नहीं चलता था।
अक्षरा से तीसरी बार मिलना भी अकस्मात ही हुआ। मैं एक एटीएम के सामने खडा हुआ था। वह अन्दर थी और पैसे निकालने की कोशिश कर रही थी। उसने पहली बार की तरह जींस और टॉप पहन रखा था। इस बार मैं पीछे से ही उसे पहचान गया था। उस रात बा से उतर कर घर जाते समय मैं उसका पार्श्व देख चुका था। वह बार बार कार्ड इन्सर्ट करती और फिर बाहर निकाल लेती। मैं समझ गया था कि उसे ऑपरेट करना आ नहीं रहा था।
मैंने दरवाजे पर दस्तक दी। उसने चौंक कर पीछे देखा। मुझे लगा, जैसे पहले क्षण उसने मुझे पहचाना नहीं था। लेकिन शीघ्र ही पहचान लौट आई। उसकी मुस्कान इस बात की गवाह थी।
मैं अन्दर चला गया, क्या हुआ?
यह काम नहीं कर रहा है।
मैं मशीन के पास ही था। मैंने उसका कार्ड इन्सर्ट किया। मोनिटर पर इन्सट्रेक्शन्स चमकने लगे थे, यह टच स्क्रीन वाला एटीएम है। आप सीधे मॉनिटर पर टच करें।
जल्दी ही वह सीख गई थी। उसने पैसे निकाले और फिर मैंने। हम साथ साथ बाहर आए। अक्षरा के कपडों पर लगे भीने सेन्ट की मोहक महक मेरे मेरे नथुनों में भर गई थी।
ऑफिस जा रही हैं? मैंने पूछा।
हाँ, आज मेरी सेकिन्ड शिफ्ट है।
ओह! तो फिर आज आप फिर देर रात फ्री होंगी ?
हाँ, पर आज कम्पनी की गाडी घर छोड देगी।....हमेशा छोडती है, पर उस दिन अचानक खराब हो गई थी।
उम्र ही की तरह वह कद में भी मुझसे लम्बी थी। लेकिन अन्य लडकियों की तरह उसने अपनी उम्र छुपाने का कोई प्रयास नहीं किया हुआ था। सादा-सा मेकअप, जो उस पर सूट कर रहा था। हमेशा की तरह बडा-सा बैग उसके कन्धे पर झूल रहा था और काला चश्मा आँखों पर।
क्या आप जल्दी में हैं? मैंने पूछा।
हाँ, आज मुझे ऑफिस जल्दी पहुँचना है....।
फूड कोर्ट पास ही है।....हम कोल्ड कॉफी पी सकते हैं।
आज नहीं, फिर कभी। मैं पहले ही काफी लेट हो गई हूँ।
हम बस स्टैण्ड की तरफ जा रहे थे। धूप में चलना कठिन हो गया था। उसने अपने बैग से फोल्डिंग छतरी निकाली और बटन दबा कर खोल कर हम दोनों पर तान दी। छतरी के छोटे होने के बावजूद भी उसने हमारे सिरों पर सीधी गिरती धूप को बीच में ही काट दिया था। पहली बार उसका मुझसे लम्बा होना अपने इतने नंगे रूप में मेरे सामने आया था।
मुझे आपसे कुछ कहना है....। चलते-चलते वह धीरे से फुसफुसाई, इतना धीरे, कि उसकी आवाज मुश्किल से मुझ तक पहुँच पाई थी।
मैं उसे ही देख रहा था।
पर आज नहीं।....बाद में कभी आपको फोन करती हूँ।
आप मुझे दुविधा में छोड कर जा रही हैं !
वह मुस्कुरा दी, एक-ऐसी मुस्कान, जिसमें आत्मीयता की घोल मिला रहता है, ऐसी कोई सीरियस बात नहीं है। आप परेशान नहीं हों....जल्दी ही मिलती हूँ।
उस संक्षिप्त सी मुलाकात ने मुझ पर गहरा प्रभाव छोडा था। वह दिन याद आता, तो वह घटना स्वतः ही याद आती और वह घटना याद आती, तो वह दिन ! दोनों एक-दूसरे में घुल मिल कर एक हो गए थे। मैं लगातार सोचता रहा था कि ऐसी क्या बात हो सकती है, जो वह मुझसे कहना चाहती थी ! कईं बार मन हुआ कि उसे फोन करूँ, पर एक अनजानी-सी झिझक ने मुझे रोक रखा था। हुआ कुछ भी नहीं था, लेकिन किसी अदृश्य डोर ने मुझे उससे बाँध दिया था।
इस घटना को अधिक समय नहीं बीता था कि एक दिन उसका फोन आ गया।
***
दिन लम्बे हुआ करते थे और रातें छोटी। नींद आँख के कोरों पर आकर बैठती ही थी कि अलसुबह परिन्दों का कलरव शुरू हो जाता था। लगता था, जैसे पिछला दिन एक बार फिर अपने को दोहरा रहा हो। सामने एक पूरा खाली दिन पसरा रहता, जिसे किसी भी मनचाहे तरीके से भरा जा सकता था। मैं उस खालीपन के विषय में सोचने से बचा करता था, जो उन दिनों मेरे भीतर परत दर परत जमा होता जा रहा था। आने वाले दिनों में क्या होगा, यह सोचने से बेहतर था कि यह सोचा जाए कि आज क्या किया जाए ! मेरे पास अधिक विकल्प मौजूद थे भी नहीं। मैं दस बजने की प्रतीक्षा किया करता, ताकि लाइब्रेरी जाया जा सके। सूनी दोपहरें किताबों में डूब जाया करती थीं। किताबें बहुत कुछ भूलने में आपकी मदद करती हैं। कागज पर छपी पंक्तियाँ कभी आपको पहाडों पर ले जाती हैं, कभी समुद्र तट पर तो कभी बारिश में भीगी छतों पर....।
उस दिन मैं लाइब्रेरी आकर बैठा ही था कि मेरा मोबाइल बज उठा। देखा, अक्षरा का नाम ब्लिंक कर रहा था।
हलो अक्षराजी....। मैं भाग कर रीडिंग हॉल से बाहर गैलरी में आ गया। हॉल में फोन अटेन्ड करना मना था। पढने वालों का कन्सन्ट्रेशन टूटता था, हालाँकि उस समय वहाँ मुश्किल से चार पाँच विद्यार्थी रहे होंगे।
इस समय आप कहाँ हैं ?
यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी में।....कहिए ?
क्या हम मिल सकते हैं ?
हाँ, क्यों नहीं। बताइए, आप कहाँ मिलेंगीं?
मैं आफ पास लाइब्रेरी आती हूँ।
ठीक है...मैं फ्र्सट फ्लोर पर मिलूँगा, रीडिंग हॉल में।
मैं दोपहर तक पहुँचती हूँ....आप थोडी देर के लिए फ्री तो हो जाएँगे न ! उसका संकोच मेरे कानों से होता हुआ मेरे मन को स्पर्श कर रहा था।
मैंने बताया था न आपको कि आजकल मेरी छुट्टियाँ चल रही हैं। मैंने एक एक शब्द पर जोर देते हुए कहा, ताकि उसकी दुविधा झड सके।
हाँ, मैं आती हूँ।
अब वही अक्षरा ठीक मेरे सामने बैठी चाय पी रही थी। दोपहर की जलती हुई गर्मी से त्रस्त और तेज हवाओं से परेशान। मेरा कुतूहल अपने चरम पर था। मैं तुरन्त जानना चाहता था कि वह मुझसे क्या कहना चाहती थी, पर यदि उत्सुकता प्रकट करता, तो शायद बेहूदगी होती। मैंने उसे समय देना ही उचित समझा, ताकि वह अपनी झिझक एक ओर बुहार सके। शायद उसकी झिझक ने ही उसे लाइब्रेरी के बाहर रोके रखा था।

मैंने इतना सूना कैम्पस पहले कभी नहीं देखा। उसने चाय की घूँट भरते हुए कहा।
आप गलत समय आ गई हैं। यदि एक महीने पहले आतीं, तो यहाँ कैन्टीन में पाँव रखने की भी जगह नहीं मिलती। उन दिनों बात करने के लिए भी चीख चीख कर बोलना पडता है। सारा कैम्पस लडके लडकियों से अटा रहता है।
वह पल भर के लिए ठहरी, जैसे ट्रेन स्टेशन पर थोडी देर के लिए ठहर जाती है, आप छुट्टियों में कहीं गए नहीं?
कहाँ जाता !
कहीं भी....पहाड पर या समुद्र किनारे।
मैं धीरे से हँस पडा, मैडम, हम मिडिल क्लास लोग हैं। यह लग्जरी अफॉर्ड नहीं कर सकते।
इस बार वह खिसिया गई, मानो अपनी बात पर शर्मिंदा हो, मेरा मतलब यह नहीं था।....कहीं भी जाया जा सकता है, अपने गाँव या किसी रिश्तेदार के....।
मैं चुप रहा। मुझे याद करने पर भी एक भी ऐसा रिश्तेदार याद नहीं आया, जहाँ निस्संकोच जाया जा सकता था। पहली बार एक ऐसी कमी ने दस्तक दी थी, जिसके बारे में मैंने कभी सोचा नहीं था।
जब मैं पढा करती थी, तब छुट्टियों की ऐसे प्रतीक्षा किया करती थी, मानो कोई खजाना मिलने वाला हो।....अधिकतर मैं और मेरी छोटी बहन नाना के घर जाया करते थे....।
बहन?
शिखा नाम है उसका। हम साथ साथ ही नाना के जाया करते थे।।....मैं उससे वहीं मिली थी। उसने झिझकते हुए कहा।
मैंने प्रश्नवाचक दृष्टि से उसे देखा।
सुधांशु से....वह नाना के पडोस में रहा करता था। एक बार वह फिर ठहर गई, चाय के कप को देखती रही, मानो वहाँ कोई फिल्म चल रही हो, जिसका हाल मुझे सुनाना हो।
बाद में उन्हीं से मेरा विवाह हुआ....।
अरे वाह! यह तो बहुत अच्छी बात बताई आपने....पर आप तो यहाँ अकेली पेइंग गेस्ट की तरह रह रही हैं ?
अब हम साथ नहीं रहते....। उसने धीरे से कहा। इतने धीरे से कि मुझे समझने में समय लगा। उसकी यह बात सुन कर मैं निःशब्द हो गया था।
हम दो साल बाद ही अलग हो गए थे।....अब वे मेरी छोटी बहन के साथ रहते हैं। उसकी झुकी हुई निगाहें चाय के कप पर लगी हुई थीं, जैसे वहाँ बहुत कुछ छिपा हुआ हो, जो दिखाई नहीं देता पर पिछले दो सालों में परत दर परत जमा होता रहा था।
मैं विस्मित-सा उसे देख रहा था, यह आप क्या कह रही हैं !
उससे तुरन्त कुछ नहीं गया। वह सोच की ऐसी दुनिया में चली गई गई थी, जहाँ उसकी पुरानी पीडा अपना फन फैलाए हुए थी, ऐसा कई बार होता है कि हमारे अपने आत्मीय लोग हमारे साथ तो रहते हैं, पर हमें चुपचाप छोड कर चले जाते हैं और हमें पता भी नहीं चलता....सुधांशु भी कब मुझे छोड कर शिखा के पास चले गए थे, इस बात का मुझे पता नहीं चल पाया था। कभी कोई संदेह भी नहीं हुआ....एक दिन अचानक जब उन्होंने विधिवत घोषणा की, मुझे तो तब पहली बार मालूम पडा था।....मैं सकते में आ गई थी।
क्या आपने विरोध नहीं किया ?
विरोध करने का कोई अर्थ नहीं था।....या तो कोई व्यक्ति आफ साथ होता है या नहीं होता। सम्बन्धों में बीच की स्थिति के लिए कोई स्थान नहीं होता।
अपने ही घर की दहलीज लाँघना कहाँ की समझदारी है !
कुछ लोगों के लिए दहलीज मायने नहीं रखती। उनके लिए उसे लाँघना उतना ही सहज होता है, जितना थैला उठा कर बाजार जाना।
मैं चुपचाप उसे सुन रहा था। उसके मन में पुरानी रील चलने लगी थी। अनुभवों के जिस दायरे से वह बोल रही थी, मैं उसके विषय में अधिक कुछ नहीं जानता था। पर उसका दुःख मुझे छू गया था। यूँ भी दुःख को किसी विशेष शब्दावली की आवश्यकता नहीं होती, वह बिना किसी भाषा के भी आफ मन के दरवाजे पर दस्तक देने की कूवत रखता है।
तभी विद्यार्थियों का एक बडा-सा ग्रुप वहाँ चला आया। शायद कोई सेमिनार रही होगी, जिसके बाद वे सब वहाँ आ गए थे। उनके शोर में अब पहले की तरह बात करना सम्भव नहीं था। हम वहाँ से उठ कर बाहर आ गए।
अक्षरा ने गोगल्स लगाए और अपनी छतरी खोल ली, लेकिन वह हम दोनों के लिए काफी नहीं थी। हमें पेडों के नीचे छाँव ढूँढते हुए चलना पड रहा था। तेज हवा में उसे अपनी छतरी सँभालना भी मुश्किल हो रहा था। हमारे संवाद स्वतः ही रुक गए थे। धूप और हवा से बचने के लिए हम पास वाली लॉ कॉलेज की बडी सी इमारत में चले गए।
गलियारा सूना पडा था और दीवारों ने हवा का वेग कम कर दिया था। क्लास रूम्स के रोशनदानों में कबूतरों ने घर बना रखे थे। जब कोई कबूतर उडता, उसकी फडफडाहट देर तक गलियारे में गूँजती रहती। अन्दर की तरफ सीढियाँ थीं, जो ऊपर पहली मंजिल की ओर जा रही थीं।
आप चाहें तो हम इन सीढियों पर बैठ सकते हैं....यहाँ न तो धूप है और न ही हवा! मैंने कहा।
और न ही शोर! वह मुस्कुरा दी। उसकी उस हल्की-सी मुस्कान ने वह विषाद पिघला दिया, जो कैन्टीन में उसके चेहरे पर चला आया था।
मैं कुछ सीढियाँ ऊपर बैठा, जबकि वह अंतिम सीढी पर बैठ गई थी। उसने अपना चश्मा ऊपर बालों पर चढा लिया था। मुझे देखने के लिए उसे अपना सिर ऊपर उठाना पडता था जिस कारण उसकी आँखें फैल जाती थीं। मैंने पहली बार नोटिस किया कि उन आँखों में अजीब किस्म की उत्सुकता थी, एक प्रकार की आकुलता, जो उस दुःखद घटना से बिल्कुल अलग जान पडती थी, जिसकी चर्चा वह कैन्टीन में कर रही थी।
संवादों का टूटा हुआ सिलसिला ठीक से जुड नहीं पा रहा था।
क्या आपकी क्लासेज इसी बिल्डिंग में लगा करती थीं? सहसा उसने पूछा।
नहीं, वह ब्लॉक अलग है, लाइब्रेरी के दूसरी तरफ।
ओह! वह ठिठकी, आप छुट्टियों में बोर नहीं हो जाते?
ज्यादा नहीं।....दिन में लाइब्रेरी चला आता हूँ और शाम दोस्तों के साथ गुजर जाती है।
आफ बहुत दोस्त हैं?
जी नहीं।....अधिक नहीं हैं। सच तो यह है कि मुझे दोस्त बनाना नहीं आता।
कोई गर्ल फ्रेन्ड भी नहीं?
मैं हँस पडा। यह एक स्त्री सुलभ जिज्ञासा थी, मैंने कभी प्रयास नहीं किया। कुछ क्लास मेट्स अवश्य हैं, लेकिन उनसे उतनी ही मित्रता है, जितनी होनी चाहिए।
आप समझदार हैं।....एक सीमा तक तो ठीक है, लेकिन उसके बाद ऐसी दोस्ती खतरनाक हो सकती है !
खतरनाक?
मेरे साथ यही तो हुआ ! सुधांशु से दोस्ती तक तो ठीक था, पर उस दोस्ती का प्रेम में बदल जाना हादसा सिद्ध हुआ। वह एक बार फिर ठहर गई, मानो सही शब्द तलाश कर रही हो, मैं नहीं जानती थी कि जो प्रेम उसने मेरे साथ किया, वही प्रेम वह मेरी बहन से भी करने लगेगा।
जितनी गलती सुधांशु की थी, उतनी ही आपकी बहन की भी।
हाँ, पर आपको यह जान कर आश्चर्य होगा कि उन दोनों को अपनी गलती का अहसास था। वे दोनों रोज मेरे सामने रोया करते थे। उनका कहना था कि उन्होंने यह सब जान बूझ कर नहीं किया, बस हो गया, जिस पर उनका कोई बस नहीं था....।
यह तो एक प्रकार की इमोशनल ब्लैकमेलिंग हुई।
मैं भी यही सोचती थी....पर उस दिन....वह रुकी, जैसे साँस नहीं आ रही हो और उसे लेने का प्रयास कर रही हो, जब घर पर कोई नहीं था, शिखा ने अपने हाथ की नस काट ली थी....वह तो पापा समय पर घर लौट आए थे, वरना उसके बचने का कोई उम्मीद नहीं थी।
मैं स्तब्ध-सा उसे सुन रहा था। उसकी पीडा, जो मेरी नहीं थी, अब मेरे पास चली आई थी। यह दूसरी बार था, जब उसका दुःख मुझे छू गया था। मुझसे कुछ भी कहते नहीं बन रहा था। पर मेरी निगाहें उसी पर टिकी हुई थीं। उसने मेरी ओर ध्यान नहीं दिया। वह अपने में खोई हुई थी। सीढियों पर पसरा सन्नाटा भी उसे सुन रहा था।
जब कोई राह दिखाई नहीं दे, तब स्वयं का अंत कर देना अंतिम विकल्प बचता है।....उसने यही किया था, वह ठिठकी, उसी क्षण मैंने सधांशु को छोडने का निर्णय ले लिया था।
पर क्या आपका निर्णय गलत नहीं था ? आपको अपना घर बचाने का कम से कम एक प्रयास तो करना चाहिए था।
उसने तुरंत उत्तर नहीं दिया। अपनी निगाहें मुझ से हटाईं और सिर पर टिका चश्मा उतार कर अपनी गोद में रख लिया। वह काफी निढाल लग रही थी, मानो अतीत की लम्बी यात्रा से लौटी हो। कुछ देर खामोशी छाई रही। उसे उबरने में समय लगा।
लौटता कोई नहीं। सुधांशु का लौटना भी सम्भव नहीं था और यदि लौटते भी, तो वे वैसे नहीं होते, जैसे मुझे पहली बार मिले थे, जब उन्हें देखते ही मुझे उनसे प्रेम हो गया था। उनके लौटने का अब कोई अर्थ नहीं रह गया था। उन्हें मुक्त करना और होना, मुझे दोनों आवश्यक लगे थे।
आप बहुत संवेदनशील हैं।
शायद....संवेदनशील होने के कारण अनेक बार अकारण दुःख उठाने पडते हैं। पर आप दुःखों के आने से बच नहीं सकते। वे आकर ही रहते हैं।
तो क्या सुधांशु ने शिखा से विवाह कर लिया?
यह कोशिश भी मुझे ही करनी पडी। वह नहीं चाहती थी उसका सुधांशु से विवाह हो....एक ओर तो वह मेरा घर नहीं तोडना चाहती थी वहीं दूसरी ओर सुधांशु को छोडना भी उसके बस की बात नहीं रही थी।....आप इस स्थिति को समझने की कोशिश कीजिए, हम तीनों ही हादसे के शिकार हो गए थे।
मैं कुछ कुछ समझ पा रहा हूँ।
मुझे यही विकल्प सबसे ठीक लगा कि वे दोनों विवाह कर लें और मैं एक मृत रिश्ते को निभाने के बजाए नए सिरे से जीवन शुरू करूँ....एक यही रास्ता शेष बचा था, जो हम तीनों को खुश रख सकता था। और मैंने यही किया।
पर क्या शिखा गिल्टी कॉन्शियस नहीं हो गई होगी ?
सारे सुख तो नहीं मिल सकते न ! जीवन में बहुत कुछ कॉम्प्रोमाइज करना पडता है।....कुछ मैंने किए, कुछ उसने। उनके विवाह के बाद पहला काम मैंने अपने शहर को छोडने का किया। न हमारा सामना होगा, न पीडा का सामना करना पडेगा।...क्या मैंने गलत किया ?
पहली बार उसने मुझसे कोई सीधा प्रश्न किया था। मेरे पास कोई सीधा उत्तर नहीं था। जब तक आप स्वयं परिस्थितियों को नहीं भुगत लें, आप उत्तर देने की स्थिति में होते भी नहीं हैं, मैं नहीं जानता....शायद आपने ठीक कदम उठाया था। समय और दूरियाँ बहुत-सी उलझनों का हल बता दिया करती हैं।
फिर वह चुप हो गई। वह सामने की ओर देखने लगी थी, जहाँ लम्बा गलियारा दूर तक चला गया था। बिना लडके-लडकियों के वहाँ एक अजीब-सा सूनापन बिखरा हुआ था। क्लास रूम्स के बंद दरवाजे अपनी सम्पूर्ण निरर्थकता के साथ दम साधे खडे हुए थे।
मैं भी चुप था। एक मौन दूसरे मौन को जन्म दे रहा था। मुझे उन मनःस्थितियों ने जकड लिया था, जो मेरी नहीं थीं, मुझे जैसे अचानक ही ऐसे घर में रहने के लिए बाध्य कर दिया गया हो, जो किसी और का था ! पर जीवित रहने के लिए जीवित होना जरूरी था, साँस लेना जरूरी था। छोड कर जाना कुछ ऐसा था, जैसे किसी घायल व्यक्ति को वीराने में छोड कर भाग रहा हूँ! मैं भागना नहीं चाहता था।
बिल्डिंग के बाहर हवा अब भी चल रही थी। सूखे पत्तों का शोर बार बार वहाँ छाया हुआ सन्नाटा तोड देता था। हम चुपचाप उस टूटे हुए सन्नाटे को सुनते रहे। अचानक कुछ प्रश्न अचानक मेरे मन में सिर उठाने लगे थे। क्या यह सब बताने के लिए ही उसने मुझसे मिलना चाहा था ? मैं तो उसका कोई खास परिचित भी नहीं, फिर उसने मुझे क्यों चुना ? क्या वह मुझसे कोई अपेक्षा पाले हुए है ?
चलें ? मैंने पूछा।
वह उठ खडी हुई, चलिए....।
मैं सीढियों से नीचे उतर आया, ठीक उसके पास। पर वह वहीं खडी रही, बिना हिले। उसने चश्मा लगा लिया था, मुझे आपसे कुछ और भी कहना है।
मैंने उसे देखा।

उसने अपने बैग में से एक फोटो निकाली और मेरी ओर बढा दी, यह सुधांशु की तस्वीर है।
मैंने उसे देखा और हैरान रह गया। लगा, जैसे मैंने अपनी ही तस्वीर देख ली हो, ओह माई गॉड ! वे तो दिखने में लगभग मेरे जैसे ही हैं!
वह मुस्कुराई, वही तो।....यदि उनकी मूँछें हटा दी जाएँ, तो कोई पहचान भी नहीं पाए कि यह तस्वीर किसकी है !
मुझे विश्वास नहीं हो रहा है।....इसी कारण आप मुझसे मिलना चाहती थीं ?
हाँ, पर केवल एक यही कारण नहीं था....यदि शहर पराया हो, तो किसी का हल्का-सा आत्मीय सम्बोधन भी मन मोह लेता है। वह क्षण भर के लिए ठिठकी और फिर हल्की-सी हँसी के साथ बोली, पर मैं आपको सिड्यूस नहीं कर रही....वैसे भी आप उम्र में मुझसे काफी छोटे हैं। अभी तो आपकी पढाई भी पूरी नहीं हुई है।
सहसा मुझे वे सारे क्षण याद हो आए, जब वह मुझे विशेष निगाहों से देखा करती थी। मैं उन निगाहों का विस्मय अब समझ पाया था। उसका सच एक सपने सा उन सीढियों पर मेरी झोली में आ गिरा था। मुझे लगा, मानो मैंने उसी कहानी को सुना हो, जिसे मैं लाइब्रेरी में पढ कर बाहर आया था। कहानी के नायक की ही तरह अक्षरा ने भी अपना प्रेमी अपनी बहन को सौंप दिया था, ताकि सब सुखी हो सकें, हालाँकि सुख कहीं नहीं था। न तो अक्षरा के पास, न ही शिखा और सुधांशु के पास। बच गया था किताब का अंतिम सफेद पन्ना, जिस पर बहुत कुछ लिखा जा सकता था, पर लिखा नहीं गया था। वह खाली पन्ना अपने को भरे जाने की प्रतीक्षा में था।
उसने तस्वीर वापस बैग में रखी और गलियारे की ओर चल दी। मैं भी साथ ही चल पडा। सीढियाँ पीछे छूट गईं। सपना भी पीछे छूट गया, केवल सच साथ बचा रह गया।....और बचा रह गया विस्मय, जो उसकी आँखों से होता हुआ मुझ तक पहुँच गया था। बादलों का एक टुकडा घूमता हुआ आकाश में आ टिका था, जिसने अपने पीछे सूरज को छिपा लिया था। एक राहत-सी महसूस होने लगी थी। अब उसे छतरी खोलने की कोई आवश्यकता नहीं थी।
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