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द काउंसलर

सन्दीप अवस्थी
वह बडा अजीब समय अजीब हालात थे जब उसे मजबूरी में काउंसलर, सलाहकार बनना पडा। और जब जो समझ मे आया वह बोलते गए और इतफाक से सब कुछ ठीक हो गया,तो उनकी धाक जमनी प्रारम्भ हुई। और उनकी भी जान में जान आई ।
वह लडकी, नहीं-नहीं युवती कहिए उससे बस में बाजू की सीट पर ही परिचय हुआ था। फिर तीन घण्टे की यात्रा में उसने न जाने क्या उनमें देखा कि अपने बारे में सब कुछ बता दिया। मसलन वह एक बेटी की माँ है,पति के कहने पर नौकरी छोड घर सँभाल रही है।खाना बनाना,घर ,बाथरूम भी साफ करना,कपडे धोना, बाजार से सामान लाना,बच्चे को पढाना,स्कूल से लाना छोडना और पति के पसन्द नापंसद को ख्याल रखते हुए खाना बनाना,कपडे पहनना और रात को जब वह चाहे उसके लिए अपना शरीर दे देना। हालाँकि यह बात उसने मुझे तब नहीं, बल्कि मेरे कार्ड पर दिए पते पर जब वह आफिस कम घर आई तब मुझे बताई । मेरे 1बी एच के के बाहर के हालनुमा जगह में चिक आदि की सहायता से छोटा-सा आफिस है। यहीं पर मैं लिखता पढता हूँ।मैं एक फ्री लांसर हूँ। जो अलग अलग प्रिंट और सोशल मीडिया में फीचर्स लिखता है।
तो उस दिनयह सब सुनकर पहला ख्याल जो आफ मन मे आ रहा है वही आया कि ऐसी लडकी हमें क्य नहीं मिली? पर साहब किस्मत भी कोई चीज होती है या नहीं? आपको जो मिली,जिसने सारा घर और आपका जीवन स्वर्ग (विपरीत अर्थ में) बना दिया है। पर प्रत्यक्ष मैंने उससे पूछा उसे दिक्कत क्या है? कुछ पल वह रुकी, कुछ सोचकर मुझे नजरों में तोला । साहेबान ऐसे मौके पर मैं गधों जैसी शक्ल बना लेता हूँ,जो लडकियों को बहुत पसंद आते हैं। और वह भरोसा भी ऐसे ही लोगों पर करती हैं। यदि आप तेज तर्रार और आत्मविश्वास से भरे है तो आप महिलाओ के काम के नहीं। आफ साथ वह सावधान और औपचारिक ही रहेंगी। देखे होंगे आपने आसपास उल्लू बनकर उल्लू सीधा करने वाले। फिर उसकी बडी-बडी भूरी लाइनर लगी आँखों में उदासी आई और वह बोली, उनके किसी से चक्कर चल रहे हैं। बहुवचन! लकीमेन । फिर उसे मैंने कोसा। ऐसी खूबसूरत देहयष्टि की बीवी जो खाने और कपडे के बदले सारा काम करती है। उसके बाद भी बाहर चक्कर?
हम्म, तुम्हे यकीन है? बिल्कुल,यह कुछ समय से रात-दिन फोन पर ही लगे रहते। और एक दिन नहाने गए, तो आधे नहाए बाहर आए अपना बजता फोन लेने, तब तक स्क्रीन पर लव 2, लिखा मैं पढ चुकी थी।
मैं सोचता रहा, मेरी कुतर्क या संदेह की आदत नहीं। जब जो जैसी स्तिथि हो, मैं उसी में हल निकालने में माहिर हूँ। लोग कहते हैं इसी चक्कर मे मैं हर कठिन हालात में, अभावों में भी गुजर बसर कर लेता हूँ। और इसीलिए कहीं ज्यादा जामारी नहीं करता। वह क्या चाहती थी मुश्किल नहीं था समझना पर उसने कुछ और पूछा। मेरे में क्या कमी है जो वह बाहर मुडे? यही जानने आई हूँ आफ पास। यह आपकी फीस का चेक। मैं रुका उसे गौर से देखा। तभी मोबाइल की घंटी बजी,स्क्रीन पर जाना पहचाना नंबर था। मैं जानता था वह क्या कहेगा। हेलो सरजी, आप जादूगर हो। कमाल कर दिया। सब भ्रम,कमजोरी दूर हो गई। कहाँ हैं आफ चरण? चूम लूँ उन्हें। मैं मुस्कारता रहा, वह बोलता रहता...इलाज पर बहुत पैसा खर्च हुआ,स्प्रे, गोलियाँ, झाडफूँक पर जैसे ही बिस्तर पर जाता सब बेकार। चलिए खुशी हुई कि मेरी फीस देना बेकार नहीं गया। अब मस्त रहे और एन्जॉय करें.....फिर मैंने जोडा, घर में ही। ड्ढद्ग ह्यड्डद्घद्ग जी सरजी।
देखिए, आपकी कमियों और खूबियों को मैं कैसे जान सकता हूँ? यह तो आप बताएँ कि कौनसी बात उसे पसन्द है और वह आप नह करती?
उसके गुलाबी,खिले चेहरे पर बडी मासूम से सोचने के भाव आए, सब करती हूँ मैं ,जो वह चाहते हैं। और क्या करूँ?
मेरे मन में दया आई कि क्या मैं इसकी आँखों पर पडा पर्दा हटा दूँगा वर्ष 2020 में यह हालत? ऐसी नारी? वह भी सर्वगुण सम्पन्न के साथ यह जहालत? फिर मैंने बडी सावधानी से उससे पूछा कि उसकी आँखों पर पडा प्यार का पर्दा में हटा रहा हूँ। उसे इससे नई रोशनी और अपनी सेल्फ रेस्पेक्ट मिलेगी। क्या उसे ऐतराज है?
मुझे वह दिन आज भी याद है जब डैडी को, जी हाँ, मैं पिताजी को डैडी ही कहता हूँ,उन्हें भी पसन्द है। तो डैडी को जब भी मैं कोई नया कार्य करके दिखाता वह मुझे डाँटते,अप्रसन्न दिखते, मैं तब 14 या 15 साल का था और गोआ घूमने गए सबके साथ। तो इतना अच्छा लगा कि 4 दिन बाद जब जाने का समय आया तो सुबह मैंने कहा कि मैं कोलावा बीच पर जाऊँगा दोपहर में और शाम ट्रैन के समय सीधा स्टेशन मडगाँव। मेरे छोटे भाई ने क्रीमरूल खाते हैरानी से मुझे देखा। पर मैं चला गया डैडी की हाँ थी। पर बीच पर इतना खो गया लहरों के मध्य की जाने का मन नहीं। सूर्यास्त देखने की इच्छा थी, पर ट्रैन निकल जाती। जब बीच की रेत से उठा तो ध्यान गया कि बाजूवाले का हाथ तो बहुत देर से मेरे गले मे था। और उसकी बियर से भरी साँस भी मैंने महसूस की थी। पर मैंने कोई ध्यान नहीं दिया। स्टेशन 10 मिनट पहले पहूँचा और वहाँ डैडी को आगबबूला पाया छोटा भाई तब कोल्ड काफी पीते चुपचाप खुश हो रहा था। तो यह क्लाइंट वहीं की याद ताजा कर गया। जल्द गोआ जाऊँगा, मैंने निश्चय किया। मैं वह हूँ, हिचकिचाते हुए वह कहने की कोशिश करने लगा। ठीकठाक कद,अच्छी पेंट,रंगीन शर्ट और.....और आई ब्रो बनी हुई। हम्म,मैं समझ गया और उसका इलाज भी। पर उसके बोलने का इंतजार करने लगा, जी वो क्या है कि...जब वह इससे आगे नहीं बढता लगा तो मैंने हर देश काल मे हर स्त्री-पुरुष पर फिट होने वाला डायलाग बोला। (आप ट्राय मत करना) आफ दिल की बात कोई समझ नहीं पाया। अभी तक आपको अपने मन की संतुष्टि नहीं मिली। आप सबके लिए करते हो पर कोई आफ लिए करने की नहीं सोचता। मैं ठिठका, उसके हिलते सिर और आँखों में आए श्रद्धा के भाव देख संतुष्ट हुआ, फिर जोडा, यहाँ मेरे सामने बेहिचक आप कह सकते हैं। एक भी बात यहाँ से कभी बाहर नहीं जाएगी। फिर वह बोला और 15 मिनट लगातार बोला। अंत मे जब हाँफते हुए चुप हुआ,मेरा अनुमान सही निकला। मैंने पानी का गिलास उसके आगे खिसका दिया।
आपको शादी नहीं करनी थी जब आप गे हैं। ओह, इकलौते लडके भी है आप ...हम्म हम्म।
तो अब बताएँ क्या चाहते हैं? गे जिंदगी फुल, या तलाक या कुछ और?
वह बोला तो एक टूटा, हताश लडका बोल रहा था, मैं आत्महत्या नहीं करना चाहता, पर सब ठीक नहीं हुआ, तो मुझे करनी पडेगी। अभी बीवी आए छह माह ही हुए हैं,उसे पता नहीं है। घर वाले वही सोच रखते हैं कि, शादी करदो, शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा। मैं सहमत था शादी नहीं हुई कोई जिन्नात का नुस्खा हो गया कि दूसरे घर, तहजीब, सोच की सपने देखने की उम्र की, और अपने घर में डांट खाती, कोई भी नौसिखिया लडकी शादी के बाद आफ नोनिहालों को कैसे सँभाल लेगी? आप उसके लिए कोई जादूगरनी या अम्मा ल रहे हो क्या? वैसे जब कुछ कुछ लडकियाँ यह सँभालने वाले काम को अच्छे से कर लेती हैं, तो फिर कहने वालों की ही त्योरियाँ चढ जाती हैं। अब तो यह सुनता ही नहीं हमारी। हर वक्त बाको लिए घूमता रहता है। पता नहीं चुडैल ने क्या जादू कर दियो, और वह जादू क्या है सब जानते समझते हैं, पर कोई मुहँ पर नहीं कहता। लडकी की इस देश मे सीधे होने में तो दुर्गति है ही (वह ऊपर वाला केस)। और जरा समझदार होने में तेज है ,मुझ पर भारी पडेगी, देखती हूँ अभी इसे जैसे दाँवपेच। यही शादियों का सच है। इसीलिए मैंने अभी तक.....।
ऐसी नेनु की नाक जैसी जिंदगी से अच्छा है मर्द बनो मर्द।
मर्द वह संदिग्ध भाव से मुझे देखता बोला, बन सकता हूँ?
मैंने हँसी रोकी और लैपटॉप पर अपना खाता देखा, कल ही इसका दस हजार का पेमेंट जमा हुआ है। रास्ता है। बहुत दिलचस्प, परन्तु थोडा कठिन, चल लोगे तो जान भी नहीं देनी पडेगी। बीवी भी खुश और कभी कभी तुम अपने मन की कर भी सकते हो। वह मन्त्रमुग्ध, उसकी आँखें हजार वाट के बल्ब से चमकी। ऐसा हो जाए तो मैं आपको जींवन भर नहीं भूलूँगा सर।
सब यही कहते हैं। कुछ तकलीफ होगी सहनी पडेगी? मैंने उसे देखते हुए कहा। जान से बढकर, तो नहीं ही होगी। वह मान गया।उससे एक अग्रीमेंट पर हस्ताक्षर लिए कि सब उसके भले के लिए,उसकी सहमति से हो रहा। पाँच सेशन में ठीक हो जाओगे। परसो पहला होगा या आज लोगे? मैं मुस्कराया।
आज..आज वह दमकते हुए बोला। मैंने बाहर बैठी अति सुंदर पर उतनी ही बुद्धि शून्य, ओवर कॉफिडेंट, नई क्लाइंट युवती को सीसीटीवी से देखा। और सेक्रेटरी को इण्टरकॉम पर अंदर बुलाया। जगह का अच्छे से इस्तेमाल किया जाए, तो इंसान के शरीर से बडी हर जगह पर्याप्त है। एक * 4 की शीट निकाल उसे मैंने अंदर कमरे में सेक्रेटरी के साथ भेजा। इस हिदायत के साथ कि जो यह बताएँ वह करना है, यह उसके भावी जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। मेरी आकर्षक सेक्रेटरी स्लीवलेस गुलाबी ड्रेस में मुस्कराते हुए उसे अंदर इकलौते रूम, जिसके भी दो भाग हैं, ले गई। जब तक वह बाहर आए आप कल्पनाएँ दौडाएँ।
अगली क्लाइंट को बुलाने से पहले मैंने स्पेशल सिगरेट निकाली। (लानत ,हर तकनीक साली इंसान की खुशी क्य छीनती है? कल को द्ग सेक्स भी आ जाएगा। खत्म, जनसंख्या बढेगी नहीं और सब ऑनलाइन, लानत है)। पर मेरे पास दोनों तरीके हैं सरकार के भी और असरकारी (effective)भी।
तो द्ग सिगरेट को रखा साइड में और निकाला पाइप और उसमे गाँजा मिला बढिया शुद्ध टोबैको भरा। यह टोबैको एजेंसी के मालिक के सौजन्य से कोलकत्ता से हमेशा आता है। सुलगाया और दो गहरे कश लिए। आनंद आ गया, पूरा आफिस सुवासित हो गया। कई बोल्ड और दमदार महिलाएँ भी इससे आकर्षित हो, इसके इस्तेमाल के लिए रुचि दिखाती हैं। उन्हें छुटी के दिन बुलाता हूँ, कभी-कभी।
छुपे हुए केमरे से लैपटॉप पर अंदर के कमरे का नजारा देखा, वह कपडे उतार रहा था। गुड, कश लेते हुए मैं अगली क्लाइंट की हिस्ट्री देखने लगा जो उसने मुझे मेल की थी। आप सभी बातें गोपनीय रखते हैं,से प्रारम्भ था मेल।
मुझे याद आया जब रीजनल कॉलेज की क्लास 7 में तिमाही की गणित की कॉपी दिखाई जा रही थी। जिसमें मेरे अंक 11 बाहर लिखे थे 15 में से और अंदर जोडने पर 7 ही थे। मैं मूरख 2 बार गिने तब भी 7 और बाहर 11, उठकर पहुँच गया सर के पास। ईमानदारी के गौरव से दमकते मेरे चेहरे पर उनकी अनुभवी निगाहों ने मूर्खता देखी और सर झुककर उन्होंने बाहर 11 की जगह 7 कर दिए। शाम डैडी के दफ्तर से आने पर,वह अक्सर बाहर खुश रहते पर घर मे आते ही रौद्र रूप में आ जाते। हमारी माँ हमे अक्सर उनके आने के समय खेलने बाहर भेज देती। तो उस दिन जब वह आए और गणित का वाकया बताया, उन्हें तो कुछ देर वह मुझे देखते रहे कि मारे या छोड दे। उस दिन मार देते चार पाँच हाथ तो आगे जिंदगी में इतनी ठोकरें, भावुकता से धोखे नहीं खाता, प्रक्टिकल होता। बाद में पता चला कि वह उन गणित के सर से एक दोस्त के द्वारा घर मिलकर आए थे मेरे लिए। और वह 11 अंक उनकी मेहनत का नतीजा थे। कल के मूर्ख आज सफल काउन्सलर बने बैठे हैं।
सेक्रेटरी आई, मुस्कराते हुए 20 हो गए सर। 10 गालों पर भी। हम्म यह आज कैसे ? इनका तो कल का है अपाइंटमेंट। एक दिन पूरा एक ही क्लाइंट को देता हूँ। तभी बहुत सारी साख और थोडी से कमाई है।
सर, यह लेखिका है। मैंने प्रोफाइल देखते हुए सर हिलाया जानता हूँ, फीस दे दी इसने? इन्हें हर चीज सौजन्य से (मुफ्त का सम्मानजनक नाम) ही चाहिए होती है। सर, फीस आ गई है। पर हालात नाजुक हैं। कल तक नहीं रुक सकती। आज ही मिलना है। एक घंटे से इंतजार कर रही है।
कहाँ कर रही है? जब से आई है फोन से ही लगी हुई है। मैंने सीसीटीवी मॉनिटर पर देख कहा। फिर जूम किया, तो उसके फोन की स्क्रीन आ गई, अपनी वॉल पर आए कमेंट पढते हुए जवाब दे रही थी। क्या है यह? कल ही लगाओ एक शीट की अपने फोन स्विचऑफ रखे यहाँ। बल्कि आज ही अभी लगा दो। जी सर।
तभी अंदर से वह हाँफता आया। लाल सुर्ख चेहरा। असर होना शुरू हो गया है आप पर इलाज का। गुड, वेरी गुड। सब अच्छा होगा। उसका 20 पीछे और दस गालों पर थप्पड खाया चेहरा दमका। यही इलाज 7 दिन रोज घर पर सुनते ही कोरोना पीडित जैसा हो गया। पर शर्तिया सफलता। वह नापा? जी, 4 इंच। ठीक है अब अगले हफ्ते अपॉइंटमेंट। उस गेट से जाओ।
साहेबान कुछ बीमारियाँ लातों से ही जाती हैं।
वह अंदर आईं, लेखिका क्लाइंट, जीन्स, कुर्ता, कानो में छह छह इंच लंबे इयररिंग्स, उँगलियों में अजीब सी अँगूठी पर चेहरे पर परेशानी। औपचारिकता के बाद बोलीं, आपकी यही बात सबसे ज्यादा मुझे आकर्षित की है कि आप सब बातों को सीक्रेट रखते हैं। मैं एक लेखिका हूँ।
मैं सुनता रहा, सुनता रहा। तो अब तलाक की स्तिथि है। इसमे क्या दिक्कत है? जी?
मतलब आज के समय मे आप अच्छी नौकरी पर हैं, ज्यादा उम्र नहीं, खूबसूरत भी हैं, अपने मन का लिखती है ,और अब प्रसिद्ध भी हो रही हैं। तो तलाक लेकर अलग होइए। वह कसमसाई, कुछ सोचा फिर बोली मेरी बेटी है, मैं तलाक नहीं चाहती। यह कहिए आप की एक सेट लाइफ, ट्रेड आफ दौरा पति है,उसे आप छोडना नहीं चाहती। आप कुछ भी कह सकते हैं, पर यह हल नहीं।
मैंने उसे मिनरल वाटर दिया। कुछ खास बात नहीं थी। आज की हर दूसरी कवयित्री और तीसरी गजलकार बनती महिलाओ की तरह ऐसे ही शुरुआत हुई। फिर पत्रिकाओ में ई ग्रेड, वह जो मुश्किल से पचास या साठ प्रतियाँ ही छपती हैं । महिलाओं की फोटो सहित कविता, (उफ्फ)ऊपर से उस वरके को महिलाएँ अपनी स्नड्ढ वाल पर सगर्व लगाती है और सम्पादक को धन्यवाद देती हैं। लानत।
उसके बाद थोडा चस्का लगतो एक छोटी कहानी ग्रेड में आई। आकर्षक फोटो और नंबर था, तो दो चार फोन आए। भृम हो गया,नशा ही गया। फिर देखा कुछ बोल्ड-वोल्ड लिखने वालियों के फॉलोवर आदि उनसे दस गुने, बीस गुने। तो बोल्ड, बुझते हैं न बोल्ड माने, स्त्री होते हुए खुला यौन वर्णन और आखिर में अपने को ही बेचारा सिद्ध भी करना। वह लिखा तो फैन बढ गए। फोन बढ गए। घर मे अब खाना बनाने वाली भी लग गई। (क्या साहब आज की लेखिका कपडे, खाना,घर सफाई करेगी? क्यों?) फिर कृष्णा सोबती, राजेंद्र यादव की चेलियाँ, पट्ट शिष्या और महेंद्र भल्ला ,वैद्य सब देखा। और लिख मारी एक किताब जिसमें स्त्री की गोपन इच्छाएँ, टपरी पर या नशे में जैसी चलते पुर्जें बात करते है वैसी चालू बाते। मतलब ऐसी स्त्रियों का यूटोपिया खडा कर दिया कि हर पुरुष जिससे मिलने का मोका ढूंढे। (अ)लोकप्रियता खूब मिली। फोन की घण्टी बंद ही न हो, एकदम वी आई पी अहसास । एफबी वाल पर रिकॉर्ड तोड फोलोवर, मन हिंडोले पर। समस्या प्रारम्भ भी तभी हुई। की वैसे ही कॉल, प्रोपोजल आने लगे। कुछ 60 साल के बंदरों ने तो मुम्बई घूमने का आमंत्रण और हवाई टिकिट का प्रस्ताव भी दिया। गलत न समझें अपनी प्रिय लेखिका को मिलना कौन बुरा है। समस्या यह हुई कि दिल्ली की आधी लेखकीय बिरादरी पीछे पड गई, सुनते हैं शर्तें वर्तें भी लगी पहले कौन की, और वह घर, कॉलेज, शॉपिंग में टकराने लगे। शेष आधी आबादी ने दूरी बनाली। और तो और पति के दोस्त भी भाभीजी कहते-कहते अलग से नाम लेकर कॉल करने लगे। अब पति ने जब लगातार फोन,नेट पर व्यस्त और घर चौपट होते देखा, तो समझाया और असर न होता देख फोन पर रोक। जो इन्हें महिला स्वतंत्रता पर चोट भी लगी। ऊपर से कइयों के तलाक लेकर शादी से बाहर आने के प्रस्ताव। कहने का अर्थ यह बदनाम होंगे तो नाम नहीं होगा वाली उक्ति सामने बैठे चेहरे पर फिट बैठ रही थी। ऊपर से एक साथ एक प्रकाशक और एक संपादक, दोनों एक एक बच्चें का ब्याह कर चुके इनसे शादी पर तैयार। और चूँकि काइयाँ हैं तो तब तक प्यार (समझे न) पर ही संतोष। आपने ,मैंने दो तीन का नाम लिया, इनसे सबक नहीं लिया? यह तीनों भी ऐसी ही बोल्ड लेखनी,यौन सम्बन्ध आदि लाई थी आपसे पंद्रह साल पहले। वह चौंकते हुए बोली आप कैसे? समय की नब्ज के लिए कुछ पढता भी हूँ। वह आगे पूछती की मैंने कहा, लिखता बिल्कुल नहीं। यह बकवास काम नहीं होता मुझसे। फिर वह बोली तीनों से सबक लिया और वह अंजाम अपना नहीं चाहती। इसीलिए आफ पास आईं हूँ। मैं मुस्कराया और इंटरकॉम पर चाय के लिए कहा। इससे सब कुछ अच्छा रहता है।
आज आने की वजह? वह प्रकाशक फोन पर बात करता करता कल दोपहर घर आ गया। अगली, न लिखी किताब, का एडवांस पेमेंट का चेक लेकर। और मेरे हाथों को सहलाने लगा कि यह ऊपर से आ गए। मैंने वहीं इन्हें देखते ही, उसे झन्नाटेदार थप्पड लगाया। (त्वरित बुद्धि) उन्होंने उसे डाँटकर भगाया और कहा आइंदा दिखाई दिया, तो हड्डी पसली तोड देंगे। वह इतना बेशर्म की रात को मेसेज करता है कि तुम ऐसे इंसान के साथ कैसे रहती हो? तभी तुम वह सब लिखकर अपनी दबी इच्छाएँ प्रकट करती हो। शुक्र है मेरे पति किसी के भी फोन को झाँकते नहीं। देवता है वह मैंने कहा। क्या? यही की अब क्या दिक्कत? वह रोनी-सी सूरत, नहीं-नहीं, आँसू आ ही गए फिर बोली, वह उसके खिलाफ पुलिस कम्प्लेन दर्ज कराना चाहते हैं मेरे साथ। और यदि ऐसा हुआ तो उस पर जो हो तो हो मेरा सामाजिक और नौकरी करना सब खत्म। लेखन तो मैं छोडने को तैयार हूँ। पर इस बदनामी से समाज में, कॉलेज में जाना आना दूभर। उन तीनों लेखिकाओं का अंजाम अपना नहीं चाहती। दो ने तलाक लिया और फ्री लाइफ जी जिसमें सभी उनसे छूत की बीमारी की तरह समझते। एक वैवाहीक रही पर समाज,पति, रिश्तेदारों में सदा बदनाम। और अब 15 वर्ष हो गए भूलकर भी एक शब्द बोल्ड लिखा हो महिला उत्थान के अलावा। पर इनके अंजाम से कौन सीखे? फिर तैयार है नई खेप आखेट के लिए। हम्म, सोचते हैं करते हैं कुछ। आप चाय ले। वैसे आपको आने दिया यहाँ मेरे पास यह खुशी की बात है। वह नीचे कार में बैठे हैं। यहाँ से सीधे थाने जाएँगे उस प्रकाशक के खिलाफ। लगता वह आपको बहुत प्यार करते हैं, सारी दुनिया से ज्यादा। उसकी खूबसूरत आँखे बेबस मैना-सी हुई। तभी कॉल आया, द्दह्वस्र,1द्गह्म्4 द्दह्वस्र अब तुम्हे जीने का आनंद और अपने होने का ,खुद के लिए जीने का खूबसूरत अहसास होगा। कविताएँ लिखा करो। क्या? कोई रुचि नहीं। ओके। नौकरी मुबारक। वही बस वाली युवती जीना सीख रही। चाय खत्म होते होते मैंने कहा, तीन सेशन और आपकी सब बातों का हल। अब आप कल आएँ। वह वो, पति, पुलिस। कुछ नहीं होता आप उनसे मेरी बात करवा दे या यहाँ भेज दें। कुछ देर बाद वह कार में पति, छह फीट का ठीक ठाक हेल्थ का,एक निजी कम्पनी का मार्केटिंग हेड,चेहरे पर गुस्सा लिए मेरे सामने। चंद मिनटों बाद वह हंसता मुस्कराता, कल भेजता हूँ इन्हें कहकर गया, सीधे घर। उस लंपट प्रकाशक का फोन नंबर लेकर। आपका खादिम भी थककर गया, कहीं दूर नहीं, अंदर वाले कमरे में आराम करने। सेक्रेट्री को घर जाने और मेरा खाने के टिफिन का आर्डर करने को कहकर।
वह टाइम पर हाजिर थीं। बोल्ड लेखिका आज साडी और मंगलसूत्र में थी। और कल से तनाव मुक्त थी। आप तो.....। जादूगर हूँ, यह वो हूँ, सब सुन चुका हूँ। हब्बी शान्त है या आज फिर आया है? नहीं आए और उस प्रकाशक की भी माफी आ गई और कोई कॉल आते है, तो मैं लेती नहीं। मैंने चाय के लिए कहा। आज इनकी ही बारी थी, लंच के बाद। उसकी डिटेल देखते हुए मैंने कहा, तो यह क्या ऐसे ही लिखा जाता है? आपको यह अहसास होना चाहिए था कि हमारे आसपास कितने मनोरोगी सामान्य बनके घूम रहे हैं। उनसे कैसे बचेंगी? या आप यही चाहती थी सेंट्रल ऑफ अट्रेक्शन, चाहे कैसे भी। आखिर आपने बडी मेहनत से किताब लिखी है। उसने कहा वही, आजादी, मर्जी, लोकप्रियता फिर समस्याएँ, अकेली पडती महिला। यह सब यहाँ मत कहिए, मैं सब जानता हूँ। देखिए, अकेले इस शहर में 500 लेखिकाए नई पुरानी होगी। आप ही क्य ? और यह भी सोचिए कि जो गंभीर पाठक हैं वह नहीं करते तंग बल्कि वह तो ऐसी किताब का नोटिस ही नहीं लेते। इण्टरकॉम पर मैंने कहा ,ले आओ। सेक्रेट्री कुछ पलों में किताब ले आई। आधी से अधिक किताब उसने पेपर मार्क किए थे। अरे ,इतने ज्यादा ,मन ही मन मैंने सोचा। लीजिए यह आपकी ही किताब है यह इतने सारे मार्क पन्ने हैं कोई पढिए । हम भी आज के महिला लेखन से परिचित होले। सेक्रेट्री ने किताब रेंडमली खोलेकर बढाई। उसने पढने की कोशिश की पर आवाज नहीं आई। दूसरा, तीसरा, चौथा, पाँचवा, उफ्फ वह एक भी नहीं पढ पाई। कुछ ज्यादा ही बोल्ड है न? बिना देखे मध्य से कोई मुडा पेज मैंने खोलकर सेक्रेटरी को पढने को कहा। अभी पाँच ही लाइन हुई थी कि उसका चेहरा लाल हो गया,वह रुकी, मुझे देखा। नेक्स्ट। अगला मार्क पेज पढा, तो लगा मध्यकाल पहूँच गए ,ऐसे आसनों का वर्णन। लेखिका को मैंने बधाई दी क्या जबरदस्त लिखा। लोग चौक गए। आप तो लिखती रहिए ऐसे ही। अभिव्यक्ति की आजादी है।सस्ती लोकप्रियतआप जानती हैं? जो अस्थाई होती है और चली जाती है जल्द। लेकिन आपको अकेला कर जाती है। जो आप चार लोगों में पढ नहीं सकती । वैसे पल्प फिक्शन और साहित्य में कोई अंतर नहीं? वह दयनीय दिखी यह लिखना तो मैं बंद करने का निश्चय कर चुकी। वैसे भी कोई महादेवी वर्मा या मन्नू भण्डारी तो मैं हूँ नहीं। जिसके न लिखने से कोई फर्क पडे। वह ग्लानि से दबी जा रही थी। वह पुरुषों को इस्तेमाल करने वाली महिला की कहानी लिखने वाली भी पिछले हफ्ते आई थी। अविवाहित होते हुए भी बडे सटीक वर्णन किए उसने। तो पूछ रही थी कि बचूँ कैसे? मैंने उसे एक राय दी फीस लेकर की क्यों बचना? जिंदगी जीने का नाम है। वह अविवाहित है। कुछ भी करे। आप अविवाहित होती तो कर लेती यह सब? वह रुकी, सोचा ,सिर हिला इनकार में। मैंने साइड विंडो से देखा बाहर मौसम सुहाना था। एक बोल्ड लेखिका कम हो रही थी। आपकी समस्या यह तो नहीं कि पति को ऐतराज या ऐसे लोग घर, कॉलेज तक आने लगे। 4श्ाह्व द्मठ्ठश्ा2 श्ा1द्गह्म् द्ग-श्चश्ाह्यह्वह्म्द्ग यदि ऐसा है, तो मैं पतिदेव को समझा दूँगा आप जो मन मे आए लिखिए। एक मामूली लेखक रिटायर्ड अधिकारी तो नई से नई लेखिकाओं को पहले अपनी पत्रिका में छापता है फिर उनसे मिलने उनके शहर पहूँच जाता है। वह ठिठकी, कसमसाई, गोरे चेहरे पर सोचने के भाव बहुत खराब लगते हैं। तलाक क्या है? मूव ऑन करना। कुछ पुरुष महिलाओ को इस्तेमाल कर रहे हैं तो महिलाएँ भी करें। क्या हर्ज है? उसने संदिग्ध भाव से देखा मैंने वही ऊपर लिखी शक्ल बना ली। कोई दिक्कत नहीं। बस मजबूत बने। सोचना बंद करें और जीना प्रारम्भ। अब वह हँसी खास बिल्लोरी गिलास वाली हँसी। सिम बदल लें और सोशल साइट्स पर न जाए। तीसरा सेशन एक महीने बाद। वह आभार मानती रवाना हुई। तभी फोन बजा गे लडके का, वह जी दस गालों पर तो हो गए। पर वह 20 पीछे, मैं कैसे? मैं हँसा फिर बोला, घर में पिताजी हैं .....।
सम्पर्क - 66/26, न्यू कॉलोनी,
रामगंज, अजमेर-305001
मो. 7737407061