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इन्दुशेखर तत्पुरुष कविताएँ

इन्दुशेखर तत्पुरुष
- एक डाल के दो जुडवाँ फलों की तरह?
*भर्तृहरि के वैराग्यशतक के एक प्रसिद्ध श्लोक पर आधारित एक प्रतीपार्थक कविता*

नहीं ! नहीं !!
वह वैराग्य की कथा नहीं थी
वह तो जीवन को उधेडने की घटना थी
कहानी थी उनकी जो चाहते थे डूबकर जीना
और विश्वास से हरा-भरा जीवन।

कि उनमें से कोई भी
अनजान नहीं था छुपाए गए सत्य से
न महाराज की प्रियतमा महारानी पिंगला
न वह साहसी सेनापति पिंगलाप्रेमी
न वह अनिंद्यसुन्दरी नगरवधू जिस पर
आसक्त था सेनापति
और न स्वयं राजा भर्तृहरि ही जिस पर
मर मिटी थी वह
हाँ, वही कालकीलित नगरवधू जिसको
साधु ने दिया था एक अमृतफल
कि आदमी अमर हो जाता जिसको खाकर
चाह कर भी
नहीं मर सकता कभी।

क्यों ये सब के सब
एक नयन में अमरप्रेम
दूसरे नयन में छल-छद्म भरे
रहते हैं निरपवाद छुप-छुप कर?
क्या अनबँचे कभी रह सकते हैं
प्रेमियों के अनुरक्त नयन
प्रेमातुर वैसे ही अन्य नयनों से?
क्या यह सम्भव है एक आँख की चुगली
नहीं कर पाए दूसरी आँख कभी!

क्या जान चुके थे वे अपने-अपने
प्रेमफलों के रन्ध्रों को उनमें
छुपे हुए कुलबुलाते कीटों को
पर चुप थे सब
किसी अवसर की प्रतीक्षा में
क्या राजा, क्या रानी, क्या सेनापति, क्या वेश्या
और वह साधु भी!
पाले बैठे थे वे एक आँख में प्रकट प्रेम
दूसरे में प्रतिशोध गुप्त
हर कोई सरका रहा वह दुर्लभतम
अमरफल दूसरे की थाली में
वे सब के सब समझ चुके थे
अमृतफल के उस रहस्य को
जिसको छुपा गया साधु के साथ-साथ
भर्तृहरि भी अपनी कविता में अनकहा रखकर।

वे देख रहे थे
खण्डहर हो चुकी देह का भीषण भविष्य
घावों को कुरेदती मक्खियों और
सरसराती चींटियों को
जिनको हटाना भी उनके वश में नहीं होगा
मल, मूत्र, पीप श्लेष्मा में लिथडी दुर्गंधभरी काया
तरसती होगी उस मृत्यु के लिए जिसकी
मौत हो चुकी होगी सदा के लिए।

इससे तो अच्छा था कोई जहरीला
फल ही दे जाता वह साधु
उस अमरफल के बदले जिसमें
अजरता का कोई उल्लेख नहीं था।
और सब के सब वे
उन कवियों की कविताएँ पढ चुके थे जिनमें
अमरता और अजरता
एक डाल के दो
जुडवाँ फलों की तरह अविच्छिन्न होते थे।
अजरता-रहित अमरता का वरदान
किसी परम वैरी को ही दिया जा सकता था।

कोई नहीं देखता?

नदी का बहना सब को दीखता है
नदी को अपनी ओर खींचती
समुद्र की टेर किसी को नहीं दिखती।

नदी का समुद्र में मिलना सब याद रखते हैं
समुद्र का आकाश लाँघ कर
नदियों में उतर आना कोई नहीं देखता।

नदी का माधुर्य सब को भाता है
समुद्र का लावण्य किसी को नहीं सुहाता।

नदी की लीलाओं का सब गान करते हैं
समुद्र की मर्यादा को कोई नहीं पूछता।

नदियों का हरहराना सबको सुनाई देता है
समुद्र के हाहाकार पर कोई ध्यान नहीं देता।

छाया की तरह चलती घर की आत्मा

बहुत कम निकलता हूँ
घर से बाहर इन दिनों, कभी-कभार।
डाक डालने या दूध सब्जी शक्कर जैसे
जरूरी काम भी
पत्नी ही करती है ऑफिस आते-जाते। फिर भी,
दिन में चार बार करता फोन / पूछता
घर की चीजों के बारे में
दूध की भगोनी, सौंफ की शीशी, कभी पेचकस
कभी दाढी बनाने का डिब्बा ही।
ढूँढते-ढूँढते क्लांत पूछता;
कोई जरूरी कागज कहीं देखा क्या?

घर के भीतर सम्राट की तरह मैं
घर नहीं फिर भी मेरे भीतर
जानता नहीं घर की वस्तुओं के पते-ठिकाने।
उधर घर के बाहर वह संघर्षरत योद्धा की तरह,
फिर भी घर है उसके भीतर,
जानती सब कुछ घर के बारे में।

छाया की तरह उसके साथ रहती घर की आत्मा।
घर की भीतरी चाभी जैसे
उसके पास रहती हर-समय
घुमा देती वहीं से और खुल जाता ताला।

घर के भीतर मैं पर नहीं हूँ भीतर ।
घर के बाहर वह पर नहीं है बाहर।

सुखद यात्रा

खूब आराम से आ पहुँचे थे
निर्विघ्न रही यात्रा
रास्ते में चाय- जलपान स्वादिष्ट
कमरे जहाँ ठहराया गया सुविधासम्पन थे
सब कुछ अच्छा मनभावन खिला-खिला
फिर भी
इस बार नहीं कह सका सुखद रही यात्रा।

सुबह से शाम हुई, ढल गई रात भी
और अब अगला दिन.....

किसी ने नहीं पूछा फोन करके
-पहुँच गए न आराम से!

सिंहासन

बहुत छोटा-सा था मैं फिर भी
पिता के सिर से बालिश्त भर
ऊपर उठ गया मेरा कद
पिता ने जब मुझको बिठलाया अपने कंधों पर

आत्मा की धातु से बने इस सिंहासन पर बैठा
कितना खिल उठा था मैं
हर्षातिरेक में मेरी पगथलियाँ
बजा रही थी पिता की छाती बार-बार
अपने उचकाए हुए हाथों से उडते पक्षियों को
पकड लेने को आतुर मैं उद्ग्रीव
पिता झुकाते रहे अपनी गर्दन
चौखट से मेरा ललाट बचाने के खातिर

बरसों बरस बीत गए ....

कन्धा-गोदी के फूलों से कोमल उस
सिंहासन को लुप्त हुए
अब दिखा वह अकस्मात्
भस्मी की ढेरी में
पिता के फूल चुनते हुए

जिसको न जला पाई बारह मन लकडियाँ भी
न बहा सकी अस्थियों के संग गङ्गा मैया
न विलीन हो सका जो आत्मा की तरह आकाश में

हर पिता अपनी संतानों के लिए छोड जाता है
आत्मा की धातु से बना एक सिंहासन।


सम्पर्क - महर्षि रेजीडेंसी, ६८३, बरकत नगर, (गणेश मंदिर, पानी की टंकी के पीछे)
टोंक फाटक, जयपुर-302015
मो. 8387062611