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हेमंत कुकरेती कविताएँ

हेमंत कुकरेती
(1)

समय क्या हुआ
इन दिनों हो यह रहा है कि याद नहीं रहती
अभी-अभी सुनी हुई बात

जन्म जन्म के सपने लेकिन तंग कर रहे हैं

अब नहीं लिखनी किसी को कोई चिट्ठी
सारे पते मिटा दिए हैं
किसी से कोई बात नहीं करनी

फोन में कई नंबर हैं उनके
जो चले गए हैं किसी और दुनिया में

उन्होंने शहर बदल लिया है
बदल गई होंगी उनकी शक्लें
उन्हें जितना भूलना चाहो
आ जाते हैं वह अपने बचपन के कपडे पहने

भूल जाना एक नियामत है
फिर दिल पर क्यों जमता जा रहा है गुबार
दिमाग में भर रहा है धुआँ

चालाकियाँ बदल गई हैं मक्कारी में
क्रूरताओं पर जब जोर से हँसते हैं तो
मोटा हो जाता है अन्यायी

आधी रात को उठता है आदमी
उसकी नींद में गिर रही है बारिश
बाहर छूट गए कपडों को सहेजने लगता है

बार-बार पूछ रही है औरत
समय क्या हुआ
मुझे घर ले चलो

(2)

जाती हुई माँ की दुनिया में पिता

सर्द रात की स्याह परछाइयाँ
सिमटने लगी थीं अपने में

जमीन पर जो बिखरा पडा था
पुरुष
पिता था!
मर रही थी एक औरत

जब दर्द बेकाबू हो जाता है
चुप्पी ही बन जाती है रोना


वह आदमी खुद को कहीं रखकर
भूल चुका था
बच्चे थे बदलती हुई दुनिया में
अपना संसार रचते

वह आदमी खुद को कहीं रखकर भूल चुका था

वह पहले से जानता था
रात का शव
उगते हुए दिन को सौंपा जाएगा

थोडी देर बचे रहने के लिए
वह अपने अंदर बना लेगा खोह
उसे अपने रोने से भर देगा

क्या उसे यह भी पता था
कि कल जब बच्चे
निचाट सूनी आँखें और खाली हाथ लिए लौटेंगे
आकाशगंगा में डूब जाएँगे सप्तर्षि
ओस और भाप से बना
काँच का घर
कोहरे में दिखेगा भी नहीं

बादलों की
अभी-अभी ठण्डी हुई चिता से
कुछ बूँदे पानी की
मुट्ठी भर राख
सुलगती ती हुई आग को चुनेगा
और बच्चों को सौंपकर कहेगा
इन्हें समूचे आकाश
और पूरी पृथ्वी को लौटा दो......

(3)

धरती की कोख
घुमावदार घाटियाँ
जाना भूल गई हैं
पहाडों में ऐसा होता ही है
वहाँ से हम जाना भूल जाते हैं

वे नहीं कहते कि
तुम बौने हो
क्षूद्र हो कर पाई हैं
तुमने ऊँचाइयाँ

पहाड तुम्हें खडा कर देते हैं
तुम्हारी परछाई के सामने
तब भी नहीं बताते तुम्हें कि
तुम्हारे पीछे हिलती
छाया के सामने
तुम कितने छोटे हो!

पहाड होते हैं
धरती की कोख

उनकी शिराओं में पानी बहता है

तुम्हें नहीं पता
पानी तुम्हें बसा लेता है
अपनी यादों में

पहाड के पानी में है
तुम्हारे कई जन्मों की यादें

(4)

जीवाश्मों के जागने का समय
रात सीटी जैसे बज रही है
गहरा सलेटी कागज फैला है
सारी पृथ्वी पर
नींद चाहिए मुझे
या सपना देखना चाहती हैं आँखें
चौक कर उठ जाता है वह
खडे हो जाते हैं उसके कान
दिमाग तक पहुँचे जाती है उसकी पूँछ की सिहरन
गुर्राहट निकलती है
उसके जबडों को चौडा करती हुई
उसे लगता है मैंने कहा -बिल्ली!
मुझे वहम होता है
मेरे कण्ठ में घुट कर रह गया -दिल्ली..
तुकें जीवन के बेतुकेपन को बता रही हैं सबको
सारा खेल बेमेल चीजों का है
कुछ लोगों का कपाल फोड कर निकलेगी
उनकी उपलब्धियाँ
कई लोग रंगीन कपडे पहन कर होते रहेंगे खुश
अच्छा हुआ कुत्ते के कान से
बाहर निकल आया चाँद
बैठ गया मेरी खिडकी के ऊपर
सोच लिया है सफेद को सफेद नहीं कहना
पानी को कहना है-भाप
नहीं पूछना किसी के नाम का अर्थ
यह जीवाश्मों के जागने का समय है
धधक रहा है आत्मा का कोयला



(5)

बूँदों की स्मृति
हवा बची है केवल
गौरैया के पंखों में

गौरैया कहाँ बची है
वहाँ
जहाँ पत्थरों में
जगह बदलती हैं नदियाँ

मिट्टी नई होती है
बहते हुए पानी में
बीजों के सपने में
पत्तियाँ गा रही है गीत
बारिश के
उनसे बहता कच्चा हरा रंग
छोडेगा पागल बना कर

सलीम अली ने
गौरैया की नहीं
तस्वीर खींची है हवा की

जिसमें अपनी जगह
बदल रही हैं
बारिश की बूँदें

बूँदों की स्मृतियों में है
गौरैया की
आखिरी उडान

सम्पर्क - कोठी नं 50, ब्लॉक ए-3, पश्चिम विहार, नई दिल्ली-110063
मो. 9818540187