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संरचनात्मक हिंसा का अनन्य पाठ

कनुप्रिया

कहानियाँ मनुष्य के अनुभवों की ऐसी श्ाृंखला है कि जिसने आरम्भ से ही मनुष्य को उसकी खूबियों-खामियों से रू-ब-रू करवाया है। कहानी संस्कृति और मनुष्य के बीच समझ के सेतु का काम करती है। बहुसांस्कृतिक समाज की आधार भूमि में कहानियों का बडा योगदान है। कहानियाँ एक ओर तो हमारी संस्कृति को सहेजती है और दूसरी ओर पल-पल बदल रहे जीवन की खोज-खबर से भी हमें अवगत कराती है। एक श्रेष्ठ कहानीकार हमारे जाने-पहचाने संसार के कुछ ऐसे अनुभवों को हमारे सामने लाता है जिन्हें हम अक्सर देखते-समझते तो हैं, पर अभिव्यक्ति के स्तर पर उचित महत्त्व नहीं दे पाते। फलस्वरूप सामाजिक संरचना में विडम्बना और विदू*पताओं की उपस्थिति बढती जाती है।
संरचनात्मक हिंसा हमारे समय की एक बडी चुनौती है जिसे दीपक शर्मा के कथाकार ने न केवल भली-भाँति पहचाना है, बल्कि अपनी पैनी नज़र और आलोचनात्मक विवेक से अनुभव को संस्कारित कर उसकी सघनता को भी बढाया है। उनकी कहानियाँ मुख्य रूप से तीन अवयवों गिर्द बुनी हुई हैं कस्बापुर, पितृसत्ता और हिंसा।
कस्बापुर, जैसा कि नाम से ही महसूस होता है, एक गाँव, कस्बा या छोटा शहर कुछ भी हो सकता है, जिसमें किसी भी आयवर्ग के लोग हो सकते हैं मगर वो अपने मिजाज में उत्तरभारत का ठेठ देसीपन लिए हुए हैं, ऐसा देसीपन जिसका पितृसत्ता अभिन्न अंग है। कहानियों का समयकाल 20वीं सदी के पूर्वार्द्ध से उत्तरार्द्ध के पहले कुछ दशकों तक फैला है और इनमे जिस भारतीय समाज का साक्षात्कार होता है वह पाठक के मन पर इस समाज के भीतर समाहित सामाजिक हिंसा की क्रूरतम छवियाँ अंकित कर देता है। जीवन की आर्थिक कठिनाइयाँ, इंसान विरोधी सामाजिक रिवाज, परम्पराएँ, पितृसत्ता और इन सबके मिलेजुले असर से उपजी परिस्थितियाँ एक ऐसा सामाजिक परिवेश तैयार करती हैं जहाँ मानवीयता, इंसान का इंसान पर भरोसा, आत्मीयता, सम्मान और जुडाव जैसी चीजें पनपना स्वाभाविक रूप से कठिन मालूम होता है, हिंसा एक अपरिहार्य घटक की तरह उपजती है और मृत्यु इन कहानियों का अनिवार्य तत्त्व बन जाती है।
उनके अधिकांश चरित्र अपने क्षुद्र स्वार्थों, लालच, वासना क्रोध और पितृसत्ता से इस कदर संचालित हैं कि उसके आगे इंसानी जीवन की कीमत कुछ भी नहीं। मसलन पहली ही कहानी चमडे का अहाता ऐसे पिता से मिलवाती हैं जो पहले बेटियों की हत्या करता है और फिर उन्हें बचाने की कोशिश करती माँ को जान से भी मार देता है, बापवाली एक ऐसी बेटी की कहानी है जहाँ बाप अपने स्वार्थ के लिए बेटी का सौदा करता है, एक अन्य कहानी कब्जे पर में पिता अपने आरामदायक जीवन के लिए अपनी पत्नी की हत्या करता है और फिर अपनी बेटी को मानसिक रूप से अपाहिज बनाने तक के लिए तैयार हो जाता है, वहीं कुंजी शारीरिक रूप से विकलांग, मगर लालची व्यक्ति की कहानी है जो सम्पत्ति पर कब्जे के लिए अपनी पत्नी का कत्ल कर देता है। संग्रह की शीर्षक कहानी पिछली घास का पिता अपनी बेटी को अपनी सम्पत्ति मानता है और उससे बलात्कार करता है। इस कदर जीवन विरोधी और दम घोंटती पितृसत्ता से मुक्ति के लिए स्त्रियाँ जब छटपटाती हैं, तो वो उससे उनकी जान, उनकी जान लेकर लेकर ही छूटती है, वो या तो स्वयं मृत्यु में ही मुक्ति का विकल्प खोजती हैं या उन्हें मारकर मुक्त कर दिया जाता है।
वहीं एक घोर पितृसत्तात्म्क समाज में केवल पुरुष ही संवेदनहीन नहीं होता और स्त्रियाँ हमेशा महज अबोध शिकार भर नहीं होतीं, कई जगह वो भी उतनी ही संगदिल, स्वार्थी, कठोर और पितृसत्ता का मारक औजार बनती हैं जितना कि उससे लाभान्वित पुरुष। वो दूसरी स्त्री पर हुई हिंसा अपने हित में नजरअंदाज भी करती हैं, तो कईं बार उस हिंसा की हिस्सेदार भी बनती हैं। इस तरह इन कहानियों में पितृसत्ता एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में प्रदर्शित होती है न कि विशेष जेंडर के रूप में।
जाहिर है कि जिस समाज में स्त्रियाँ सुरक्षित नहीं होतीं, सामाजिक हिंसा का शिकार होती हैं वहाँ बच्चे भी सुरक्षित नहीं रहते। वो जिस हिंसा को देखते हुए बडे होते हैं उसका असर इन कहानियों में इस तरह समझा जा सकता है कि ज़्यादातर कहानियों के सूत्रधार बच्चे ही हैं। कहानियाँ अधिकांशतः उन बच्चों की नजर से कही गई हैं, जो इस सामाजिक पितृसत्तात्मक हिंसा के गवाह हैं, उसकी भयावहता उनकी स्मृति में बसी हुई है और लम्बे समय तक उसके दंश भोगते हैं।
इस तरह कहानीकार ऊपर से धर्मपरायण, पारम्परिक और उदार नजर आने वाले समाज के भीतर पसरी क्रूरता और हिंसा की परतें उसी बेरहमी और कठोरता के साथ उधेडती हैं जितना बेरहम वो खुद है और ऐसा दिखाने में वो पाठक की कोमल भावनाओं और संवेदनाओं के साथ किसी तरह की रियायत नही बरततीं। वहीं इन कहानियों का उद्देश्य समाज की हिंसा को नग्नतम और निकृष्टतम रूप में सामने रखके महज पाठक को विचलित भर करना भी नहीं है, बल्कि आदर्श समाज की कल्पना के उस भ्रम से बाहर निकालना है जिसके आवरण और ढाल में यह हिंसा आज 21 वीं सदी के विज्ञान और तकनीक के विकसित युग मे भी उतनी ही ज्यों कि त्यों बनी हुई है।
अंत में जिक्र कहानी प्रेत छाया का, जो उस काल खंड की कथा है जब हमारा देश स्वतंत्रता के महान संघर्ष के लिए आंदोलनरत था, एकतरफ नीचे गली में साइमन गो बैक के नारे लगाते आंदोलनकारियों का दल गुजरता है, वहीं दूसरी तरफ ऊपर छत से गिरती एक स्त्री की अंतिम चीख उन नारों में दब जाती है। प्रतीकात्मक तौर पर ये कहानी बताती है कि दरअसल हमारी आजादी अब भी कितनी अधूरी है। जब तक हम देश के हर व्यक्ति के लिए भेदभाव रहित समाज और सामाजिक न्याय का अपना संवैधानिक लक्ष्य प्राप्त नहीं करते तब तक विदेशी सत्ता से मुक्ति भर को पूर्ण आजादी नहीं कहा जा सकता।
कुल मिलाकर पिछली घास कहानी संग्रह आपको एक ऐसे अनुभव से गुजारता है जहाँ आप थोथे धार्मिक, राष्ट्रवादी गर्वबोध से परे अपने समाज की तल्ख हकीकत का सामना करते हैं। ये हमारे समाज का ऐसा आइना है , जिससे हम नजरे चुराए रखना चाहते हैं।
पुस्तक का नाम : पिछली घास
लेखक : दीपक शर्मा
प्रकाशक : रश्मि प्रकाशन, लखनऊ
प्रकाशन वर्ष : 2021
मूल्य : 200/-
विधा : कहानी
सम्पर्क- मनप्रसन्न भवन,
राज कॉम्प्लेक्स के पास,
गोइल गली, चौतीना कुँआ,
बीकानेर-334001