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कविता की हमजोली का आस्वाद

सुदीप सोहनी
(1)
कविता पढने की कला है - यह बात अमिताभ चौधरी की कविता को जीने, समझने और आत्मसात करने का पहला पाठ है। रजा फाउंडेशन की प्रकाश वृत्ति योजना के तहत प्रकाशित अमिताभ का कविता संग्रह अर्थात् एक नजर में पाठक के सम्मुख चुनौती ही प्रस्तुत करता है। शब्द, भाषा, अर्थ, व्यंजना, शिल्प, कथ्य और बिम्ब की सुघड कारीगरी में कलात्मकता का जामा पहनी 170 कविताओं का यह दुरूह संकलन अपने आप में श्रमसाध्य रचनात्मकता का उदाहरण है। सवाल तब उठता है कि कविता के इस मायावी सरोवर में किस तरह पैठा जाए कि कविता का आस्वाद लिया जा सके? मेरे लिए इस प्रश्न का उत्तर मेरे सिनेमा देखने के प्रशिक्षण से आया और उसे जस का तस उतार कर प्रयोग किया कि पहले तो पढ लिया जाना चाहिए। ठीक भी है, समझने की जल्दी ही क्यों? पहले क्यों न सौन्दर्य को भरपूर निहार ही लिया जाए! अमिताभ की ये कविताएँ मेरे सामने बिलकुल उसी तरह उतरीं, जिस तरह से मैंने अपने पाठक को भरपूर अवसर दिया। शुरू से, बीच से, अंत से ... पढने की सुविधा ने अर्थ की नियत्ता से दूर अनुभव के रस की स्वतन्त्रता स्वयं ही प्रदान की।
तुम्हारी गंध आती है। किंवा
नहीं आती है। (पृष्ठ स 210)

इस सरल मगर दुरूह पंक्ति को क्या समझाने की जरूरत है?
निस्संदेह अमिताभ शिल्प के कवि हैं। यह बात उनकी कविता पढने के पहले देख कर ही समझ आ जाती है। यही उनकी कविता में प्रवेश करने का रास्ता भी है। किसी चित्र को देखने की भाँति अमिताभ की कविता को कहीं से भी पढकर अनुभूत किया जा सकता है। फिर इस रास्ते सुंदर, टँके हुए शब्द मन को मोहते हैं। अर्थ तक पहुँचने की जल्दी पाठक को त्यागनी होगी। उनकी कविता का मजा अद्भुत बिंबों में है। पंक्तियों के विन्यास में है। भाषा की कलाकारी में है। पंक्तियों का बेहद चुस्त फैलाव .. शब्दों को रखने का अपना विन्यास। इस माने में उन्हें कविता का नक्काश कहा जा सकता है, जो बेहद सावधानी से, महीन से महीन शब्द अपनी कविता में रखता है। सौन्दर्य उनकी कविता का दूसरा गुण है। यहाँ सौन्दर्य से तात्पर्य शब्द और अर्थ के बीच के सेतु से है जो पाठक के लिए अनुभव का वितान रचता है। मगर यह सौन्दर्य कुछ हद तक दुरूह भी है। उनकी कविता को यूँ ही सरसरी तौर पर नहीं पढा जा सकता। बल्कि प्रत्येक पंक्ति और शब्द पर बार-बार दृष्टि डालनी होगी।
अमिताभ की कविताओं के बारे में सुपरिचित कवयित्री तेजी ग्रोवर समालोचन मे लिखती हैं, इन कविताओं से पता चलता है कोई बिम्बधर्मी कवि अपने आसपास के संसार से कितने बारीक कश खींच सकता है, और उसकी सोच कैसे बिम्बों से उन्मत्त काव्य में रूपांतरित होती चलती है। इस कविता में सुरूर है, जुनून है, और काव्य संयम है... आपको अपना जीवन ऐसा बनाए रखना पडता है कि हालात कुछ भी हों, वे कविता को पुष्ट करें, आप अपनी पूरी सामाजिकता को निभाते हुए भी कवि रहें, और अपने स्व की ब्रह्माण्डीय अनुभूति से कभी भटक कर दूर न चले जाएँ। दुनियावीपन की काट जिनके काव्य में गुम्फित है, उनकी जिम्मेदारी तो और भी बडी। तेजी का यह कथन अमिताभ के कवि की संभावना का व्यापक दायरा भी बताता है और बिंबों की विपुलता और दृश्य की अलक्षितता पर भी ध्यान खींचता है।
मैं -
तुम्हारे कानों में
अपने और पृथ्वी के मध्य
टप् की ध्वनि के लिए मरा हूँ। (पृष्ठ स 21)
दुःख काटने में
जितनी देह लगी है
मैं ने लगाई है ।
*रक्त को पसीना होने में रोयें भेदने पडते हैं, प्रभु!* (पृष्ठ स 27)
जैसे आग की मौत पर स्तब्ध जल -
जल-हीन-जल! (पृष्ठ स 159)

भूखे बहेलिए ने
चिडिया के पाँख ऐसे उखाड लिए -
जैसे पाँख ही तो हैं!

फडफडाती चिडिया को ऐसे मुट्ठी में भर लिया -
जैसे फडफडाती ही तो है! (पृष्ठ स 171)

(2)
कविता में जीवन को परिभाषित करना हर कवि का स्वप्न होता है। कुछ यूँ भी कि किस तरह अपने आसपास को वह देख रहा, जी रहा, सोच रहा और रच रहा। सुप्रसिद्ध कवि अशोक वाजपेयी, जिन्होंने इस पुस्तक के प्रकाशन में महती भूमिका निभाई है, की कविता की एक पंक्ति है, - उसके छूने से नहीं खिलते फूल, लेकिन लगता है कि उसने छुआ, तभी खिले फूल। कहने की छटपटाहट कलाकार का पहला अधिकार है। हो भी क्यों ना? जैसे उडि जहाज कौ पंछी, पुनि जहाज पै आवै - पंच तत्त्वों के भीतर-बाहर की देह और मन पुरखे कवि सूरदास की इस पंक्ति के अर्थ की तरह और कहाँ जाएँगे! वह प्रकृति में विचरण कर, भीतर की बेचैनी के पास ही लौटेंगे। कवि और सर्जक की आदिम इच्छा अमिताभ के यहाँ कुछ इस तरह दिखती है -
पहाड की टूट में भारी मिट्टी पर
जो हरी घास है,
वह पहाड के पानी होने की प्यास है?
(पृष्ठ स 46)
एक दिन सूरज नहीं निकलेगा -
स्थिर हो जाएगी पृथ्वी
एक दिन । (पृष्ठ स 47)
जैसे एक पत्थर हो गया पहाड है ।
एक जल नदी। एक मिट्टी घट।
एक नील आकाश।
-किंवा एक वर्ण शब्द । (पृष्ठ स 54)
एक अर्थ
जैसे पंक्ति के शब्दों का पास है। (पृष्ठ स 57)
वे नावें देखो। वह सदा जल ही में
डूबती हैं।
और वे लोग! - इसीलिए
भँवर में फँसे हैं कि उनके पास नावें हैं
(पृष्ठ स 65)
एक पानी ही मेरे पास है
तैरने के लिए -
डूबने के लिए । (पृष्ठ स 67)
(3)
अर्थात् के माने क्या? मेरे खयाल से अर्थ के परे जीवन और कविता की हमजोली का आस्वाद ही हो सकता। देखते, गुनते, ठहरते, जीते हुए जीवन और कल्पना की इबारत इन पन्नों पर शाया है। कविता में अर्थ की खोज का अपना आनंद हो सकता है पर यह ही सम्पूर्ण नहीं। अर्थात् शायद इन सब अनुभूतियों का समुच्चय है। जिसे शायद एक-एक कर देखने की बजाय सम्पूर्णता में ही ग्रहण करना होगा।
आकाश : मेरी स्तब्धता का स्थैर्य- देखो ! -(पृ.स 36)
मृग जैसे - चौंकी हुई
हवा-एक साँस - (पृष्ठ स 41)

आकाश में अनगिन तारे हैं !
यद्यपि, यह कोई कहने की बात नहीं -
किन्तु,
रात इतनी गहरी है कि और कुछ सूझ नहीं रहा । (पृष्ठ स 87)
(4)
क्या सौंदर्य के बीहड में जीवन की भंगुरता का यह पाठ चमत्कृत नहीं करता! चमत्कृत क्या गोली की ठाएँ की आवाज की तरह मन में कहीं धँसता है कि पंचतत्व की देह मूल स्वरूप में लौटे तो भी समय लेती है। फिर अगर हम जीवन और समाज की सामूहिकता में प्रकृति से इतना आगे आ गए हैं तो क्या वापस लौट पाएंगे या कि अगर लौट सके, तो उसमें कितना समय लगेगा?
समय जंगलों में भी था।
बीहडों में भी।

समय उन तहों में भी था;
जहाँ डूबकर कोई जाता है। (पृष्ठ स 88)

एक साँझ
वेश्या की भोगी हुई देह-सी
विरक्त ।
शिथिल ।
शांत । (पृष्ठ स 203)
एकांत के मौन को इतने में अगर कवि व्यक्त कर पाया है, तो उसने महसूस कैसा किया होगा? इसके ठीक उलट विचार के गहन से इतर एक दृश्य-शब्द कुछ यूँ हैं-
धीमे-धीमे खुलते हैं किवाड
चर्रचर्र
-बिलकुल धीमे । (पृष्ठ स 197)
एक कविता जिसका शीर्षक कमाल है - काठ का हठ नहीं। निश्चित रूप से यह शीर्षक कविता में प्रवेश करने के पहले इसी जगह रुक जाने पर मजबूर कर देता है। भीतर उतरो तो एक पंक्ति फिर ठिठका देती है मृत देहों को मिट्टी होने में समय लगता है। (पृष्ठ स 205)
(5)
अमिताभ मरु प्रदेश की पैदाइश भले हों, लेकिन उनकी कविता के भीतर पानी ही पानी है। वह जितनी तरल है, उतनी ही मरीचिका की भाँति मायावी भी। अर्थ से छल करती। शब्द से भ्रम रचती। शिल्प के आधिक्य में कहीं रूखी भी। भाप की तरह ताप वाली भी। जब पढते-पढते लगे कि और कितना पढना होगा डूबने की इच्छा में तो अचानक कुछ पंक्तियाँ आँखों के सामने आती हैं-
मैंने आँखें देकर आकाश को पोंछ दिया है
(पृष्ठ स 194)
धरती-आकाश एक होने के पहले
मैंने तुम्हें प्रेम किया था
और तुम्हारे सपने देखे थे (पृष्ठ स 195)
ऐसा नहीं कि वैचारिक सघनता में यह संग्रह एकरसता को सम्मिलित करता है। अमिताभ जैसे सघन कवि के दायरे में प्रवेश करने के पहले पाठक की अपनी तैयारी जरूरी है। अमूमन कविता का आधुनिक परिवेश गद्य की प्रांजल भाषा के आसपास है, जहाँ भाव और दृश्य का वैचारिक ताप पाठक को निश्चित बिन्दु तक ले जाता है। अक्सर कवि और कविता का पाठकीय सामंजस्य इस तरह भी निबाह कर लेता है कि साहित्यिक पत्रिकाओं अथवा मंचों से कविता पाठ एक आश्वस्ति भी होती है, और स्वीकार्य की। फिर कई जगह उद्धरणों के बीच भी कविता जगह बनाती है और इस तरह कवि का दायरा या आभामण्डल बडा होता जाता है। अमिताभ की कविता इन मानकों पर बिलकुल भी जँचती नहीं। वे ऐसी कविता रचते हैं जिसका मंच से पाठ कोई विशेष प्रभाव नहीं छोडता। न ही केवल जीवन की आपाधापी के विमर्श उनकी कविता को प्रचलित करने में कामयाब होते हैं। तब भी अमिताभ अपने समय के युवा कवियों में अलग खडे दिखाई देते हैं। मंतव्य के प्रति कोई आग्रह नहीं। कहने की हडबडी भी नहीं। दिखने की तो कतई नहीं। उनके लिए कविता कहना नहीं सिरजना है।
सर्प को विष से बाहर करने के मेरे अर्थ
मेरी कला की पूँजी हैं-
जिन्हें कविता सिद्ध करने में
मैंने चिडिया को उठा लिया है। (पृष्ठ स 158)
मैं कविता लिखने में पहाड-सा अपने पर टूटा हूँ (पृष्ठ स 183)

एक कविता
मुझे जन्म देने से पहले
पृष्ठ पर एक घोसला बनाएगी (पृष्ठ स 186)
सहसा गालिब याद आते हैं सुब्ह करना शाम का लाना है जू-ए-शीर का । अमिताभ की कविता अपने कवि से इतनी ही मेहनत करवाती है और इतनी की ही चाह पाठक से भी करती है।
(6)
मौन, प्रेम, मरुस्थल, पानी, सौन्दर्य, आकाश, तारे, नदी, मिट्टी, साँझ, देह जैसे शब्द और विषय अमिताभ की कविता में बार-बार आते हैं। यकीनन अपने परिवेश की पुकार, देह का राग और व्याकुल मन का बीहड उनकी कविता का स्रोत है। इन सबके बीच कुछ बेहद खूबसूरत शब्दों को अमिताभ कविता में यहाँ-वहाँ पिरोते हैं मसलन किंवा, पुहुप, व्योम-कम्पन, निरंध्र,निर्स्वर, विवर्ण, स्व-शून्य, आकाशमृग, मधुप, नीलवर्णाक्षरा, वर्षर्तु नद्द्युन्मुखी, पातालभेद यत्न आदि। कुछ देशज शब्द, ध्वनियाँ भी बेहद सुंदर बन पडती हैं - कर्र-कर्र, किवाड, साँकल, चर्रर्र, डग, टप् , राई-लौण, मिट्टी का डगला, मेह, रत्ती-रत्ती, भर्र।
इन सबके आलोक में अमिताभ की कविता देशज अनुभूतियों के साथ ही प्रकृति का अक्स अपने साथ समेटे चलती है। शिल्प का प्राधान्य अगर कविता का सौष्ठव रचता है, तो शब्द और बिम्ब का अचूक चुनाव उसकी रीढ को तानता है। विषय की बहुत गहरी छटपटाहट कवि को नहीं बाँधती। उसे पता है कि क्या कहना है और कैसे कहना है। फिर भी मिट्टी-पानी-हवा-ताप जिनसे अमिताभ का धूसर-उर्वर मन सिरजा है, वह हर कविता में लक्षित हो ही जाता है। यह अनुभव में स्थानिकता का वैश्विकता में बदल जाना है। रचना में देशज के साथ मौलिक किन्तु दक्ष साधक हो जाना है। कोरी भावुकता के बीच सजगता का सर्जक हो जाना है।

असंतोष को कई जगह कुछ इस तरह शब्द मिले हैं
पीले, गन्धहीन फूल
मरुस्थल सत्यानाशी ! (पृष्ठ स 129)
तापे गए लौह पर
हुंफ हुंफ हथोडे की चोटों के निकट
मेरे भय का शीलभंग हुआ है । (पृष्ठ स 131)
धरती इसलिए हरी रहती है
कि मैं कविता पढने की तरह
तारे गिनता हूँ
और रात भर कहानियों के घाव
भरता हूँ! (पृष्ठ स 140)
(7)
किताब के फ्लैप पर अंबुज पाण्डेय लिखते हैं - कहने के विलक्षण ढंग, प्रस्तुति की अभिनव शैली और समर्थ भाषा के साथ विशिष्ट शिल्प में बुनी गयीं ये कविताएँ अपनी प्रभविष्णुता में अन्यतम हैं। यहाँ काव्य-भंगिमा तिर्यक है। सामान्य कथन और इकहरी अर्थ-योजना की इयत्ता के बाहर कवि कभी चित्त को उसके सौन्दर्य की गरिमा से भर देता है - कभी गंभीर एकाकीपन और चीर-प्रतीक्षा में अभिभूत छोड देता है।
ऐसा भी नहीं कि कविता की तान और स्वर अदेखा हो। अज्ञेय, शमशेर और राजकमल चौधरी से लेकर अनिरुद्ध उमट, रुस्तम, पीयूष दईया और अमिताभ तक कविता का यह शिल्प कवियों ने बचाया है। अर्थात् अर्थ की तहों में नए अर्थों को सृजित करे, कविता को नए तरीके से परिभाषित करे - यह उम्मीद इन कविताओं से बनी हुई है।

पुस्तक का नाम : अर्थात्
लेखक : अमिताभ चौधरीी
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष : 2021
मूल्य : 399
विधा : कविता

सम्पर्क- बी-210, प्रकृति ईडन एण्ड एलीट,
ई-8, चूना भट्टी एक्सटेंशन, शाहपुरा पुलिस थाने के पास, शाहपुरा- भोपाल- ४६२०३९
मो. 9967647822