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वि-औपनिवेशीकरण के लिए काफी नहीं है विलाप

आदित्य निगम
भारतीय मानस के वि-औपनिवेशीकरण पर यह किताब रजा फाउंडेशन व सेतु प्रकाशन ने सह-प्रकाशित की है। इसके लेखक अम्बिकादत्त शर्मा जी का इस महत्त्वपूर्ण विषय पर पुस्तक लिख कर बहस छेडने के शुक्रिया अदा करना चाहिए। यह विषय हमारे आज के लिए एक ज्वलंत सवाल है और इस पर पूरी गंभीरता से बातचीत होनी चाहिए। मुझे लगता है कि यह बहस दो कारणों से जरूरी है। पहला कारण यह है कि पिछली सदियों के यूरोपीय वर्चस्व और इतिहास व प्रगति की उसकी धारणा ने हमारे समूचे ग्रह को एक अभूतपूर्व संकट के कगार पर ला खडा कर दिया है। इससे निकल पाना तब तक संभव नहीं लगता जब तक हम उसी वैचारिक दायरे में चक्कर काटते रहते हैं। तथाकथित अविकसित देशों में अगर आज भी विकसित देशों से बराबरी करने की लालसा है तो उसकी गुंजाइशें अब न के बराबर रह गयी हैं। दूसरा कारण कुछ और पेचीदा है जिसका ताल्लुक उस दशा से है जिसे लातिन अमेरीकी विचारक अनिबल क्विहनो के जिसे सत्ता की औपनिवेशिकता (coloniality of power) कहा है। क्विहनो का तर्क, जिसे बाद में वॉल्टर मिन्योलो ने और विकसित किया, इस बात की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है कि उपनिवेशवाद के औपचारिक अंत से वो सत्ता के सम्बन्ध खत्म नहीं हो जाते जिन्हें वह वजूद में लाता है - बल्कि वे बदस्तूर कायम रहते हैं। इस अवधारणा के जरिये वे इस बात को रेखांकित करना चाहते हैं कि नस्ल, जाति, धर्म व तमाम तरह की राजनीतिक व सामाजिक दर्जाबन्दियाँ (hierarchies) जो उपनिवेशवाद खडी करता है वे उसके औपचारिक अंत के बाद भी स्वतन्त्र रूप से कायम रहते हैं।
हमारे देश के सन्दर्भ में, पिछले कुछ दशकों में, अलग अलग नजरियों से काम करने वाले इतिहासकारों ने बहुत बारीकी से अध्ययन के बाद हमें बताया था कि दरअसल औपनिवेशिक सरकार चलाने के लिए जिन औजारों का प्रयोग किया गया- मसलन नक्शे, जनगणना आदि-उनसे जो ज्ञान पैदा हुआ उसने किस तरह उपमहाद्वीप में समुदायों के आपसी रिश्तों को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया था। जनगणना की ही मिसाल लें, तो बर्नार्ड कोह्न, ज्ञानेंद्र पाण्डेय, दीपेश चक्रवर्ती, आदि कई इतिहासकारों ने दिखाया है कि अंग्रेजों के आने से पहले हिन्दू और मुसलमान की कोई गिनती हमारे पास नहीं थी। जब जनगणाओं का काम शुरू हुआ तब यह सवाल भी उठ खडा हुआ कि आप किनकी गिनती करना चाहते हैं? किन खानों में लोगों का वर्गीकरण करना चाहते हैं? मसलन, अगर अंग्रेजों की आदमशुमारी ने सिर्फ वर्गों के आधार पर वर्गीकरण करके हमें इतना ही बताया होता कि कितने फीसद खेतिहर, कितने श्रमिक, कितने मध्यवर्गीय हैं, तो हमारी राजनीती की शक्ल क्या बनती? रफी अहमद बंगाल के मुसलमानों के अपने अध्ययन में दिखाते हैं कि बंगाल की पहली आदमशुमारी ने 1881 में पहली बार दिखाया कि पूरे प्रान्त में मुसलमानों की संख्या हिन्दुओं से 1 फीसद ज़्यादा थी हालाँकि इसका कोई अहसास तब के संपन्न व शक्तिशाली भद्रलोक तबके को नहीं था क्योंकि ज़्यादातर मुसलमान किसान थे और देहातों में बसते थे। इस जनगणना के नतीजे सामने आते ही जैसे भूचाल-सा आ गया। वहाँ से हमारी राजनीतिक और सामाजिक तानेबाने ने एक ऐसी शक्ल अख्तियार कर ली जिसे हम आज भी जीते जा रहे हैं। यह डर कि एक दिन वो हम से संख्या में ज़्यादा हो जाएंगे, उच्चवर्ण हिन्दू मन को सालने लगा। यहाँ यह भी याद रखना चाहिए कि अगर आप को यही न मालूम हो कि बहुसंख्यक होने के फायदे क्या हैं, तो आप क्यों उसकी फिक्र करेंगे। प्राक-औपनिवेशिक भारत के बाशिंदों को कभी अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक होने की कोई फिक्र रही हो ऐसे कोई प्रमाण नहीं मिलते। यह डर तो एक खालिस आधुनिक डर है, जिसकी नींव ही दो खेमों में बाँटें जाने से पडी और जो हर किस्म के राष्ट्रवाद के लिए अपने आत्म को परिभाषित करने के लिए जरूरी बन गई।
ऐसा नहीं कि अंग्रेजों के आने से पहले कोई हिन्दू-मुसलमान झगडे या विवाद नहीं खडे होते थे। जरूर होते थे, मगर वे किसी अखिल भारतीय हिन्दू बनाम मुस्लमान के बीच नहीं, बल्कि स्थानीय किस्म के झगडे हुआ करते थे क्योंकि आत्म-परिचय का आधार आमने-सामने के सामुदायिक रिश्ते हुआ करते थे। जनगणाओं के उपरांत बनी इन पहचानों पर आधारित इन आधुनिक टकरावों को एक अर्थ में हम सत्ता की औपनिवेशिकता के ही एक रूप में समझ सकते हैं।
अम्बिकादत्तजी की किताब मैंने इसलिए काफी उत्साह के साथ पढनी शुरू की, मगर शुरू में ही निराश होना पडा। निराश इसलिए कि लेखक का प्रस्थान बिंदु ही कुछ और है। कुछ और होने में अपने आप में कोई दिक्कत नहीं है, मगर यहाँ यह कुछ और मेरे अर्थों में सत्ता की औपनिवेशिकता में लिपटे, उसके द्वारा गढे गए एक ऐसे आहत उच्चवर्णीय अहम् का विलाप लगा जो इतिहास और तथ्यात्मकता के कोसों दूर था।

अपनी इस पुस्तिका की शुरुआत वे इस दावे के साथ करते हैं कि औपनिवेशीकरण की प्रक्रिया और उत्तर-औपनिवेशिक प्रभाव में भारत का तीन बार आत्म-विभाजन हुआ है। (प्राक्कथन, पृ 9) चूँकि ये तीन आत्म-विभाजन उनकी वि-औपनिवेशीकरण की धारणा के केंद्र में हैं इसलिए शुरुआत में ही पाठक को इनसे अवगत करा लेना मुनासिब होगा। उनके मुताबिक अगर पहला आत्म-विभाजन ओरिएंटलिस्ट विद्वानों द्वारा भारत के वर्तमान को उसके गौरवशाली अतीत से काट दिया जाना था, तो दूसरा वह था जो स्वातंत्र्योत्तर काल में राजनीति और संस्कृति के बीच उत्तरोत्तर बढते हुए पार्थक्य के कारण घटित हुआ, जिसके चलते एकात्म गुण-सूत्रों वाला सांस्कृतिक राष्ट्र (जो भारत कभी हुआ करता था), एक संस्कृतिविहीन राष्ट्र-राज्य में रूपांतरित होकर रह गया। तीसरा आत्म-विभाजन भाषाई आधार पर हुआ। इसे थोडा और खोलते हुए अम्बिकादत्तजी बताते हैं कि इसके फलस्वरूप इस देश में अंग्रेजी ने राष्ट्रीता (Nationism) की भाषा कि पदवी को अख्तियार कर लिया और भारतीय भाषाएँ बहुविध उप-राष्ट्रीयता (Sub-Nationality) बन कर रह गयीं। इस तरह राष्ट्रीता और उप-राष्ट्रीयताओं में विभाजित भारत से राष्ट्रीयता (Nationality) विलुप्त कर दी गयी। (9,जोर हमारा)
तीसरे आत्म-विभाजन के सन्दर्भ में यह दर्ज कर लेना जरूरी है कि राष्ट्रीता उर्फ (Nationism) अम्बिकादत्तजी की ईजाद है जिसे वे, जाहिर है, भारत की प्रामाणिक राष्ट्रीयता के बरअक्स रखते हैं और जिसके बारे में उनका यह मानना है कि वह कत्तई अप्रमाणिक व बनावटी कोई शै है। इस मौके पर मैं पाठक का ध्यान सिर्फ इस दावे की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ जहाँ लेखक कहते हैं कि भारत एकात्म गुण-सूत्रों वाला सांस्कृतिक राष्ट्र था जिसकी राष्ट्रीयता विलुप्त कर दी गयी। चूँकि लेखक कहीं भी इन प्रत्ययों को खोलते नहीं हैं, इसलिए इस पर दो पल ठहरना मुनासिब होगा। राष्ट्र और राष्ट्रीयता के इतिहास से सामान्य तौर पर वाकिफ होने वाला भी जानता है कि ये कोई प्राकृतिक देन नहीं है कोई चिरंतन चली आ रही चीज है - बेशक हिन्दू सिद्धांतकार इसे एक दावे के तौर पर कितना ही दोहराते रहें। राष्ट्र और राष्ट्रीयता के इतिहास पर अब तक दुनिया के अलग अलग देशों के सन्दर्भ में बहुत काम हो चुका है जो यह साफ दिखाता है कि यह शै आधुनिक राजनीति की पैदाइश है- बल्कि यूँ कहा जाए कि वह आधुनिक राजनीति को संगठित करने का एकमात्र तरीका है। खुद हमारे देश में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने बीसवीं सदी के शुरुआती सालों में ही भाँप लिया था कि यह राजनीति करने का एक खास आधुनिक व पश्चिम से आयातित उत्पाद है जिसके लिए हमारी अपनी भाषाओँ में कोई शब्द नहीं है। बांग्ला में तो आज भी राष्ट्र शब्द का मतलब राज्य होता है जो पारम्परिक संस्कृत प्रयोग के ज़्यादा करीब है। यहाँ राष्ट्र और राष्ट्रवाद पर बहस में जाना संभव नहीं है मगर मैं इस बात का उल्लेख एक पद्धतिगत सवाल उठाने के लिए कर रहा हूँ जो इस पुस्तिका की खासियत कही जा सकती है - अगर अम्बिकादत्तजी खुद या उनकी काशी की पाण्डित्य परंपरा (फ्लैप में लेखक परिचय देखें) में इन प्रत्ययों को कोई अलग अर्थ हैं और इन पर कोई अलहदा किस्म का सैद्धांतीकरण उपलब्ध है, तो उसे पाठक के सामने रख कर चर्चा करनी चाहिए। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो हमें मन लेना होगा कि उनका प्रयोग यहाँ प्रचलित समाज विज्ञान के अर्थों में ही किया जा रहा है - जिसके अर्थ फिलहाल यही निकलते हैं कि वि-औपनिवेशीकरण के उनके दावों के बावजूद, जिन पदों के जरीये वे भारतीय संस्कृतात्मा के बारे में अपनी बात रख रहे हैं वह दरअसल पश्चिमी आधुनिकता से ही उधार लिए गए हैं।
यही पद्धतिगत बात अम्बिकादत्त जी के पहले आत्म-विभाजन पर दो पल गौर करने से और साफ हो जाती है। जब वे कहते हैं कि पहला विभाजन ओरिएंटलिस्ट विद्वानों द्वारा भारत के वर्तमान को उसके गौरवशाली अतीत से काट दिया जाना है तो ये भी महज एक दावा ही है। इस दावे के समर्थन में न तो कहीं कोई तर्क दिया जाता है न कोई प्रमाण या सुबूत। मगर फिर भी मैं यह मानाने के लिए तैयार हूँ इस गौरवशाली अतीत के उन्नीसवीं सदी के से काट दिए जाने के पीछे लेखक के पास ऐसे तर्क या प्रमाण हो सकते हैं जो काशी की पाण्डित्य परंपरा के बहार हम लोग नहीं जानते हैं। दिक्कत यह है की अगर उन्हें हम जैसे उनके पाठकों के सामने नहीं रखा जाता है तो फिर हमारे पास कोई चारा नहीं बचता सिवाय इसके कि हम उसे अपने पास उपलब्ध जानकारियाँ व ज्ञान की कसौटी पर ही कसें। अब तक इतिहासकरों के जो शोध सामने आए हैं या जो वृत्तांत हमें उस जमाने के बारे में बताते हैं, उन सब से तो यही पता चलता है कि औपनिवेशिक शासन ने ही गौरवशाली भारतीय अतीत की खोज करके हमारे सामने राखी और तमाम तरह के राष्ट्रवादियों के हाथ में बारूद थमाया। वैसे सबसे पहले पश्चिम और यूरोप की भारतीय अतीत और दर्शन से साबिका तब पडा, जब 1671 में फ्रांसीसी डाक्टर फ्रांसोआ बेर्नियर भारत में कई साल बिताने के बाद दाराशिकोह द्वारा फारसी में अनूदित 52 उपनिषद् (उपनिखत) लेकर वापस फ्रांस पहुँच। दारा शिकोह ने 1657 में ये तर्जुमा खुद पण्डितों की मदद से किए थे। यूरोप में इस तर्जुमा के पहुँचने के बाद जब इसके लैटिन व फ्रांसीसी अनुवाद छापे तो जैसे अचानक यूरोप के रोमांटिक दार्शनिकों में प्राचीक भारतीय दर्शन को लेकर जबरदस्त उत्साह व और जानने की ख्वाहिश पैदा हुई। फ्रेरिक फॉन शेलिंग, शॉपेनहोएर व पॉल दोएसेन जैसे दार्शनिक और आलिमों ने ही वस्तुतः संस्कृत दर्शन परंपरा के प्रति यूरोप में उत्सुकता पैदा की। शेलिंग ने ही मैक्सम्यूलर को उपनिषदों का जर्मन भाषा में अनुवाद करने की दरख्वास्त की। ओरिएंटलिस्ट विद्वानों की उसके बाद की कोशिशों के पीछे के इस इतिहास को अक्सर गायब कर दिया जाता है।
इस सन्दर्भ में यह भी याद रखना चाहिए कि उपनिवेशवादी शासन के शुरुआती दौर में, और उससे पहले मुगल व दक्कनी सल्तनतों के जमाने में, देशज बुद्धिजीवियों के सामने कोई खास संकट नहीं था। इतिहास के शोधों से यह भी पता चलता है कि मुगल साम्राज्य के दौरान भी और बाद में, ईस्ट इण्डिया कंपनी के जमाने में भी, ब्राह्मणों ने शासकों के सलाहकारों की भूमिका निभाई और कंपनी ने तो उन्हें बिहार और अवध में सरकारी पेशों में और बंगाल में सेना तक में भी भर्ती किया। इससे पहले भी दक्षिण भारत की दक्कनी सल्तनतों में 16वीं-17वीं शताब्दी में बडी तादाद में ब्राह्मणों को नियुक्त किया जाता रहा। इन पारम्परिक बुद्धिजीविजयों - खासकर पण्डितों/ ब्राह्मणों - का एक अच्छा खासा हिस्सा अंग्रेजी-औपनिवेशिक शासन द्वारा स्थापित ज्ञान की संस्थाओं में शामिल हो गया।
उपनिवेशवादी शासन की स्थापना के बाद देशज बुद्धिजीवियों का एक अन्य हिस्सा हताशा के एक दौर से गुजरा। यह वह हिस्सा था जो अपने गुलामी के कारणों की शिनाख्त करते करते इस नतीजे पर पहुँचा कि भारतवासियों में एकता का अभाव ही उनकी गुलामी का कारण था। अर्थात उनके सामने अगर अम्बिकादत्तजी ने एकात्म गुण-सूत्रों वाले सांस्कृतिक राष्ट्र की अपनी थीसिस पेश की होती, तो शायद वे हैरत से उनकी और ताकते रह जाते। यहाँ एक बात और स्पष्ट कर दूँ। उस जमाने के बुद्धिजीवियों के लिए एकता के अभाव का अर्थ हिन्दू-मुस्लिम टकराव से नहीं था, बल्कि खुद हिन्दू समाज के भीतर एकता के आभाव से था। मिसाल के तौर पर जरा उन विवेकानंद की बात पर गौर करें जिनकी दुहाई अम्बिकादत्तजी भी देते और हर प्रकार के हिंदुत्ववादी भी-
खुसूसी विशेषाधिकार *एक्सक्लूसिव प्रिविलेज* और खुसूसी दावों के दिन अब लद गए हैं, भारत की जमीन से हमेशा के लिए रुख्सत हो गए हैं। भारत में बरतानवी हुकूमत की कुछ बरकतों में से यह भी एक है। और हम इस बरकत के लिए मोहम्मदन शासन के भी कर्जदार हैं, इस खुसूसी विशेषाधिकार के खात्मे के लिए। दबे-कुचले और गरीब लोगों के लिए भारत पर मुसलमान आक्रमण मुक्ति की तरह आया था। इसीलिए हमारे लोगों के पाँचवा हिस्सा मुसलमान बन गया। यह सब तलवार की ताकत पर नहीं हासिल किया गया। यह सोचना की यह सब सिर्फ तलवार और हथियारों के बूते पर हुआ पागलपन की हद होगी। *अनुवाद मेरा है* (द डेफिनिटिव विवेकानंद, रूपा, नई दिल्ली 2018, पृ 373-374)
चलते चलते यह नोट करते चलें कि स्वामी विवेकानंद को यह स्वीकार करने में कतई कोई परेशानी नहीं होती कि प्राचीन भारत कोई एकात्म गुण-सूत्रों वाला सांस्कृतिक राष्ट्र नहीं, बल्कि खास विशेषाधिकारों पर आधारित समाज था जहाँ दबे कुचले और गरीब लोगों के लिए बाहरी आक्रमण मुक्ति की तरह आया था।
खैर हम अपनी बात की और लौटें। फिर एक दौर वह आया जब विलियम जोंस जैसे ओरिएंटलिस्ट विद्वानों ने रॉयल एशियाटिक सोसाइटी जैसी संस्थाओं की स्थापना की और मैक्स म्यूलर जैसों ने प्राच्य के ज्ञान भण्डार पर नयी रौशनी डाली। इन तमाम ओरिएंटलिस्ट विद्वानों के काम से ही यह भी पता चला कि संस्कृत भाषा और ग्रीक और लातिन में कई सदृशताएँ हैं और मुमकिन हैं कि ये एक ही मूल की भाषाएँ हों। वस्तुतः इन्हीं ओरिएंटलिस्ट विद्वानों के काम ने अचानक हताश उच्चवर्णीय देशज बुद्धिजीवियों में नयी जान फूँक दी। यह भी याद रखना जरूरी है कि इसी दौर में सिंधु घाटी सभ्यता के भी अवशेष सामने आए और उच्चवर्णीय देशज बुद्धिजीवी की कल्पना उडान भरने लगी। इनमें एक खास जमात तो ऐसी थी जिन्होंने अपनी कल्पना में खुद को ही सिंधु घाटी की सभ्यता का वारिस मुकर्रर कर दिया और खुद तो दुनिया की तमाम सभ्यताओं की माता समझना शुरू कर दिया। उस तसव्वुर के ऊपर खडी कर दी गयी एक पूरी की पूरी राजनीति। वहीं से पैदा हुए प्रामाणिक संस्कृतात्मा को लेकर विश्वगुरु बनने के तमाम खयाल।
इस तरह देखें, तो ऐसा लगता है कि ओरिएंटलिस्ट विद्वानों ने हिंदुत्व और उसके गौरवशाली अतीत की बुनियाद खडी की। उन्हीं के काम से भारतीय अतीत के बारे में ऐसी जानकारीयाँ सामने आईं जिनके बूते पर हताश, विचलित उच्चवर्णीय हिन्दू मन उछाल मरने लगा। अब अगर ओरिएन्टलि*म और भारत के गौरवमय अतीत का इससे अलग कोई शोध-आधारित पाठ अम्बिकादत्तजी के पास उपलब्ध है, तो किताब में तो उसका कोई सुराग नहीं मिलता। बस एक के बाद एक दावे मिलते हैं।
अब मिसाल के तौर पर इसे वाक्य पर गौर करें -
भारतीय संस्कृति की सुदीर्घ निरंतरता का सानी तो दुनिया की अन्य कोई संस्कृति है ही नहीं। (15 )
यह दावा अपने आप में क्या अर्थ रखता है जब आज यह स्पष्ट हो चुका है कि न तो सिन्दु घाटी सभ्यता से हमारे वर्तमान का कोई नैरंतर्य है (वह बीसवीं सदी की खोज है) और न ही वेदों के बारे में हमारे पास सिवाय शब्दों के कुछ और है जिससे ऐसा कुछ साबित हो सके जिसका अम्बिकादत्तजी दवा करते हैं। अलबत्ता आज के ताजातरीन शोधों के बाद (जिसमें अब पुरातत्त्वविदों और भाषाविदों के आलावा जेनेटिक विज्ञानी भी शामिल हो चुके हैं) डीएनए मैपिंग के जरिये यह पता चल रहा है कि सिंधुघाटी सभ्यता (जो हरियाणा के राखीगढी तक फैली थी) की आबादी ईरानी कृषिजीवियों और दक्षिण एशियाई शिकारी संग्रहकर्त्ताओं के समुदायों से मिल कर बनी थी। इनमें से भारत के सबसे पुराने बाशिंदे प्राचीन पुश्तैनी दक्षिण भारतीय समुदाय थे। (विस्तृत जानकारी के लिए देखें दुनिया भर के 118 वैज्ञानिकों द्वारा जारी अध्ययन द फॉर्मेशन ऑफ ह्यूमन पॉपुलेशन्स इन साउथ एंड सेंट्रल एशिया, https://www।science।org/doi/full/10।1126/science।aat7487 )
वैदिक लोगों के विश्वासों और चलन के बारे में हम जो कुछ जानते हैं वह उन्हीं शब्दों से है जिन से मिलकर वेद बने हैं - न कोई मंदिर, न रिहाइश के कोई पुरातात्त्विक अवशेष आज तक कहीं मिल पाए हैं। दशकों से उस पर शोध कर रहे से विद्वानों का तो यह मानना है की यह सभ्यता मूलतः घुमन्तु समुदायों की थी जो आज के सीरिया से लेकर अनातोलिया और इराक तक फैली थी। इस बाबत कम से कम एक शिलालेख संस्कृत की पूर्वज मित्तनी भाषा में सीरिया में मिला है जिसमें इंद्र और वरुण का जिक्र आता है। वैदिक लोगों के भारत आगमन से तकरीबन कुछ सौ बरस पहले ही सिंधु घाटी सभ्यता नष्ट हो चुकी थी। यह भी साफ है कि जहाँ सिंधु घाटी की सभ्यता मूलतः शहरी थी, वैदिक सभ्यता ग्राम्य और घुमन्तु थी। इसीलिए वैदिक जमाने के कोई अवशेष यहाँ नहीं मिलते, जबकि सिंधु घाटी की सभ्यता और भी पुरानी होने के बावजूद उसके पुरातात्त्विक अवशेष इफरात में मिले हैं।
ये तमाम जानकारियाँ दशकों लम्बे शोध के बाद किन्हीं अत्यंत अस्थाई नतीजों पर पहुँच विद्वानों के जरिये हमें मिलती हैं जिसे अम्बिकादत्तजी इस निश्चितता के साथ भारतीय संस्कृति की सुदीर्घ निरंतरता का दावा हमारे सामने रखते हैं कि पढने वाले को यह गुमान होने लगता है कि शायद उनके पास इससे जुडी भी ऐसी जानकारियाँ हैं जो किसी स्कॉलर के हाथ नहीं लग पाई हैं। मुझे शक है कि ऐसा होगा मगर अगर ऐसी बात है, तो इतना बडा दावा इतने हलके से, बिना साक्ष्यों और प्रमाणों के नहीं किया जाना चाहिए।
बहरहाल, अब जरा इन पद्धतिगत मसलों से आगे बढते हैं। वैसे तो पुस्तक के कई अंश 1989 में हाइडेलबर्ग विश्वविद्यालय में निर्मल वर्मा द्वारा भारत और यूरोप शीर्षक पर दिए गए आख्यान से इस कदर प्रभावित लगते हैं कि कई जगह उद्धरण तक वही के वही परोस दिए गए हैं, मगर उस विषय पर मैं कुछ नहीं कहूँगा। मुझे जो बात हैरान करने वाली लगती है उसे अम्बिकादत्तजी की बौद्धिक रणनीति कहा जा सकता है। एक मिसाल से शायद यह बात साफ हो जाए। वैसे जिस अंश का मैं यहाँ उल्लेख करने जा रहा हूँ, काफी हद तक निर्मलजी से मुतास्सिर है मगर खुद लेखक की भी रणनीति इसमें झलकती है। प्रसंग है भारतीयों का दुनिया की अन्य संस्कृतियों के प्रति उदासीनता का। अम्बिकादत्त जी लिखते हैं -
भारत को जानने की जिज्ञासा लेकर यहाँ यूनानी, चीनी, मुस्लमान यात्री-इतिहासकार और पता नहीं कौन-कौन आए लेकिन भारतीय भी ऐसे उद्देश्यों को लेकर बहार गए हों, इसका कोई दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। यहाँ तक कि हिन्दुओं का मुसलमानों के साथ कोई दार्शनिक धार्मिक अथवा धार्मिक शास्त्रार्थ भी नहीं हुआ।(30)
अब यह एक मसाला तो है - और मुमकिन है कि वर्तमान की हमारी आत्म-मुग्धता (या कूप-मंडूपता) के कुछ सुराग इस तथ्य में मिलते हों। सारी दुनिया को आप में दिलचस्पी थी, मगर आप को किसी और में कोई दिलचस्पी नहीं - यह आत्म-मुग्धता नहीं तो और क्या है? कम अज कम यह टटोलने लायक एक सवाल तो है ही। मगर अम्बिकादत्त जी उस तरफ नहीं जाते, बल्कि वे कहते हैं -
भारतीयों की दूसरी संस्कृतियों और धर्मों के प्रति इस चुप्पी को अन्य के प्रति जिज्ञासा का अभाव तो नहीं कहा जा सकता। हमें यह मालूम है कि आनोभद्रा क्रतवो यन्तु विश्वतः उनकी खुली जिज्ञासा का आदर्श रहा है। वस्तुतः भारतीयों की यह प्रवृत्ति एक सांस्कृतिक मनोविज्ञान का प्रश्न है और इसके खुलासे से उसके साभ्यतिक-सांस्कृतिक चरित्र को बहुत गहरे से समझा जा सकता है। (31)
इस उद्देश्य से लेखक दो कारणों की तरफ इशारा करते हैं। पहला कारण यह कि भारतीयों ने पहले ही एक ऐसी आत्म -निर्भर और आत्म-पूरित व्यवस्था तैयार कर ली थी जो जीवन और जगत की तमाम जरूरतों, जिज्ञासाओं का समाधान करने में सक्षम थी। अतः उसे दूसरी संस्कृतियों से कुछ सीखने की आवश्यकता नहीं पडी। (31, जोर हमारा) वे आगे और भी मार्के की बात कहते हैं-
दूसरा एक और गंभीर कारण यह कि भारतीयों के लिए अपनी अस्मिता को परिभाषित करने का सन्दर्भ कभी अन्य रहा ही नहीं, जैसा कि यूरोपियों के लिए यह सदैव रहा है। (31, जोर हमारा)
हैरानी होती है कि अम्बिकादत्तजी इतने बडे बयान बिना पलक झफ दे डालते हैं जिनमें वे न सिर्फ दो तीन हजार सालों के भारतीय चिंतन को समेत लेते हैं, बल्कि इस अंदाज में बात करते हैं कि गोया पूरे यूरोप का चिंतन उनकी उँगलियों पर हो। पूरे यूरोप में, सदैव अन्य के बरअक्स खुद की पहचान परिभाषित होती रही और आपने कभी अन्य को सन्दर्भ बिंदु माना ही नहीं। अम्बिकादत्तजी तकरीबन पूरी किताब में इसे तरह सपाट बयानी का परिचय देते हैं और जहाँ कहीं उनके सामने एक जटिल सवाल खडा होता है (जैसे भारतीयों की औरों के प्रति उदासीनता का) वैसे ही वे इस तरह की पैंतरों का सहारा लेने लगते हैं।
अपने बात को स्पष्ट करने के लिए इस सन्दर्भ में मैं दो सवाल उठाकर यह समीक्षा खत्म करना चाहता हूँ। पहला, जो एक कयास ही कहा जा सकता है मगर मैं उसे अम्बिकादत्तजी की तरह सत्य का जामा नहीं पहनाना चाहता- जिन्हें हम आज हिन्दू कहते हैं, मूलतः ब्राह्मण वर्चस्व वाले समाज में जाति और वर्णधर्म के प्रधानता के कारण विदेशों में आने जाने पर पाबंदियाँ थीं ऐसा तो हम जानते ही हैं। क्या यह मुमकिन है कि भारतीयों की उदासीनता का सबब ऐसा ही या इससे जुडा कुछ रहा हो? क्या यह दिलचस्प नहीं कि लेखक इस संभावना को भूले से भी अपनी विश्लेषण में जगह नहीं देते? दूसरा सवाल यह है कि अगर यह सच है कि भारतीयों के लिए अन्य कभी भी (सदैव?) अपनी अस्मिता को परिभाषित करने का सन्दर्भ बिंदु नहीं रहा, तो आज क्या हो रहा है इसकी व्याख्या क्या एक दार्शनिक को देनी नहीं चाहिए? आज बात बात पर मुस्लमान क्या कर रहा है वह ही आप का सन्दर्भ बिंदु बना हुआ है और उसी के बरअक्स भारतीयता परिभाषित हो रही है। दिलचस्प यह है कि खुद अम्बिकादत्तजी हिंदुत्व के इस विचार के हामी हैं (कई उद्धरण दिए जा सकते हैं, मगर एक ही काफी है) -
परन्तु, हिन्दू-मुस्लिम इतिहास का चित्रपट इतना विशाल कि हाशिये पर दोनों के बीच अपनेपन और परायेपन के बहुतेरे सन्दर्भ प्राप्त होते हैं, लेकिन सत्य जो केंद्र में है वह यह की अपनेपन का प्रस्ताव हिंदुपक्षीय और हिंदुहेतुक है तथा परायेपन का प्रस्ताव इस्लामपक्षीय और इस्लामहेतुक है। (62, जोर हमारा)
उनका मतभेद एक खास सत्तासीन हिंदुत्व से बस इतना है कि हमें उग्र होकर उनकी तरह नहीं हो जाना चाहिए क्योंकि वह हमारे स्वभाव के विपरीत होगा। तो उनका और हमारा फर्क तो खुद उनकी सोच का अभिन्न अंग मालूम होता है। फिर इन दावों को हम कैसे समझें?
अंत में एक बात और। अम्बिकादत्तजी के वृत्तांत का खलनायक जवाहरलाल नेहरू हैं। यहाँ नेहरू और उनकी विरासत पर बात करने की गुजांइश नहीं है, मगर लेखक व पाठकों के सामने एक सवाल छोड कर यह समीक्षा खत्म करूँगा। जवाहरलाल नेहरू के पुनर्मूल्यांकन की - और उनकी आलोचना की - आज अवश्य जरूरत है। जैसे किसी भी महान शख्सियत की होनी चाहिए। मगर आलोचना और पुनर्मूल्यांकन एक बात है और अपनी सामूहिक विफलताओं के लिए खुद अपने गिरेबान में झाँके बिना खलनायक खडे करना जैसा आज कुछ हलकों में फैशन है, बिलकुल अलग बात है। अम्बिकादत्तजी की किताब पढते हुए मुझे दूसरी प्रवृत्ति ज़्यादा दिखाई दी। एक बात जो अक्सर मन में कौंधती है उसे एक सवाल के रूप में रखने से पहले लेखक का एक उद्धरण पेश है। वे कहते हैं -
समाजशास्त्र के क्षेत्र में तो पश्चिमी समाजविज्ञान को आकण्ठ अपना लिया गया। मनो भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक चिंतन जैसी कोई चीज ही नहीं रही। हाँ, भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक चिंतन के नाम पर हमें ओरिएंटलिस्ट षड्यंत्रों के तहत खोजे गए रंगभेद सरीखे अनेकों शगूफे, विष-बीज पकडा दिए गए हो, हमारे लोकजीवन की समरसता को आज पूरी तरह विषाक्त कर चुके हैं, समाज के एकीकृत ढाँचे को फाँक-फाँक कर दिया है। (80, जोर हमारा)
इस उद्धरण पर एक टिप्पणी और एक सवाल-टिप्पणी यह कि इस पूरे विमर्श से या लगता है कि भारतीय संस्कृति की सुदीर्घ निरंतरता और समरसता की प्रस्थापनाओं के बारे में लेखक किसी किस्म के सवाल या किसी आलोचना को बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं हैं, इसलिए उन्होंने तय ही कर लिए है कि समाज में जो कुछ खराब है वह या तो अंगेजों की देन है या मुसलमानों की। यह बात न स्वामी विवेकानंद स्वीकारते हैं (ऊपर दिया गया उद्धरण देखें) और न स्वामी दयानन्द सरस्वती - जिनकी वैदिक धर्म पर लौटने का प्रस्ताव निरंतरता के विचार को सिरे से खारिज करता था और जिसके लिए उनपर भी सनातनियों द्वारा बेतहाशा हमले हुए। दयानन्द सरस्वती इस बात को बखूबी मानते थे कि हिन्दू समाज में अनगिनत कुरीतियाँ शामिल हो गयी हैं - बेशक उनके विश्लेषण और हल से हम सहमत न हों। रवीन्द्रनाथ ठाकुर और महात्मा गाँधी, जिनके बारे में (दयानन्द समेत) अम्बिकादत्तजी यह मानते हैं कि वे सभी उस तत्त्व के द्रष्टा थे जो सनातन भारत का स्वत्व है (77) तो एक बारे में बिलकुल स्पष्ट थे - इन दोनों महापुरुषों का सरोकार वर्तमान की चुनौतियों से था और वे हमेशा परम्परा से जुडे रह कर भी उसके आलोचक रहे। मुझे नहीं लगता है की इनमें कहीं भी आपको वो अतीतोन्मुखी भाव देखने को मिलेगा जो अम्बिकादत्तजी की किताब में इतना हावी है। और इनमें से कोई भी नेहरूवादी नहीं थे!
और सवाल यह- मुझे लगता है कि समाजविज्ञान के सन्दर्भ में भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक चिंतन का मसला उठाने वाले अक्सर यह भूल जाते हैं कि समाजविज्ञान का कारोबार आधुनिकता से पैदा होता है। मुमकिन है मैं यहाँ कुछ गलत समझ रहा हूँ, मगर जो भी यह दवा करते हैं कि भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक चिंतन के बूते पर अलग समाजविज्ञान गढा जा सकता था या है, क्या आप मीमांसा, न्याय या सांख्य के प्रत्ययों का इस्तेमाल करके बाजार के नियम या फिर जनतंत्र व फासि*म जैसी परिघटनाओं पर रौशनी डाल सकते हैं? क्या आप महीनों से चल रहे किसान आंदोलन के बारे में उन प्रत्ययों के आधार पर कोई विश्लेषण प्रस्तुतु कर सकते हैं? अगर हाँ, तो जरूर प्रकाशित करें, ताकि इन्हें पढाया जा सके।

पुस्तक का नाम : भारतीय मानस का वि-औपनिवेशी
-करण : प्रामाणिक संस्कृतात्मा के
प्रत्यभिज्ञान की कार्ययोजना।
लेखक : अम्बिकादत्त शर्मा,
प्रकाशक : सेतु प्रकाशन व राजा फाउंडेशन,
दिल्ली,
सन् : 2020
मूल्य : 115


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