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साहित्यिक समाचार

शोध पत्रिका सामाजिकी का लोकार्पण

गोविन्द बल्लभ पन्त सामाजिक विज्ञान संस्थान और राजकमल प्रकाशन के संयुक्त पहल से प्रकाशित सामाजिकी पत्रिका के प्रवेशांक का लोकार्पण वरिष्ठ समाजशास्त्री आशीष नंदी, इतिहासकार सुधीरचंद्र, आलोचक-अनुवादक प्र.टी.वी. कटीमनी, राजनीतिक सिद्धान्तकार प्रो. राजीव भार्गव, राजनीतिक सिद्धान्तकार प्रो. विधु वर्मा, मानव विकास अर्थशास्त्री संतोष मेहरोत्रा और समाजशास्त्री प्रो. राजन हर्षे समेत अनेक गणमान्य हस्तियों की गरिमायी उपस्थिति में हुआ।
लोकार्पण कार्यक्रम पर हिन्दी में सामाजिकी र् चिन्तन की नई दिशाएँ विषय पर आयोजित परिचर्चा में राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने कहा कि राजकमल पाठकों के ज्ञान और संवेदना को समृद्ध करने वाली सामग्री के प्रकाशन के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहा है। अपनी स्थापना के 75वें वर्ष की ओर बढते हुए सामाजिकी का प्रकाशन कर हमने अपने संकल्प को पूरा करने की दिशा में एक कदम और आगे बढाया है।

व्यंग्य संग्रह 36 का आँकडा का लोकार्पण
जयपुर। देश की अग्रणीय साहित्यिक संस्था कलमकार मंच की ओर से डॉ. राधाकृष्णन पुस्तकालय एवं आलोकपर्व प्रकाशन के सहयोग से आजादी का अमृत महोत्सव के अंतर्गत लाईब्रेरी सभागार में आयोजित कार्यक्रम में किया गया।
इस अवसर पर कलमकार मंच के राष्ट्रीय संयोजक निशांत मिश्रा ने सभी आगुन्तकों का स्वागत करते हुए संस्था की भावी योजनाओं और आगामी माह प्रकाशित होने वाली किताबों की जानकारी दी।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ व्यंग्यकार, कवि और मुख्यमंत्री के विशेषाधिकारी फारूक आफरीदी ने कहा कि सामाजिक विद्रूपताएँ व्यंग्य की जननी है। व्यंग्यकार को समाज के व्यापक हित में अपनी प्रखर कलम के माध्यम से आज के कबीर यानी एक्टिविस्ट की भूमिका निभानी होगी।
अंत में डॉ.राधाकृष्णन लाईब्रेरी की अधीक्षक रेखा यादव ने सभी अतिथियों एवं आगुन्तकों का आभार व्यक्त किया।
- डेस्क मधुमती

रश्मि शर्मा का सुयश
झारखंड की वरिष्ठ कवयित्री शैलप्रिया की स्मृति में स्त्री लेखन के लिए दिए जाने वाले सम्मान के लिए इस वर्ष रांची की लेखिका रश्मि शर्मा का चयन किया गया है। इस सम्मान में 15,000 रुपये की राशि और मानपत्र अर्पित किया जाएगा।
रश्मि शर्मा को यह सम्मान रांची में आयोजित एक समारोह में प्रदान किए जाने की योजना है।

डॉ.रत्नाकर पाण्डेय स्मृति राष्ट्रीय साहित्यांचल सम्मान
2021 श्रीकृष्णशर्मा और फारूक आफरीदी को
प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री कृष्ण शर्मा और वरिष्ठ व्यंग्यकार एवं कवि फारूक आफरीदी (जयपुर) को वर्ष 2012 का डॉ.रत्नाकर पाण्डेय स्मृति राष्ट्रीय साहित्यांचल सम्मान प्रदान किया जाएगा।
साहित्यांचल के प्रधान संपादक और समारोह के संयोजक सत्यनारायण व्यास मधुप ने बताया कि यह दो दिवसीय समारोह 25 और 26 दिसम्बर2021 को भीलवाडा में होगा।

हिंसा के बीच फँसी सभ्यता के इस दौर में
ज्यादा गाँधीवादी होने की जरूरत है
बीते रविवार कानपुर में प्रसिद्ध साहित्यकार गिरिराज किशोर (1937-2020) की स्मृति में अनुष्टुप का पहला आयोजन हुआ।
इस आयोजन में नौ प्रमुख वक्ताओं (राजाराम भादू, अनुज लुगुन, रमाशंकर सिंह, हितेंद्र पटेल, रामशरण जोशी, भाषा सिंह, प्रियंवद, रूपरेखा वर्मा, नंदकिशोर आचार्य) ने दो सत्रों में एक प्रसंग को छोडकर अतिवाद से भरसक बचते हुए अपने वक्तव्य दिए। कानपुर सरीखी स्थानीयताएँ अतिवाद पर प्रतिक्रया को स्थगन या प्रतीक्षा के शिल्प में रखना पसंद नहीं करती हैं।
इसका नजारा इस कार्यक्रम के बिल्कुल मध्य में तब हुआ जब प्रियंवद अल्पसंख्यकों पर अपनी बात रखते हुए यह कह बैठे कि उन्होंने मुस्लिम घरों में प्रायः गाँधी की तस्वीर नहीं देखी है। उनका वक्तव्य सभागार में उपस्थित उस मंच और जन-हस्तक्षेप की वजह से अधूरा रहा जो उनकी पूरी बात सुने बगैर उनसे असहमत था।
इस तरह के दृश्य उन आयोजनों में संभव नहीं हैं जिनमें अभिजात्य तो होता है, पर संवाद की सामूहिक गरिमा नहीं होती।
इस आयोजन की शुरुआत गिरिराज किशोर के उपन्यास पहला गिरमिटिया के अंश पर आधारित संजीबा निर्देशित लघु फिल्म ‘गाँधी गिरमिटिया गिरिराज’ से हुई। इसके बाद नंदकिशोर आचार्य ने अपनी नवीनतम पुस्तक विद्रोही महात्मा वाया रामशरण जोशी प्रियंवद को सार्वजनिक रूप से भेंट की। पुस्तक लोकार्पण की दिशा में इस नवाचार के बाद वक्तव्यों का सिलसिला शुरू हुआ।
दूसरे सत्र की शुरुआत प्रसिद्ध लेखक-पत्रकार रामशरण जोशी के वक्तव्य से हुई। उन्होंने मार्कस और गाँधी को तुलनात्मक रूप से देखते हुए कहा कि मार्कस वर्गहीन समाज चाहते थे और गाँधी राजहीन। उन्होंने कहा कि अहिंसा समाज का स्वाभाव हो सकता है, राज्य का नहीं।
इस संगोष्ठी का समाहार समादृत साहित्यकार और विचारक नंदकिशोर आचार्य के वक्तव्य से हुआ। उन्होंने कहा कि हिंसा का सवाल मुख्यतः हमारे बिलीव सिस्टम का सवाल है। बर्बरीकरण हमारे बिलीव सिस्टम में आ चुका है।
ऐसे में हमें यह देखना होगा कि कहाँ-कहाँ हमारा मन हिंसा के पक्ष में खडा हो जाता है। वह कब-कब किस-किस तरह की हिंसा को जायज ठहरा देता है। नंदकिशोर आचार्य ने इस कायक्रम की शुरुआत में गाँधी को ग्रैंड फेल्योर मानते हुए कहा था कि गाँधीवादी होने के लिए बहुत साहस की जरूरत होती है।
उन्होंने कहा कि वह अपने समापन वक्तव्य में गाँधी के बगैर इस विषय पर बात करना चाहते थे, लेकिन गाँधी के बिना यह बात संभव ही नहीं है। क्योंकि हर तरह की सत्ता आज हिंसात्मक नतीजे दे रही है। अर्थव्यवस्था का काम बर्बरता के बिना नहीं चलता है, इसलिए अर्थव्यवस्था का चरित्र बदले बगैर, राज्य का चरित्र बदलना संभव नहीं है।
इस कार्यक्रम के पहले सत्र का संचालन बसंत त्रिपाठी ने और दूसरे सत्र का संचालन आनंद शुक्ल ने किया।
(लल्लनटॉप पर अविनाश मिश्र की लिखी रपट का संपादित अंश)