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संवाद निरन्तर

मधुमती : साहित्यिक पत्रकारिता का नया स्वरूप



हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता का दीर्घ गौरवशाली इतिहास रहा है । आधुनिक काल के आरम्भ में लगभग सभी साहित्यकार किसी न किसी पत्रिका के संपादन से जुडे थे । उस जमाने में पत्रिका के प्रकाशन का महत्त्व भारतेंदु हरिश्चंद्र की नये जमाने की मुकरी के उस पद से समझी जा सकती है जिसमें वे अखबार के सातवें या आठवें दिन आने पर अपनी खुशी जाहिर करते हैं। वह उन्हें देश विदेश के हाल सुनाता है और घर बैठे ही जोडे तार। उसके साथ जुडे छापाखाना को वे सयाना काम करने वाला बताते हैं। भारतेंदु मण्डल के सभी सदस्य पत्रिकाओं का संपादन किया करते थे । तब देश में प्रथम स्वाधीनता संग्राम को दमन के बल पर कुचले कम ही दिन हुए थे और बकौल भारतेंदु भारतवासी सिर भी नहीं हिला सकते थे । ऐसे माहौल में तरह तरह के उपायों से इन साहित्यकारों ने पत्रिकाओं के माध्यम से देश की हालत का बयान किया। इसीलिए उस समय की पत्रिकाओं में साहित्यिक और साहित्येतर सामग्री को अलगाना मुश्किल होता है । आजादी के बाद जाकर साहित्यिक पत्रकारिता की पहचान अलग बनी । इसके बावजूद साहित्येतर सामग्री भी धर्मवीर भारती संपादित साप्ताहिक हिंदुस्तान में जगह पाती रही । अजादी के बाद विभिन्न प्रदेशों के साथ केंद्र सरकार ने भी पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू किया ।

आम तौर पर जिन पत्रिकाओं पर सरकारी ठप्पा लग जाता है उनकी गुणवत्ता संदेह के घेरे में आ जाती है। इस आम चलन के एकाधिक अपवाद भी रहे हैं। इस अपवाद का सबसे जोरदार उदाहरण देवेंद्र सत्यार्थी के संपादन में निकलने वाली पत्रिका आजकल थी। कहा जा सकता है कि उसकी गुणवत्ता के पीछे स्वाधीनता आंदोलन के मूल्यों का दबाव था। असल में अंग्रेजी शासन की पराधीनता को तत्कालीन बौद्धिक राजनीतिक के साथ भाषा और साहित्य के स्तर पर भी अनुभव करते थे। इसीलिए भारतेंदु ने लिखा कि निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल । उस जमाने में हिंदी भाषा को मजबूत बनाने का काम देशभक्ति से अभिन्न रूप से जुडा हुआ था । साहित्य की उन्नति को इसका माध्यम समझा गया । यही कारण है कि उस समय के अधिकांश राजनेता साहित्य, खासकर हिंदी साहित्य का न केवल ज्ञान रखते थे, बल्कि साहित्यकारों से भी उनकी निकटता हुआ करती थी। साहित्यकार भी खुद को स्वाधीनता आंदोलन का अंग महसूस करते थे। प्रेमचंद ने देश की आजादी के काम आने वाली किताबें लिखने की जो इच्छा जाहिर की उसके मूल में यही भावना थी । रवींद्रनाथ ठाकुर के बारे में कहना मुश्किल है कि उनके भीतर देश की आजादी का चिंतक बडा था या साहित्यकार। ऐसे ही वातावरण में परम घुमंतू देवेंद्र सत्यार्थी इन सबके नजदीक रहे। स्वाभाविक था कि इस विरासत ने उनके संपादन को अलग तेवर दिया । उनके संपादन छोडने के बाद लम्बे समय तक इस पत्रिका की कोई छाप नहीं बन सकी। काफी समय के बाद पंकज बिष्ट के कुशल संपादन में फिर से उसका पुराना गौरव लौटा था । इसके पीछे भी एक साहित्यिक वातावरण का योगदान था। खुद पंकज बिष्ट साहित्य और कला को बदलाव के मामले में अग्रधावक (अवांगार्द) मानने के वातावरण में जवान हुए थे । दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे उच्च शिक्षा संस्थान के अध्यापक भी एक पत्रिका का संपादन करते थे । विद्यार्थी भी इन पत्रिकाओं के पाठक तथा लेखक हुआ करते थे । ध्यान देने की बात है कि इन दोनों ही समयों में इस पत्रिका में प्रकाशित सामग्री में साहित्य के अवांतर प्रसंग भी हुआ करते थे । हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं को वैचारिक समझ की उन्नति के लिए सामाजिक विज्ञान से जुडे लोग भी देखा करते थे । सिद्ध है कि वातावरण के अतिरिक्त उस व्यक्ति संपादक का भी महत्त्व पत्रिका की गुणवत्ता के साथ नाभिनालबद्ध है ।

ऐसा ही साहित्यिक उत्थान एक अन्य सरकारी पत्रिका उत्तर प्रदेश के सिलसिले में देखा गया जब श्री विजय राय ने उसका संपादन का भार ग्रहण किया । उस पत्रिका का प्रतिबंधित साहित्य विशेषांक संग्रहणीय उपलब्धि था । वीर सावरकर के 1857 पर लिखे से लेकर रवींद्रनाथ ठाकुर की रूस की चिट्ठी समेत तमाम दुर्लभ सामग्री का संग्रह उस अंक में विजय राय ने किया था । संपादकीय नजरिया असल में किसी भी पत्रिका की जान होता है क्योंकि उस नजरिये का जन्म खास सामाजिक वातावरण से होता है । प्रकाशित सामग्री की सबसे बडी खूबी यह होती है कि वह संपादकीय स्वेच्छाचार के हिसाब से नहीं हो सकती क्योंकि पाठकों का विशाल समुदाय भी परोक्ष दबाव बनाए रहता है । इन सबको संतुलित करते हुए किसी गुणवत्ता वाली सरकारी साहित्यिक पत्रिका का नियमित प्रकाशन निश्चय ही श्लाघनीय काम है । सभी जानते हैं कि ऐसी जगहों पर निहित संकीर्ण स्वार्थ वाले राजनेताओं और नौकरशाहों से निरंतर सम्पर्क किसी भी रचनात्मक काम के लिए भरपूर प्रतिकूल माहौल बना देता है । इस प्रत्यक्ष सीमा के बावजूद राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका मधुमती ने पिछले वर्षों में संपादक ब्रजरतन जोशी के संपादन में हिंदी की दुनिया में अपनी खास पहचान बनायी है ।

किसी भी पत्रिका की गुणवत्ता के लिए संपादक की योग्यता से अधिक उसकी रुचि का महत्व होता है । इस मामले में बिना किसी अपवाद के कहा जा सकता है कि ब्रजरतन जोशी ने मधुमती को लगभग मिशन की तरह बना लिया है। इसके लिए वे लेखकों से व्यक्तिगत सम्पर्क करते हैं। अन्य जगहों पर उनकी प्रकाशित सामग्री को परखकर उनसे उनकी रुचि के विषयों पर लिखने का आग्रह करते हैं । लेखक स्वभाव से अभिमानी होता है इसलिए उसे नितांत औपचारिक या व्यावसायिक की जगह निजी संस्पर्श आकर्षित करता है । ब्रजरतन जी खुद लेखक होने के कारण इस खूबी से परिचित हैं इसलिए लेखकों से लिखने का आग्रह करने में इसका उपयोग भी करते हैं । समीक्षा के सिलसिले में भी वे रचना का चुनाव सोच समझकर करते हैं और फिर सुयोग्य व्यक्ति से समीक्षा कराते हैं । कहने की जरूरत नहीं कि समीक्षा से साहित्य जगत की रुचि का परिष्कार होता है ।

इसके अतिरिक्त उन्होंने राजस्थान की स्थानीय मनीषा को अखिल भारतीय स्तर पर उजागर करने का बेहद आवश्यक कार्य किया है । राजस्थान की सामान्य छवि केवल शौर्य के साथ जोड दी गयी है । इसे व्यापक बनाते हुए दर्शन, पर्यावरण तथा अन्यान्य अनुशासनों की मौलिक प्रतिभाओं को रेखांकित करने वाले लेख इसमें छापे गए हैं । आखिर अनुपम मिश्र के पर्यावरण संबंधी शोध और लेखन के केंद्र में राजस्थान ही तो है । हिंदी के मामले में उत्तर प्रदेश और बिहार के बाहर की व्यापक दुनिया को बहुतेरे लोग नहीं जानते । इस संकीर्णता की शिकायत मध्य प्रदेश और राजस्थान के विद्वान अक्सर करते रहते हैं। राजस्थान के ढेर सारे मनीषियों की उपलब्धियों को सामने लाकर उन्होंने इस पत्रिका का बुनियादी कर्त्तव्य पूरा किया है । इस मामले में न केवल विद्वत्ता, बल्कि शैल्पिक रचनात्मकता को रेखांकित करने का प्रयास तो अनूठा रहा है। इस रचना के सभी कर्ता सदियों से संचित कौशल के स्वामी होते हैं । उनकी जादूभरी कारीगरी को उजागर करना प्रतिभा की बहुरंगी छटा के प्रति सश्रद्ध विनय को जन्म देता है ।

पत्रिका की पहचान बनाने में उसके गाँधी विशेषांक का भी भरपूर योगदान रहा । कहना न होगा कि आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर स्वाधीनता संग्राम के इस अपूर्व योद्धा का पुण्य स्मरण बेहद जरूरी था । महात्मा गाँधी पर केंद्रित इस अंक में लिखने वालों ने गाँधी को किसी विगत परिघटना की तरह याद नहीं किया बल्कि वर्तमान संदर्भ उनकी चर्चा के पीछे से बोल रहा था । गाँधी ने शहादत का वरण किया और सच्चे लोकतांत्रिक जीवन की कीमत चुकायी । राजसत्ता में मद और अहंकार की किसी भी बढोत्तरी का जीवंत प्रतिरोध गाँधी अभी बहुत दिनों तक बने रहेंगे । अकारण नहीं इस देश के सामान्य जन उस संत के साथ अपने को एकमेक करके देखते और समझते हैं । सूट-बूट और आडम्बर की बहुतायत के इस समय में वह अधनंगा फकीर फिर से प्रासंगिक हो गया है । समग्र अनुपनिवेशन की उनकी परियोजना वर्तमान हालात के लिहाज से बहुत ही महत्व की हो गयी है । उन पर विशेषांक निकालकर मधुमती ने देश की बहुमूल्य सेवा की है । इन सब वजहों से मधुमती पत्रिका न केवल राजस्थान बल्कि समग्र हिंदी भाषी बौद्धिक समुदाय की पसंदीदा पत्रिका के रूप से स्थापित हो गयी है । इसके कारण तमाम अध्येता और विद्वान बिना किसी संकोच के इस पत्रिका में लिखते रहते हैं ।

बहुत सम्भव है कि भविष्य में राजस्थान साहित्य अकादमी की उज्ज्वल पहचान इस पत्रिका के माध्यम से समूचे देश में निखार पाए। किसी भी ऐसे प्रयास का यही सार्थक उपयोग हो सकता है । किसी भी सरकारी संपत्ति को सार्वजनिक इसी अर्थ में कहा जाता है । इस सार्वजनिक संसाधन का सही रचनात्मक उपयोग यही होगा कि संबंधित प्रदेश की प्रतिभा, विरासत और उपलब्धियों को राष्ट्रीय पहचान मिले । इस मामले में मधुमती ने स्थानीय कवियों, कहानीकारों और रचनाकारों को राष्ट्रीय स्तर का मंच मुहैया करा रही है । हमारे देश भारत के इस नायाब प्रांत की नानाविध छवियों के राष्ट्रीय उद्घाटन की दिशा में मधुमती ने कुछ शुरुआती मजबूत ठोस कदम उठाये हैं। उसे अभी लम्बी यात्रा करनी है। इस यात्रा में उसकी रचनात्मक प्रतिष्ठा ही उसकी पूंजी है और इसे सामने लाकर मधुमती निश्चय ही स्तुत्य प्रयास कर रही है। उसे रंगारंग विद्वत्ता से भरे राजस्थान की पारम्परिक और नवीन कामयाबी को मंच प्रदान करने के लिए भाँति-भाँति के प्रयोग करने हेतु तैयार रहना होगा। रचना को किसी भी अनुशासन में बाँधना सम्भव नहीं होता इसलिए उसकी अभिव्यक्ति को अवसर भी तभी दिया जा सकता है जब संसाधनों का सृजनात्मक अभिनेवेश किया जाए।

- गोपाल प्रधान

* लेखक हमारे समय के अनन्य अध्येता और विचारक हैं।