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आज की कुन्ती

संगीता माथुर
नई अध्यापिका रितु आज फिर देरी से आई थी। हस्ताक्षर के लिए मेरे कमरे में घुसते ही वह सफाई देना शुरू हो गई थी। मेम क्या करूँ? अकेली हूँ। घर बाहर सब....
मैंने उसे बीच में ही टोक दिया था। आप नई हैं। इसलिए शायद अभी इस स्कूल के नियम कायदे नहीं जानतीं। घर परिवार की बातें करने की यहाँ बिल्कुल मनाही है। मेरे सख्त रवैये से वह एकदम सकपका गई थी।
जी! मैं यहीं स्कूल के आस-पास कमरा ढूँढ रही हूँ ताकि समय पर पहुँच सकूँ। वह जल्दी-जल्दी हस्ताक्षर कर जाने लगी तो मैंने कुछ सोचकर उसे फिर रोक दिया।
छुट्टी के बाद मिलकर जाना।
वह स्वीकृति में सिर हिलाकर चली गई तो मैं आगामी रूपरेखा बनाने लगी। मेरे वन बी एच के फ्लैट के लिए यह उपयुक्त किराएदार रहेगी। स्कूल के पास भी है। खाली फर्निश्ड फ्लैट की अच्छी देखभाल भी हो जाएगी। मुझे तो यहाँ परिसर में सुसज्जित प्राचार्य आवास मिला ही हुआ है। रितु पर अपनी सख्ती की बात याद कर थोडी शर्मिंदगी भी महसूस हुई। पर क्या करूँ? जिन्दगी में दो-दो बार धोखा खा लेने के बाद घर परिवार आदि से विश्वास उठ सा गया है। पहली बार पति बेवफा निकला तो दूसरी बार किस्मत जिसने एक दुर्घटना में पति को पागलखाने पहुँचा दिया। जीवन के इस पडाव पर अब वैवाहिक जीवन की साध तो नहीं रही। पर मातृत्व सुख के लिए दिल कई बार मचल उठता है। कोई मेरे घाव न कुरेद डाले इसलिए मैंने स्टाफ को काम और घर परिवार को अलग-अलग रखने की सख्त हिदायत दे रखी थी।
छुट्टी के बाद रितु डरते-डरते मेरे पास आई तो मैंने उसे अपने इरादे से अवगत करा दिया। वह बच्चों की तरह किलक उठी। मेम, आपने तो मेरी समस्या चुटकियों में हल कर डाली। लोग ऐसे ही आपको हिटलर और जाने क्या क्या पुकारते हैं! वह अपनी ही धुन में बोल तो गई पर फिर तुरन्त जीभ काट ली। उसकी बचकानी हरकत पर मेरे चेहरे पर मुस्कराहट आ गई।
जानती हूँ। खैर, यह चाबी ले जाओ और मकान देख आओ। जैसी कि मुझे उम्मीद थी रितु को मकान पहली ही नजर में पसन्द आ गया था। उसने झटपट शिफ्ट भी कर लिया। अपने स्वभाव के अनुरूप मैं अब भी उससे काम की बात ही करती थी। उसके शिफ्ट होने के बाद तो मैंने फ्लैट की तरफ झांका भी नहीं। रितु बंधा-बंधाया किराया मेरे अकाउंट में जमा करा देती थी। इधर कुछ दिनों से वह आकस्मिक अवकाश ज्यादा लेने लगी थी। कभी तबियत खराब होने के नाम पर आधी छुट्टी भी ले लेती थी। फिर मैंने उसके पेट में हल्का उभार महसूस किया जिसे वह बडी सफाई से दुपट्टे या शॉल में छुपा लेती थी।
तो क्या वह विवाहित है? पर उसने तो कहा था अकेली हूँ। अच्छा, यहाँ अकेली रहती होगी। पति की नौकरी और कहीं होगी। उत्सुकता के बावजूद अपने ही उसूलों के कारण मैं उससे या किसी और से इस बारे में पूछताछ भी नहीं कर सकती थी। मेरा शक सही था। कुछ महीनों बाद ही वह लम्बी छुट्टी पर चली गई। और लौटी तो उभार सफाचट था। शायद खुद ही माँ बनने की मिठाई खिला दे सोचकर मैं शान्त बनी रही। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। वह एकदम सामान्य थी मानो कुछ हुआ ही न हो। साल बीतते न बीतते मुझे फिर उसके गर्भवती होने का शक हुआ। और इस बार भी कुछ महीनों बाद वह लम्बी छुट्टी पर चली गई। उसे छुट्टियों की परवाह नहीं थी। सवैतनिक अवकाश खत्म हो जाने पर वह अवैतनिक अवकाश लेने में भी संकोच नहीं करती थी। इस बार भी वह भरा-भरा शरीर लेकर लौटी। मानो प्रसूति के बाद खूब सेहत बनाकर लौटी हो। चुफ-चुफ शायद उसने अपने सहकर्मियों को पार्टी भी दी हो। पर मैं जानती थी मेरे स्वभाव से अभिज्ञ कोई मेरे सम्मुख ऐसी बात भी नहीं करेगा। पार्टी में बुलाना तो दूर की बात थी।
दीवाली पर मैंने अपने फ्लैट का रंग-रोगन करवाया तो भुगतान के पूर्व एक बार जाकर देख आने की जरूरत महसूस हुई। इस बहाने शायद रितु के बच्चों आदि से मिलने की ख्वाहिश भी मन में थी। पर यहाँ भी निराशा ही हाथ लगी। घर में बच्चे तो क्या उनका कोई चिह्न तक नहीं था। न कपडे, न खिलौने। जरूर अपनी नानी दादी के पास रहते होंगे। पर कोई तस्वीर तो हो। ठेकेदार के संग खडे-खडे ही मैं पूरे घर का निरीक्षण कर आई। रितु ने औपचारिकतावश चाय के लिए अवश्य पूछा पर मुझे रोककर बिठाने, बतियाने में उसकी कोई दिलचस्पी नजर नहीं आई। अपने रूक्ष व्यवहार के कारण मैंने खुद ही तो अपने को सबसे काट रखा था। इसलिए किसी से कोई अपेक्षा रखने का हक भी मुझे नहीं था। आश्चर्य तो तब हुआ जब रितु ने आकर मुझे बताया कि महीने भर बाद वह मकान खाली करने वाली है। आप चाहें तो दूसरा किराएदार ढूँढ लें, नहीं तो मैं ढूँढ लाऊ। हमारे स्टाफ के ही एक दो सदस्य तैयार हैं।
हो जाएगा, कोई बडी समस्या नहीं है। पर तुम कहाँ जा रही हो?
रितु ने झिझकते हुए अपना शादी का कार्ड पकडा दिया तो मैं सनाके की सी स्थिति में आ गई थी।
मैं अब अपने होने वाले पति के शहर में ही नौकरी खोज लूँगी। आप शादी में जरूर आइएगा। मुझे बहुत खुशी होगी।
रितु तो टेबल पर कार्ड रखकर चली गई। लेकिन मैं देर तक प्रश्नों के भँवरजाल में ही उलझी रही। क्या रितु दूसरी शादी कर रही है? बच्चे किसके पास रहेंगे? पहले पति का क्या हुआ?’
अपने निरंकुश एकाकी स्वभाव पर आज मुझे गुस्सा आ रहा था। किसी से आगे बढकर पूछ भी नहीं सकती। शादी तो दूसरे शहर में थी। जिसमें मैं सम्मिलित नहीं हुई। पर अपने ही शहर में उसने सहकर्मियों और दोस्तों को जो छोटी-सी पार्टी दी, उसमें मैं शामिल हुई। सुदर्शन, गरिमामय व्यक्तित्व वाले अपने पति के पास नववधू के श्रृंगार में खडी रितु बहुत प्यारी लग रही थी। उनके और उनके घर परिवारवालों के अतिशय उत्साह को देखकर कहीं भी ऐसा नहीं लग रहा था कि यह उनकी या उनमें से किसी की भी दूसरी शादी है। सब तरफ नजरें दौडाने के बाद भी मुझे दोनों छोटे बच्चों का भी कोई चिह्न नजर नहीं आया। रितु ने अपनी माँ से मिलवाया। पापा ने तो नया नया बिजनेस शुरू किया है। इसलिए आ नहीं पाए। आप माँ से मिलिए। माँ, ये मेरी प्रिंसीपल मेम! जिनके मकान में हम रह रहे हैं। और जिन्होंने हमेशा मेरी मदद की है।
उसकी माँ गौर से मुझे देख रही थी। तुम प्रज्ञा हो? निर्मला की छोटी बहन?
मैं अचकचा गई थी। उन्हें गौर से देखने पर खुशी के मारे मेरी भी चीख निकल गई, विनीता दीदी?
उन्होंने आगे बढकर मुझे बाँहों में भर लिया। वे मेरी दीदी की सबसे अच्छी सहेली थीं। वे निर्मला दीदी का हाल-चाल पूछने लगीं। इससे पहले कि वे मेरे बारे में जानकारी लें मैंने उन्हें अगले दिन लंच के लिए आमन्त्रित कर लिया। साथ में नवविवाहित वर वधू को तो आमन्त्रित करना ही था। अगले दिन स्कूल की छुट्टी भी थी तो दीदी से खूब गपशप का मूड था। अब विनीता दीदी से तो रितु के वैवाहिक जीवन की असलियत जानकर ही रहगी। भले ही इसके लिए मुझे उनके सामने अपने अतीत के पन्ने खोलने पडें। मैंने सोच लिया था।
अगले दिन लंच चल ही रहा था कि रितु के मोबाइल पर कॉल आ गया। सामान पैक करने वाले घर पर उनका इन्तजार कर रहे थे। दोन जल्दी जल्दी खाना खाकर निकल गए। माँ आप बाद में आ जाना। मेम के साथ आराम से पुरानी यादें ताजा कर लो।
दोनों निकल गए तो मैंने इत्मीनान की साँस ली। चलो अब तो और खुलकर पूछताछ की जा सकती है।
कॉफी के कप लेकर हम दोनों बरामदे में आ बैठीं।
रितु काफी खुश नजर आ रही है। विवेक काफी सुलझे विचारों वाला युवक लगता है। मैंने वार्तालाप छेडा।
अरे बहुत समझदार है। वरना मैंने तो रितु की शादी की उम्मीद ही छोड दी थी।
हाँ, दूसरी शादी मुश्किल तो है ही। वो भी जब पहले वाली से 2-2 बच्चे हों। मैंने सहानुभूति दर्शाई।
दूसरी? तुम्हें कोई गलतफहमी हुई है। रितु की तो पहली बार शादी हो रही है।
और बच्चे?
वे उसके नहीं थे। रितु उनकी सेरोगेट मदर मात्र थी।
मुझे चक्कर आने लगे थे। किसी तरह मैंने खुद को संभाला। पर रितु को यह सब करने की कहाँ जरूरत थी?
अब क्या बताऊँ? रितु हमारी इकलौती सन्तान है। हम लोग उसकी डोली सजाने की सोच ही रहे थे कि उसके पापा को बिजनेस में जबरदस्त घाटा हो गया। हम लोग एक तरह से सडक पर ही आ गए थे। रितु ने तुरत फुरत यह नौकरी जॉइन कर ली और हमें धीरज बन्धाने लगी कि पापा का बिजनेस शुरू करने के लिए वह जल्द ही पैसों का इंतजाम करेगी। इस बीच उसने किसी पत्रिका में सरोगेसी का विज्ञापन देख लिया। और उन सम्पन्न निसन्तान दम्पति के लिए बच्चा पैदा करने का फैसला कर डाला।
तो आपको पहले से सब कुछ मालूम था?
नहीं। मालूम होता तो हम रोक न लेते। वह तो बच्चा पैदा कर सौंप देने के बाद हासिल मोटी रकम जब उसने हमें भेजी तो हम चौंके। पर उसने सफाई दी कि उसको बैंक से लोन मिल गया है और उसकी दयालु प्रिंसीपल मेम ने भी उसकी काफी मदद की है। वह तो उन्हीं के घर में रहती भी है। नई नौकरी के बहाने वह काफी समय से हमसे मिलने भी नहीं आई थी। तो हमने उसकी बातों पर भरोसा कर लिया। पर दूसरी बार में मुझे शक हो गया था। कडी पूछताछ करने पर उसने सच्चाई उगल दी थी। हम दोनों ही अपना आपा खो बैठे थे। उसे कुलच्छणी, असंस्कारी जाने क्या क्या कह डाला था! विनीता दीदी की आँखें उन पलों को याद कर भर आई थीं। मैंने हौले से उनका हाथ सहला दिया। तो उनमें आगे बयां करने का हौसला आ गया।
.... रितु सारे आक्षेप सुनती रही। फिर धीरे से पूछा- आप संस्कारी किसे मानती हैं? जो हमारी सभ्यता और संस्कृति के अनुसार व्यवहार करे। वही ना! और हमारी सभ्यता और संस्कृति क्या है? क्या वही जो आप रोज रामायण और गीता में पढती हैं? मैं प्रश्नवाचक निगाहों से उसे ताक रही थी कि उसने अगला प्रश्न उछाल दिया। आपकी नजरों में कुंती, जिसके अलग-अलग पुरुषों से कर्ण और पाण्डवों सहित छह पुत्र थे, वह संस्कारी थी। आपकी नजरों में द्रौपदी जिसके पाँच पति थे, वह संस्कारी थी। तो फिर मैं असंस्कारी क्यों?
कुंती ने अलग-अलग इष्टदेव की आराधना करके अलग-अलग पराक्रम वाले पुत्र पैदा किए। उसके पीछे वासना नहीं एक अच्छा ध्येय छुपा था। मैंने टोका था।
तो आपको क्या लगता है मैंने यह सब वासना के वशीभूत होकर किया? मैंने अपने डिंब में नौ माह तक एक भ्रूण को क्या वासना के कारण रखा? सन्तान के लिए तडपते एक निसन्तान दम्पति को माता-पिता बनने का गौरव दिलवाना क्या अच्छा ध्येय नहीं था? उनसे प्राप्त रकम से पापा का बिजनेस शुरू करवाना क्या अच्छा ध्येय नहीं था? माँ कुंती के अनजानेवश दिए एक आदेश से द्रौपदी पाँच पुरुषों में बँट गई। लेकिन मैंने द्रौपदी के लिए कहीं असंस्कारी या अपवित्र शब्द नहीं सुना।
वे परिस्थितियाँ अलग थीं बेटी। आज वह सब न सम्भव है न व्यावहारिक। उसके पापा ने भी उसे समझाने का प्रयास किया था।
मैं जानती हूँ पापा इतिहास न तो अक्षरशः दोहराने के लिए है और न ही पूर्णतः बिसराने के लिए। इतिहास तो अक्षम पति की पत्नी को नियोग द्वारा गर्भवती होने की इजाजत भी देता है। पर आज समाज वैज्ञानिक रूप से ही इतना सक्षम हो गया है कि उसे इतनी वैचारिक उदारता की आवश्यकता ही नहीं रही। सरोगेसी, स्पर्म डोनेशन, टेस्टट्यूब बेबी, एग फ्रीजिंग जैसे ढेरों विकल्प मौजूद हैं। बदलते समाज में बदलते प्रतिमानों को अपनाना व्यावहारिक बनने का सबूत है न कि असंस्कारी होने का।
तो फिर हमसे यह सब छुपाया क्यों?
क्योंकि मुझे डर था कि आप मुझे इमोशनली ब्लैकमेल कर कमजोर बना देंगे। और ऐसा करने से रोक लेंगे। आपकी अवहेलना करने का मेरा कोई इरादा नहीं था।
लेकिन बेटी अब तुझसे शादी कौन करेगा? हमें इस बात को दबाकर रखना होगा। मैंने कातर स्वर में कहा था।
मैं कुंती वाली गलती नहीं दोहराऊँगी माँ। जिसने बात को दबाए रखकर अनजाने में ही भाई को भाइयों के विरुद्ध खडा कर दिया था। मुझसे शादी करने वाले शख्स को मुझे मेरी सच्चाई के साथ स्वीकारना होगा। रितु ने दृढता से कहा था।
लेकिन बेटी ऐसा शख्स मिलना बहुत मुश्किल है। हमने समझाया था। पर रितु अडी रही।
तो क्या विवेक रितु की सच्चाई जानता है? मैंने अपनी उत्सुक निगाहें विनीता दीदी पर टिका दी थीं।
न केवल जानता है वरन् उस सच्चाई का सम्मान भी करता है। वह खुद स्पर्म डोनेट करके कुछ निःसन्तान दम्पतियों को सन्तान सुख दिलवा चुका है।
वाह! मैंने मन ही मन उस प्रगतिशील, खुली सोच वाले युगल को सलाम किया। जिसने मुझे मातृत्व सुख उठाने की नई राह सुझा दी थी।

सम्पर्क - कोटा राजस्थान